न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 87, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६३
शंका-सुवर्णके तैजस होनेमें क्या प्रमाण है? समाधान-किसी प्रतिबन्धकके
न होनेसेभी अत्यन्त अग्निका संयोग होनेसेभी सुवर्णमें अनुच्छिद्यमान द्रवण रहता है
इसलिये जाना जाता है कि, सुवर्ण तैजस है. ( यन्नैवं ) जो प्रतिबन्धकके न होनेसे
अत्यन्त अग्निके संयोग होनेसे अनुच्छिद्यमान द्रवणवाला नहींहै अर्थात् जिसके द्रव-
णका उच्छेद ( विनाश ) होजाताहै, ( तन्नैवं ) वह तैजसभी नहीं है; जैसे पृथिवीहै.
शंका-तुम्हारा अनुमान अप्रयोजक है अर्थात् अनुकूल तर्कके अभाववाला है.
याते सुवर्णके तैजस न होनेसेभी पूर्वोक्त हेतु सुवर्णमें रहे तो दोष नहीं. समाधान-
घृतलाक्षादि पृथिवीमें जो द्रवण है तथा जन्य जलमें जो द्रवण है वह अग्निसंयोगसे नष्ट
हो जाताहै. सुवर्णके द्रवणका नाश नहीं होता. यही पूर्वोक्त अनुमानमें अनुकूलतर्क
है.शंका- पीतरूपके तथा गुरुत्वके आश्रय पृथिवीके भागोंकाभी तो उसकालमें
सुवर्णके साथही द्रवण होताहै. उनमें पूर्वोक्त हेतुका व्यभिचार होगा. समाधान-
जलके बीच घुले हुये स्याहीके चूर्णकी तरह सुवर्णमें होनेवाले पृथिवीके पीत भागभी
द्रवणयुक्त नहीं केवल जलके तथा सुवर्णके सम्बन्धसे उभयत्र पार्थिव भागोंमें द्रवणकी
भ्रमात्मक प्रतीति होतीहै.
अपरे तु पीतिमाश्रयस्यात्यन्ताग्निसंयोगेऽपि रूपापरावृत्तिदर्श-
नात्तत्प्रतिबन्धकं विजातीयं द्रवद्रव्यं कल्प्यते । तथाहि ।
अग्निसंयोगे पीतिमगुरुत्वाश्रयो विजातीयरूपप्रतिबन्धकद्रवद्र-
व्यसंयुक्तः,अत्यंताग्निसंयोगेऽपि पूर्वरूपविजातीयरूपानधिकरण-
पार्थिवत्वात् । जलमध्यस्थपीतपटवत्, तस्य च पृथिवीजल-
भिन्नस्य तेजस्त्वनियमात् ।
भाषा-कई एक आचार्य ऐसेभी कहतेहैं कि, पीतरूपके आश्रय पार्थिवभागोंका
अति अग्निके संयोग होनेसेभी रूप बदलता नहीं देखाजाता इसलिये अग्निसंयोगसे
पार्थिवभागोंमें रूप न बदलने देनेवाला कोई विजातीय विलक्षण तथा द्रवणयुक्त
द्रव्यप्रतिबन्धक कल्पना करना उचितहै उस कल्पनाका प्रकार यह है कि, जैसे जल-
पूरित पात्रमें पीत वस्त्र डालकर अग्निपर वह पात्र रखा जाय तो अत्यन्त अग्निका
संयोग होनेसेभी वस्त्रका पूर्वरूपसे विलक्षण रूप नहीं देखाजाता; वैसेही पीतरूपयुक्त
तथा गुरुत्वके आश्रय सुवर्णस्थ पार्थिवभागोंमेंभी अत्यन्त अग्निसंयोग होनेसेभी पूर्वरूप
से विलक्षणरूपकी अधिकरणता प्रतीत नहीं होती.इससे जाना जाताहै कि वह सुवर्णस्थ .
पार्थिवभाग किसी विलक्षण तथा रूपके प्रतिबन्धक द्रवणयुक्त द्रव्यके साथ मिश्रित
हैं; वह विलक्षण द्रव्य पृथिवी जलसे भिन्न होनेसे नियमसे तेजःपदार्थ है.