न्यायसिद्धान्तमुक्तावली / भाषापरिच्छेद (महामहोपाध्याय विश्वनाथ पंचानन - स्वामी गोविन्द सिंह सविस्तार हिन्दी टीका)
Nyayasiddhantamuktavali with Bhashaparichchheda
विश्वनाथ पंचानन भट्टाचार्य (टीकाकार: स्वामी गोविन्द सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) भूमिका ।
खतेहैं. क्या जाने यह कौनसे ऋषि वचनोंका अनुवाद कर खण्डन कर रहेहैं? गौतमकणाद
सिद्धान्तमें तो कहीं आत्माको घटकुड्यादिवत् कहानहीं.प्रत्युत “बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव”
इत्यादि श्रुतिसिद्धज्ञानादिगुणाधिकरण कहाहै. पुरीततीबाह्यदेशावच्छेदेनात्ममनःसंयोगसे
ज्ञानका प्रादुर्भाव होना अनुभवसिद्धहै.इस विलक्षणसंयोगसे विनामुक्तिमेंभी कुछ विशेष नहीं
अर्थात् सुषुप्ति एकमुक्ति अवस्थाका उदाहरणरूप है. सबीजनिर्बीज समाधि तो अन्तःकरण-
की अवस्था हैं इसलिये मुक्तिका उदाहरण नहींबनसकतीं, एवं इसके सिवाय अन्तःकरण
में या अविद्यामें आभास मानकर जीवकी सुषुप्ति या जाग्रत्की व्यवस्थाके लिये प्रतिदिन
अंतःकरणका कारणरूपेणावस्थान तथा अविद्याका वृद्धिरूपेण परिणाम माननाभी बुद्धि
तथा शास्त्रविरुद्ध है. विना विशेष सामग्रीके कार्य्यकी कारणरूपेण परिणति या कारण
की कार्य्यरूपेण परिणतिमें संसारमात्रमें कोई उदाहरण नहीं है. उदाहरणरूपेण गृहीतदधि-
दुग्धादिपदार्थ स्वविकृत्यर्थ तिक्तादि विशेषपदार्थोंकी अपेक्षा रखतेहैं- इति ।
एवं संस्कृतके पूर्ण विद्वान् लोग तो यद्यपि अच्छीतरहसे इस वार्त्ताको जानतेहैं कि-शं-
करस्वामीने सांख्यादि सर्वदर्शनोंसे विरुद्ध एक अपनी ठाईपा जुदाही पकाई है तथा सुयो-
ग्यशिष्यमण्डलीने उसकी सुगन्धि पूर्णरूपसे सर्वत्र फैलाई है तथापि आर्य्यभाषाले-
खसे उसी मतको मण्डन करतेहुए निश्चलादिविद्वानोंने जिन सरल पुरुषोंको महर्षि-
सिद्धान्तोंसे वंचित किया है उनके बोधका उपाय वर्तमानकालमें सर्वथा अचिन्तनीय है.
शंकरमतको पुष्ट करतेहुए निश्चल कहतेहैं कि-शंकरस्वामी महादेवका अवतारहैं इसमें
व्यासोक्त “कलिमें वेद अर्थ बहु करिहैं । श्रीशंकर शिव तब अवतरिहैं ।
जैन बुद्धमतमूल उखारैं । गंगाते प्रभुमूर्ति निकारैं । ” इत्यादि पुराण वचन
प्रमाणहैं १ । एवं परमपूज्य महर्षि वाल्मीकिने जिस अर्थका सविस्तर निरूपण
किया है वही शंकरस्वामीभी उत्तम रीतिसे लिखतेहैं २ । एवं युक्तिसेभी
भेदवाद विरुद्ध है. वह युक्ति खण्डनादि ग्रन्थोंमें लिखी है; कठिनहैं, इसलिये यहां नहीं
लिखते ३ । “एवं मृत्योः स मृत्युमाप्नोति, य इह नानेव पश्यति, द्वितीयाद्वै
भयं भवति, अथ योऽन्यां देवतामुपासते, अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद, यथा
पशुरेव स देवानाम्” इत्यादि श्रुतिविरुद्ध होनेसेभी द्वैतवाद अप्रमाणिक है ४।
बस, इन चार हेतुओंसे निश्चलने शंकरमतको प्रमाणित किया है. प्रथममें यह
वक्तव्य है कि विज्ञानभिक्षुने इससे विपरीतार्थ बोधक पद्मपुराणके पूर्वोक्त वचन लिखेहैं.
सभी पुराणोंके कर्त्ता व्यासही हैं. दोनोंमें कौन वचन सच्चेहैं? सो आपही कहदीजिये.
और आप कौनसे पुराणके गीत गातेहैं?यदि नाम लिखते तो देखभी लेते; परन्तु आप तो
श्रद्धाके उमँगमें नाम लिखनाभी भूलगए. यदि आप कहें कि व्यासभी अनेक हुएहैं तो,
हमभी मानतेहैं परन्तु आपकी आख्यायिकाका मूलकारक तो कोई शंकरस्वामी क