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न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 350 में से

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पृष्ठ 88

६४ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
वायुं निरूपयति, अपाकज इति ।
भाषा-'अपाकज' इत्यादिग्रंथसे मूलकार वायुका निरूपण करताहै ।
अपाकजोऽनुष्णाशीतस्पर्शस्तु पवने मतः ॥ ४२ ॥
तिर्यग्गमनवानेष ज्ञेयः स्पर्शादिलिङ्गकः ।
भाषा-अग्निसंयोगसे न उत्पन्न होनेवाला जो शीत उष्णसे भिन्न मध्यराशीका
स्पर्श उसवाला वायु है ॥ ४२ ॥ यह वायु टेढ़ी गतिवाला है, स्पर्शादिक हेतुओंसे
वायुका आनुमानिक ज्ञान होताहै.
अनुष्णाशीतस्पर्शस्य पृथिव्यामपि सत्त्वादुक्तमपाकज इति ।
अपाकजस्पर्शस्य जलादावपि सत्त्वादुक्तमनुष्णाशीतेति । तेन
वायवीयो विजातीयः स्पर्शो दर्शितः। तज्जनकतावच्छेदकं वायु-
त्वमिति भावः ।
भाषा-अनुष्णाशीतस्पर्शयुक्त पृथ्वीभी है, उससे वायुके लक्षणकी अव्याप्ति-वार-
णार्थ लक्षणमें 'अपाकज' पद अनुष्णाशीतस्पर्शका विशेषण किया है, अपाकजस्पर्श
जल तथा अग्निमें है; उनसे अतिव्याप्तिवारणार्थ लक्षणमें 'अनुष्णाशीत' पदका प्रवेश
है, इतने कथनसे वायुमें अग्नि जल पृथ्वीसे विलक्षण स्पर्श दिखलाया है, उस वि-
लक्षणस्पर्शनिष्ठजन्यता निरूपित जनकता वायुमें है, जनकताका अवच्छेदक 'वा-
युत्व जाति है.
एष वायुः स्पर्शादिलिङ्गकः । वायुर्हि स्पर्शशब्दधृतिकम्पैरनु-
मीयते, विजातीयस्पर्शेन विलक्षणशब्देन तृणादीनां धृत्या
शाखादीनां कम्पनेन च वायोरनुमानात् । यथा च वायोर्न प्रत्यक्षं
तथाऽग्रे वक्ष्यते ।
भाषा-इस वायुका स्पर्शादि (लिङ्ग) हेतुओंसे आनुमानिक ज्ञान होता है. इसके
अनुमापक स्पर्श शब्द, धारण, और कम्पन ये चार हेतु हैं. अर्थात् विलक्षणस्पर्शसे वि-
लक्षण शब्दसे तृणादि गुरुपदार्थोंके धारणसे वृक्षादिकोंके कंपनसे वायुका आनुमानिक
ज्ञान होता है. अनुमान रचनाका प्रकार यह है कि-जो यह रूपवाले द्रव्यमें समवाय
सम्बन्धसे न रहनेवाला स्पर्श है वह किसीके आश्रितहै. पृथ्वी समवेतस्पर्शकीतरह स्पर्श
होनेसे । इति १ । एवं रूपवाले द्रव्यका अभिघात न होनेसेभी जो यह पुष्पपत्रादि