न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ न्यायतत्त्वसमीक्षाख्यभूमिका ।
इस सर्वथा इत्थंभावेन अचिन्तनीय तथा अनवद्य वैशद्य विपुल संसारमें प्राणीमात्रको
प्रतिक्षण समूल दुःखनिर्मूलपूर्वक परमोत्कृष्टाप्रतिहत सुखसंतानविषयिणी लिप्सा तथा
एकान्तात्यन्त समूल दुःखविषयिणी जिहासा सामान्यरूपेण स्वान्तमें सर्वदा एकरस
बनी रहती है; परन्तु यावत् प्राणी हेय हेयहेतु तथा हान हानोपायको सम्यक्रूपसे
न जानते हुए संसारचक्रमें प्राप्त होय सुखके बदले विपरीत अनेकविध जन्ममरणादि
दुःखहीको अनुभव करतेहैं. वर्तमान प्रचलित संसारचक्रमें प्रायः सामान्यरूपेण यों देख-
नेमें आता है कि-प्रादुर्भूत हुआ प्राणीमात्र प्रथम अबुद्धावस्थामें अपने मातापितृद्वारा
या किसी दूसरे सजाति विजातिसम्बंधिद्वारा पालनपोषणादि सहकारिताको पायकर समया-
नुसार स्वयं सुबोध हुआ विशेषरूपसे निरवच्छिन्न सुखसम्पादनमें प्रयत्नशील होताहै;
उसमेंभी सामान्यरूपसे इन प्राणियोंके दो भेद देखनेमें आतेहैं. एक तो ऐसा प्राणीदल
देखनेमें आता है कि, जिसमें विचारशक्तिका बहुतही ह्रास प्रतीत होताहै; जैसे कि, पशु
पक्षि कृमि-दंशादि हैं. ऐसा प्राणीदल अहोरात्र केवल काय पालन पोषणादिमें प्रयत्नशील
हुआ इसीको परम पुरुषार्थ तथा सुखसीमा मानकर अपनी आयुको व्यतीत करता
हुआ स्वस्वान्तमें परम सन्तुष्ट होताहै; और दूसरा विचारशील प्राणीवर्ग देवमनुष्यादिहैं.
इस प्राणीवर्गको जब अनेकविध भोगोंसे शरीर पालन पोषण कर कदाचित् दैवात् अव-
काश मिलता है तो समय २ पर ऐसे विचार उत्पन्न होतेहैं कि मैं कौनहूं? कैसाहूं? कहांसे
आया और कहाँजाऊंगा? इत्यादि । एवं यह संसार क्या है? कैसा है ? किसका है? इत्या-
दि । एवं मेरा तथा इस संसारका कोई अधिपति है या नहीं? यदि है तो कैसा है? कौन
है ? कहां है ? इत्यादि अनेक प्रकारके विकल्पयुक्त विचार उद्बुद्ध होते हैं. बस, इनही
विचारोंको दार्शनिक विचार कहतेहैं. वह दार्शनिक विचार इस देशमें प्रायः ‘ अस्ति
नास्ति ’ कोटिके भेदसे प्राचीन कालसे दोप्रकारका चला आता है. इन विचारोंपर
सिद्धान्त करनेवाले महापुरुषोंको ऋषि महर्षि मुनि महामुनि इत्यादि प्रतिष्ठित शब्दोंसे
इतरलोग स्मरण करते हैं और परमोत्कट जिज्ञासावस्थामें इतर लोग उनही महर्षियों-
के सिद्धान्तोंको स्वान्तारूढ कर अपनेको कृतकृत्य तथा परमपुरुषार्थके भागी मानतेहैं.