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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ४९
न चेदमप्रयोजकम् । अपकृष्टमहत्त्वं प्रत्यनेकद्रव्यवत्त्वस्य प्र-
योजकत्वात् । न चैवं क्रमेण तदवयवधारापि सिद्ध्येदिति वा-
च्यम्, अनवस्थाभयेन तत्सिद्धेः ।
शंका-इस पूर्वोक्त अनुमानमें अनुकूल तर्कका अभाव है. समाधान--अपकृष्ट
महत्त्वके प्रति अनेकद्रव्यको कारणतारूपही अनुकूलतर्क प्रसिद्ध है.शंका-इसी क्रमसे
उन अवयवोंकी धाराभी सिद्ध हो तो क्या हानि है? समाधान--अनवस्थारूप दोषके
भयसे तथा मेरु सरसोंके साम्यप्रसंगके भयसे अवयवोंकी धारा माननी अनुचित
है. इससे अणुपरिमाणकी विश्रांतिकी अवधि परमाणुनामक पदार्थ सिद्ध हुआ.
सा च त्रिधा भवेद्देहमिन्द्रियं विषयस्तथा ॥ ३७॥
सा च त्रिधेति । सा कार्यरूपा पृथिवी त्रिविधा शरीरेन्द्रियवि-
षयभेदादित्यर्थः ॥ ३७ ॥
भाषा-वह कार्यरूपा पृथिवी शरीरभेदसे तथा इन्द्रियभेदसे तथा विषयभेदसे तीन
प्रकारकी है ॥ ३७ ॥
तत्र देहमुदाहरति, योनिजादीति-
भाषा-उनमें 'योनिजादि' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार देहके भेदको दिखलाताहै-
योनिजादि भवेद्देहं--
योनिजमयोनिजं चेत्यर्थः ।
भाषा-योनिज तथा अयोनिजभेदसे वह देह दो प्रकारका है.
योनिजमपि जरायुजमण्डजं च । जरायुजं मानुषादीनाम्,अण्ड-
जं सर्पादीनाम् । अयोनिजं स्वेदजोद्भिज्जादिकम् । स्वेदजाः
कृमिदंशाद्याः, उद्भिज्जास्तरुगुल्माद्याः । नारकिणां शरीरमप्य-
योनिजम् ।
भाषा-योनिजशरीरभी जरायुज तथा अण्डजभेदसे दो प्रकारके हैं. उनमें पुरु-
षादिकोंके शरीर जरायुज कहे जाते हैं; तथा सर्पादिकोंके शरीर अण्डज कहे जातेहैं
तैसे अयोनिज शरीरभी स्वेदज तथा उद्भिज्ज भेदसे दो प्रकारके हैं. पसीनेसे उत्पन्न
होनेवाले कीटदंशादिक जीव स्वेदज कहेजातेहैं; तथा भूमिकेभेदनसे उत्पन्न होनेवाले
४

[५० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-

वृक्षलतादिके शरीर द्विज्ज कहे जातेहैं. नरकमें होनेवाले जीवोंके शरीरभी अयो-
निजही हैं; याते पृथक् परिगणन नहींकिये.
न च मानुषादिशरीराणां पार्थिवत्त्वे किं मानमिति वाच्यम्,
गन्धादिमत्त्वस्यैव प्रमाणत्वात् । न च क्लेदोष्मादेरुपलम्भादाप्य-
त्वादिकमपि स्यादिति वाच्यम्, तथा सति जलत्वपृथिवीत्वादि-
ना सङ्करप्रसङ्गात् । न च तर्हि जलत्वादिकमेवास्तु, न तु पार्थि-
वत्त्वमिति वाच्यम् । क्लेदादीनां विनाशेऽपि शरीरत्वेन प्रत्यभि-
ज्ञानात्, गन्धाद्युपलब्धेश्च पृथिवीत्वसिद्धेः । तेन पार्थिवादिशरीरे
जलादीनां निमित्तत्वमात्रं बोध्यम् ।
शंका-पूर्वोक्त पुरुषादिकोंके शरीर पृथिवीसे उत्पन्न होनेवाले हैं इसमें क्या प्रमा-
णहै? समाधान-पुरुषादिकोंके शरीर पार्थिव है, गन्धवाले होनेसे किंवा शुक्लेतररूप-
वाले होनेसे 'घटादिवत्' इत्याकारक अनुमानही प्रमाण है. शंका-पुरुषादि शरी-
रोंहीमें कदाचित् स्वेदादिसे गीलापना और कदाचित् ज्वरादिकोंसे उष्णता प्रतीत
होतीहै, इससे पुरुषादि शरीरोंको जलसे उत्पन्न होनेवाले किंवा तेजसे उत्पन्न
होनेवालेभी कहना चाहिये. समाधान--ऐसा माननेसे जलत्व जातिका तथा पृथिवीत्व
जातिका परस्पर संकर होगा. शंका-यदि ऐसाही है तो इन शरीरोंको जलसे वा
तेजसे उत्पन्न होनेवाला माननाही उचितहै और पार्थिव मानना व्यर्थ है. समाधान-
शरीरसे गीलेपनेके विनाशके पश्चात् किंवा उष्णताके विनाशके पश्चात् भी पुरुषादि
शरीरोंमें 'यह वही देवदत्तका शरीर है' इत्याकारक शरीरत्वरूपसे प्रत्यभिज्ञात्मकज्ञान
होताहै और गन्धके तथा श्वेतेतररूपादिकोंके उपलाभ होनेसे पुरुषादिशरीरोंमें पार्थि-
वत्व निश्चय होताहै, पुरुषादिशरीरोंको पार्थिव सिद्ध होनेसे इनमें जलादिभूतोंको
निमित्तकारण मात्र जानना चाहिये. पुरुषादिशरीरोंमें पाञ्चभौतिकत्वव्यवहारभी पञ्च-
भूतजन्यत्वमात्रको लेकर है किन्तु उपादान तात्पर्य्यसे नहींहै.
शरीरत्वं न जातिः पृथिवीत्वादिना साङ्कर्यात्, किंतु चेष्टाश्र-
यत्वम् । वृक्षादीनामपि चेष्टासत्त्वान्नाव्याप्तिः । नच वृक्षादीनां
शरीरत्वे किं मानमिति वाच्यम् । आध्यात्मिकवायुसम्बन्धस्य


१ यहां संकरका प्रकार ऐसेहै कि-पृथिवीत्वधर्मको छोड़कर शरीरत्वधर्म जलादिशरीरोंमें है
ऐसे शरीरत्वधर्मको छोड़कर पृथिवीत्वघटादिकोंमेंहै एवं दोनों धर्मोंका समावेश मानुषादिशरी-
रोंमें है याते पूर्वोक्तसंकरका लक्षणसमन्वय होसकता है ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५१
प्रमाणत्वात्। तत्रैव किं मानमिति चेत्, भग्नक्षतसंरोहणादिना
तदनुमानात् ।
भाषा-पृथ्वीत्वादिजातियोंके साथ संकर होनेसे शरीरत्व जाति नहींहै,किंतु उपाधि
है,चेष्टा के आश्रयका नाम शरीर है यह उसका निर्वचन है. (चेष्टा) क्रियाका व्याप्य
जाति विशेष है, सो "चेष्टते२" इत्यादि व्यवहारसे प्रत्यक्ष सिद्ध है वह चेष्टा वृक्षादि
शरीरोंमेंभी है याते उनमें अव्याप्ति नहीं है शंका-वृक्षादिकोंके शरीर होनेमें क्या
प्रमाण है? समाधान-वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका सम्बन्ध ही उनके शरीरमें प्रमाण है.
शंका-वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका सम्बन्ध है. इसीमें क्या प्रमाण है?समाधान-१वृ-
क्षादिके स्वयं फूटनेसे, २तथा वृक्षादि शरीरोंमें स्वयं ( विस्फोट ) गूमड़ा होजानेसे,
३ एवं वृक्षादिके परस्पर एक दूसरे पर संरोहण होजानेसे,४ तथा वृक्षादिके वर्द्धनसे,
वृक्षादिकोंमें प्राणवायुका अनुमान होता है.
यदि हस्तादौ शरीरव्यवहारो न भवति, तदाऽन्त्यावयवित्वेन
विशेषणीयम्। न च यत्र शरीरे चेष्टा न जाता तत्राव्याप्तिरिति
वाच्यम्, तादृशे प्रमाणाभावात् । अथवा चेष्टावदन्त्यावयवि-
मात्रवृत्तिद्रव्यत्वव्याप्यजातिमत्त्वं तत्, मानुषत्वचैत्रत्वजातिमा-
दाय लक्षणसमन्वयः । न च नृसिंहशरीरे कथं लक्षणसमन्वयः,
तत्र नृसिंहत्वस्यैकव्यक्तिवृत्तितया जातित्वाभावात् । जलीयतै-
जसशरीरवृत्तितया देवत्वस्यापि¹ जातित्वाभावादिति वाच्यम् ।
कल्पभेदेन नृसिंहशरीरस्य नानात्वेन नृसिंहत्वजात्या लक्षण-
समन्वयात् ॥
शंका-पूर्वोक्त क्रियाविशेषरूप चेष्टा हस्त पादादिकोंमेंभी रह सकतीहै परन्तु वहां
शरीरव्यवहार कोई नहीं करता. समाधान-यदि ऐसा है तो "अन्त्यावयवित्वे सति
चेष्टाश्रयत्वं" ऐसा लक्षण करनेसे दोष नहीं द्रव्यान्तरके अनारम्भकका नाम 'अ-
न्त्यावयवि' है ऐसा शरीर है; हस्तपादादि नहीं हैं. शंका-जिस शरीरमें चेष्टा नहीं
उत्पन्न हुई उसमें पूर्वोक्तलक्षणकी अव्याप्ति होगी. समाधान-ऐसे शरीरमें प्रमाण
१ देवत्वधर्मभी संकरदोषसे दूषित होनेसे जातिरूप नहींहै. उसका प्रकार यह है कि-देवत्व
धर्मको छोड़कर तैजसत्व धर्म स्वर्णादि तैजस पदार्थोंमें रहताहै. एवं तैजसत्वधर्मको छोड़
कर देवत्व जलीय देवोंमें है. उभयका समावेश तैजसदेवोंके शरीरमें है. इसलिये देवत्वधर्म
जातिरूप नहीं है ।

५२ - न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
नहीं है. शंका-मृतशरीरमें चेष्टा नहींहै परन्तु शरीर व्यवहार होताहै. समाधान-
यदि ऐसा है तो चेष्टावाला जो अन्त्यावयवि उसमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी व्याप्य
(मानुषत्व आदिजाति) तादृश जातिमत्त्व पूर्वोक्त लक्षणका विवरण करना उचित है. ऐसा
जातिघटित लक्षण करनेसे दोष नहीं. मानुषत्व चैत्रत्वादि जातिको लेकर लक्षणसम-
न्वय होसकताहै. शंका-नृसिंहके शरीरमें कैसे लक्षणसमन्वय होगा? वहां 'नृसिंहत्व'
धर्मको एकव्यक्तिमें रहनेवाला होनेसे जातिरूपता नहींहै. समाधान-नृसिंहशरीरमें
देवत्वजातिको लेकर लक्षणसमन्वय हो सकताहै. शंका--जलीयशरीरोंमें तथा
तैजसशरीरोंमें वर्तनेवाला होनेसे देवत्वधर्मभी जातिरूप नहीं है. समाधान-कल्प-
कल्पान्तरोंके भेदसे नृसिंहके शरीरोंकीभी अनन्त होनेसे लक्षणसमन्वय होसकताहै.
– इन्द्रियं घ्राणलक्षणम् ।
इन्द्रियमिति । घ्राणेन्द्रियं पार्थिवमित्यर्थः ।
भाषा-इन्द्रियोंमेंसे घ्राण नामक इन्द्रिय पृथिवीसे उत्पन्न होताहै.
पार्थिवत्त्वं कथमितिचेत्। इत्थम्। घ्राणेन्द्रियं पार्थिवं रूपादिषुमध्ये
गन्धस्यैव व्यञ्जकत्वात्, कुङ्कुमगन्धाभिव्यञ्जकगोघृतवत् । नच
दृष्टान्ते स्वकीयरूपादिव्यञ्जकत्वादसिद्धिरिति वाच्यम्। परकी-
यरूपाद्यव्यञ्जकत्वस्य तदर्थत्वात् ।
शंका-'घ्राणइन्द्रिय पार्थिव है' इसमें क्या प्रमाणहै? समाधान-जैसे कुंकुम
(केसर) के गन्धक अभिव्यंजक गोघृत कुंकुमके रूपादिकोंका अभिव्यंजक न होकर
केवल कुंकुमके गन्धहीका व्यंजक है और पार्थिवभी है; वैसेही घ्राणइन्द्रियभी
रूपादिकों के मध्यमें केवल गन्धहीका व्यंजक होनेसे पार्थिव सिद्ध होताहै. शंका-
घृतरूप दृष्टान्त कुंकुमयोगसे उसके गन्धका व्यंजक होकर अपने रूपकाभी व्यंज-
क है; इसलिये पूर्वोक्त हेतु दृष्टान्तमें स्वरूपासिद्ध है. समाधान-परकीयरूपा-
दिकोंके अव्यंजक होकर केवल गन्धहीके व्यंजक होना पूर्वोक्त हेतुका अर्थ है.
ऐसा हेतु घृतरूप दृष्टान्तमें सिद्ध है; क्योंकि घृत अपनेसे पर कुंकुमके रूपादिकोंका
व्यंजक न होकर केवल गन्धहीका व्यंजकहै.
न च नवशरावगन्धव्यञ्जकजलेनैकान्तिकत्वमिति वाच्यम्,
तस्य सक्तुरसाभिव्यञ्जकत्वात्। यद्वा परकीयेति न देयं वायूपनी-

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५१
तसुरभिभागस्य दृष्टान्तत्वसम्भवात्। न च घ्राणेन्द्रियसन्निकर्षस्य
गन्धमात्रव्यञ्जकत्वात्तत्राव्यभिचार इति वाच्यम्, द्रव्यत्वे सती-
ति विशेषणात् ॥
शंका—पूर्वोक्त हेतु जलमें व्यभिचारी है; क्योंकि जलभी नवीन शराव (प्याले)
के गन्धहीका व्यंजक है. समाधान—नवीन शरावके गन्धका व्यंजक जल केवल
गन्धहीका व्यंजक नहीं है, किन्तु सक्तु ( सत्तु ) के रसकाभी व्यंजक है; याते पूर्वोक्त
हेतु जलमें व्यभिचारी नहीं अथवा लाघवानुरोधसे पूर्वोक्त हेतुमें 'परकीय' यह पद न
देना और घृतको दृष्टान्तभी न रखना चाहिये. वायुवेगसे देशान्तरमें प्राप्त जो पुष्पा-
दिकोंके सुगन्धितभाग वे दृष्टान्त बन सकतेहैं; क्योंकि वे रूपादिकोंके मध्यमें
केवल गन्धहीके व्यंजक हैं और पार्थिवभी हैं. शंका—घ्राणइन्द्रियका जो अपने गन्ध-
रूप विषयके साथ 'स्वसंयुक्तसमवाय' संबन्ध है उसको केवल गन्धहीका व्यंजक
होनेसे उसी संबन्धमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार होगा. समाधान—पूर्वोक्तहेतुमें 'द्रव्य
त्वे सति' यह विशेषण देना उचित है अर्थात् द्रव्य होकर रूपादिकोंके मध्यमें गन्ध-
हीका व्यंजक होना चाहिये. एवं पूर्वोक्त संबन्ध द्रव्य नहीं, याते दोष नहीं.
विषयो द्व्यणुकादिश्च ब्रह्माण्डान्त उदाहृतः ॥ ३८ ॥
भाषा—द्व्यणुकादिसे लेकर ब्रह्माण्डपर्य्यन्त विषयरूपा पृथ्वी है ॥ ३८ ॥
विषय इति । उपभोगसाधनं विषयः। सर्वमेव हि कार्यजात-
मदृष्टाधीनम् । यत्कार्यं यददृष्टाधीनं तत्तदुपभोगं साक्षात् प-
रम्परया वा जनयत्येव । न हि बीजप्रयोजनाभ्यां विना कस्य
चिदुत्पत्तिरस्ति, तेन द्व्यणुकादि ब्रह्माण्डान्तं सर्वमेव विषयो
भवति । शरीरेन्द्रिययोर्विषयत्वेपि प्रकारान्तरोपन्यासः शि-
प्यबुद्धिवैशद्यार्थः ॥ ३८ ॥
भाषा—सुखदुःखसाक्षात्कारके प्रयोजकका नाम विषय है. साक्षात् अथवा परंप-
रासंबन्धसे कार्यसंपादकका नाम प्रयोजक है. सम्पूर्ण कार्यसमुदाय जीवोंके अदृ-
ष्टोंके अधीनहै. जो कार्य जिस जीवके जिस अदृष्टके अधीन है वह कार्य उसी जीवको
उसी अदृष्टके अनुसार साक्षात् अथवा परम्परासम्बन्धसे सुखदुःख साक्षात्कारका प्रयो-
जक होताहै. इस संसारमें कारण अथवा प्रयोजनसे विना किसी वस्तुकीभी उत्पत्ति
नहीं है; याते द्व्यणुकादिसे लेकर ब्रह्माण्डपर्य्यन्त सम्पूर्ण विषय होसकताहै. विषयके

पूर्वोक्त लक्षणानुसार यद्यपि शरीर तथा इन्द्रियकी गणनाभी विषयहीके अन्तर्भूत
करनी उचितहै तथापि जुदा परिगणन केवल शिष्यलोगोंकी बुद्धि विशदार्थ है॥३८॥
जलं निरूपयति, वर्णः शुक्ल इति-
भाषा-'वर्णः शुक्ल' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार जलका निरूपण करता है-
वर्णः शुक्लः-
भाषा-जलका शुक्ल अर्थात् सफेद वर्ण है.
स्नेहसमवायिकारणतावच्छेदकतया जलत्वं जातिः सिद्धयति ।
यद्यपि स्नेहत्वं नित्यानित्यवृत्तितया न कार्यतावच्छेदकम्,
तथापि जन्यस्नेहत्वं तथा बोध्यम् । अथ परमाणौ जलत्वं न
स्यात्, तत्र जन्यस्नेहाभावात्। नित्यस्य स्वरूपयोग्यत्वे फला-
वश्यम्भावनियमादिति चेत्, न । जन्यस्नेहजनकतावच्छेदकत-
या जन्यजलत्वजातेः सिद्धौ, तदवच्छिन्नजनकतावच्छेदकतया
जलत्वजातिसिद्धेः । शुक्लरूपवत्त्वमेव दर्शयितुमुक्तं 'वर्णः शुक्ल'
इति । न तु शुक्लरूपवत्त्वं लक्षणम् ।
भाषा-स्नेहरूप कार्यकी समवायिकारणताकी अवच्छेदक होनेसे जलत्वरूपा
जाति सिद्ध है. यद्यपि स्नेहत्वरूप धर्म नित्य जल तथा अनित्य जल उभयमें वृत्ति
होनेसे कार्यताका अवच्छेदक नहीं हो सकता तथापि जन्यस्नेहत्वरूप धर्म कार्यताका
अवच्छेदक जानना चाहिये. शंका-परमाणुओंमें जलत्वजातिकी सिद्धि न होगी;
क्योंकि वहां जन्य स्नेह नहींहै. यदि स्नेहरूप कार्यके प्रति जलीयपरमाणुओंमें स्वरू-
पयोग्यतारूप कारणता माने तो उस स्वरूपयोग्यतारूप कारणतासे कदाचित् फलभी
१ 'समवायसम्बन्धावच्छिन्न स्नेहत्वावच्छिन्न स्नेहनिष्ठ कार्यता निरूपिता तादात्म्यसम्ब-
न्धावच्छिन्ना या जलनिष्ठा समवायिकारणता सा किंचिद्धर्मावच्छिन्ना कारणतात्वात्' इत्यादि ।
२ 'समवायसम्बन्धावच्छिन्नजन्यस्नेहत्वावच्छिन्न जन्यस्नेहनिष्ठजन्यता निरूपिता । तादात्म्य
सम्बन्धावच्छिन्ना या जन्यजलनिष्ठा समवायिकारणता सा किञ्चिद्धर्मावच्छिन्ना कारणतात्वात्'
इत्यादि ।
३ 'एवं समवायसम्बन्धावाच्छिन्नजन्यजलत्वावाच्छिन्नजन्यजलनिष्ठजन्यता निरूपिता तादा-
म्यसंबन्धावच्छिन्ना या शुद्धजलनिष्ठा समवायिकारणता सा किञ्चिद्धर्मावाच्छिन्ना कारणतात्वात्,
इत्यादि । इन प्रयोगोंसे शुद्धजलत्वजातिकी सिद्धि होती है,

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५५
अवश्य होना चाहिये, सो तो नहीं होता; याते स्नेहरूप कार्यकी समवायिकारणताकी
अवच्छेदक एक अनुगत जलत्व जातिकी सिद्धि नहीं होसकती. समाधान-जन्य-
स्नेहनिष्ठ जन्यता निरूपित जो जन्यजलनिष्ठा जनकता तादृश जनकताकी अवच्छे-
दक होनेसे जन्यजलमें जलत्वजाति सिद्ध हुए पश्चात् जन्यजलनिष्ठ जन्यतानिरू-
पित जो शुद्ध जलनिष्ठा जनकता तादृश जनकताकी अवच्छेदक होनेसे शुद्ध जल-
त्वजातिकी सिद्धि होतीहै. जलका रूप श्वेत है, केवल यह दिखलानेके लिये मूलमें
“वर्णः शुक्लः” यह पाठ लिखा है; किन्तु श्वेतरूपवत्त्व जलका लक्षण नहीं है.
अथवा नैमित्तिकद्रवत्ववदवृत्तिरूपवद्वृत्तिद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्य-
जातिमत्त्वम्, अभास्वरशुक्लेतररूपासमानाधिकरणरूपवद्वृत्तिद्र-
व्यत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं वा तदर्थः । तेन स्फटिकादौ ना-
तिव्याप्तिः ।
भाषा-अथवा नैमित्तिक द्रवणवाले जो 'पृथिवी तेजः'उनमें न वर्तनेवाली तथा रूपवा-
लेंमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य 'जलत्व' जाति तादृश जातिवाले होना
जलका लक्षण है; किंवा अप्रकाशक श्वेतरूपसे इतर जो 'नीलपीतादि तथा प्रकाशक
श्वेतरूप'उनका असमानाधिकरण होकर रूपवद् जो जलउसमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी
साक्षात् व्याप्य जलत्वजाति तादृश जातिमत्ताही पूर्वोक्त “वर्णः शुक्लः” इस ग्रन्थका
अर्थ है. एवं लक्षण करनेसे स्फटिकमणिआदिमें अतिव्याप्ति नहींहै. अन्यथा शुक्ल
वर्णवत्त्वेन स्फटिकमणिरूप पृथिवीमें अतिव्याप्ति स्पष्टही थी.
-रसस्पर्शौ जले मधुरशीतलौ ।
भाषा-जलमें रस तथा स्पर्श यथाक्रम मधुर तथा शीतल है.
रसस्पर्शाविति । जलस्य मधुर एव रसः। शीत एव स्पर्शः । ति-
क्तरसवदवृत्तिमधुरवद्वृत्तिद्रव्यत्वसाक्षाद्व्याप्यजातिमत्त्वं तदर्थः,
तेन शर्करादौ नातिव्याप्तिः । ननु शुक्लरूपवत्त्वमेवेति कुतः,
कालिन्दीजलादौ नीलोपलब्धेरिति चेत्,न । नीलजनकतावच्छे-
दिकायाः पृथिवीत्वजातेरभावाज्जले नीलरूपासम्भवात् । का-
लिन्दीजले नीलत्वप्रतीतिस्त्वाश्रयौपाधिकी । अतएव वियति
विक्षेपे धवलिमोपलब्धिः ।

५६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-अर्थात् जलमें रस मधुरही है. तथा स्पर्श शीतही है. इसकाभी तिक्तादि
रसवालेमें न वर्तनेवाली तथा मधुररसवालेमें वर्तनेवाली जो द्रव्यत्वकी साक्षात् व्याप्य
जलत्वजाति तादृश जातिमत्ता जलका लक्षण है, ऐसा जातिघटित लक्षण करना
उचित है. ऐसा कहनेसे चीनी शर्करादिमें अतिव्याप्तिभी नहींहै. क्योंकि ये पार्थिव
हैं. इनमें रहनेवाली पृथ्वीत्व जाति तिक्तादिरसवालेमें न वर्तनेवाली नहींहै, किन्तु
वर्तनेवालीही है; याते जातिघटित लक्षणकी वहां प्रसक्ति नहींहै. शंका-'जलका
शुक्लही रूप है' यह कैसे निश्चय किया जावे? क्योंकि यमुनाके जलमें नीलरूपभी
दिखाईदेताहै. समाधान-नीलरूपनिष्ठ जन्यता निरूपिता जो जनकता तादृश
जनकताकी अवच्छेदक जो पृथिवीत्वजाति उसका जलमें अभाव होनेसे जलमें नील
रूपका सम्भव नहीं होसकता.यमुनाके जलमें नीलरूपकी प्रतीति तो पृथ्वीसम्बन्धसे
औपाधिकी है अर्थात् नीचेकी पृथिवी नीली है उसीकी नीलता जलमें दीख पड़ती है.
इसीसे यमुनाके जलको यदि ऊपरको फेंके तो श्वेत प्रतीत होता है.
अथ जले माधुर्ये किं मानं, न हि प्रत्यक्षेण कोऽपि रसस्तत्रानुभूय-
ते, नच नारिकेलजलादौ माधुर्यमुपलभ्यत एवेति वाच्यम् ।
तस्याश्रयोपाधिकत्वात् । अन्यथा जम्बीरजलादावम्लादिरसोप-
लब्धेरम्लादिमत्त्वमपि स्यादिति चेत्, न। हरीतक्यादिभक्षणस्य
जलरसव्यञ्जकत्वात् । नच हरीतक्यामेव जलोष्णसंयोगाद्रसा-
न्तरोत्पत्तिरिति वाच्यम् । कल्पनागौरवात् ।
शंका-जलके मीठेपनेमें क्या प्रमाण है? रासनज प्रत्यक्षसे तो जलमें किसी
रसकीभी प्रतीति नहीं होती. यदि कहो कि नारियल तथा इक्षु आदिका जल मधुर
ही होताहै, तो युक्त नहीं; क्योंकि वह मधुरता पृथ्वी सम्बन्धसे पृथिवीहीकीहै जलकी
नहीं. (अन्यथा) निम्बु गलगलादिके रसमें आम्ल ( खट्टा) रसभी प्रतीतहोता है वहभी
जलमें मानना चाहिये.समाधान-जलमें अनुद्बुद्ध मधुर रस है. हरीतकी(हरड़) या
आमला खानेके पश्चात् जल पीनेसे उसमें मधुरता उद्बुद्ध होतीहै.शंका-जल तथा
ऊष्म ( मुखकी भाफ ) के सम्बन्धसे हरीतकीमें ही रसान्तरकी उत्पत्ति मान लीजाय
तो क्या दोष है? समाधान-कल्पनागौरव है. अर्थात् फलादिरूप पृथिवीमें रसकी
उत्पत्ति तेजःसंयोगसे देखी जाती है और यदि पूर्वोक्त हरीतकीके उदाहरणके अनु-
रोधसे जलके संयोगकोभी पृथिव रसका उत्पादक माना जाय तो यह एक जुदा
कार्यकारणभाव माननेमें कल्पनागौरव है,

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५७
पृथिवीत्वस्याम्लादिजनकतावच्छेदकत्वाच्च जलेनाम्लादिकम् ।
जम्बीररसादौ त्वाश्रयोपाधिकी तथा प्रतीतिः । एवं जन्यशीत-
स्पर्शजनकतावच्छेदकं जन्यजलत्वम्, तदवच्छिन्नजनकताव-
च्छेदकं तु जलत्वमिति बोध्यम् । घृष्टचन्दनादौ तु शैत्योपलब्धि-
श्चन्दनान्तर्वर्तिशीततरसलिलस्यैव । तेजःसंयोगाज्जले उष्णप्रती-
तिरौपाधिकी स्फुटैव, तत्र पाकासम्भवात् ।
भाषा-अम्लादिनिष्ठ जन्यता निरूपित जनकतावच्छेदकत्व पृथिवीत्वको है; याते
अम्लादिक जलके धर्म नहींहैं. निम्बु गरगलादिके रसमें अम्लप्रतीति तो स्वसमवा-
यिसंयोग सम्बन्धसेहै याते औपाधिकी है. ऐसे जन्यशीतस्पर्शनिष्ठ जन्यता निरूपित जन-
कताकी अवच्छेदक जन्य जलमें जलत्वजाति है और जन्यजलनिष्ठ जन्यता निरूपित
जनकताकी अवच्छेदक शुद्ध जलत्व जाति है. शंका-घिसेहुये चन्दनकाभी तो शीत
स्पर्श होताहै याते जलका लक्षण चन्दनमें अतिप्रसक्त होगा. समाधान-चन्दनमें
शीतलता प्रतीति चन्दनान्तर्गत जलहीकी है, चन्दन शीतल नहीं है. आगआदिके
संयोगसे जलमें उष्णताकी प्रतीति तो औपाधिकी स्पष्टही है. जलमें पाक तो होही
नहीं सकता.
स्नेहस्तत्र-
भाषा-स्नेह अर्थात् चिकनापना जलहीमें रहता है.
स्नेहस्तत्रेति । घृतादावपि तदन्तर्वर्तिजलस्यैव स्नेहो जलस्य
स्नेहसमवायिकारणत्वात् । तेन जल एव स्नेह इति मन्तव्यम् ।
भाषा-घृतादिकोंमेंभी स्नेह घृतान्तर्वर्ति जलहीका है, क्योंकि स्नेहकी समवा-
यिकारणता जलहीमें सिद्ध है इससे जलहीमें स्नेहका मानना उचित है.
-द्रवत्वं तु सांसिद्धिकमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
भाषा-द्रवणगुण जलमें स्वाभाविक स्वीकार किया है ॥ ३९ ॥
द्रवत्वमिति । सांसिद्धिकद्रवत्वत्वं जातिविशेषः प्रत्यक्षसिद्धस्त-
दवच्छिन्नजनकतावच्छेदकमपि तदेवेति भावः । तैलादावापि
जलस्येव द्रवत्वम्, स्नेहप्रकर्षेण च दहनानुकूल्यमिति वक्ष्यति३९
भाषा-स्वाभाविक द्रवणमें स्वाभाविक द्रवणत्वरूपा जातिविशेष तो प्रत्यक्षही
सिद्ध है, स्वाभाविक द्रवणत्वावच्छिन्न जन्यता निरूपित जनकताकी अवच्छेदक भी

५८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वही स्वाभाविक द्रवत्वरूपा जाति है.तैलादिकोंमेंभी द्रवणगुण जलहीका है स्नेहगुण
की अधिकतासे दहनानुकूलता तैलमें है, इस वार्त्ताको ग्रन्थकार आगे कहेगा.
नित्यतादि प्रथमवत्-
भाषा-जलमें नित्य अनित्यादि यावत् व्यवहार प्रथमवत् करने चाहिये,
प्रथमवदिति । पृथिव्या इवेत्यर्थः।तथाहि । जलं द्विविधं नित्यम-
नित्यं च । परमाणुरूपं नित्यम्, द्व्यणुकादिकं सर्वमनित्यम
वयवसमवेतं च । अनित्यमपि त्रिविधं शरीरेन्द्रियविषयभेदा त् ।
भाषा-अर्थात् पृथिवीवत् जलभी नित्य अनित्य भेदसे दो प्रकारका है,जो नित्य
है वह परमाणुरूप है, शेष द्व्यणुकादिरूप सम्पूर्ण अनित्य है तथा अवयवोंमें समवाय
सम्बन्धसे रहता है. शरीरभेदसे तथा इन्द्रिय भेदसे तथा विषयभेदसे अनित्यभी
तीन प्रकारका है.
पृथिवीतो यो विशेषस्तमाह, किंत्विति-
भाषा-'किंतु' इत्यादि ग्रंथसे पृथिवीसे जो विशेष है वह कहता है--

  • किंतु देहमयोनिजम् ।
    भाषा--पृथिवीसे जलमें इतना भेद है कि जलका शरीर योनिसे पैदा नहीं होता,
    अयोनिजमिति । अयोनिजमेवेत्यर्थः । जलीयं शरीरमयोनिजं
    वरुणलोके प्रसिद्धम् ।
    भाषा-जलसे उत्पन्न होनेवाला शरीर योनिसे पैदा नहीं होता यह वार्ता वरुण-
    लोकमें प्रसिद्ध है ।
    इन्द्रियं रसनं-
    भाषा-जलसे उत्पन्न होनेवाला इन्द्रिय रसना है.
    इन्द्रियमिति । रसनं जलीयमित्यर्थः।तथाहि रसनं जलीयं गन्धा-
    द्यव्यञ्जकत्वे सति रसव्यञ्जकत्वात्, सक्तुरसाभिव्यञ्जकोदकव
    त् । रसनसन्निकर्षे व्यभिचारवारणाय द्रव्यत्वं देयम् ।
    भाषा-यह कल्पना अनुमानसे करी जाती है. तथाहि गन्धादिकोंका न उद्बोधक
    होकर केवल रसहीका उद्बोधक होनेसे-रसना इन्द्रिय जलीय प्रतीत होताहै. दृष्टान्त
    में जैसे जल सक्तुओं ( सत्तूओं ) के गन्धादिका न उद्बोधक होकर केवल रसहीका
    उद्बोधक है, गन्धादिकोंका न उद्बोधक होकर केवल रसका उद्बोधक रसना वस्तुका

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५९
संयोगभी है. उसमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार है.उसके वारणार्थ हेतुमें "द्रव्यत्वेसति"
यह विशेषण देना उचित है. अर्थात् द्रव्यत्वे सति गन्धादिकोंका न उद्बोधक होकर
केवल रसका उद्बोधक होनेसे रसना इन्द्रिय जलीय है.
विषयं दर्शयति, सिन्धुरिति-
भाषा-'सिन्धु' इत्यादि ग्रन्थसे विषयको दिखलाता है-
-सिन्धुहिमादिर्विषयो मतः ॥ ४० ॥
सिन्धुः समुद्रः । हिमं तुषारः। आदिपदात् सरित्कासारकरकादिः
सर्वो ग्राह्यः ।
भाषा-समुद्र, तुषार (बर्फ), आदि पदसे नदी, सरोवर, करक (गड़ा ), ये सम्पूर्ण
जलीय विषय हैं ॥ ४० ॥
न च हिमकरकयोः कठिनत्वात्पार्थिवत्वमिति वाच्यम्। ऊष्मणा
विलीनस्य तस्य जलत्वस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वात् । यद्द्रव्यं यद्द्रव्य-
ध्वंसजन्यमिति व्याप्तेर्जलोपादानोपादेयत्वसिद्धेः। अदृष्टविशेषेण
द्रवत्वप्रतिरोधात् करकादीनां काठिन्यप्रत्ययस्य भ्रान्तित्वात् १॰
शंका-हिमकरकादि कठिन स्पर्शवाले होनेसे पार्थिव प्रतीत होतेहैं. समा-
धान-तेजःसंयोगसे विलीन (गले) हुये हिमकरकादि जलरूपसे साक्षात् प्रतीत
होते हैं. जो (जलरूप) द्रव्य जिस (हिमकरकादि) रूप द्रव्यके ध्वंससे उत्पन्न हो
वह (जल रूप) द्रव्य उस (हिमकरकादिरूप) द्रव्यका उपादानरूपेण (उपा-
देय) ग्रहण होता है, इस व्याप्तिसे हिमकरकादि जलसे अतिरिक्त पदार्थ नहीं है
हिमकरकादिमें द्रवणका प्रतिरोध जीवोंके हानिलाभकारक अदृष्टविशेषसे है, तथा
कठिनस्पर्शकी प्रतीति भ्रान्ति सिद्ध है ॥ ४० ॥
तेजो निरूपयति, स्पर्श उष्ण इत्यादिना-
भाषा-'स्पर्श उष्ण' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार तेजःका निरूपण करता है-
स्पर्श उष्णस्तेजसस्तु-
भाषा-जिसका स्पर्श उष्ण हो वह तेजःपदार्थ है.
उष्णत्वं स्पर्शनिष्ठो जातिविशेषः प्रत्यक्षसिद्धः। इत्थं च जन्यो
१ भ्रान्तित्वं नामातात्विकान्यथाभावेन वस्त्ववगाहनत्वम् ।

६० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष -
ष्णस्पर्शसमवायिकारणतावच्छेदकं तेजस्त्वं जातिविशेषः ।
तस्य परमाणुवृत्तित्वं तु जलत्वस्येवानुसन्धेयम् । न चोष्ण-
स्पर्शवत्त्वं चन्द्रकिरणादावव्याप्तमिति वाच्यम् । तत्राप्युष्णस्य
सत्त्वात् । किन्तु तदन्तःपातिजलस्पर्शैनाभिभवादग्रहः। एवं र-
त्नकिरणादौ पार्थिवस्पर्शैनाभिभवाच्चक्षुरादौ चानुद्भूतत्वादग्रहः।
भाषा-उष्णस्पर्शमें रहनेवाला ( उष्णत्व ) धर्म स्पर्शनिष्ठ जातिविशेष प्रत्यक्ष
सिद्ध है. इस रीतिसे जन्य उष्णस्पर्शनिष्ठ कार्यतानिरूपिता जो तेजोनिष्ठा समवायि
कारणता तादृश कारणताकी अवच्छेदक तेजस्त्व जाति विशेष है. उस तेजस्त्व जाति
विशेषकी परमाणुओंमें सिद्धि पूर्वोक्त जलत्वजातिकी तरह जाननी चाहिये अर्थात्
तेजःपरमाणुओंमें जन्य उष्णस्पर्श नहीं है. इसलिये जन्य स्पर्शनिष्ठ जन्यतानिरूपित
जनकताकी अवच्छेदक परमाणु साधारण तेजस्त्व जाति सिद्ध नहीं होसकती; किन्तु
जन्यस्पर्शनिष्ठ जन्यतानिरूपित जनकतावच्छेदकत्वरूपसे जन्यतेजस्त्वजातिकी सिद्धि
और जन्यतेजस्त्वावच्छिन्न जन्यतानिरूपित जनकतावच्छेदकत्व रूपसे शुद्ध तेजस्त्व
जातिकी सिद्धि होती है. शंका-उष्णस्पर्शवत्ता चन्द्रकिरणादिकोंमें अव्याप्तिग्रस्त है.
समाधान-चन्द्रकिरणादिमें उष्णस्पर्श है तो सही परन्तु चन्द्रकिरणोंके बीच जल
भी रहता है. जलके स्पर्शसे उष्णस्पर्श दबा रहता है इसलिये ग्रहण नहीं होता. ऐसे
ही रत्नभी तेजःपदार्थ है. उनका उष्णस्पर्श पार्थिवस्पर्शसे तिरस्कृत है और नेत्रादिमें
अनुद्भूत ( अनुद्बुद्ध ) स्पर्श है इसलिये प्रत्यक्ष नहीं होता.
-स्याद्रूपं शुक्लभास्वरम् ।
भाषा-तेजःपदार्थका रूप श्वेत तथा प्रकाशवान् है.
रूपमित्यादि । वैश्वानरे मरकतकिरणादौ च पार्थिवरूपेणाभिभ-
वाच्छुक्लत्वाग्रहः । तद्रूपाग्रहे धर्म्मिणोऽपि चाक्षुषत्वं न स्यादिति
चेत्, न । अन्यदीयरूपेणापि धर्म्मिणो ग्रहसम्भवात्, शङ्खस्येव
पित्तपीतिम्ना । वह्नेस्तु शुक्लरूपं नाभिभूतं किंतु तदीयं शुक्ल-
त्वमभिभूतमित्यन्ये ।
भाषा-प्रज्वलित अग्निमें तथा मणिकिरणादिमें जो रक्त ( लाल ) रूप
दिखाई देता है वह पृथिवीका है, पार्थिवरूपसे तेजका वास्तवश्वेतरूप तिरस्कृत
है; याते प्रत्यक्ष नहीं होता. शंका-यदि तेजका वास्तवरूप ग्रहण नहीं होता तो

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेतां. ६१
उस रूपके धर्मी अग्नि आदिकाभी ग्रहण न हुआ चाहिये. समाधान-धर्मीका
ग्रहण रूपान्तरसेभी होसकताहै. जैसे पित्तदोषदूषित नेत्रोंद्वारा श्वेतशंखका पीतरूपसे
पार्थिवरूपसे अग्निका रूप तिरस्कृत ( दबा हुआ ) नहींहै, किन्तु अग्निके शुक्लरूपमें
जो ' शुक्लत्व ' जाति वह दबी है ऐसाभी कई लोग मानते हैं.
नैमित्तिकं द्रवत्वं तु-
भाषा-निमित्तसे अर्थात् अग्निसंयोगसे द्रवण तेजःपदार्थमें है.
नैमित्तिकमिति । सुवर्णादिरूपे तेजसि तत्सत्त्वात् । न च नैमि-
त्तिकद्रवत्वं न लक्षणं दहनादावव्याप्तेर्घृतादावतिव्याप्तेश्चेति वा-
च्यम् । पृथिव्यवृत्तिनैमित्तिकद्रवत्ववद्वृत्तिजातिमत्त्वस्य विव-
क्षितत्वात् ।
भाषा-सुवर्णादिरूप तेजःपदार्थमें नैमित्तिक द्रवण प्रसिद्ध है. शंका-नैमित्तिक
द्रवण तेजःपदार्थका लक्षण नहीं होसकता; क्योंकि वह अग्निआदिकोंमें अव्याप्त है तथा
घृतादिकोंमें अतिव्याप्त है. समाधान-पृथिवीमें न वर्तनेवाली जो नैमित्तिक द्रवण
वालेमें वर्तनेवाली तेजस्त्वजाति तादृश जातिमत्ता यावत् तेजःपदार्थमें दिखलानेकी
वक्ताकी इच्छा है; याते दोष नहीं.

  • नित्यतादि च पूर्ववत् ॥ ४१ ॥
    पूर्ववदिति । जलस्यैवेत्यर्थः ।
    भाषा--तेजःपदार्थका नित्यानित्य व्यवहार जलवत् जानना चाहिये ॥ ४१ ॥
    तथाहि । तद्विविधं नित्यमनित्यं च। नित्यं परमाणुरूपं तदन्यद-
    नित्यं अवयवि च । तच्च त्रिधा शरीरेन्द्रियविषयभेदात् । शरी-
    रमयोनिजमेव, तच्च सूर्यलोकादौ प्रसिद्धम् ॥ ४१ ॥
    भाषा-वह यह है कि तेज दोप्रकारका है एक नित्य है, दूसरा अनित्य है. नित्य
    परमाणुरूप है, उससे भिन्न अनित्य है तथा अवयवजन्य है. वह अनित्य शरीरभेदसे
    तथा इंद्रियभेदसे और विषयभेदसे पुनः तीन प्रकारका है. तैजसशरीर अयोनिज
    सूर्य्यलोकमें प्रसिद्ध है.
    अत्र यो विशेषस्तमाह, इन्द्रियमिति-
    भाषा-'इन्द्रिय' इत्यादिग्रन्थसे तेजःपदार्थमें जो औरोंसे विशेषताहै वह कहताहै.-
    इन्द्रियं नयनं-
    भाषा-नेत्र इन्द्रिय तेजःपदार्थसे उत्पन्न हुआ है.

काल, दिक्, आत्मा, मन एवं चतुर्विंशति गुण खण्ड (रूप से लेकर संस्कार पर्यन्त)

६२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- प्रत्यक्ष--
चक्षुस्तैजसं परकीयस्पर्शाद्यव्यञ्जकत्वे सति परकीयरूपव्यञ्ज-
कत्वात्प्रदीपवत् । प्रदीपस्य स्वीयस्पर्शव्यञ्जकत्वादाद्यं परकी-
येति, घटादेः स्वीयरूपव्यञ्जकत्वात् व्यभिचारवारणाय द्वितीयं
परकीयेति । अथवा प्रभाया दृष्टान्तत्वसम्भवादाद्यं परकीयेति
न देयम् । चक्षुःसन्निकर्षे व्यभिचारवारणाय द्रव्यत्वं देयम् ।
भाषा-घटपटादिकोंके स्पर्शादिका न ग्राहक होकर केवल उन (घटादि) के
रूपका ग्राहक होनेसे नेत्रेन्द्रिय तैजस प्रतीत होताहै. जैसे प्रदीप घटादिके स्पर्शा-
दिका ग्राहक न होकर केवल रूपका ग्राहक है और तैजसभी है. दृष्टान्तमें प्रदीपको
स्वस्पर्शका ग्राहक होनेसे हेतुकी विशेषणासिद्धि वारणके लिये प्रथम 'परकीय' पद है.
परकीय स्पर्शादिकोंके ग्राहक न होकर विषयतासम्बन्धसे स्वकीयरूप ग्राहकत्व घटादि-
पदार्थोंमेंभी है; उनमें पूर्वोक्तहेतुका व्यभिचार होगा. उस (व्यभिचार) के वार;
णार्थ हेतुमें दूसरे 'परकीय' पदका निवेश है. अथवा 'प्रदीप' की जगह 'प्रभा' को
दृष्टान्त रक्खें तो प्रथम 'परकीय' पदके न देनेसेभी दोष नहीं प्रभामें स्वपरस्पर्शादि
ग्राहकत्व नहींहै. नेत्र घटादिके संयोगमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार होगा इसलिये
हेतुमें 'द्रव्यत्व' पदका निवेश करना चाहिये अर्थात् "द्रव्यत्वे सति स्पर्शाद्यव्यञ्ज-
कत्वे सति परकीयरूपव्यञ्जकत्वात्" इति ।
विषयं दर्शयति, वह्निरिति-
भाषा-'वह्नि' इत्यादि मूलसे ग्रन्थकार तैजसविषयको दिखलाताहै-
-वह्निस्वर्णादिर्विषयो मतः ।
भाषा-अग्नि तथा सुवर्णादि धातु यह तैजस विषय है.
ननु सुवर्णस्य तैजसत्वे किं मानमिति चेत्, न । सुवर्णं तैजसम्
असति प्रतिबन्धकेऽत्यन्तानलसंयोगेऽप्यनुच्छिद्यमानजन्यद्रव-
त्वात्, यन्नैवं तन्नैवं यथा पृथिवीति । न चाप्रयोजकं पृथि-
वीद्रवत्वस्य जन्यजलद्रवत्वस्य चाग्निसंयोगनाश्यत्वात् । ननु
पीतिमगुरुत्वाश्रयस्य पार्थिवभागस्यापि तदानीं द्रुतत्वात्तेन
व्यभिचार इति चेत्, न । जलमध्यस्थमसीक्षोदकवत्तस्याद्रु
तत्वात् ।

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६३
शंका-सुवर्णके तैजस होनेमें क्या प्रमाण है? समाधान-किसी प्रतिबन्धकके
न होनेसेभी अत्यन्त अग्निका संयोग होनेसेभी सुवर्णमें अनुच्छिद्यमान द्रवण रहता है
इसलिये जाना जाता है कि, सुवर्ण तैजस है. ( यन्नैवं ) जो प्रतिबन्धकके न होनेसे
अत्यन्त अग्निके संयोग होनेसे अनुच्छिद्यमान द्रवणवाला नहींहै अर्थात् जिसके द्रव-
णका उच्छेद ( विनाश ) होजाताहै, ( तन्नैवं ) वह तैजसभी नहीं है; जैसे पृथिवीहै.
शंका-तुम्हारा अनुमान अप्रयोजक है अर्थात् अनुकूल तर्कके अभाववाला है.
याते सुवर्णके तैजस न होनेसेभी पूर्वोक्त हेतु सुवर्णमें रहे तो दोष नहीं. समाधान-
घृतलाक्षादि पृथिवीमें जो द्रवण है तथा जन्य जलमें जो द्रवण है वह अग्निसंयोगसे नष्ट
हो जाताहै. सुवर्णके द्रवणका नाश नहीं होता. यही पूर्वोक्त अनुमानमें अनुकूलतर्क
है.शंका- पीतरूपके तथा गुरुत्वके आश्रय पृथिवीके भागोंकाभी तो उसकालमें
सुवर्णके साथही द्रवण होताहै. उनमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार होगा. समाधान-
जलके बीच घुले हुये स्याहीके चूर्णकी तरह सुवर्णमें होनेवाले पृथिवीके पीत भागभी
द्रवणयुक्त नहीं केवल जलके तथा सुवर्णके सम्बन्धसे उभयत्र पार्थिव भागोंमें द्रवणकी
भ्रमात्मक प्रतीति होतीहै.
अपरे तु पीतिमाश्रयस्यात्यन्ताग्निसंयोगेऽपि रूपापरावृत्तिदर्श-
नात्तत्प्रतिबन्धकं विजातीयं द्रवद्रव्यं कल्प्यते । तथाहि ।
अग्निसंयोगे पीतिमगुरुत्वाश्रयो विजातीयरूपप्रतिबन्धकद्रवद्र-
व्यसंयुक्तः,अत्यंताग्निसंयोगेऽपि पूर्वरूपविजातीयरूपानधिकरण-
पार्थिवत्वात् । जलमध्यस्थपीतपटवत्, तस्य च पृथिवीजल-
भिन्नस्य तेजस्त्वनियमात् ।
भाषा-कई एक आचार्य ऐसेभी कहतेहैं कि, पीतरूपके आश्रय पार्थिवभागोंका
अति अग्निके संयोग होनेसेभी रूप बदलता नहीं देखाजाता इसलिये अग्निसंयोगसे
पार्थिवभागोंमें रूप न बदलने देनेवाला कोई विजातीय विलक्षण तथा द्रवणयुक्त
द्रव्यप्रतिबन्धक कल्पना करना उचितहै उस कल्पनाका प्रकार यह है कि, जैसे जल-
पूरित पात्रमें पीत वस्त्र डालकर अग्निपर वह पात्र रखा जाय तो अत्यन्त अग्निका
संयोग होनेसेभी वस्त्रका पूर्वरूपसे विलक्षण रूप नहीं देखाजाता; वैसेही पीतरूपयुक्त
तथा गुरुत्वके आश्रय सुवर्णस्थ पार्थिवभागोंमेंभी अत्यन्त अग्निसंयोग होनेसेभी पूर्वरूप
से विलक्षणरूपकी अधिकरणता प्रतीत नहीं होती.इससे जाना जाताहै कि वह सुवर्णस्थ .
पार्थिवभाग किसी विलक्षण तथा रूपके प्रतिबन्धक द्रवणयुक्त द्रव्यके साथ मिश्रित
हैं; वह विलक्षण द्रव्य पृथिवी जलसे भिन्न होनेसे नियमसे तेजःपदार्थ है.

६४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वायुं निरूपयति, अपाकज इति ।
भाषा-'अपाकज' इत्यादिग्रंथसे मूलकार वायुका निरूपण करताहै ।
अपाकजोऽनुष्णाशीतस्पर्शस्तु पवने मतः ॥ ४२ ॥
तिर्यग्गमनवानेष ज्ञेयः स्पर्शादिलिङ्गकः ।
भाषा-अग्निसंयोगसे न उत्पन्न होनेवाला जो शीत उष्णसे भिन्न मध्यराशीका
स्पर्श उसवाला वायु है ॥ ४२ ॥ यह वायु टेढ़ी गतिवाला है, स्पर्शादिक हेतुओंसे
वायुका आनुमानिक ज्ञान होताहै.
अनुष्णाशीतस्पर्शस्य पृथिव्यामपि सत्त्वादुक्तमपाकज इति ।
अपाकजस्पर्शस्य जलादावपि सत्त्वादुक्तमनुष्णाशीतेति । तेन
वायवीयो विजातीयः स्पर्शो दर्शितः। तज्जनकतावच्छेदकं वायु-
त्वमिति भावः ।
भाषा-अनुष्णाशीतस्पर्शयुक्त पृथ्वीभी है, उससे वायुके लक्षणकी अव्याप्ति-वार-
णार्थ लक्षणमें 'अपाकज' पद अनुष्णाशीतस्पर्शका विशेषण किया है, अपाकजस्पर्श
जल तथा अग्निमें है; उनसे अतिव्याप्तिवारणार्थ लक्षणमें 'अनुष्णाशीत' पदका प्रवेश
है, इतने कथनसे वायुमें अग्नि जल पृथ्वीसे विलक्षण स्पर्श दिखलाया है, उस वि-
लक्षणस्पर्शनिष्ठजन्यता निरूपित जनकता वायुमें है, जनकताका अवच्छेदक 'वा-
युत्व जाति है.
एष वायुः स्पर्शादिलिङ्गकः । वायुर्हि स्पर्शशब्दधृतिकम्पैरनु-
मीयते, विजातीयस्पर्शेन विलक्षणशब्देन तृणादीनां धृत्या
शाखादीनां कम्पनेन च वायोरनुमानात् । यथा च वायोर्न प्रत्यक्षं
तथाऽग्रे वक्ष्यते ।
भाषा-इस वायुका स्पर्शादि (लिङ्ग) हेतुओंसे आनुमानिक ज्ञान होता है. इसके
अनुमापक स्पर्श शब्द, धारण, और कम्पन ये चार हेतु हैं. अर्थात् विलक्षणस्पर्शसे वि-
लक्षण शब्दसे तृणादि गुरुपदार्थोंके धारणसे वृक्षादिकोंके कंपनसे वायुका आनुमानिक
ज्ञान होता है. अनुमान रचनाका प्रकार यह है कि-जो यह रूपवाले द्रव्यमें समवाय
सम्बन्धसे न रहनेवाला स्पर्श है वह किसीके आश्रितहै. पृथ्वी समवेतस्पर्शकीतरह स्पर्श
होनेसे । इति १ । एवं रूपवाले द्रव्यका अभिघात न होनेसेभी जो यह पुष्पपत्रादि

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६५
कोंमें शब्द सन्तति है; वह किसी स्पर्शवाले तथा वेगवाले द्रव्यके संयोगसे जन्य है.
दण्डाभिघातसे भेरीशब्दकी तरह अवयवोंके न विभाग होनेसेभी द्रव्यसम्बन्धि शब्द
सन्तति होनेसे-इति २; एवं आकाशमें तृणतूलादिकोंकी धृति किसी स्पर्शवाले
तथा वेगवाले द्रव्यके संयोगहेतुका है, नौका धृतिकी तरह अस्मदादिकोंसे अनधिष्ठित
द्रव्यधृति होनेसे-इति ३; एवं रूपवाले द्रव्यके अभिघातसे विना जो तृणशाखादिमें
क्रिया है वह किसी स्पर्शवाले तथा वेगवाले द्रव्यके अभिघातसे जन्य है. नदीप्रवाह
में प्रवाहित तृणक्रियाकी तरह विलक्षण क्रिया होनेसे-इति ४; जिस रीतिसे वायुका
प्रत्यक्ष नहीं होता वह रीति आगे आत्मानिरूपणमें कहेगा.
पूर्ववन्नित्यतायुक्तं -
भाषा-वायुका नित्य अनित्यपना जलकी तरहही कहा है.
पूर्ववदिति । वायुर्द्विविधः, नित्योऽनित्यश्च, परमाणुरूपो नित्य-
स्तदन्योऽनित्यः समवेतश्च, सोऽपि त्रिविधः शरीरेन्द्रियविषय-
भेदात् । तत्र शरीरमयोनिनं पिशाचादीनाम्, परंतु जलीय-
तैजसवायवीयशरीराणां पार्थिवभागोपष्टम्भादुपभोगसाधनत्वं
जलादीनां प्राधान्याज्जलीयत्वादिकमिति ।
भाषा-अर्थात् वायु नित्यानित्यभेदसे दो प्रकारका है. परमाणुरूप वायु नित्य है
और कार्य्यरूप अनित्य है. तथा समवायसम्बन्धसे स्वअवयवोंमें रहता है. वह अ-
नित्यवायुभी शरीरभेदसे, इन्द्रियभेदसे तथा विषयभेदसे तीन प्रकारका है. उनमेंसे
वायवीय शरीर तो अयोनिज पिशाचादिकोंका वायुलोकमें मसिद्ध है; परन्तु इतना वि-
शेष है कि जलीय शरीरोंको तथा तैजस शरीरोंको तथा वायवीय शरीरोंको भोग उप
करणता पार्थिवभागोंकी मिलावटसे है. जलीयत्व आदि व्यवहार तो जलादिकों
की प्रधानता होनेसे होताहै.
अत्र यो विशेषस्तमाह, देहव्यापीति-
भाषा-'देहव्यापि' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार त्वगिन्द्रियनिष्ठ विशेषताको कहताहै-
देहव्यापि त्वगिन्द्रियम् ॥ ४३ ॥
भाषा-सर्वशरीरमें व्यापक त्वगिन्द्रिय वायवीय है ॥ ४३ ॥
शरीरव्यापकं स्पर्शग्राहकमिन्द्रियं त्वक् । तच्च वायवीयं रूपा-
दिषु स्पर्शस्यैव व्यञ्जकत्वादङ्गसङ्गिसलिलशैत्यव्यञ्जकव्यजन-
वातवत् ।
५

६६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
भाषा-यावत् शरीरमें व्यापक तथा स्पर्शका ग्राहक त्वक्इन्द्रिय है. वह रूपादि-
कोंके मध्यमेंसे स्पर्शहीका ग्राहक होनेसे वायवीय है, जैसे व्यजन (पंखे) का
पवन शरीरसम्बन्धि स्वेदरूप जलके केवल शैत्यहीका ग्राहक है तद्वत् ॥ ४३ ॥
विषयं दर्शयति, प्राणादिरिति-
भाषा-‘प्राणादि’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार वायवीय विषयको दिखलाता है-
प्राणादिस्तु महावायुपर्यन्तो विषयो मतः ।
भाषा-प्राणादिवायुसे लेकर महावायुपर्यन्त वायवीय विषय है.
यद्यप्यनित्यो वायुश्चतुर्विधस्तस्य चतुर्थी विधा तु प्राणादिरि-
त्युक्तमाकरे । तथापि संक्षेपादत्र त्रैविध्यमुक्तम् । प्राणस्त्वेक एव
हृदादिनानास्थानवशान्मुखनिर्गमादिनानाक्रियावशाच्च नाना-
संज्ञां लभत इति ।
भाषा-यद्यपि अनित्य वायु चार प्रकारका है. उसका चौथा भेद प्राणादिवायु है;
यह वार्ता प्रशस्तपादभाष्यमें लिखी है, तथापि इस ग्रन्थमें संक्षेपसे अनित्य वायुके
तीन भेदही कहे हैं. प्राणवायु एकभी हृदयादि नानास्थानभेदसे तथा मुखनिर्गमनादि
नानाक्रियाके भेदसे ‘प्राण अपान आदि’ नाना संज्ञाको लाभ करता है.
आकाशं निरूपयति, आकाशस्येति-
भाषा-‘आकाशस्य’ इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार आकाशका निरूपण करे है-
आकाशस्य तु विज्ञेयः शब्दो वैशेषिको गुणः ॥ ४४॥
भाषा-शब्दात्मक विशेष गुणवाला आकाश जानना योग्य है ॥ ४४ ॥
आकाशकालदिशामेकैकव्यक्तित्वादाकाशत्वादिकं न जातिः
किंवाकाशत्वं शब्दाश्रयत्वम् । वैशेषिक इति कथनं तु विशेष-
गुणान्तरव्यवच्छेदाय । एतेन प्रमाणमपि दर्शितम् ।
भाषा-आकाश काल तथा दिशाको एक एक व्यक्ति होनेसे आकाशत्वादिधर्म
जातिरूप नहीं है, किंतु समवायसम्बन्धसे शब्दका आश्रयही आकाश है. मूल
कारिकामें ‘वैशेषिक’ यह कथन तो विशेष गुणान्तर व्यवच्छेदके वास्ते है; अ-
र्थात् आकाशमें शब्दके सिवाय विशेष गुणान्तर नहीं है; इतने कथनसे आकाशमें
प्रमाणभी दिखलाया है; वह प्रमाण अनुमान है.

परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६७
तथाहि । शब्दो विशेषगुणश्चक्षुर्ग्रहणायोग्यबहिरिन्द्रियग्राह्यजा-
तिमत्त्वात् स्पर्शवत्, शब्दो द्रव्यसमवेतो गुणत्वात् संयोगवत्
इत्यनुमानेन शब्दस्य द्रव्यसमवेतत्वे सिद्धे, शब्दो न स्प-
र्शवद्विशेषगुणोऽग्निसंयोगासमवायिकारणकत्वाभावे सत्यकारण-
गुणपूर्वकप्रत्यक्षत्वात् सुखवत् । पाकजरूपादौ व्यभिचारवार-
णाय सत्यन्तम् । पटरूपादौ व्यभिचारवारणायाकारणगुणपूर्व-
केति । जलपरमाणुरूपादौ व्यभिचारवारणाय प्रत्यक्षति ।
भाषा—उसका प्रकार यह है कि-शब्दभी स्पर्शकी तरह गुणहै. नेत्रसे ग्रहणके अ-
योग्य होकर बाह्य इन्द्रियसे ग्रहण योग्य'शब्दत्व'जातिवाला होनेसे-इति. इस अनुमान
से शब्दको गुण न माननेवाले वैयाकरण तथा मीमांसकके मतका खण्डन किया
और अग्रिम अनुमानमें स्वरूपासिद्धिका परिहारभी किया है. दूसरा अनुमान यह
है कि-शब्द संयोगकी तरह गुण होनेसे किसी एक द्रव्यमें समवायसम्बन्धसे रहता
है, इस अनुमानसे 'शब्द ' को द्रव्यसमवेतत्वसिद्धिके पश्चात् ' शब्द ' स्पर्शवाले
द्रव्योंका विशेष गुण नहीं है, सुखकी तरह अग्निसंयोगरूप असमवायिकारणत्व अ-
भावविशिष्ट अकारणगुणपूर्वक प्रत्यक्ष होनेसे; इस अनुमानसे यह सिद्ध हुआ कि
'शब्द' पृथिवी आदि चतुष्टयका विशेष गुण नहीं है, पृथिवीनिष्ठ पाकजरूपका प्रत्यक्ष
अकारण गुणपूर्वकहै उससे प्रकृत हेतुका व्यभिचार वारणार्थ"अग्निसंयोगासमवायिकारण
कत्वाभावेसति"यह सप्तमीअन्त हेतुका विशेषण कहा. पार्थिवरूपका असमवायिकारण
अग्निसंयोग है, याते व्यभिचार नहीं है. एवं यदि सप्तमीअन्तमात्र हेतु रक्खें तो
पटादिके रूपमें हेतु व्यभिचारी होगा,क्योंकि पटके रूपमें अग्निसंयोगासमवायिकारण-
कत्वाभाव सिद्ध है, इसलिये 'अकारण गुणपूर्वक प्रत्यक्षत्व' कहा. पटके रूपका प्रत्यक्ष
अकारण गुणपूर्वक नहीं है;किन्तु पटका कारणीभूत जो तन्तु उनके रूपग्रहणपूर्वक
पटके रूपका प्रत्यक्ष है, याते व्यभिचार नहीं है. एवं यदि हेतुमें 'प्रत्यक्ष' पद नहीं
देवें तो समग्र हेतुका व्यभिचार जलीय परमाणुओंके रूपमें होगा; क्योंकि जलीय
परमाणुभी अग्निसंयोगासमवायिकारणकत्वाभावविशिष्ट अकारणगुणपूर्वक है; परन्तु
प्रत्यक्ष नहीं है याते व्यभिचार नहीं है-इति ॥
शब्दो न दिक्कालमनोगुणो विशेषगुणत्वात् । नात्मविशेषगुणो
१ जो लौकिक सम्बन्धसे इन्द्रियग्राह्य हो और लौकिक सम्बन्धहीसे द्विइन्द्रियसे ग्रहणकी
योग्यता न रखता हो तथा गुणत्वव्याप्य जातिवाला हो वह ' विशेषगुण ' कहाताहै. इस
लक्षणके लक्ष जो विशेषगुण हैं उनका निरूपण ' बुद्ध्यादिषट्कं ' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार
स्वयं करेगा.

६८ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
बहिरिन्द्रियग्राह्यत्वादूपवत् । इत्थं च शब्दाधिकरणं नवमद्रव्यं
गगननामकं सिद्ध्यतीति । न च वायववयवेषु सूक्ष्मशब्दक्रमेण
वायौ कारणगुणपूर्वकः शब्द उत्पद्यतामिति वाच्यम् । अया-
वद्द्रव्यभावित्वेन वायुविशेषगुणत्वाभावात् ॥ ४४ ॥
भाषा-तत्पश्चात् 'शब्द' दिशाका तथा कालका तथा मनकाभी गुण नहीं है;
रूपकी तरह विशेष गुण होनेसे-इति. ऐसा अनुमान करना उचित है. एवं शब्द
आत्माका विशेष गुणभी नहीं है, रूपकी तरह बाह्य इन्द्रियसे ग्रहणकी योग्यतावाला
होनेसे-इति. इसीरीतिसे शब्दका अधिकरण नवम द्रव्य 'गगन' नामकासिद्ध होता है.
शंका-यदि ऐसा मानलें कि, वायुके अवयवोंमें प्रथम सूक्ष्मशब्द उत्पन्न होता है,
पश्चात् क्रमसे स्थूलवायुमें कारणगुणपूर्वक स्थूल शब्द उत्पन्न होता है तो क्या दोषहै?
समाधान-पृथ्वीआदि चतुष्टयमें जो गुण रहता है वह सभी अपने आश्रयके नाश
होनेसे नाश होता है और शब्द अयावत् द्रव्यभावीहै अर्थात् शब्द के आश्रय द्रव्यके
नाशसे जन्य जो नाश उस नाशका प्रतियोगी शब्द नहीं है; याते शब्दवायुका विशेष
गुणभी नहीं है-
तत्र शरीरस्य विषयस्य चाभावादिन्द्रियं दर्शयति,इन्द्रियमिति-
भाषा-आकाशीय शरीर तथा विषयका अभाव होने से. 'इन्द्रियं' इत्यादि
ग्रन्थसे मूलकार इन्द्रियको दिखलाता है ।
इन्द्रियं तु भवेच्छ्रोत्रं -
भाषा-श्रवण इन्द्रिय आकाशसे उद्बुद्ध हुआ है.
नन्वाकाशं लाघवादेकं सिद्धम्,श्रोत्रं तु पुरुषभेदेन भिन्नं तत्कथ-
माकाशं स्यादत आह, एकः सन्नपीत्यादि-
शंका-आकाश लाघवसे एक सिद्धहै और श्रोत्र तो पुरुषभेदसे भिन्नरहै वहकैसे
आकाश हो सकताहै?समाधान-'एकइत्यादि'ग्रन्थसे मूलकार समाधान लिखताहै-

  • एकः सन्नप्युपाधितः ।
    भाषा-आकाश एकभी उपाधि भेदसे भिन्न २ है.
    आकाश एक एव सन्नप्युपाधेः कर्णशष्कुल्यादेर्भेदाद्भिन्नं श्रोत्रा-
    त्मकं भवतीत्यर्थः ।