न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
अथ न्यायतत्त्वसमीक्षाख्यभूमिका ।
इस सर्वथा इत्थंभावेन अचिन्तनीय तथा अनवद्य वैशद्य विपुल संसारमें प्राणीमात्रको
प्रतिक्षण समूल दुःखनिर्मूलपूर्वक परमोत्कृष्टाप्रतिहत सुखसंतानविषयिणी लिप्सा तथा
एकान्तात्यन्त समूल दुःखविषयिणी जिहासा सामान्यरूपेण स्वान्तमें सर्वदा एकरस
बनी रहती है; परन्तु यावत् प्राणी हेय हेयहेतु तथा हान हानोपायको सम्यक्रूपसे
न जानते हुए संसारचक्रमें प्राप्त होय सुखके बदले विपरीत अनेकविध जन्ममरणादि
दुःखहीको अनुभव करतेहैं. वर्तमान प्रचलित संसारचक्रमें प्रायः सामान्यरूपेण यों देख-
नेमें आता है कि-प्रादुर्भूत हुआ प्राणीमात्र प्रथम अबुद्धावस्थामें अपने मातापितृद्वारा
या किसी दूसरे सजाति विजातिसम्बंधिद्वारा पालनपोषणादि सहकारिताको पायकर समया-
नुसार स्वयं सुबोध हुआ विशेषरूपसे निरवच्छिन्न सुखसम्पादनमें प्रयत्नशील होताहै;
उसमेंभी सामान्यरूपसे इन प्राणियोंके दो भेद देखनेमें आतेहैं. एक तो ऐसा प्राणीदल
देखनेमें आता है कि, जिसमें विचारशक्तिका बहुतही ह्रास प्रतीत होताहै; जैसे कि, पशु
पक्षि कृमि-दंशादि हैं. ऐसा प्राणीदल अहोरात्र केवल काय पालन पोषणादिमें प्रयत्नशील
हुआ इसीको परम पुरुषार्थ तथा सुखसीमा मानकर अपनी आयुको व्यतीत करता
हुआ स्वस्वान्तमें परम सन्तुष्ट होताहै; और दूसरा विचारशील प्राणीवर्ग देवमनुष्यादिहैं.
इस प्राणीवर्गको जब अनेकविध भोगोंसे शरीर पालन पोषण कर कदाचित् दैवात् अव-
काश मिलता है तो समय २ पर ऐसे विचार उत्पन्न होतेहैं कि मैं कौनहूं? कैसाहूं? कहांसे
आया और कहाँजाऊंगा? इत्यादि । एवं यह संसार क्या है? कैसा है ? किसका है? इत्या-
दि । एवं मेरा तथा इस संसारका कोई अधिपति है या नहीं? यदि है तो कैसा है? कौन
है ? कहां है ? इत्यादि अनेक प्रकारके विकल्पयुक्त विचार उद्बुद्ध होते हैं. बस, इनही
विचारोंको दार्शनिक विचार कहतेहैं. वह दार्शनिक विचार इस देशमें प्रायः ‘ अस्ति
नास्ति ’ कोटिके भेदसे प्राचीन कालसे दोप्रकारका चला आता है. इन विचारोंपर
सिद्धान्त करनेवाले महापुरुषोंको ऋषि महर्षि मुनि महामुनि इत्यादि प्रतिष्ठित शब्दोंसे
इतरलोग स्मरण करते हैं और परमोत्कट जिज्ञासावस्थामें इतर लोग उनही महर्षियों-
के सिद्धान्तोंको स्वान्तारूढ कर अपनेको कृतकृत्य तथा परमपुरुषार्थके भागी मानतेहैं.
( २ ) भूमिका ।
वह दार्शनिक विद्या संसारके अनादि होनेसे समय २ पर यद्यपि अनेक प्रकारसे परि-
णत होती चली आती है तथा समय २ पर इस विद्याके प्रचारक ऋषि महर्षिभी अने-
कों होचुकेहैं; तथापि वर्तमान कालमें इस भारतभूमिमें प्रख्यात अस्तिकोटीकी दर्श-
निकविद्या षट्भेदसे विभक्त हुई विराजमान है, तथा इसके प्रचारक परमपूज्य प्रति-
ष्ठित इस भारतसन्तानके हितपूर्वक एकमात्र शासक महर्षिभी षट्ही हुएहैं,
जिनके सदुपदेशोंसे उपदिष्ट तथा अनुगृहीत हुई भारतीय संतान अद्यावधि
महर्षि कपिल, महर्षि कणाद, महर्षि गौतम, महर्षि पतंजलि, महर्षि व्यास,
तथा महर्षि जैमिनि, इन सुशोभित नामोंसे तथा अपने पवित्र हृदयके भावोंसे समय २
पर स्मरण करती है. यद्यपि चार्वाक बृहस्पति बुद्धादि विद्वान् लोग नास्तिको-
टीके दर्शनोंके प्रवर्त्तकभी अनेक हुएहैं तथापि इस भारतीय प्रजामें उन दर्शनोंका
सम्मान तथा प्रचार वर्तमानकालमें बहुतही न्यून दीख पड़ताहै; परन्तु कपिल
कणादादि महर्षियोंके मुखारविन्दनिःसृत तथा सद्विद्वद्वायुद्वारा इतस्ततः प्राप्त सदुपदे-
शरूपाऽऽमोदको किसी एक हतभाग्यके सिवाय ऐसा कोईभी भारतोद्बुद्ध प्रबुद्ध मधुप
न होगा जो कि सत्कार तथा परमप्रेमपूर्वक श्रवणद्वारा आघ्रात न करे. भाव यह कि-इन
महर्षियोंके सदुपदेशात्मक ज्ञानमयी पताका आसमुद्र भारतमात्रमें तो क्या बलके
पारके देशोंमेंभी एकरस सत्कारपूर्वक फहराती दीख पड़ती है; कारण यह कि-इन
महात्माओंने अतिसंक्षिप्त सूत्रभूत शब्दोंसे जिज्ञासुलोगोंको ऐसा सारभूत तथा पक्ष-
पातरहित सदुपदेश कियाहै कि, विज्ञ अधिकारी यदि संतोषपूर्वक श्रद्धासे सांगोपांग
देखे या सुने तो अवश्य उसके चित्तमें आर्षसिद्धान्तका आभास पड़ही जावे और
इन छहों महर्षियोंके सूत्रोंमें यह एक भारी उत्तमता है कि, सिवाय स्वसिद्धान्तप्रति-
पादनके परस्पर रागद्वेषसे एक दूसरेका खण्डन मण्डन या कटाक्ष वचनोंसे परस्पर
तिरस्कारका लेशभी दृष्टिगोचर नहीं होता. प्रत्युत सबसे प्रथम दर्शनकार महर्षि कपि-
लदेव (कि, जिनके विषयमें श्रीमद्भागवतादि महापुराणोंमें भगवदवतारत्वेन गणना करीहै
उन)के दर्शनके उपयुक्त तथा सहकारक योगसूत्र निर्माण कर महर्षि पतंजलिने पाणिनि
कात्यायनकी तरह एकार्थ प्रतिपादकत्वेन परस्पर सख्य सूचन कियाहै. एवं कणाद-
महर्षिके दर्शनके उपयुक्त तथा सहकारक सूत्रोंको निर्माण कर गौतम महर्षिनेभी
परम सख्य दिखलायाहै. एवं ब्रह्मसूत्रोंके सहकारक धर्मसूत्रोंको निर्माण कर जैमिनि
महर्षिनेभी अपने गुरु व्यासदेवके साथ सम्मतिही सूचन करीहै; इसीहीसे सांख्य
योग दोनों केवल एकही 'सांख्य' शब्दसे प्रख्यात हैं और न्याय वैशेषिक दोनों एकही
'न्याय' शब्दसे प्रख्यातहैं. तथा ब्रह्मसूत्र और धर्मसूत्र दोनों केवल एकही 'मीमांसा'
शब्दसे प्रख्यात हैं. भाव यह कि-यह महर्षिलोग अपने आपको एक वैदिकसिद्धान्तानु-
भूमिका । ( ३ )
यायी समझते हुए एक दूसरेकी जहाँतक बन पड़े सहायताही करतेथे किन्तु स्वकीय
पाण्डित्य प्रख्यापनार्थ स्वेतरसिद्धांतको दूषित कदापि नहीं करतेथे. कपिल महर्षिने
तत्त्वप्रसंख्यानको मुक्तिमार्ग मानाहै; उसीका सहकारी चित्तशोधक तथा जीवन्मुक्तिका
सम्पादक योगशास्त्र है. इसी भावसे “ सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डि-
ताः ” ऐसा भगवान्नेभी कहाहै. एवं पदार्थतत्त्वज्ञानको कणादमहर्षिने मुक्तिमार्ग
मानाहै; उसीके उपयोगी वादविजयाद्यर्थ निग्रहस्थान हेत्वाभासादिका प्रदर्शक न्याय-
शास्त्र है. एवं ब्रह्मज्ञानको मुक्तिमार्ग वेदव्यासने माना है उसीका उपयोगी अन्तःक-
रणशुद्धिद्वारा जैमिनिमहर्षिका धर्ममीमांसाशास्त्र है. एवं मूलसूत्रकारोंमें परस्पर
विरोधका लेशभी नहीं है. यद्यपि कहीं २ मूलसूत्रोंमें नास्तिकमत खण्डनका
आभास दीखपड़ता है. तथापि हमारा इस कथनमें तात्पर्य है कि-वैदिक मतावलम्बी
इन छहोंका किसी अंशमेंभी विरोध नहीं है. एवं शंकरस्वामीके समयसे प्रथम होनेवाले
इन षट्दर्शनसूत्रोंके व्याख्यानोंमेंभी कहीं परस्पर विरोध देखनेमें नहीं आता. यद्यपि
सांख्यसूत्रोंपर विज्ञानभिक्षुके व्याख्यानमें आद्यहीमें-
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ।
आर्थं च श्रुतिवाक्यानां दर्शयँल्लोकगर्हितम् ॥ १ ॥
कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्र च प्रतिपाद्यते ।
सर्वकर्मपरिभ्रंशान्नैष्कर्म्यं तत्र चोच्यते ॥ २ ॥
परात्मजीवयोरैक्यं मयाऽत्र प्रतिपाद्यते ॥
ब्रह्मणो ऽस्य परं रूपं निर्गुणं दर्शितं मया ॥ ३ ॥
सर्वस्य जगतोऽप्यस्य नाशनार्थं कलौ युगे ॥
वेदार्थवन्महाशास्त्रं मायावादमवैदिकम् ॥ ४ ॥
मयैव कथितं देवि जगतां नाशकारणम् ॥
इत्यादि पद्मपुराणके वचनोंसे वेदांतियोंपर कटाक्षयुक्त लेख दीख पड़ताहै तथापि वह
अत्यन्ताधुनिक होनेसे विज्ञश्रेणीमें कदाचित् श्रद्धेय नहींहै.अब हमसे कोई यदि यह पूछे कि
यदि सूत्रकारोंका तथा भाष्यकारोंका परस्पर विरोध नहीं तो वर्तमान कालमें तो दर्शन
सम्बन्धी कोई ग्रन्थ या लेख ऐसा लिखाही नहीं जाता कि,जिसमें सांख्यी नैयायिकोंका
तथा नैयायिक बिना अपने वेदान्तादिपांचोंका तथा वेदान्ती बिना अपने न्यायादि पांचों
का इत्यादि परस्पर खण्डन या मण्डन न लिखाजावे; यदि यह खण्डन मण्डन सूत्रों-
में या उनके भाष्योंमें नहीं तो आया कहासे तथा किमूलक है ? तो इसकाउत्तर हमको
जिह्वा संकुचित कर यही कहना पड़ताहै कि-इस दर्शनकारोंके परस्पर विरोधका
मूलभूत भगवान् भाष्यकार भगवत्पाद श्री १०८ शंकराचार्य्यही हैं. इनसे प्रथम सांख्य
योगादि उत्तमसिद्धान्तोंके निराकरण करनेमें किसी आस्तिक विद्वान्का साहस न हुआथा।
किन्तु सांख्यसिद्धान्तको सहित उसके कर्ताके अप्रमाणित ठहरानेमें तथा गौतम
कणादको वैनाशिक तुल्य बतलाकर उनके सिद्धान्तोंको धूलीमें मिलानेमें एवं धर्म
मीमांसाके मूलोच्छेदनेमें यह प्रथम २ भगवती भगवत्पादहीकी लेखनी प्रवृत्त हुईहै.
इसमें यदि कोई ऐसा कहे कि--शंकरस्वामी महाप्रमित लेखकहैं; इसलिये अत्यन्त
निर्मूल लेख कदापि नहीं लिख सकते, कहींभी मूलसूत्रोंमें या उनके प्राचीन भाष्योंमें
खण्डन मण्डनविषयक लेख अवश्य होगा उसीके आश्रयसे भाष्यकारकी लेखनीभी उधर ही
प्रवृत्त हुई तो इसमें हम यह कहतेहैं कि--इसका मूल “एतेन योगाः प्रत्युक्ताः” यह
द्वितीयाध्यायके प्रथम पादका तृतीय वेदान्तसूत्र है, बस, इसी एकभावी सूत्रके आधारसे
प्रथमाध्यायके चारों पादोंकी जहां तक बनपड़ा कपिल महर्षिके सिद्धान्त निराकरणमें
ही व्याख्या करी, अन्तमें फिरभी संतोष नहीं हुआ तो दूसरे अध्यायके आद्यमें “स्मृ-
त्यनवकाशदोषप्रसंगः इति चेत्, न, अन्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसंगात् ॥ १॥” इस सूत्रकी
व्याख्यामें फिर बिचारे कपिलको लथेडना आरम्भ किया और यहां तक लथेडा कि
श्रुतिस्मृतिप्रतिपाद्य सर्वज्ञ कपिलदेव वासुदेवांश रूपसे अवतीर्ण औरही हुआ है और
यह द्वैतवादी सांख्यशास्त्रका कर्ता कोई अवैदिक कपिल है इत्यादि सभी कुछ कहा. यद्यपि
“ऋषिं प्रसूतं कपिलं यः” इत्यादि श्रुतिस्मृतीतिहासप्रसिद्ध वह एकही महर्षि कपि-
ल है जो कि देवहूति माताके गर्भसे कर्दम महर्षिके वीर्यसे हुआहै; उसीको
श्रीमद्भागवतके तृतीयस्कन्धमें “अयं सिद्धगणाधीशः सांख्याचार्यैः सुसम्मतः ॥ लोके
कपिल इत्याख्यां गन्ता ते कीर्तिवर्द्धनः ॥१९॥ अ० २४॥” इत्यादि वचनोंसे ब्रह्माने
सिद्धोंका स्वामी भगवदवतार तथा सांख्यशास्त्रका कर्ता कहा है, एवं इसीही कपिलने
अपनी माताको प्रसिद्ध सांख्यशास्त्रके अनुसारही उपदेश कियाहै; तथापि सांख्यशा-
स्त्रका कर्ता अवैदिक था किन्तु श्रुतिप्रतिपाद्य कपिल दूसरा हुआहै, ऐसा कहतेहुए स्वामीको
रोकनेका किसका सामर्थ्य है? आप साक्षात् शंकरहैं अतएव स्वतन्त्र होनेसे नियोग पर्यनु
योगानर्ह हैं जो चाहें सो लिखें, हम लोगों आस्तिकोंको बीचमें किन्तु करनेका अधि-
कार नहीं है किन्तु केवल राजशासनवत् इनका जो कुछ लेख होय वह हम लोगों
अनुचरोंको सन्मानपूर्वक शिरोधार्य तथा मान्य है.
एवं आपने मन्वादिस्मृतियोंको वर्णाश्रमधर्म बोधनमें सावकाश तथा कापिलशास्त्र-
को विना अध्यात्मविचारके निरवकाश, एवं “अस्मत्कृते च व्याख्याने जना न
विश्वस्युर्बहुमानात्स्मृतीनां प्रणेतृषु” इत्यादि वचनोंसे कपिलादिमहर्षियोंके वचनोंमें
लोगोंकी अधिक श्रद्धा तथा स्ववचनोंमें विश्वासका संदेह इत्यादि बहुत कुछ कहा परन्तु शेषमें
इसकी व्यवस्था कुछभी न करी, ठीक २ अब मुझे स्मरण हुआ आपने अग्रिमभाष्यमें कपिलको
द्वैतवादी होनेसे अवैदिक तथा कणाद गौतमको परमाणुवादी होनेसे वैनाशिक लिखही
दिया है. गुरुका कहा सभी चेला लोग मानेहींगे फिर पृथक् व्यवस्था करनेका कौन
प्रयोजन रहा? कपिल, कणाद, गौतम, पतंजलि, तथा जैमिनि, ये पांचों दर्शनकार
तो नानात्मवादी होनेसे अवैदिकही हैं. शेष रहे व्यासदेव सो इन्होंकाभी योगसूत्रोंके
भाष्यमें तो नाना चिदात्मवादही सिद्धान्त है इनकोभी चाहे आप वैदिक मानें या अवै-
दिक. हां, इनके ब्रह्मसूत्रोंमें स्पष्टरूपसे चाहो कहींभी नहींमिलता परन्तु भगवत्पाद
निर्मित उनके भाष्यमें एकात्मवाद अतिसमारोहसे निरूपण किया है.
अब हमको यहां सन्देह उत्पन्न होता है कि कपिलादि षट्महर्षि अवैदिक हैं या एक
भगवत्पाद श्री १०८ शंकर स्वामीही अवैदिकहैं ? परस्पर विरुद्ध लेख है; इसलिये
दोनोंमें एक कोटि अवश्य निर्बल होनी चाहिये. ‘कौन होनी चाहिये?’ इसको विद्वान्
लोग स्वयं सोचें. मेरी अल्पबुद्धि इसपर सिद्धान्त नहीं करसकती और न मैं श्रद्धा-
शून्य होकर किसी अपने पूज्य पूर्वज वृद्धको न्यूनकोटीका कहनाही चाहताह
( ६ ) भूमिका ।
निवेदन श्रीचरणोंमें कुछ दोषतात्पर्यसे नहींहै किन्तु प्रार्थनारूपसे है; क्योंकि मिथ्या
परदोषोद्भावन करना महाराजप्रासाद गिरानेकी तरह एक साधारण निर्बुद्धिपुरुषोंका
काम है, परन्तु उसी राजभवनके यदि पुनः निर्माणकी अपेक्षा होय तो बहुतसे उत्तम
शिल्पशास्त्रवेत्ताओंकी पेक्षा होती है इसलिये परके उसमेंभी अपने पूर्वजोंके दोष-
उद्भावन करनेको मैं बहुतही बुरा समझताहूं; तथापि गौतम कणादसिद्धान्तपर
जो आपने मिथ्या आक्षेप कियेंहैं वे हमको सर्वथा असह्यहैं. यों तो यही
सच्च है कि--निर्दोष एक परमात्मा है, जावका निर्दोष होना दुर्घट है; परन्तु इतना
कहना किसी विद्वान्को अस्वीकृत न होगा कि--यदि महर्षि पाणिनि पतंजलि
पदनियामकशास्त्रको निर्माण न करते तथा महर्षिगौतम कणाद पदार्थनियामकशास्त्र
को निर्माण न करते तो इतर जीवोंको शास्त्रके विद्वान् बनकर बोलनाभी कठिन पड़ता.
धनीका धन वर्तनेसे लोगोंको मुनीमभी धनीसा दीख पड़ताहै परन्तु वस्तुतः वह धनी नहीं
होता. आपने गौतम कणाद सिद्धांतके यद्यपि मुख्य २ कईएक पदार्थोंको दूषित किया है
तथापि नानात्मवाद उन सबमें मुख्य है. इसलिये इसमें किंचिद् हमकोभी वक्तव्य है.
प्रथम नानात्मवादम यह दोष हैं कि--जब एक आत्माके साथ मनका संयोग होताहै तो उसी
कालमें उसी मनका दूसरे आत्माओंके साथ संयोगभी नियमसे होगा क्योंकि आत्माओं-
को व्यापक होनेसे मनकी सन्निधि सबके साथ समान है. एवं सन्निधिरूप हेतुके समान
होनेसे सबका सुख दुःख समानही होना चाहिये १ । नानात्मवादीको अदृष्टोंसे
व्यवस्था माननीभी कठिन है, क्योंकि अदृष्टभी तो आत्ममनःसंयोगहीसे बने हैं; उनका
भी यह इसी आत्माके हैं, दूसरेके नहीं; यह निर्द्धार होना कठिन है २। यदि नानात्म-
वादी कहें कि जिस आत्माने जैसे तात्पर्यसे जो क्रिया करी है वह उसीके अदृष्टोंकी
जनक होसकती है, दूसरेके नहीं; तो यहभी सम्यग् नहीं क्योंकि तात्पर्यभी तो आत्ममनः-
संयोगहीसे उत्पन्न होताहै जो कि सर्वत्र तुल्यही है ३ । यदि प्रदेशकृता व्यवस्था
कहो अर्थात् शरीरावच्छेदेन आत्ममनःसंयोगको रागादि तथा अदृष्ट सुखादिजनकता
मानो तो यहभी ठीक नहीं; क्योंकि सभी आत्मा सभी शरीरोंमें समान विद्यमानहैं.
शरीरके सम्बन्धसे कोई आत्मा प्रदेशवाला नहीं होसकता और शरीरकाभी सब व्या-
पक आत्माओंके साथ सम सम्बन्ध होनेसे 'यह अमुक आत्माका शरीर है' ऐसा निर्धार
होना कठिन है ४ । यदि आत्माका प्रदेश मानभी लियाजाय तो जिन दो जीवा-
त्माओंको समान सुख दुःख होना है उनको एकही शरीरसे होजाना चाहिये; क्योंकि
दोनों जीवात्माओंके अदृष्टका कदाचित् समान प्रदेशभी होसकता है. जैसे जिस प्रदे-
शमें चैत्रको जैसा सुख या दुःख अनुभव हुआहै यदि वहां उसके स्थानापन्न मैत्र
नियत किया जावे तो उसकोभी वैसाही सुखदुःख देखनेमें आता है; इसलिये दो जीवा-
त्माओंका समान प्रदेशादृष्टका सम्भव होसकता है ५ । एवं प्रदेशवादीको स्वर्गादि
उपभोगभी नहीं होना चाहिये; क्योंकि ब्राह्मणादि शरीर प्रदेशेन उत्पन्न
हुए अदृष्ट अतिदूर प्रदेशांतरवर्त्ति स्वर्गके जनक नहीं बन सकते ६ । नाना आत्मा
व्यापकभी नहीं होसकते; क्योंकि ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं है ७ । यदि आकाशादिका-
लादि दृष्टान्त कहो तो वेभी उत्पत्तिवाले होनेसे हमारे मतमें व्यापक नहीं हैं इत्यादि
८ । यह सब २ अ०, ३ पादकी समाप्तिमें भाष्यकारने दोष दियेहैं; इनमें प्रथम
के चार तो पूर्व पूर्वउत्तर २से दूषित हैं और पंचममें यह वक्तव्य है कि,दो जीवात्माके या
अधिकके परस्पर अदृष्टोंका या भोगका या उनके प्रदेशका समान होनाही असम्भव है;
क्योंकि हमारे मतमें आत्मसमवायि अदृष्ट प्रत्यात्म असाधारण हैं और उन
अदृष्टोंके भेदको अनादि होनेसे उनका किया मनके साथ आत्माका स्वस्वामिभाव
लक्षण सम्बन्धभी अनादि है. एवं आत्ममनःसंयोगके सर्वात्मसाधारण होनेसेभी
स्वस्वामिभावलक्षणसबन्धको सर्वथा असाधारण होनेसे पूर्वोक्त अभिसंध्यादि व्यवस्था
सर्वथा उपपन्न होसकतीहै और वास्तवविचार करें तो मनका संयोगभी प्रत्यात्मसाधारण
नहींहै; क्योंकि आत्मसंयोगका प्रतिसंयोग भेदसे भेद है. इसलिये मनका आत्मान्तरोंके
साथ जो जो संयोग है वह स्वस्वामिआत्माके साथ नहीं किंतु दूसरा है,इति५। एवं तत्त-
दात्माके तत्तद्विचित्र अनाद्यदृष्टसे प्रेरित हुए तत्तत् मन-स्वस्वामि आत्माके प्रति स्वर्ग
नरकादि तत्तत्प्रदेशावच्छेदेन सुखदुःखादि भोगका हेतु होसकतेहैं. प्रदेशभेद होनेसेभी अदृष्ट
तथा भोगका एकात्मवृत्तित्वेन परस्पर समानाधिकरण होनेसे कार्यकारणभाव निर्वाह है.
अन्यथा मनको मध्यमपरिमाण मानकर उसमें अदृष्ट सुखादिभोगके माननेवाले वेदा-
न्तीकोभी व्यवस्था लगानी कठिन होगी; क्योंकि उसकोभी यह पूछ सकतेहैं कि अन्तःकर-
णम अदृष्टव्याप्यवृत्ति उत्पन्न होतेहैं या अव्याप्यवृत्ति?यदि व्याप्यवृत्ति कहो तो "शिरसि मे
वेदना पादे मे सुखं" इत्यादि प्रतीतिकी अनुपपत्तिहोगी; क्योंकि व्याप्यवृत्तिअदृष्ट व्याप्य-
वृत्ति सुखादिके जनकही होने चाहिये. एवं यदि द्वितीयपक्ष कहो तो क्रिया तथा अदृष्टकी
अदृष्ट तथा भोगकी समानाधिकरणानुपपत्ति होगी-इत्यादि ६ । जैसे आपके एकात्मवादमें
आकाश दृष्टान्त है वैसेही हमारे नानात्मवादमेंभी आकाशादि दृष्टान्त होसकतेहैं ७ ।
यदि आकाश उत्पत्तिवालाहै तो "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः"ऐसा आपभी नहीं कहसकते
और"आत्मनआकाशः सम्भूतः"इत्यादि वचनोंको देखकर बुद्धिविरुद्धअर्थको श्रौत मान-
नाभी बुद्धिमत्ता नहीं है. आकाशादि विभुहैं,अस्पर्श द्रव्य हैं तथा निरवयव हैं इसलिये उनकी
उत्पत्ति माननी अयुक्त है इत्यादि ८ । यद्यपि वेदान्ती केसुषुप्ति अवस्थाके तथा नैयायिक
के मनःसंयोगाभावावस्थाके जीवात्मामें किञ्चिदपि विशेष नहीं तथापि दूषित करणार्थ गौतम-
कणाद सिद्धान्तका अनुवाद करते हुए भाष्यकार उनके आत्माको घट कुड्यादिवत् लि-
( ८ ) भूमिका ।
खतेहैं. क्या जाने यह कौनसे ऋषि वचनोंका अनुवाद कर खण्डन कर रहेहैं? गौतमकणाद
सिद्धान्तमें तो कहीं आत्माको घटकुड्यादिवत् कहानहीं.प्रत्युत “बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव”
इत्यादि श्रुतिसिद्धज्ञानादिगुणाधिकरण कहाहै. पुरीततीबाह्यदेशावच्छेदेनात्ममनःसंयोगसे
ज्ञानका प्रादुर्भाव होना अनुभवसिद्धहै.इस विलक्षणसंयोगसे विनामुक्तिमेंभी कुछ विशेष नहीं
अर्थात् सुषुप्ति एकमुक्ति अवस्थाका उदाहरणरूप है. सबीजनिर्बीज समाधि तो अन्तःकरण-
की अवस्था हैं इसलिये मुक्तिका उदाहरण नहींबनसकतीं, एवं इसके सिवाय अन्तःकरण
में या अविद्यामें आभास मानकर जीवकी सुषुप्ति या जाग्रत्की व्यवस्थाके लिये प्रतिदिन
अंतःकरणका कारणरूपेणावस्थान तथा अविद्याका वृद्धिरूपेण परिणाम माननाभी बुद्धि
तथा शास्त्रविरुद्ध है. विना विशेष सामग्रीके कार्य्यकी कारणरूपेण परिणति या कारण
की कार्य्यरूपेण परिणतिमें संसारमात्रमें कोई उदाहरण नहीं है. उदाहरणरूपेण गृहीतदधि-
दुग्धादिपदार्थ स्वविकृत्यर्थ तिक्तादि विशेषपदार्थोंकी अपेक्षा रखतेहैं- इति ।
एवं संस्कृतके पूर्ण विद्वान् लोग तो यद्यपि अच्छीतरहसे इस वार्त्ताको जानतेहैं कि-शं-
करस्वामीने सांख्यादि सर्वदर्शनोंसे विरुद्ध एक अपनी ठाईपा जुदाही पकाई है तथा सुयो-
ग्यशिष्यमण्डलीने उसकी सुगन्धि पूर्णरूपसे सर्वत्र फैलाई है तथापि आर्य्यभाषाले-
खसे उसी मतको मण्डन करतेहुए निश्चलादिविद्वानोंने जिन सरल पुरुषोंको महर्षि-
सिद्धान्तोंसे वंचित किया है उनके बोधका उपाय वर्तमानकालमें सर्वथा अचिन्तनीय है.
शंकरमतको पुष्ट करतेहुए निश्चल कहतेहैं कि-शंकरस्वामी महादेवका अवतारहैं इसमें
व्यासोक्त “कलिमें वेद अर्थ बहु करिहैं । श्रीशंकर शिव तब अवतरिहैं ।
जैन बुद्धमतमूल उखारैं । गंगाते प्रभुमूर्ति निकारैं । ” इत्यादि पुराण वचन
प्रमाणहैं १ । एवं परमपूज्य महर्षि वाल्मीकिने जिस अर्थका सविस्तर निरूपण
किया है वही शंकरस्वामीभी उत्तम रीतिसे लिखतेहैं २ । एवं युक्तिसेभी
भेदवाद विरुद्ध है. वह युक्ति खण्डनादि ग्रन्थोंमें लिखी है; कठिनहैं, इसलिये यहां नहीं
लिखते ३ । “एवं मृत्योः स मृत्युमाप्नोति, य इह नानेव पश्यति, द्वितीयाद्वै
भयं भवति, अथ योऽन्यां देवतामुपासते, अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद, यथा
पशुरेव स देवानाम्” इत्यादि श्रुतिविरुद्ध होनेसेभी द्वैतवाद अप्रमाणिक है ४।
बस, इन चार हेतुओंसे निश्चलने शंकरमतको प्रमाणित किया है. प्रथममें यह
वक्तव्य है कि विज्ञानभिक्षुने इससे विपरीतार्थ बोधक पद्मपुराणके पूर्वोक्त वचन लिखेहैं.
सभी पुराणोंके कर्त्ता व्यासही हैं. दोनोंमें कौन वचन सच्चेहैं? सो आपही कहदीजिये.
और आप कौनसे पुराणके गीत गातेहैं?यदि नाम लिखते तो देखभी लेते; परन्तु आप तो
श्रद्धाके उमँगमें नाम लिखनाभी भूलगए. यदि आप कहें कि व्यासभी अनेक हुएहैं तो,
हमभी मानतेहैं परन्तु आपकी आख्यायिकाका मूलकारक तो कोई शंकरस्वामी क
भूमिका । ( ९
शिष्यही व्यासदेव होगा ऐसा जानिये १। और जिस वासिष्ठ के पोथेको आप
महर्षिवाल्मीकिकृत मानतेहैं वह तो शंकरस्वामीकीही शिष्यमण्डलीमेंसे किसी शंक-
रानन्दादि विद्वान्का लेख है. आप सोचें तो सही कि यदि यह ग्रन्थ शंकर स्वामीसे
प्रथम होता तो जैसे मनु गीता महाभारत विष्णुपुराणादिके वचन जगह२ पर भाष्यमें आते
हैं. कोई इसका वचन या प्रकरणभी न आता? परन्तु शारीरक मात्रमें योगवासिष्ठका नाम
तक नहीं है; इसलिये यह ग्रन्थ सर्वथा आधुनिक है २। खण्डन मण्डनकी युक्ति तो खड्गकी
तरह वादी प्रतिवादी दोनोंको समान है वह जिसके पास दृढ होगी उसीका विजय होगा.
केवल अद्वैत वादको युक्तिप्रधान मानना भ्रम है ३। एवं श्रुतिविचारमें जैसे च्छा-
न्दोग्यमें “तद्धैके आहुरसदेवेदमग्र आसीत्” इत्यादि वचनोंसे चार्वाक सिद्धान्त
का निरास कियाहै. वैसेही “मृत्यौः स मृत्युमाप्नोति” इत्यादि कठ या वाजस-
नेयि वचनोंसे बौद्धोंका क्षणिक विज्ञान वाद निरास कियाहै अर्थात् जो इस आत्मामें
क्षणिक विज्ञानरूपेण नानापना देखता है वह वारंवार यमयातना सहनपूर्वक जन्मम-
रणको प्राप्तहोता है. एवं “द्वितीयाद्वै” इत्यादि श्रुति अनुवादक अर्थवादरूपा है. भय
दूसरेहीसे हुआ करताहै, इसमें किसीको सन्देह ही नहीं; परन्तु दूसरे विद्यमानकोभी भयकी
भीतिसे उसको न मानना मूर्खता है. कपोत नेत्र निमीलनसे बिडालाऽभाव वस्तुतो नहीं होता
एवं “अथ योऽन्यां देवतामुपासते” इत्यादि वाजसनेयि वचनकाभी अभेद भावनासे
उपासनामें तात्पर्य्य है. भाव यह कि भेद भावना रखने से यदि लोक में मित्र का चित्तभी
स्वच्छ नहीं रहता तो सर्वज्ञ देवतासे भेदभावना रखनेसे उपासनाका क्या फल होगा? इसीलि-
ये भेद भावना से उपासना करने वालेको अर्थात् तन मन धन से विना देवता के नामसे केवल
घंटे बजानेवाले मूर्ख भक्त को श्रुति देवों का पशु कहतीहै अन्यथा एक आत्मा में उपास्य उपा-
सकभावादि विरुद्धधर्मोंका समावेशभी तो सर्वथा बुद्धिविरुद्ध कल्पनाहै-इत्यादि।
एवं स्वदेशीयोंका परस्पर खण्डन मण्डनावलोकनसे विदेशी विद्वानोंकोभी महर्षियों
के सिद्धान्त पर आक्षेप करनेका अवसर मिला है. वह यह कहतेहैं कि ' गुरुणी द्वे '
यह तथा ' द्वयोर्नैमितिको द्रवः ' यह इत्यादि कई एक स्थलोंमें महर्षि कणाद
का सिद्धान्त अज्ञात पूर्वक है क्योंकि हम ( Baroscope, ) वायु मापक यंत्रसे वायुमें
बोझ का अनुभव करा सकतेहैं. एवं हिम करकादिजलमें भी नैमित्तिक द्रवण अनुभव
सिद्ध है इत्यादि २ इसका उत्तर हम संक्षेपसे यह कहते हैं कि यह विदेशियोंके-
आक्षेप महर्षि सिद्धान्त मर्माज्ञात पूर्वकहैं; क्योंकि कणाद महर्षिने पदार्थोंके स्वरूप
प्रायः दो तरहके निरूपण किये हैं; एक तात्विक स्वरूप जैसे कि “शीतस्पर्शवत्य
आपः, उष्ण स्पर्शवत्तेज; रूपरहितस्पर्शवान् वायुः” इत्यादि। दूसरा
साधर्म्य वैधर्म्य निरू-पणप्रसङ्गमे पदार्थोंका लोकस्थितिके अनुरोधसे
( १० ) भूमिका ।
स्वरूप कहाहै. जैसे " गुरुणीद्वे, द्वयोर्नैमितिको द्रवः" इत्यादि ।
इनके तात्त्विक स्वरूपमें तो कदापि किसीको विपरीत ज्ञान नहीं होता
किन्तु जब जहां जिसको होताहै महर्षि सिद्धान्तके अनुकूलही होता है; परन्तु
लोकस्थित्यनुरोधसे कहे पदार्थोंमें अल्पश्रुत पुरुषोंको प्रायः विपरीत ज्ञान होही
जाताहै. जैसे वायुमें गुरुत्वका जलमें, नैमित्तिक द्रवणका इत्यादि. महर्षिने वायुमें
गुरुत्व नहीं माना परन्तु गुरुत्वकी भ्रान्तिकारक वेगाख्य संस्कार वायुमें मानाह
जैसे वेगापहत हुई वस्तुमें अल्पगुरुत्व वालिमेंभी अधिक गुरुत्वका भान होता है
वैसेही वस्तुतः गुरुत्वरहित वायुमेंभी गुरुत्वका स्थल विशेषमें भ्रमसे भान
होता है यदि वायुमें गुरुत्व होय तो यंत्र के सिवाय पात्रनिरुद्ध वायुकाभी पात्रसे
पृथक् गुरुत्व प्रतीत होना चाहीये; परन्तु होता तो नहीं यदि कुछभी होता है तो बलात्
प्रविष्ट हुए पार्थिव परमणुओंहीका होता है; वायुका नहीं. एवं जलकी लोकस्थितिभी
सरित् समुद्र वापि कूप तडागादि संसार मात्रमें स्वाभाविक द्रवणयुक्त ही प्रतीत होतीहै
किंतु जलमें द्रवण प्रतिरोध नैमित्तिक है अर्थात् जलमें द्रवण प्रतिरोधनाथं जहां तहां विल-
क्षण वायुसम्पर्क अपेक्षित है इति । कणादादि महर्षि कोई लौकिक विद्याके आचार्य्य न थे
किन्तु आध्यात्मक विद्याके प्रचारक थे परन्तु उस महाविद्याके प्रतियोगित्वेन उपयोगि
लौकिक पदार्थोंकाभी जिन २का निरूपण कियाहै वह सब योगबलसे अनायास कियाहै
याते सर्वथा भ्रांतिरहित है. उसी कणाद गौतम महाशास्त्रके संक्षिप्तसारभूत अर्थका
अवबोधक यह 'न्यायसिद्धान्त मुक्तावली' नामक ग्रन्थ यद्यपि स्वयं महा प्रख्यात तथा
परीक्षक मण्डलीमें देश देशान्तरोंमें सर्वत्र सत्कृतिपूर्वक पठन पाठनमें प्रत्यहं प्रचरित
है तथापि ततोऽप्यधिक प्रचारार्थ तथा वंगदेशीय विद्वद्वर्य्य श्रीविश्वनाथ पंचानन भट्टाचा-
र्य्य के वास्तविक हार्दको अत्यल्पश्रुत विद्यार्थी के सरल स्वान्तमें अनायास समारोहार्थ
विद्यानुरागी कतिपय सुचरित्र पवित्र मित्रमण्डलके अभ्यर्थनाने मैंने इसको प्रति पंक्ति
सरलदेशभाषामें भूषित कर समर्थन कियाहै; अत एव मुझे यह पूर्ण आशा है कि
श्रीकाशीजीके तथा देश दशान्तरोंके सुप्रतिष्ठित विद्वान् गुरुलोग स्वकीय शिष्य प्रशि-
ष्य श्रेणीमें शीघ्रबोधार्थ इसका प्रेमपूर्वक प्रचार कर मेरे यथाबुद्धि श्रमको सफल करते
हुए मुझे अवश्य अनुगृहीत करेंगे--इति शम् ।
निवेदक काशी निवासी--
निर्मल पं० स्वामी गोविन्दसिंह साधुः।
विशेषवक्तव्य।
इस न्यायसिद्धान्तमुक्तावलीप्रकाशका प्रकाश यद्यपि मेरी लेखनीद्वारा एकदा तो पूर्ण
रूपसे श्रीकाशीजीमें होही चुकाथा तथापि मेरी जो यह अभिलाषा थी कि यह शत
सहस्रधा होकर देशदेशान्तरके अनेक विद्वानोंकी दृष्टिगोचरहोकर पवित्र होय तथा वि द्या
भिलाषि विद्यार्थिगणका स्वल्प व्ययहीसे मित्रहोय उसका पूराहोना मेरी शक्तिसे अतिक्रान्त
था तदर्थ मैंने जगत्प्रख्यात दीनपालक व्यापारमिषेणार्य्यसद्ग्रंथजीर्णोद्धारक महापरोपकारी
दानसन्मानादि अनेकसद्गुणसम्पन्न वैश्यकुलकलापकुमुदकलानिधि मुम्बईके सुप्रतिष्ठित
सेठ श्रीमान् खेमराजश्रीकृष्णदासको सूचना दी तो उन्होंने प्रेमपूर्वक सर्वप्रियधनके व्ययसे
तथा मुद्रायंत्ररूप अपूर्वमहाशक्तिसे मेरे शुभसंकल्पको सफलकिया; इसलिये मैं इस स
द्गुणसम्पन्न सद्गृहस्थको अनेकशः धन्यवाददेताहूँ. तथा परमेश्वरसे प्रतिक्षणप्रार्थीहूं कि यह
दीर्घकालतक सुखपूर्वक आरब्धकार्य्यमें प्रतिदिन उन्नति करताहुआ लोकोपकारपूर्वक
यशोभागी बनारहें--इतिशम् ।
निवेदक काशीनिवासी-
निर्मल पं० स्वामीगोविन्दसिंहसाधुः
श्रीः ।
अथ न्यायसिद्धान्तमुक्तावलेर्विषयानुक्रमः ।
[प्रथमः स्तम्भः]
विषयाः पृष्ठे
मङ्गलाचरणम् ... ... ... ... १
मङ्गलाचरणे नास्तिकशंका ... ३
तत्रैव नवीनप्राचीनयोर्विशेषः ... ४
ईश्वरसाधकानुमाननिरूपणम् ... ५
तत्रैव शंकासमाधिपूर्वकश्रुतिप्रमाणम् ६
पदार्थविभागः ... ... ... ७
शक्तिसादृश्यादीनामतिरिक्तपदार्थ-
त्वाशंका ... ... ... ७
लाघवेन युक्त्या च तत्समाधानम् ... ८
द्रव्यविभागः ... ... ... ९
तमसो दशमद्रव्यत्वाशंकासमाधानम् १०
गुणविभागः ... ... ... १०
कर्मविभागः ... ... ... ११
सामान्यनिरूपणम् ... ... १२
विशेषनिरूपणम् ... ... १५
समवायनिरूपणम् ... ... १५
अभावविभागः ... ... ... १८
पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्यनिरूपणम् २१
द्रव्यादिपञ्चानां तन्निरूपणम् ... २१
सत्तादित्रयाणां गुणादिपञ्चानां च
तन्निरूपणम् ... ... २२
सामान्यादीनां तन्निरूपणम् ... २४
पारिमाण्डल्यभिन्नानां तन्निरूपणम् २४
प्रसङ्गात्तत्रिविधकारणतानिरूपणम् २६
तत्रापि प्रसङ्गादन्यथासिद्धपदार्थ
निरूपणम् ... ... २६
द्रव्यस्यैव तन्निरूपणम् ... ... ३३
गुणकर्मणोस्तन्निरूपणम् ... ... ३३
नित्यद्रव्यभिन्नानां तन्निरूपणम् ... ३४
क्षित्यादिनवानां तन्निरूपणम् ... ३४
मनोयुक्तक्षित्यादिचतुर्णां तन्निरूपणम् ३४
कालखात्मदिशां तन्निरूपणम् ... ३५
क्षित्यादिपञ्चानां चतुर्णां च तन्निरू० ३५
आकाशजीवात्मनोस्तन्निरूपणम् ... ३७
क्षित्यादित्रयाणां तन्निरूपणम् ... ३९
[द्वितीयः स्तम्भः]
विषयाः पृष्ठ
क्षितिजलयोस्तन्निरूपणम्... .... ४०
क्षितितेजसोस्तन्निरूपणम् ... ... ४१
भूतवर्गविशिष्टात्मनस्तन्निरूपणम् .. ४१
नवद्रव्येषु पृथक् पृथक्क्रमेण गुण
स्थिति निरूपणम् ... ... ४२
क्षितिनिरूपणम् ... ... ४२
तत्र रूपरसादिनिरूपणम् ... ... ४४
नित्यानित्यभेदेन तस्य द्विविधत्वनि० ४६
तत्रैव बौद्धकृतशंकासमाधानम् ... ४६
शरीरादिभेदेन तस्य त्रिविधत्वनिरू० ४९
जलनिरूपणम् ... ... ५४
तत्र रसस्पर्शादिनिरूपणम् ... ५५
तस्य द्वैविध्यनिरूपणम् ... ... ५८
पुनस्तस्य त्रैविध्यनिरूपणम् ... ५८
तेजोनिरूपणम्... ... ... ५९
वायुनिरूपणम् ... ... ... ६४
आकाशनिरूपणम् ... ... ६६
कालनिरूपणम् ... ... ... ६९
दिशानिरूपणम् ... ... ७१
आत्मनिरूपणम् ... ... ... ७२
तत्र चार्वाकशंकासमाधिः ... ७३
इन्द्रियात्मवादखण्डनम् .... ... ७५
मनआत्मवादखण्डनम् .... ... ७६
तत्रैव बौद्धशंकासमाधिः ... ७७
शांकरीयनित्यविज्ञानस्वरूप आत्मवाद-
खण्डनम्- ... ... ८०
सांख्यात्मवादखण्डनम् ... ... ८४
आत्मवादे स्वसिद्धान्तनि० ... ८८
तत्र बुद्ध्यादिगुणनि० ... ८९
अनुभूतिस्मृतिभेदेन बुद्धेर्द्वैविध्यनि-
रूपणम् ... ... ... ८९
अनुभूतेश्चातुर्विध्यनिरूपणम् ... ९०
षड्विधप्रत्यक्षनिरूपणम् ... ९२
तत्रैव नव्यमते विशेषः ... ... ९५
मनोग्राह्यनिरूपणम् .... ... ९८
न्यायसिद्धान्तमुक्तावल्यनुक्रमः । २
विषयाः पृष्ठे. विषयाः पृष्ठे.
निर्विकल्पकज्ञाननिरूपणम् ... ... १०० मनोनि॒िरूपणम् ... ... .... २१२
षड्विधप्रत्यक्षे महत्त्वस्य कारणत्वनि० १०१ गुणनिरूपणम् ... ... २१५
इन्द्रियसामान्यलक्षणम्.... ... १०२ मूर्तगुणाः ... ... ... २१७
षड्विधप्रत्यक्षे सम्बन्धनि० .... १०४ अमूर्तगुणाः ... ... २१७
प्रसंगादनुपलब्धिनिरूपणम् ... १०९ मूर्तामूर्तगुणाः ... ... ... २१७
त्रिविधाऽलौकिकप्रत्यक्षनिरूपणम् ११२ अनेकाश्रिता गुणाः... ... ... २१८
सामान्यलक्षणानिरूपणम्... ... ११३ एकैकवृत्तिगुणाः ... ... २१८
ज्ञानलक्षणानिरूपणम् ... ... ११७ वैशेषिका गुणाः ... ... २१८
योगजप्रत्यासत्तिनिरूपणम् ... १२० सामान्यगुणाः ... ... २१९
प्रसङ्गादनुमानप्रमाणनिरूपणम्... १२२ द्वीन्द्रियग्राह्यगुणाः ... ... २१९
परामर्शस्वरूपनिरूपणम् ... १२३ बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्याः ... ... २१९
तत्रैव मीमांसकंशङ्कासमाधानम्... १२५ अकारणगुणोत्पन्नाः ... ... २२०
प्रसङ्गाद्व्याप्तिस्वरूपनिरूपणम् ... १२७ कारणगुणोद्भवाः ... ... २२०
सिद्धान्तव्याप्तिनिरूपणम् ... १३१ कर्मजाः ... ... २२१
पक्षतानिरूपणम् ... ... १५१ नियमेनासमवायिकारणभूताः ... २२१
प्रसङ्गाद्धेत्वाभासविभागः ... १५७ नियमेन निमित्तकारणभूताः ... २२२
हेत्वाभाससामान्यनिरुक्तिः ... १५७ नियमेन द्विविधकारणभूताः ... २२२
त्रिविधसव्यभिचारनिरूपणम् ... १६२ प्रदेशवृत्तिगुणाः ... ... २२३
विरुद्धनिरूपणम् ... ... १६३ रूपलक्षणं तन्निरूपणं च ... २२३
सत्प्रतिपक्षनिरूपणम् ... ... १६४ रसनिरूपणम् ... ... २२९
त्रिविधासिद्धिनिरूपणम् ... १६७ गन्धनिरूपणम् ... ... २२९
बाधनिरूपणम् ... ... १६९ स्पर्शनिरूपणम् ... ... २३०
प्राचीनमतेन तेषां स्वरूपप्रदर्शनम् १७२ रूपादीनां पाकजापाकजत्वनि०... २३०
उपमानप्रमाणनिरूपणम् ... १७७ वैशेषिकमतेन तन्निरूपणम् ... २३१
शब्दप्रमाणनिरूपणम्... ... १७८ तत्रैव प्रसङ्गात् क्षणिकप्रक्रिया ... २३२
पदवृत्तिनिरूपणम् ... ... १८० नैयायिकसिद्धान्तेन रूपादिपाकनि० २३९
व्याकरणादीनां शक्तिग्राहकत्वम् १८१ संख्यानिरूपणम् ... ... २४०
मीमांसकजातिशक्तिवादखण्डनम् १८८ प्रसङ्गादपेक्षाबुद्धिनिरूपणम् २४३
स्वसिद्धान्तेन जात्याकृतिविशिष्ट- परिमाणनिरूपणम् ... ... २४४
व्यक्तौशक्तिनिरूपणम् ... १८९ पृथक्त्वनिरूपणम् ... ... २४९
चतुर्विधपदनिरूपणम् ... १९० संयोगनिरूपणम् ... ... २५१
प्रसङ्गाल्लक्षणानिरूपणम् ... १९२ विभागनिरूपणम् ... ... २५३
लक्षितलक्षणास्वरूपनिरूपणम् .... १९४ परत्वापरत्वनिरूपणम् .... २५५
प्रसङ्गात समासशक्तिखण्डनम् .... १९५ अप्रमाज्ञाननिरूपणम् .... २५७
आसत्त्यादिचतुर्णां शाब्दबोधे कार- प्रमाज्ञाननिरूपणम् ... ... २५८
णत्वम् ... ... ... २०२ संशयज्ञाननिरूपणम् ... ... २५९
स्मृतिप्रक्रियाप्रदर्शनम् .... .... २१० अप्रमाया दोषजन्यत्वम् ... ... २६२
३ न्यायसिद्धान्तमुक्तावल्यनुक्रमः ।
विषयाः पृष्ठे. विषयाः पृष्ठे.
प्रमाया गुणजन्यत्वम् .... .... २६२ प्रवृत्तौ जनकत्वप्रदर्शनम् .... ... २९३
प्रमाया लक्षणम् .... ... २६३ उक्तार्थे गुरुमतप्रदर्शनम् .... ... २९३
निर्विकल्पकज्ञाननिरूपणम् ... २६४ प्रवृत्तौस्वसिद्धान्तप्रदर्शनम् ... २९६
प्रमात्वे स्वतस्त्वपरतस्त्वविचारः २६५ प्रवृत्तौ नव्यमतप्रदर्शनम् .... ... २९७
तत्र मतमतान्तरप्रदर्शनम् ... २६५ प्रसङ्गाद्विध्यर्थनिरूपणम् ... २९९
परतस्त्वव्यवस्थापनम् .... ... २६९ विधिवाक्यघटितनञर्थनिरूपणम् ३०३
प्रमालक्षणे प्रभाकरशंका ... ... २७० विध्यर्थे शंकांसमाधानम् .... ... ३०४
तन्निरासपूर्वकान्यथाख्यातिव्यवस्था- उदयनाचार्योक्तविध्यर्थप्रदर्शनम् ... ३०७
पनम् .... .... ... .... २७४ प्रसङ्गाद्वेदे पौरुषेयत्वप्रदर्शनम् ... ३०७
व्याप्तिग्रहोपायप्रदर्शनम् ... ... २७५ जीवनयोनियत्नप्रदर्शनम् ... ... ३०९
तर्कस्वरूपप्रदर्शनम् ... ... २७५ गुरुत्वनिरूपणम् ... ... ... ३१०
उपाधिस्वरूपप्रदर्शनम् ... ... २७६ द्रवत्वनिरूपणम् .... ... ... ३१०
उपाधेः प्रयोजनप्रदर्शनम् ... २८४ स्नेहनिरूपणम् ... ... ... ३१२
वैशेषिकमतेन प्रमाणप्रदर्शनम् ... २८१ संस्कारनिरूपणम् ... ... ... ३१३
त्रिविधानुमानप्रदर्शनम् ... ... २८४ धर्माधर्मनिरूपणम् .... ... ... ३१६
द्विविधव्याप्तिप्रदर्शनम् ... २८४ धर्माधर्मयोर्वासनाजन्यत्वम् ... ३१९
अर्थापत्तेर्व्यतिरेकव्याप्त्यन्तर्भावः ... २८७ आत्मज्ञानविनाश्यत्वं च .... ... ३२०
सुखनिरूपणम् .... ... ... २८९ शब्दनिरूपणम् .... ... ... ३२१
दुःखनिरूपणम् .... ... ... २९० मतभेदेन तदुत्पत्तिप्रदर्शनम् ... ३२२
इच्छानिरूपणम् ... ... ... २९० शब्दानित्यत्वप्रतिपादनम् ... ३२२
द्वेषनिरूपणम् ... ... ... ... २९२ ग्रन्थसमाप्तिः .... ... .... ३२४
प्रयत्ननिरूपणम् ... ... ... २९३
इति न्यायसिद्धान्तमुक्तावल्या अनुक्रमणिका समाप्ता ।
अथ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली
भाषाटीकासमेता ।
अथ प्रत्यक्षपरिच्छेदः १.
प्रज्वालितो ज्ञानतमोऽपनोदी येन प्रदीपो मधुरैर्वचोभिः ॥
सन्मानसे मानसराजहंसं वन्दे गुरुं नानकनामकं तम् ॥ १ ॥
मूढस्तु मूढ एवास्ति तत्त्वज्ञस्त्वस्ति तत्त्ववित् ॥
तस्मादूर्द्ध्वप्रबुद्धा ये ते सन्त्यत्राधिकारिणः ॥ २ ॥
चूडामणीकृतविधुर्वलयाकृतवासुकिः ।
भवो भवतु भव्याय लीलाताण्डवपण्डितः ॥ १ ॥
भाषा-चूडामणिरूप कियाहै चन्द्र जिनने, तथा कंकणरूप किया है वासुकि सर्प
जिनने ऐसे जो स्वाभाविक नृत्यमें निपुण महादेव हैं वे हम सबके कल्याणके लिये
होवें ॥ १ ॥
निजनिर्मितकारिकावलीमतिसंक्षिप्तचिरंतनोक्तिभिः ॥
विशदीकरवाणि कौतुकात्ननु राजीवदयावशंवदः ॥ २ ॥
भाषा-मैं अपने राजीव नामक शिष्य पर कृपा करता हुआ, प्राचीन आचार्योंके
अतिसंक्षिप्त सिद्धान्तानुकूल, अपनी बनाई कारिकावलीको अनायासही स्फुट
करता हूं ॥ २ ॥
सद्द्रव्यागुणगुम्फितासुकृतिनां सत्कर्मणां ज्ञापिका-
सत्तासामान्यविशेषनित्यमिलिताऽभावप्रकर्षोज्ज्वला ॥
विष्णोर्वक्षसि विश्वनाथकृतिना सिद्धान्तमुक्तावली
विन्यस्ता मनसो मुदं वितनुतां सद्युक्तिरेषा चिरम् ॥ ३ ॥
भाषा-पृथिवी जलादि नव द्रव्योंके सहित रूपरसादि चौवीस गुणोंसे
गुंथित, उत्क्षेपणादि पंचविध कर्मकी बोधक, जातिरूप सामान्य तथा विशेष और
२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
समवायसे मिश्रित, प्राग्भावादि अनेकविध अभावोंकी प्रकाशक ऐसे यह बुद्धिमें
विराजमान शुभयुक्तियुक्त न्यायसिद्धान्तरूप मोतियोंकी माला विश्वनाथ
पण्डितने विष्णु परमात्मा के वक्षःस्थलमें अर्पण करी हुई, पण्डित लोगोंके चित्तों
को बहुत काल पर्यन्त आनन्द विस्तीर्ण करे ॥ ३ ॥ इस पूर्व कथनसे
द्रव्यादि पदार्थवत्त्वेन रूपेण मुक्तावलीनिरूपित सादृश्य ग्रन्थमें कहा अर्थात् जैसे
मोतियोंकी माला द्रव्यसाध्या है तथा गुणसे (सूत्र) से गुन्थिा है एवं पुण्यवान् पुरुषोंके
पूर्वकृत सत्कर्मोंकी बोधिका है, और मोतियोंकी प्राचीन जातियोंसे तथा उनमें
होनेवाले महत्त्व निर्मलत्व आदि धर्मोंसे निरंतर सम्बन्धवाली है तथा तेजो-
अभावमें अर्थात् अन्धकारमें प्रकर्षरूपसे उजाला करती है ॥ वैसेही यह मेरा
मुक्तावलीरूप ग्रन्थभी मोतियोंकी मालाकी तरह पूर्ण गुण रखता है ॥ ३ ॥
विघ्नविघाताय कृतं मंगलं शिष्यशिक्षायै निबध्नाति । नूतनेति ।
भाषा-ग्रन्थ लिखनेमें जो विघ्न, उनके विनाशके लिये किये मङ्गलको शिष्य
लोगोंकी शिक्षाके अर्थ (अर्थात् मेरी तरह मेरी शिष्यपरंपराभी कार्यमात्रके
आद्यमें कृष्णपरमात्माका स्मरण करे) ग्रन्थकार, ग्रन्थके आदिमें लिखता है
नूतनेति ।
नूतनजलधररुचये गोपवधूटीदुकूलचौराय ।
तस्मै कृष्णाय नमः संसारमहीरुहस्य बीजाय ॥१॥
भाषा-नवीन मेघके सदृश कान्तिवाले, तथा गोपोंकी नव युवतियोंके वस्त्र
चुरानेवाले, संसाररूप वृक्षके कारणभूत जगत् प्रसिद्ध श्रीकृष्ण देवको
नमस्कार है ॥ १ ॥
१ विघाताय । यहां वि+घात = दोपद हैं. प्रथमका नाम उपसर्ग है और
द्वितीयका नाम प्रातिपदिक है, उनमें द्वितीयपदको तो स्वार्थवाचकत्व सर्वतंत्रसिद्धान्त
सिद्ध है परन्तु उपसर्गपदको कई आचार्य्य वाचकत्व मानते हैं, और कई पदान्तरयोगसे
द्योतकत्व मानते हैं. प्रकृतमें द्योतकत्व वादीके मतमें तो यद्यपि दोष नहीं, परन्तु वाच-
कत्व वादीके मतमें ( उत्पत्तिवाली वस्तुका अभाव ) ‘घात’ पदहीका अर्थ होनेसे ‘ वि ’
पद अनर्थक प्रतीत होता है; तथापि आचार्योंका यह संकेत है कि-जहां विशिष्ट
वाचक पदके समीप विशेषणवाचक पदान्तर होय वहां विशिष्ट वाचक पदको विशेष्य मात्र
वाचकत्व होता है. इससे प्रकृतमें यह सिद्ध हुआ कि-केवल ‘ घात ’ पदका अर्थ शुद्ध
अभाव मात्र है, और ‘ वि ’ विशेषणके मिलानेमें “ उत्पत्तिवालेका अभाव ” यह अर्थ
हुआ. एवं दोनों मतमें कुछ दोष नहीं.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ३
ननु मङ्गलं न विघ्नध्वंसं प्रति नवा समाप्तिं प्रति कारणं, विनापि
मङ्गलं नास्तिकादीनां ग्रन्थे निर्विघ्न परिसमाप्ति दर्शनादिति चेत् न ।
भाषा-( शंका ) विघ्नध्वंसके प्रति वा समाप्तिके प्रति मङ्गलको कारणता नहीं
है, क्योंकि मङ्गलसे विनाभी नास्तिकादिकोंके ग्रन्थोंकी निर्विघ्न समाप्ति
देखी जाती है.
अविगीतशिष्टाचारविषयत्वेन मङ्गलस्य सफलत्वे सिद्धे तत्र च
फलजिज्ञासायां सम्भवति दृष्टफलकत्वेऽदृष्टफलकल्पनाया
अन्याय्यत्वात् उपस्थितत्वाच्च समाप्तिरेव हि फलं कल्प्यते ।
इत्थं च यत्र मङ्गलं न दृश्यते तत्रापि जन्मान्तरीयं तत् कल्प्यते।
यत्र च सत्यपि मङ्गले समाप्तिर्न दृश्यते तत्र बलवत्तरो विघ्नो विघ्न
( १ ) यहां “मङ्गलाचरणमयुक्तं निष्फलत्वात्” इस अनुमानमें यदि कोई निष्फ-
लत्व रूप हेतुको स्वरूपासिद्ध कहे तो “मङ्गलं निष्फलं फलविशेषशून्यत्वात्” इस
प्रयोगसे उसका वारण करनेसे प्रकृत अर्थकी सिद्धि हो सकती है. इसी तात्पर्य्यसे
‘ननु’ इत्यादि ग्रन्थ कहनेवाले वादीकी शंकाभी है.
( २ ) “मङ्गलं विघ्नध्वंसं प्रति तथा समाप्तिं प्रति कारणत्वाभाववत् कार्य्याधिकरण
वृत्त्यत्यन्ताभावप्रतियोगित्वात् घटं प्रति वेमवत्” यह अनुमान व्यतिरेक व्यभिचारका
साधक है.
३ “एवं मङ्गलं सफलं अवगीतशिष्टाचारविषयत्वात्” यह अनुमान मङ्गलकी सफलताका
साधक है.
४ “मङ्गलं समाप्तिफलं समाप्त्यन्याफलत्वे सति सफलत्वात्” यह अनुमान पूर्वोक्त व्यतिरे-
कव्यभिचारकावारक है. “कारणसत्त्वे कार्य्यसत्त्वमन्वयसहचारः । कारणाभावे कार्य्या-
भावः व्यतिरेकसहचारः । एवं कारणसत्त्वे कार्य्याभावोऽन्वयव्यभिचारः । कारणाभावे कार्य्य-
सत्त्वं व्यतिरेकव्यभिचारः” ‘विनापि मङ्गलं’ इत्यादि ग्रन्थसे पूर्वपक्षीने मङ्गलसमाप्तिके
कार्यकारणभावका व्यतिरेकव्यभिचारही दिखलाया है; किन्तु अन्वयव्यभिचारका प्रद-
र्शन नहीं किया, परन्तु सिद्धान्तीने “यत्र च सत्यपि मङ्गले” इत्यादि ग्रन्थसे अन्वयव्यभि-
चारका वारण किया है. इसलिये पूर्वपक्षमें अन्वयव्यभिचारके स्थल ‘कादम्बरी’ आदि
आस्तिक ग्रंथ जानने चाहिये.
( ५ ) “नास्तिकग्रन्थः स्वाश्रयपुरुषप्रयत्नजन्यत्वसम्बन्धेन मङ्गलवान् । स्वप्रतियोगिचरम-
वर्णघटितत्वसम्बन्धेन समाप्तिमत्त्वात् भारतादिवत्” यहां प्रथम ‘स्व’ पदसे मङ्गलका
ग्रहण है और द्वितीयसे समाप्तिका ग्रहण है. इस अनुमानसे जन्मान्तरीय मङ्गलकी कल्पना
होसकती है.
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष- ]
प्राचुर्य्ये वा बोध्यम् । प्रचुरस्यैव चास्य बलवत्तरविघ्न निराक-
रणे कावणत्वम् । विघ्नध्वंसस्तु मङ्गलस्य द्वारमित्याहुः प्राञ्चः ॥
भाषा-( समाधान ) अनिन्दित जो शिष्ट पुरुषोंका प्रयत्न उस प्रयत्नका मङ्गलको
विषयीभूत होनेसे मङ्गलकी सफलताका अनुमान होता है. एवं ( तत्र ) मङ्गले
विशेषरूपसे फलकी जिज्ञासा हुई तो दृष्ट फलका सम्भव होय तो अदृष्टकी
कल्पना करनी अयोग्य है. प्रकृतमें “आरब्धं कर्म्ममे निर्विघ्नं परिसमाप्यताम्” इस
कामनासे प्रवृत्त पुरुषकी कामना विषयरूपसे उपस्थित होनेसे हम मङ्गलका
फल ग्रन्थकी समाप्तिरूपही कल्पना करते हैं. ( इत्थञ्च ) इसरीतिसे मङ्गलसमाप्ति
रूप फलवाला हुआ तो जिस नास्तिकादिके ग्रन्थके आद्यमें मङ्गल न देखनेमें आवे
वहांभी उस ग्रन्थकर्ताके पूर्व जन्म जन्मान्तरके किये मङ्गलकी कल्पना अर्थात्
अनुमान कर लेना होता है और जिस ( कादम्बरी ) ग्रन्थविशेषकी मङ्गल
होनेमेंभी समाप्ति नहीं हुई है वहां कोई बलिष्ठ विघ्न किंवा विघ्नोंका समुदाय
जानना चाहिये. बलिष्ठ विघ्नविशेष अथवा विघ्नोंके समुदायके विनाशार्थ, बलिष्ठ
मङ्गल समुदायहीकी कारणता है. और प्राचीन आचार्य लोग तो विघ्नध्वंसको
मङ्गलका व्यापार कहते हैं.
नव्यास्तु मङ्गलस्य विघ्नध्वंस एव फलम्। समाप्तिस्तु बुद्धिप्रति-
भादिकारणकलापात् । नचैवं स्वतःसिद्धविघ्नविरहवता कृतस्य
मङ्गलस्य निष्फलत्वापत्तिरिति वाच्यम्, इष्टापत्तेः। विघ्नशङ्कया
तदाचरणात् तथैव शिष्टाचारात् । नच तस्य निष्फलत्वे तद्बो-
धकशिष्टाचारानुमित²वेदप्रामाण्यापत्तिरितिवाच्यम्, सति³ विघ्ने
तन्नाशस्यैव वेदबोधितत्वात् । अत एव पापभ्रमेण कृतस्य प्राय-
( १ ) " बुद्धिस्तात्कालिकी ज्ञेया मतिरागामिगोचरा ॥ प्रज्ञा नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभां
विदुः ॥ इस वचनसे विलक्षण बुद्धिका नाम प्रतिभा है.
( २ ) यहां फलसाधनांशमें भ्रांतिरहित का नाम शिष्ट है; उन शिष्टोंके आचारसे
अर्थात् प्रयत्नसे अनुमित “ समाप्तिकामो मङ्गलमाचरेत् ” इत्यादि वेदवचन उसको अप्रमा-
ण्यापत्ति होगी इस वचनके अनुमापक अनुमानका आकार “ मङ्गलं वेदबोधितकर्तव्यताकं
अलौकिकाविगीतशिष्टाचारविषयत्वात् दर्शादिवत् ” इत्यादि है.
( ३ ) एवं स्वतः सिद्ध विघ्नविरहवाले पुरुषमें विघ्नात्मक प्रतियोगिरूप कारणके न
होनेसे विघ्नध्वंसरूप कार्यके अनुदयकी उपपत्ति हुई तो मङ्गलमें कारणताभी अबाधित
रही और कारणताबोधक वेदकोभी अप्रमाणता न हुई.
परिच्छेदः १ ] भाषाटीकासमेता. ५
श्चित्तस्य निष्फलत्वेऽपि न तद्बोधकवेदाप्रामाण्यम् । मङ्गलं च
विघ्नध्वंसविशेषे कारणम् । विघ्नध्वंसविशेषे च विनायकस्तवपा-
ठादिः, क्वचिच्च विघ्नात्यन्ताभाव एव समाप्तिसाधनं, प्रतिबन्धक-
संसर्गाभावस्यैव कार्यजनकत्वात् । इत्थं च नास्तिकादिकृतग्र-
न्थेषु जन्मान्तरीयमङ्गलजन्यदुरितध्वंसः स्वतः सिद्धविघ्नात्य-
न्ताभावो वाऽस्तीति न व्यभिचार इत्याहुः ॥
भाषा-और चिन्तामणिकार गंगेशोपाध्यायादि नवीन आचार्योंका यह मत
है कि-मङ्गलका विघ्नध्वंसही फल है. ग्रन्थसमाप्ति तो बुद्धिमतिभादि ( स्फु-
र्त्यख्यसंस्कार ) कारणसमुदायसे होती है. शंका- जो पुरुष अपने कार्य्य करने
में स्वतःसिद्ध विघ्नोंके विरहवाला है उसके किये मङ्गलको निष्फलता होगी? समा०-
यह वार्ता हमको इष्ट है; क्योंकि विघ्नोंकी शंकासे उस धार्मिक पुरुषने मंगल किया
है और शिष्ट पुरुषोंका आचरणभी ऐसेही है. शंका- यदि मङ्गल निष्फल होगा
तो उसके बोधक शिष्टाचारातुमित वेदको अप्रमाणता होगी? समा०- विघ्नोंकी
विद्यमानावस्थामें विघ्नोंके नाशका बोधक वेद है अन्यथा नहीं इसीसे पाप भ्रम
से किया हुआ प्रायश्चित्त निष्फलभी है परन्तु उसके बोधक वेदको अप्रमाणता नहीं है
जैसे-विघ्नध्वंस विशेषमें मङ्गल कारण है, वैसेही विघ्नध्वंस विशेषमें (विनायक) ग-
णेशस्तुतिपाठादिभी कारण हैं और किसी स्थलमें विघ्नोंका अत्यन्ताभावही
समाप्तिका साधन है. तात्पर्य्य यह, कि सर्वत्र प्रतिबन्धक संसर्गाभावहीको कार्य
जनकता है. इस रीतिसे नास्तिकादिकृत ग्रन्थोंमें पूर्वजन्मकृत मङ्गलजन्य
पापनाश, अथवा स्वतःसिद्धविघ्नोंका अत्यन्ताभाव समझना चाहिये. एवं व्यतिरेक
व्यभिचार नहीं है। 'आहुः' यह क्रियापद 'नव्याः' इस कर्तृ पदसे अन्वित है.
संसारमहीरुहस्य बीजाय इति । संसार एव महीरुहो वृक्षस्तस्य
बीजाय निमित्तकारणायेत्यर्थः। एतेन ईश्वरे प्रमाणं दर्शितंभवति।
तथाहि।यथा घटादिकार्य्यं कर्तृजन्यं तथा क्षित्यङ्कुरादिकमपि।
नच तत्कर्तृत्वमस्मदादीनां सम्भवति । इत्यतस्तत्कर्तृत्वेनेश्वर-
१ क्षित्यंकुरादिकं “कर्तृजन्यं कार्य्यत्वात्” घटादिवत् यह ईश्वर साधक सिद्धान्तिका
प्रयोग है।
२ भूमण्डलकी रचना तथा अंकुरादिकी उत्पत्ति, जीवप्रयत्नसाध्य कदापि नहीं है.
६ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली- [ प्रत्यक्ष-
सिद्धिः। न च शरीराजन्यत्वेन कर्तृजन्यत्वसाधकेन सत्प्रतिपक्ष इति
वाच्यम्, अप्रयोजकत्वात्। मम३ तु कर्तृत्वेन कार्यत्वेन कार्यकारण-
भाव एवानुकूलस्तर्कः। “द्यावाभूमी जनयन् देव एक आस्ते
विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता” इत्यादय आगमा अप्यनुसन्धेयाः १
संसाररूप जो महीरुह ( वृक्ष ) उसका बीज अर्थात् निमित्त कारणभूत । इस
पूर्व कथनसे ईश्वरमें प्रणाम भी प्रदर्शन किया है । तथाहि । जैसे घटादि
कार्य कुलालादिकर्तासे जन्य हैं, वैसेही पृथिवीअंकुरादि कार्यभी कर्ताही से
जन्य हैं. पृथिवीअंकुरादिका कर्ता कोई अस्मदादि जीव तो बन ही नहीं सकता,
इसलिये तत्कर्त्तृत्वेन ईश्वरकी सिद्धि होसकती है. शंका-कर्तासे अजन्यत्व-
का साधक जो शरीराजन्यत्वरूप हेतु, उससे ‘ क्षित्यंकुरादि ’ अनुमान सत्प्रति-
पक्ष होगा. समाधान-यह कथन सम्यक् नहीं क्योंकि शरीराजन्यत्व रूप हेतुमें
अनुकूलतर्कका अभाव है और सिद्धान्तानुमानमें तो कर्तृत्वेन कार्यत्वेन रूपेण
जो परस्पर कार्यकारणभाव, वही अनुकूल तर्क है. एवं अनुमानसे ईश्वर
सिद्ध हुआ तो “आकाश तथा पृथवीका प्रादुर्भावकारक एक देव परमात्मा सदा
विराजमान है. वह विश्वका कर्ता है तथा संसारका पालक है ” इत्यादि-
अर्थबोधक वेदवाक्यभी ईश्वरसद्भावमें प्रमाण होसकते हैं ॥ १ ॥
१ “क्षित्यंकुरादिकं कर्तृजन्यं शरीराजन्यत्वात् । ध्वंसविशेषवत्” यह ईश्वर निराकारक
वादीका प्रयोग है; इससे सिद्धान्तीका प्रयोग सत्प्रतिपक्ष है.
२ “अप्रयोजकत्वात् । व्यभिचारशंकोत्थानेऽनुकूलतर्काभावादित्यर्थः ” भाव यह है
कि—वादीके प्रयोगमें यदि “शरीराजन्यत्वमस्तु कर्तृजन्यत्वं मास्तु ” इत्याकारक व्यभिचार
शंकाका उत्थान होय तो उसका वारक अनुकूल तर्क नहीं मिलता, क्योंकि तर्कका स्वरूप
प्रायः कार्यकारणभावभंगप्रसंगरूप होता है; सो प्रकृतमें वादीने “ यदि कर्तृजन्यत्वं
न स्यात् तर्हि शरीराजन्यत्वमपि न स्यात् ” यही कहना होगा; परन्तु इससेभी वादीके
प्रयोगमें व्यभिचारशंका निवृत्त नहीं होती क्योंकि कर्तृजन्यत्वका तथा शरीराजन्यत्वका
परस्पर कार्यकारणभाव यदि प्रथम कहीं प्रसिद्ध होय तो उसका “न स्यात् न स्यात् ”
कहके भंगप्रसंग दिया जाय. सो तो कहीं प्रसिद्ध है ही नहीं इसलिये वादीका प्रयोग अप्रयो-
जक है.
३ और मुझ सिद्धान्तीके प्रयोगमें तो व्यभिचार शंकाका निवर्तक “यदि कर्तृजन्यत्व
न स्यात् तर्हि कार्य्यत्वमेव न स्यात्” इत्याकारका कार्यकारणभाव भंगप्रसंगरूप अनुकू
तर्क मिल सकता है क्योंकि कर्तृजन्यत्वका तथा कार्य्यत्वका परस्पर कार्यकारणभा
प्रसिद्ध है. एवं ईश्वरसाधक अनुमान सत्प्रतिपक्ष नहीं है.