न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- प्रत्यक्ष-
शरीरस्य न चैतन्यं मृतेषु व्यभिचारतः ।
समाधान--कर्ता चेतन होताहै और शरीर चेतन नहींहै; क्योंकि मृतशरीरोंमें
चेतनताका अभाव देखाजाताहै.
ननु चैतन्यं ज्ञानादिकमेव मुक्तात्मनां त्वन्मत इव मृतशरीराणा-
मपि तदभावे का क्षतिः प्राणाभावेन ज्ञानाभावस्य सिद्धेरिति
चेत् । न । शरीरस्य चैतन्ये बाल्ये विलोकितस्य स्थविरे स्मर-
णानुपपत्तेः । शरीराणामवयवोपचयापचयैरूत्पादविनाशशालि-
त्वात् ।
चार्वाक शंका-चैतन्य नाम ज्ञान इच्छादिका है; सो वह जैसे तुम्हारे
मतमें मुक्त आत्मामें नहीं रहते वैसेही हमारे मतमें शरीररूप आत्मामें मृतअवस्थामें
न रहें तो दोष नहीं क्योंकि हमारे मतमें मृत शरीरमुक्त आत्मा है और आपको
शरीरमें ज्ञानाभाव प्राण तथा आत्मा उभयके अभाव प्रयुक्त मानना पड़ता है. हमा-
रेको केवल प्राणके अभावसे शरीरमें ज्ञानाभाव माननेमें लाघव है. समाधान-यदि
शरीर चेतन हो तो बालपनमें देखे पदार्थोंका वृद्ध अवस्थामें स्मरण न होना चाहिये
शरीर पुष्टिक्षीणताकारक अवयवोंके बढ़ने घटनेसे शररिसे उत्पत्ति विनाश स्वभाववाले
अनुभव सिद्ध हैं.
न च पूर्वशरीरोत्पन्नसंस्कारेण द्वितीयशरीरे संस्कार उत्पद्यत
इति वाच्यम् । अनन्तसंस्कारकल्पने गौरवात् । एवं शरीरस्य
चैतन्ये बालकस्य स्तनपानादौ प्रवृत्तिर्न स्यात् । इष्टसाधनता-
ज्ञानस्य तद्धेतुत्वात्तदानीमिष्टसाधनतास्मारकाभावात् । मन्मते
जन्मान्तरानुभूतेष्टसाधनत्वस्य तदानीं स्मरणादेव प्रवृत्तिः ।
शंका-प्रथम शरीरके संस्कार दूसरे शरीरके संस्कारोंके जनकहैं,याते पूर्व देखे पदार्थके
स्मरणकी अनुपपत्ति नहीं है. समाधान-अवयव वृद्धिक्षीणतामयुक्त यावत् शरीर
क्षणक्षणमें बदलते हैं; उनमें यदि पूर्व २ शरीरमें उत्पन्न संस्कारोंसे उत्तर २ शरीरमें
संस्कारोंकी उत्पत्ति माने तो अनेकसंस्कार कल्पनाओंसे अति गौरव होगा. ऐसेही
यदि शरीरही चेतन हो तो प्रथम उत्पन्न हुये बालककी अपनी माताके स्तनसे दूध
पीनेमें प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये;क्योंकि प्रवृत्तिका कारण इष्ट साधनताका "इदं मदि-
ष्टसाधन" इत्याकारक ज्ञान है और प्रथम उत्पन्न स्तनपानप्रवृत्तिके पूर्वकालमें इष्ट-