सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 17

त्माओंका समान प्रदेशादृष्टका सम्भव होसकता है ५ । एवं प्रदेशवादीको स्वर्गादि
उपभोगभी नहीं होना चाहिये; क्योंकि ब्राह्मणादि शरीर प्रदेशेन उत्पन्न
हुए अदृष्ट अतिदूर प्रदेशांतरवर्त्ति स्वर्गके जनक नहीं बन सकते ६ । नाना आत्मा
व्यापकभी नहीं होसकते; क्योंकि ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं है ७ । यदि आकाशादिका-
लादि दृष्टान्त कहो तो वेभी उत्पत्तिवाले होनेसे हमारे मतमें व्यापक नहीं हैं इत्यादि
८ । यह सब २ अ०, ३ पादकी समाप्तिमें भाष्यकारने दोष दियेहैं; इनमें प्रथम
के चार तो पूर्व पूर्वउत्तर २से दूषित हैं और पंचममें यह वक्तव्य है कि,दो जीवात्माके या
अधिकके परस्पर अदृष्टोंका या भोगका या उनके प्रदेशका समान होनाही असम्भव है;
क्योंकि हमारे मतमें आत्मसमवायि अदृष्ट प्रत्यात्म असाधारण हैं और उन
अदृष्टोंके भेदको अनादि होनेसे उनका किया मनके साथ आत्माका स्वस्वामिभाव
लक्षण सम्बन्धभी अनादि है. एवं आत्ममनःसंयोगके सर्वात्मसाधारण होनेसेभी
स्वस्वामिभावलक्षणसबन्धको सर्वथा असाधारण होनेसे पूर्वोक्त अभिसंध्यादि व्यवस्था
सर्वथा उपपन्न होसकतीहै और वास्तवविचार करें तो मनका संयोगभी प्रत्यात्मसाधारण
नहींहै; क्योंकि आत्मसंयोगका प्रतिसंयोग भेदसे भेद है. इसलिये मनका आत्मान्तरोंके
साथ जो जो संयोग है वह स्वस्वामिआत्माके साथ नहीं किंतु दूसरा है,इति५। एवं तत्त-
दात्माके तत्तद्विचित्र अनाद्यदृष्टसे प्रेरित हुए तत्तत् मन-स्वस्वामि आत्माके प्रति स्वर्ग
नरकादि तत्तत्प्रदेशावच्छेदेन सुखदुःखादि भोगका हेतु होसकतेहैं. प्रदेशभेद होनेसेभी अदृष्ट
तथा भोगका एकात्मवृत्तित्वेन परस्पर समानाधिकरण होनेसे कार्यकारणभाव निर्वाह है.
अन्यथा मनको मध्यमपरिमाण मानकर उसमें अदृष्ट सुखादिभोगके माननेवाले वेदा-
न्तीकोभी व्यवस्था लगानी कठिन होगी; क्योंकि उसकोभी यह पूछ सकतेहैं कि अन्तःकर-
णम अदृष्टव्याप्यवृत्ति उत्पन्न होतेहैं या अव्याप्यवृत्ति?यदि व्याप्यवृत्ति कहो तो "शिरसि मे
वेदना पादे मे सुखं" इत्यादि प्रतीतिकी अनुपपत्तिहोगी; क्योंकि व्याप्यवृत्तिअदृष्ट व्याप्य-
वृत्ति सुखादिके जनकही होने चाहिये. एवं यदि द्वितीयपक्ष कहो तो क्रिया तथा अदृष्टकी
अदृष्ट तथा भोगकी समानाधिकरणानुपपत्ति होगी-इत्यादि ६ । जैसे आपके एकात्मवादमें
आकाश दृष्टान्त है वैसेही हमारे नानात्मवादमेंभी आकाशादि दृष्टान्त होसकतेहैं ७ ।
यदि आकाश उत्पत्तिवालाहै तो "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः"ऐसा आपभी नहीं कहसकते
और"आत्मनआकाशः सम्भूतः"इत्यादि वचनोंको देखकर बुद्धिविरुद्धअर्थको श्रौत मान-
नाभी बुद्धिमत्ता नहीं है. आकाशादि विभुहैं,अस्पर्श द्रव्य हैं तथा निरवयव हैं इसलिये उनकी
उत्पत्ति माननी अयुक्त है इत्यादि ८ । यद्यपि वेदान्ती केसुषुप्ति अवस्थाके तथा नैयायिक
के मनःसंयोगाभावावस्थाके जीवात्मामें किञ्चिदपि विशेष नहीं तथापि दूषित करणार्थ गौतम-
कणाद सिद्धान्तका अनुवाद करते हुए भाष्यकार उनके आत्माको घट कुड्यादिवत् लि-