न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) भूमिका ।
स्वरूप कहाहै. जैसे " गुरुणीद्वे, द्वयोर्नैमितिको द्रवः" इत्यादि ।
इनके तात्त्विक स्वरूपमें तो कदापि किसीको विपरीत ज्ञान नहीं होता
किन्तु जब जहां जिसको होताहै महर्षि सिद्धान्तके अनुकूलही होता है; परन्तु
लोकस्थित्यनुरोधसे कहे पदार्थोंमें अल्पश्रुत पुरुषोंको प्रायः विपरीत ज्ञान होही
जाताहै. जैसे वायुमें गुरुत्वका जलमें, नैमित्तिक द्रवणका इत्यादि. महर्षिने वायुमें
गुरुत्व नहीं माना परन्तु गुरुत्वकी भ्रान्तिकारक वेगाख्य संस्कार वायुमें मानाह
जैसे वेगापहत हुई वस्तुमें अल्पगुरुत्व वालिमेंभी अधिक गुरुत्वका भान होता है
वैसेही वस्तुतः गुरुत्वरहित वायुमेंभी गुरुत्वका स्थल विशेषमें भ्रमसे भान
होता है यदि वायुमें गुरुत्व होय तो यंत्र के सिवाय पात्रनिरुद्ध वायुकाभी पात्रसे
पृथक् गुरुत्व प्रतीत होना चाहीये; परन्तु होता तो नहीं यदि कुछभी होता है तो बलात्
प्रविष्ट हुए पार्थिव परमणुओंहीका होता है; वायुका नहीं. एवं जलकी लोकस्थितिभी
सरित् समुद्र वापि कूप तडागादि संसार मात्रमें स्वाभाविक द्रवणयुक्त ही प्रतीत होतीहै
किंतु जलमें द्रवण प्रतिरोध नैमित्तिक है अर्थात् जलमें द्रवण प्रतिरोधनाथं जहां तहां विल-
क्षण वायुसम्पर्क अपेक्षित है इति । कणादादि महर्षि कोई लौकिक विद्याके आचार्य्य न थे
किन्तु आध्यात्मक विद्याके प्रचारक थे परन्तु उस महाविद्याके प्रतियोगित्वेन उपयोगि
लौकिक पदार्थोंकाभी जिन २का निरूपण कियाहै वह सब योगबलसे अनायास कियाहै
याते सर्वथा भ्रांतिरहित है. उसी कणाद गौतम महाशास्त्रके संक्षिप्तसारभूत अर्थका
अवबोधक यह 'न्यायसिद्धान्त मुक्तावली' नामक ग्रन्थ यद्यपि स्वयं महा प्रख्यात तथा
परीक्षक मण्डलीमें देश देशान्तरोंमें सर्वत्र सत्कृतिपूर्वक पठन पाठनमें प्रत्यहं प्रचरित
है तथापि ततोऽप्यधिक प्रचारार्थ तथा वंगदेशीय विद्वद्वर्य्य श्रीविश्वनाथ पंचानन भट्टाचा-
र्य्य के वास्तविक हार्दको अत्यल्पश्रुत विद्यार्थी के सरल स्वान्तमें अनायास समारोहार्थ
विद्यानुरागी कतिपय सुचरित्र पवित्र मित्रमण्डलके अभ्यर्थनाने मैंने इसको प्रति पंक्ति
सरलदेशभाषामें भूषित कर समर्थन कियाहै; अत एव मुझे यह पूर्ण आशा है कि
श्रीकाशीजीके तथा देश दशान्तरोंके सुप्रतिष्ठित विद्वान् गुरुलोग स्वकीय शिष्य प्रशि-
ष्य श्रेणीमें शीघ्रबोधार्थ इसका प्रेमपूर्वक प्रचार कर मेरे यथाबुद्धि श्रमको सफल करते
हुए मुझे अवश्य अनुगृहीत करेंगे--इति शम् ।
निवेदक काशी निवासी--
निर्मल पं० स्वामी गोविन्दसिंह साधुः।