न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ६५
कोंमें शब्द सन्तति है; वह किसी स्पर्शवाले तथा वेगवाले द्रव्यके संयोगसे जन्य है.
दण्डाभिघातसे भेरीशब्दकी तरह अवयवोंके न विभाग होनेसेभी द्रव्यसम्बन्धि शब्द
सन्तति होनेसे-इति २; एवं आकाशमें तृणतूलादिकोंकी धृति किसी स्पर्शवाले
तथा वेगवाले द्रव्यके संयोगहेतुका है, नौका धृतिकी तरह अस्मदादिकोंसे अनधिष्ठित
द्रव्यधृति होनेसे-इति ३; एवं रूपवाले द्रव्यके अभिघातसे विना जो तृणशाखादिमें
क्रिया है वह किसी स्पर्शवाले तथा वेगवाले द्रव्यके अभिघातसे जन्य है. नदीप्रवाह
में प्रवाहित तृणक्रियाकी तरह विलक्षण क्रिया होनेसे-इति ४; जिस रीतिसे वायुका
प्रत्यक्ष नहीं होता वह रीति आगे आत्मानिरूपणमें कहेगा.
पूर्ववन्नित्यतायुक्तं -
भाषा-वायुका नित्य अनित्यपना जलकी तरहही कहा है.
पूर्ववदिति । वायुर्द्विविधः, नित्योऽनित्यश्च, परमाणुरूपो नित्य-
स्तदन्योऽनित्यः समवेतश्च, सोऽपि त्रिविधः शरीरेन्द्रियविषय-
भेदात् । तत्र शरीरमयोनिनं पिशाचादीनाम्, परंतु जलीय-
तैजसवायवीयशरीराणां पार्थिवभागोपष्टम्भादुपभोगसाधनत्वं
जलादीनां प्राधान्याज्जलीयत्वादिकमिति ।
भाषा-अर्थात् वायु नित्यानित्यभेदसे दो प्रकारका है. परमाणुरूप वायु नित्य है
और कार्य्यरूप अनित्य है. तथा समवायसम्बन्धसे स्वअवयवोंमें रहता है. वह अ-
नित्यवायुभी शरीरभेदसे, इन्द्रियभेदसे तथा विषयभेदसे तीन प्रकारका है. उनमेंसे
वायवीय शरीर तो अयोनिज पिशाचादिकोंका वायुलोकमें मसिद्ध है; परन्तु इतना वि-
शेष है कि जलीय शरीरोंको तथा तैजस शरीरोंको तथा वायवीय शरीरोंको भोग उप
करणता पार्थिवभागोंकी मिलावटसे है. जलीयत्व आदि व्यवहार तो जलादिकों
की प्रधानता होनेसे होताहै.
अत्र यो विशेषस्तमाह, देहव्यापीति-
भाषा-'देहव्यापि' इत्यादि ग्रन्थसे मूलकार त्वगिन्द्रियनिष्ठ विशेषताको कहताहै-
देहव्यापि त्वगिन्द्रियम् ॥ ४३ ॥
भाषा-सर्वशरीरमें व्यापक त्वगिन्द्रिय वायवीय है ॥ ४३ ॥
शरीरव्यापकं स्पर्शग्राहकमिन्द्रियं त्वक् । तच्च वायवीयं रूपा-
दिषु स्पर्शस्यैव व्यञ्जकत्वादङ्गसङ्गिसलिलशैत्यव्यञ्जकव्यजन-
वातवत् ।
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