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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 350 में से

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पृष्ठ 84

६० न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष -
ष्णस्पर्शसमवायिकारणतावच्छेदकं तेजस्त्वं जातिविशेषः ।
तस्य परमाणुवृत्तित्वं तु जलत्वस्येवानुसन्धेयम् । न चोष्ण-
स्पर्शवत्त्वं चन्द्रकिरणादावव्याप्तमिति वाच्यम् । तत्राप्युष्णस्य
सत्त्वात् । किन्तु तदन्तःपातिजलस्पर्शैनाभिभवादग्रहः। एवं र-
त्नकिरणादौ पार्थिवस्पर्शैनाभिभवाच्चक्षुरादौ चानुद्भूतत्वादग्रहः।
भाषा-उष्णस्पर्शमें रहनेवाला ( उष्णत्व ) धर्म स्पर्शनिष्ठ जातिविशेष प्रत्यक्ष
सिद्ध है. इस रीतिसे जन्य उष्णस्पर्शनिष्ठ कार्यतानिरूपिता जो तेजोनिष्ठा समवायि
कारणता तादृश कारणताकी अवच्छेदक तेजस्त्व जाति विशेष है. उस तेजस्त्व जाति
विशेषकी परमाणुओंमें सिद्धि पूर्वोक्त जलत्वजातिकी तरह जाननी चाहिये अर्थात्
तेजःपरमाणुओंमें जन्य उष्णस्पर्श नहीं है. इसलिये जन्य स्पर्शनिष्ठ जन्यतानिरूपित
जनकताकी अवच्छेदक परमाणु साधारण तेजस्त्व जाति सिद्ध नहीं होसकती; किन्तु
जन्यस्पर्शनिष्ठ जन्यतानिरूपित जनकतावच्छेदकत्वरूपसे जन्यतेजस्त्वजातिकी सिद्धि
और जन्यतेजस्त्वावच्छिन्न जन्यतानिरूपित जनकतावच्छेदकत्व रूपसे शुद्ध तेजस्त्व
जातिकी सिद्धि होती है. शंका-उष्णस्पर्शवत्ता चन्द्रकिरणादिकोंमें अव्याप्तिग्रस्त है.
समाधान-चन्द्रकिरणादिमें उष्णस्पर्श है तो सही परन्तु चन्द्रकिरणोंके बीच जल
भी रहता है. जलके स्पर्शसे उष्णस्पर्श दबा रहता है इसलिये ग्रहण नहीं होता. ऐसे
ही रत्नभी तेजःपदार्थ है. उनका उष्णस्पर्श पार्थिवस्पर्शसे तिरस्कृत है और नेत्रादिमें
अनुद्भूत ( अनुद्बुद्ध ) स्पर्श है इसलिये प्रत्यक्ष नहीं होता.
-स्याद्रूपं शुक्लभास्वरम् ।
भाषा-तेजःपदार्थका रूप श्वेत तथा प्रकाशवान् है.
रूपमित्यादि । वैश्वानरे मरकतकिरणादौ च पार्थिवरूपेणाभिभ-
वाच्छुक्लत्वाग्रहः । तद्रूपाग्रहे धर्म्मिणोऽपि चाक्षुषत्वं न स्यादिति
चेत्, न । अन्यदीयरूपेणापि धर्म्मिणो ग्रहसम्भवात्, शङ्खस्येव
पित्तपीतिम्ना । वह्नेस्तु शुक्लरूपं नाभिभूतं किंतु तदीयं शुक्ल-
त्वमभिभूतमित्यन्ये ।
भाषा-प्रज्वलित अग्निमें तथा मणिकिरणादिमें जो रक्त ( लाल ) रूप
दिखाई देता है वह पृथिवीका है, पार्थिवरूपसे तेजका वास्तवश्वेतरूप तिरस्कृत
है; याते प्रत्यक्ष नहीं होता. शंका-यदि तेजका वास्तवरूप ग्रहण नहीं होता तो