न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २ ) भूमिका ।
वह दार्शनिक विद्या संसारके अनादि होनेसे समय २ पर यद्यपि अनेक प्रकारसे परि-
णत होती चली आती है तथा समय २ पर इस विद्याके प्रचारक ऋषि महर्षिभी अने-
कों होचुकेहैं; तथापि वर्तमान कालमें इस भारतभूमिमें प्रख्यात अस्तिकोटीकी दर्श-
निकविद्या षट्भेदसे विभक्त हुई विराजमान है, तथा इसके प्रचारक परमपूज्य प्रति-
ष्ठित इस भारतसन्तानके हितपूर्वक एकमात्र शासक महर्षिभी षट्ही हुएहैं,
जिनके सदुपदेशोंसे उपदिष्ट तथा अनुगृहीत हुई भारतीय संतान अद्यावधि
महर्षि कपिल, महर्षि कणाद, महर्षि गौतम, महर्षि पतंजलि, महर्षि व्यास,
तथा महर्षि जैमिनि, इन सुशोभित नामोंसे तथा अपने पवित्र हृदयके भावोंसे समय २
पर स्मरण करती है. यद्यपि चार्वाक बृहस्पति बुद्धादि विद्वान् लोग नास्तिको-
टीके दर्शनोंके प्रवर्त्तकभी अनेक हुएहैं तथापि इस भारतीय प्रजामें उन दर्शनोंका
सम्मान तथा प्रचार वर्तमानकालमें बहुतही न्यून दीख पड़ताहै; परन्तु कपिल
कणादादि महर्षियोंके मुखारविन्दनिःसृत तथा सद्विद्वद्वायुद्वारा इतस्ततः प्राप्त सदुपदे-
शरूपाऽऽमोदको किसी एक हतभाग्यके सिवाय ऐसा कोईभी भारतोद्बुद्ध प्रबुद्ध मधुप
न होगा जो कि सत्कार तथा परमप्रेमपूर्वक श्रवणद्वारा आघ्रात न करे. भाव यह कि-इन
महर्षियोंके सदुपदेशात्मक ज्ञानमयी पताका आसमुद्र भारतमात्रमें तो क्या बलके
पारके देशोंमेंभी एकरस सत्कारपूर्वक फहराती दीख पड़ती है; कारण यह कि-इन
महात्माओंने अतिसंक्षिप्त सूत्रभूत शब्दोंसे जिज्ञासुलोगोंको ऐसा सारभूत तथा पक्ष-
पातरहित सदुपदेश कियाहै कि, विज्ञ अधिकारी यदि संतोषपूर्वक श्रद्धासे सांगोपांग
देखे या सुने तो अवश्य उसके चित्तमें आर्षसिद्धान्तका आभास पड़ही जावे और
इन छहों महर्षियोंके सूत्रोंमें यह एक भारी उत्तमता है कि, सिवाय स्वसिद्धान्तप्रति-
पादनके परस्पर रागद्वेषसे एक दूसरेका खण्डन मण्डन या कटाक्ष वचनोंसे परस्पर
तिरस्कारका लेशभी दृष्टिगोचर नहीं होता. प्रत्युत सबसे प्रथम दर्शनकार महर्षि कपि-
लदेव (कि, जिनके विषयमें श्रीमद्भागवतादि महापुराणोंमें भगवदवतारत्वेन गणना करीहै
उन)के दर्शनके उपयुक्त तथा सहकारक योगसूत्र निर्माण कर महर्षि पतंजलिने पाणिनि
कात्यायनकी तरह एकार्थ प्रतिपादकत्वेन परस्पर सख्य सूचन कियाहै. एवं कणाद-
महर्षिके दर्शनके उपयुक्त तथा सहकारक सूत्रोंको निर्माण कर गौतम महर्षिनेभी
परम सख्य दिखलायाहै. एवं ब्रह्मसूत्रोंके सहकारक धर्मसूत्रोंको निर्माण कर जैमिनि
महर्षिनेभी अपने गुरु व्यासदेवके साथ सम्मतिही सूचन करीहै; इसीहीसे सांख्य
योग दोनों केवल एकही 'सांख्य' शब्दसे प्रख्यात हैं और न्याय वैशेषिक दोनों एकही
'न्याय' शब्दसे प्रख्यातहैं. तथा ब्रह्मसूत्र और धर्मसूत्र दोनों केवल एकही 'मीमांसा'
शब्दसे प्रख्यात हैं. भाव यह कि-यह महर्षिलोग अपने आपको एक वैदिकसिद्धान्तानु-