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सर्वकोश
न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)

Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda

विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 350 में से

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पृष्ठ 14

योगादि उत्तमसिद्धान्तोंके निराकरण करनेमें किसी आस्तिक विद्वान्‌का साहस न हुआथा।
किन्तु सांख्यसिद्धान्तको सहित उसके कर्ताके अप्रमाणित ठहरानेमें तथा गौतम
कणादको वैनाशिक तुल्य बतलाकर उनके सिद्धान्तोंको धूलीमें मिलानेमें एवं धर्म
मीमांसाके मूलोच्छेदनेमें यह प्रथम २ भगवती भगवत्पादहीकी लेखनी प्रवृत्त हुईहै.
इसमें यदि कोई ऐसा कहे कि--शंकरस्वामी महाप्रमित लेखकहैं; इसलिये अत्यन्त
निर्मूल लेख कदापि नहीं लिख सकते, कहींभी मूलसूत्रोंमें या उनके प्राचीन भाष्योंमें
खण्डन मण्डनविषयक लेख अवश्य होगा उसीके आश्रयसे भाष्यकारकी लेखनीभी उधर ही
प्रवृत्त हुई तो इसमें हम यह कहतेहैं कि--इसका मूल “एतेन योगाः प्रत्युक्ताः” यह
द्वितीयाध्यायके प्रथम पादका तृतीय वेदान्तसूत्र है, बस, इसी एकभावी सूत्रके आधारसे
प्रथमाध्यायके चारों पादोंकी जहां तक बनपड़ा कपिल महर्षिके सिद्धान्त निराकरणमें
ही व्याख्या करी, अन्तमें फिरभी संतोष नहीं हुआ तो दूसरे अध्यायके आद्यमें “स्मृ-
त्यनवकाशदोषप्रसंगः इति चेत्, न, अन्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसंगात् ॥ १॥” इस सूत्रकी
व्याख्यामें फिर बिचारे कपिलको लथेडना आरम्भ किया और यहां तक लथेडा कि
श्रुतिस्मृतिप्रतिपाद्य सर्वज्ञ कपिलदेव वासुदेवांश रूपसे अवतीर्ण औरही हुआ है और
यह द्वैतवादी सांख्यशास्त्रका कर्ता कोई अवैदिक कपिल है इत्यादि सभी कुछ कहा. यद्यपि
“ऋषिं प्रसूतं कपिलं यः” इत्यादि श्रुतिस्मृतीतिहासप्रसिद्ध वह एकही महर्षि कपि-
ल है जो कि देवहूति माताके गर्भसे कर्दम महर्षिके वीर्यसे हुआहै; उसीको
श्रीमद्भागवतके तृतीयस्कन्धमें “अयं सिद्धगणाधीशः सांख्याचार्यैः सुसम्मतः ॥ लोके
कपिल इत्याख्यां गन्ता ते कीर्तिवर्द्धनः ॥१९॥ अ० २४॥” इत्यादि वचनोंसे ब्रह्माने
सिद्धोंका स्वामी भगवदवतार तथा सांख्यशास्त्रका कर्ता कहा है, एवं इसीही कपिलने
अपनी माताको प्रसिद्ध सांख्यशास्त्रके अनुसारही उपदेश कियाहै; तथापि सांख्यशा-
स्त्रका कर्ता अवैदिक था किन्तु श्रुतिप्रतिपाद्य कपिल दूसरा हुआहै, ऐसा कहतेहुए स्वामीको
रोकनेका किसका सामर्थ्य है? आप साक्षात् शंकरहैं अतएव स्वतन्त्र होनेसे नियोग पर्यनु
योगानर्ह हैं जो चाहें सो लिखें, हम लोगों आस्तिकोंको बीचमें किन्तु करनेका अधि-
कार नहीं है किन्तु केवल राजशासनवत् इनका जो कुछ लेख होय वह हम लोगों
अनुचरोंको सन्मानपूर्वक शिरोधार्य तथा मान्य है.
एवं आपने मन्वादिस्मृतियोंको वर्णाश्रमधर्म बोधनमें सावकाश तथा कापिलशास्त्र-
को विना अध्यात्मविचारके निरवकाश, एवं “अस्मत्कृते च व्याख्याने जना न
विश्वस्युर्बहुमानात्स्मृतीनां प्रणेतृषु” इत्यादि वचनोंसे कपिलादिमहर्षियोंके वचनोंमें
लोगोंकी अधिक श्रद्धा तथा स्ववचनोंमें विश्वासका संदेह इत्यादि बहुत कुछ कहा परन्तु शेषमें
इसकी व्यवस्था कुछभी न करी, ठीक २ अब मुझे स्मरण हुआ आपने अग्रिमभाष्यमें कपिलको