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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 350 में से

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पृष्ठ 13

भूमिका । ( ३ )
यायी समझते हुए एक दूसरेकी जहाँतक बन पड़े सहायताही करतेथे किन्तु स्वकीय
पाण्डित्य प्रख्यापनार्थ स्वेतरसिद्धांतको दूषित कदापि नहीं करतेथे. कपिल महर्षिने
तत्त्वप्रसंख्यानको मुक्तिमार्ग मानाहै; उसीका सहकारी चित्तशोधक तथा जीवन्मुक्तिका
सम्पादक योगशास्त्र है. इसी भावसे “ सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डि-
ताः ” ऐसा भगवान्नेभी कहाहै. एवं पदार्थतत्त्वज्ञानको कणादमहर्षिने मुक्तिमार्ग
मानाहै; उसीके उपयोगी वादविजयाद्यर्थ निग्रहस्थान हेत्वाभासादिका प्रदर्शक न्याय-
शास्त्र है. एवं ब्रह्मज्ञानको मुक्तिमार्ग वेदव्यासने माना है उसीका उपयोगी अन्तःक-
रणशुद्धिद्वारा जैमिनिमहर्षिका धर्ममीमांसाशास्त्र है. एवं मूलसूत्रकारोंमें परस्पर
विरोधका लेशभी नहीं है. यद्यपि कहीं २ मूलसूत्रोंमें नास्तिकमत खण्डनका
आभास दीखपड़ता है. तथापि हमारा इस कथनमें तात्पर्य है कि-वैदिक मतावलम्बी
इन छहोंका किसी अंशमेंभी विरोध नहीं है. एवं शंकरस्वामीके समयसे प्रथम होनेवाले
इन षट्दर्शनसूत्रोंके व्याख्यानोंमेंभी कहीं परस्पर विरोध देखनेमें नहीं आता. यद्यपि
सांख्यसूत्रोंपर विज्ञानभिक्षुके व्याख्यानमें आद्यहीमें-
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ।
आर्थं च श्रुतिवाक्यानां दर्शयँल्लोकगर्हितम् ॥ १ ॥
कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्र च प्रतिपाद्यते ।
सर्वकर्मपरिभ्रंशान्नैष्कर्म्यं तत्र चोच्यते ॥ २ ॥
परात्मजीवयोरैक्यं मयाऽत्र प्रतिपाद्यते ॥
ब्रह्मणो ऽस्य परं रूपं निर्गुणं दर्शितं मया ॥ ३ ॥
सर्वस्य जगतोऽप्यस्य नाशनार्थं कलौ युगे ॥
वेदार्थवन्महाशास्त्रं मायावादमवैदिकम् ॥ ४ ॥
मयैव कथितं देवि जगतां नाशकारणम् ॥
इत्यादि पद्मपुराणके वचनोंसे वेदांतियोंपर कटाक्षयुक्त लेख दीख पड़ताहै तथापि वह
अत्यन्ताधुनिक होनेसे विज्ञश्रेणीमें कदाचित् श्रद्धेय नहींहै.अब हमसे कोई यदि यह पूछे कि
यदि सूत्रकारोंका तथा भाष्यकारोंका परस्पर विरोध नहीं तो वर्तमान कालमें तो दर्शन
सम्बन्धी कोई ग्रन्थ या लेख ऐसा लिखाही नहीं जाता कि,जिसमें सांख्यी नैयायिकोंका
तथा नैयायिक बिना अपने वेदान्तादिपांचोंका तथा वेदान्ती बिना अपने न्यायादि पांचों
का इत्यादि परस्पर खण्डन या मण्डन न लिखाजावे; यदि यह खण्डन मण्डन सूत्रों-
में या उनके भाष्योंमें नहीं तो आया कहासे तथा किमूलक है ? तो इसकाउत्तर हमको
जिह्वा संकुचित कर यही कहना पड़ताहै कि-इस दर्शनकारोंके परस्पर विरोधका
मूलभूत भगवान् भाष्यकार भगवत्पाद श्री १०८ शंकराचार्य्यही हैं. इनसे प्रथम सांख्य