न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ( ९
शिष्यही व्यासदेव होगा ऐसा जानिये १। और जिस वासिष्ठ के पोथेको आप
महर्षिवाल्मीकिकृत मानतेहैं वह तो शंकरस्वामीकीही शिष्यमण्डलीमेंसे किसी शंक-
रानन्दादि विद्वान्का लेख है. आप सोचें तो सही कि यदि यह ग्रन्थ शंकर स्वामीसे
प्रथम होता तो जैसे मनु गीता महाभारत विष्णुपुराणादिके वचन जगह२ पर भाष्यमें आते
हैं. कोई इसका वचन या प्रकरणभी न आता? परन्तु शारीरक मात्रमें योगवासिष्ठका नाम
तक नहीं है; इसलिये यह ग्रन्थ सर्वथा आधुनिक है २। खण्डन मण्डनकी युक्ति तो खड्गकी
तरह वादी प्रतिवादी दोनोंको समान है वह जिसके पास दृढ होगी उसीका विजय होगा.
केवल अद्वैत वादको युक्तिप्रधान मानना भ्रम है ३। एवं श्रुतिविचारमें जैसे च्छा-
न्दोग्यमें “तद्धैके आहुरसदेवेदमग्र आसीत्” इत्यादि वचनोंसे चार्वाक सिद्धान्त
का निरास कियाहै. वैसेही “मृत्यौः स मृत्युमाप्नोति” इत्यादि कठ या वाजस-
नेयि वचनोंसे बौद्धोंका क्षणिक विज्ञान वाद निरास कियाहै अर्थात् जो इस आत्मामें
क्षणिक विज्ञानरूपेण नानापना देखता है वह वारंवार यमयातना सहनपूर्वक जन्मम-
रणको प्राप्तहोता है. एवं “द्वितीयाद्वै” इत्यादि श्रुति अनुवादक अर्थवादरूपा है. भय
दूसरेहीसे हुआ करताहै, इसमें किसीको सन्देह ही नहीं; परन्तु दूसरे विद्यमानकोभी भयकी
भीतिसे उसको न मानना मूर्खता है. कपोत नेत्र निमीलनसे बिडालाऽभाव वस्तुतो नहीं होता
एवं “अथ योऽन्यां देवतामुपासते” इत्यादि वाजसनेयि वचनकाभी अभेद भावनासे
उपासनामें तात्पर्य्य है. भाव यह कि भेद भावना रखने से यदि लोक में मित्र का चित्तभी
स्वच्छ नहीं रहता तो सर्वज्ञ देवतासे भेदभावना रखनेसे उपासनाका क्या फल होगा? इसीलि-
ये भेद भावना से उपासना करने वालेको अर्थात् तन मन धन से विना देवता के नामसे केवल
घंटे बजानेवाले मूर्ख भक्त को श्रुति देवों का पशु कहतीहै अन्यथा एक आत्मा में उपास्य उपा-
सकभावादि विरुद्धधर्मोंका समावेशभी तो सर्वथा बुद्धिविरुद्ध कल्पनाहै-इत्यादि।
एवं स्वदेशीयोंका परस्पर खण्डन मण्डनावलोकनसे विदेशी विद्वानोंकोभी महर्षियों
के सिद्धान्त पर आक्षेप करनेका अवसर मिला है. वह यह कहतेहैं कि ' गुरुणी द्वे '
यह तथा ' द्वयोर्नैमितिको द्रवः ' यह इत्यादि कई एक स्थलोंमें महर्षि कणाद
का सिद्धान्त अज्ञात पूर्वक है क्योंकि हम ( Baroscope, ) वायु मापक यंत्रसे वायुमें
बोझ का अनुभव करा सकतेहैं. एवं हिम करकादिजलमें भी नैमित्तिक द्रवण अनुभव
सिद्ध है इत्यादि २ इसका उत्तर हम संक्षेपसे यह कहते हैं कि यह विदेशियोंके-
आक्षेप महर्षि सिद्धान्त मर्माज्ञात पूर्वकहैं; क्योंकि कणाद महर्षिने पदार्थोंके स्वरूप
प्रायः दो तरहके निरूपण किये हैं; एक तात्विक स्वरूप जैसे कि “शीतस्पर्शवत्य
आपः, उष्ण स्पर्शवत्तेज; रूपरहितस्पर्शवान् वायुः” इत्यादि। दूसरा
साधर्म्य वैधर्म्य निरू-पणप्रसङ्गमे पदार्थोंका लोकस्थितिके अनुरोधसे