न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६ ) भूमिका ।
निवेदन श्रीचरणोंमें कुछ दोषतात्पर्यसे नहींहै किन्तु प्रार्थनारूपसे है; क्योंकि मिथ्या
परदोषोद्भावन करना महाराजप्रासाद गिरानेकी तरह एक साधारण निर्बुद्धिपुरुषोंका
काम है, परन्तु उसी राजभवनके यदि पुनः निर्माणकी अपेक्षा होय तो बहुतसे उत्तम
शिल्पशास्त्रवेत्ताओंकी पेक्षा होती है इसलिये परके उसमेंभी अपने पूर्वजोंके दोष-
उद्भावन करनेको मैं बहुतही बुरा समझताहूं; तथापि गौतम कणादसिद्धान्तपर
जो आपने मिथ्या आक्षेप कियेंहैं वे हमको सर्वथा असह्यहैं. यों तो यही
सच्च है कि--निर्दोष एक परमात्मा है, जावका निर्दोष होना दुर्घट है; परन्तु इतना
कहना किसी विद्वान्को अस्वीकृत न होगा कि--यदि महर्षि पाणिनि पतंजलि
पदनियामकशास्त्रको निर्माण न करते तथा महर्षिगौतम कणाद पदार्थनियामकशास्त्र
को निर्माण न करते तो इतर जीवोंको शास्त्रके विद्वान् बनकर बोलनाभी कठिन पड़ता.
धनीका धन वर्तनेसे लोगोंको मुनीमभी धनीसा दीख पड़ताहै परन्तु वस्तुतः वह धनी नहीं
होता. आपने गौतम कणाद सिद्धांतके यद्यपि मुख्य २ कईएक पदार्थोंको दूषित किया है
तथापि नानात्मवाद उन सबमें मुख्य है. इसलिये इसमें किंचिद् हमकोभी वक्तव्य है.
प्रथम नानात्मवादम यह दोष हैं कि--जब एक आत्माके साथ मनका संयोग होताहै तो उसी
कालमें उसी मनका दूसरे आत्माओंके साथ संयोगभी नियमसे होगा क्योंकि आत्माओं-
को व्यापक होनेसे मनकी सन्निधि सबके साथ समान है. एवं सन्निधिरूप हेतुके समान
होनेसे सबका सुख दुःख समानही होना चाहिये १ । नानात्मवादीको अदृष्टोंसे
व्यवस्था माननीभी कठिन है, क्योंकि अदृष्टभी तो आत्ममनःसंयोगहीसे बने हैं; उनका
भी यह इसी आत्माके हैं, दूसरेके नहीं; यह निर्द्धार होना कठिन है २। यदि नानात्म-
वादी कहें कि जिस आत्माने जैसे तात्पर्यसे जो क्रिया करी है वह उसीके अदृष्टोंकी
जनक होसकती है, दूसरेके नहीं; तो यहभी सम्यग् नहीं क्योंकि तात्पर्यभी तो आत्ममनः-
संयोगहीसे उत्पन्न होताहै जो कि सर्वत्र तुल्यही है ३ । यदि प्रदेशकृता व्यवस्था
कहो अर्थात् शरीरावच्छेदेन आत्ममनःसंयोगको रागादि तथा अदृष्ट सुखादिजनकता
मानो तो यहभी ठीक नहीं; क्योंकि सभी आत्मा सभी शरीरोंमें समान विद्यमानहैं.
शरीरके सम्बन्धसे कोई आत्मा प्रदेशवाला नहीं होसकता और शरीरकाभी सब व्या-
पक आत्माओंके साथ सम सम्बन्ध होनेसे 'यह अमुक आत्माका शरीर है' ऐसा निर्धार
होना कठिन है ४ । यदि आत्माका प्रदेश मानभी लियाजाय तो जिन दो जीवा-
त्माओंको समान सुख दुःख होना है उनको एकही शरीरसे होजाना चाहिये; क्योंकि
दोनों जीवात्माओंके अदृष्टका कदाचित् समान प्रदेशभी होसकता है. जैसे जिस प्रदे-
शमें चैत्रको जैसा सुख या दुःख अनुभव हुआहै यदि वहां उसके स्थानापन्न मैत्र
नियत किया जावे तो उसकोभी वैसाही सुखदुःख देखनेमें आता है; इसलिये दो जीवा-