न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
१४ भूमिका ।
यह पीछे दिखलाया जा चुका है कि धर्मकीर्ति धर्मपालका शिष्य था और यह भी
बतला दिया गया है कि धर्मपाल योगाचार ( विज्ञानाद्वैतवाद ) मतावलम्बी था ।
अतएव जो मत गुरुका हो वही शिष्यका भी होना चाहिये । किन्तु न्यायविन्दुमें स्थान
स्थान पर ऐसे वाक्य आये हैं जिनसे बाह्य अर्थका अस्तित्व स्पष्ट प्रतीत होता है ।
उदाहरणके लिये ऐसे कुछ वाक्य दिये जाते हैं—
‘इन्द्रियज्ञानम्’ पृ० १२
‘स्वविषयानन्तरविषयसहकारिणेन्द्रियज्ञानेन समनन्तरप्रत्ययेन जनितं तन्मनो-
विज्ञानम्’ पृ० १३
‘सर्वचित्तचैत्तानामात्मसंवेदनम्’ पृ० १४
‘भूतार्थभावनाप्रकर्षपर्यन्तजं योगिज्ञानं चेति’ पृ० १४ इत्यादि २ ।
न्यायविन्दुके इस प्रकारके वाक्य ही इस प्रश्नको उपस्थित करते हैं कि वह
बाह्यार्थास्तित्ववादी था या विज्ञानाद्वैतवादी ? क्योंकि यद्यपि योगाचार बाह्य अर्थको
नहीं मानता तथापि उपचारसे उसको वह भी मानता ही है । यदि हम धर्मकीर्तिको
विज्ञानाद्वैतवादी मान लें तो न्यायविन्दुके बाह्यार्थास्तित्ववाचक शब्दोंको औपचारिक
मानना पड़ेगा । किन्तु उन वाक्योंके ढंगसे ऐसा प्रतीत नहीं होता । यदि उक्त वाक्य
औपचारिक होते तो उनमेंसे किसीमें तो उपचारवाचक शब्द अवश्य ही होता किन्तु
ऐसा कोई शब्द न्यायविन्दुमें उपलब्ध नहीं है । अतएव धर्मकीर्तिको विज्ञानाद्वैतवादी
मानना युक्तिसंगत नहीं है ।
इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि धर्मकीर्ति पहिले तीर्थमतका था । उसके
दिग्विजयसे प्रतीत होता है कि उसका मनन वैशेषिक आदि मतोंका विशेष था ।
वेदान्तियोंसे उसकी किसी भी भिज्ञताका पता नहीं चलता है । अतएव बौद्ध होनेसे
पूर्व वह बाह्य और आन्तर दोनों प्रकारके पदार्थके अस्तित्वको माननेवाले किसी
दर्शनका अनुगामी होगा । सो दोनोंके अस्तित्वको माननेवालेकी दूसरी सीढ़ी एकको ही
मानना या न मानना हो सकती है और वह सीढ़ी बाह्यार्थास्तित्ववाद है । अतएव
धर्मकीर्ति बाह्यार्थास्तित्ववादी था ।
तीसरी बात यह भी है कि नैयायिक प्रायः कमसे कम बाह्य अर्थको माननेवाले
होते हैं । जैन यद्यपि बाह्य और आन्तर दोनों अर्थको मानते हैं तथापि शास्त्रार्थकी
झंझटोंको दूर करने और विपक्षीको आक्षेपका मौका न देनेके लिये ही उनको मतिज्ञान-
रूप परोक्षज्ञानको सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहना पड़ा है । अतएव ऐसी दशामें यह आशा
नहीं की जा सकती कि बौद्ध न्यायका उद्धार कर्ता धर्मकीर्ति बाह्य अर्थतकका स्पष्ट
रूपसे अस्तित्व न मानता होगा ।
( ५ ) धर्मकीर्तिका बौद्ध न्यायमें स्थान ।
धर्मकीर्तिके बौद्धन्यायमें स्थानको लिखनेसे पूर्व यह प्रश्न उपस्थित होता है कि
धर्मकीर्तिका बौद्ध दर्शनमें क्या स्थान है ? किन्तु उसके बनाये हुए किसी भी दार्शनिक
भूमिका । १५
ग्रन्थके सामने न होनेसे हम इस विषयपर लिखनेमें असमर्थ हैं। क्योंकि केवल न्यायके
ग्रन्थके आधारपर दार्शनिक विषयकी समालोचना करना हम योग्य नहीं समझते ।
यह पीछे प्रगट किया जा चुका है कि आचार्य दिङ्नाग आधुनिक बौद्ध न्यायके
जन्मदाता थे । किन्तु गौतम न्यायसूत्रके वात्स्यायन भाष्यकी टीका न्यायवार्तिकके
रचयिता उद्योतकरने अपने ग्रन्थ में उनकी खूब समालोचना की है । उस समय इस
समालोचनासे ब्राह्मणोंका प्रभाव बहुत कुछ बढ़ गया और बौद्धोंका घट गया ।
दिङ्नागसे धर्मकीर्ति तकके बीचमें कोई भी ऐसा बौद्ध नैयायिक नहीं हुआ जो उस
उखड़ी हुई प्रतिष्ठाको जमाता । किन्तु धर्मकीर्तिने स्थान २ पर शास्त्रार्थ करके बौद्ध-
मतका इतना प्रचार किया कि उसके पीछेके प्रायः सभी दर्शनोंके न्यायवालोंने उसकी
समालोचना करनेमें ही अपना गौरव समझा । इन्होंने न्यायवार्तिककी भी समालोचना
खूब की थी । इनके पश्चात् बौद्ध नैयायिकोंमें ऐसा दमदार कोई नैयायिक नहीं हुआ ।
इसलिये जबकि हम दिङ्नागको आधुनिक न्यायका जन्मदाता कहते हैं तो धर्मकीर्तिको
बौद्धन्यायका उद्धारक कहना बहुत योग्य होगा ।
( ६ ) धर्मकीर्तिकृत दिङ्नागका खण्डन ।
प्रमाणवार्तिककारिकाके बननेके वर्णनमें कहा जा चुका है कि धर्मकीर्तिने दिङ्नागके
ग्रन्थमें उसकी गलतियां पकड़ीं । यद्यपि हमारे सामने प्रमाणवार्तिककारिका उपस्थित
नहीं है तथापि न्यायविन्दु टीकासे दिङ्नागसे धर्मकीर्तिका मतभेद स्पष्ट प्रगट हो
जाता है । यद्यपि डाक्टर सतीशचन्द्र विद्याभूषणने इस विषयपर भी काफी लिखा है
किन्तु इस स्थलपर उस विषयमें न लिखना भी अनुचित होगा अतएव हम यहां पर
वही विषय डाक्टर साहिबसे अभिन्न सम्मति रखते हुए लिखते हैं—
इष्टविघातकृत् विरुद्ध ।
हेतुके साध्यके विरुद्ध होनेको दिङ्नाग और धर्मकीर्ति दोनोंने ही हेत्वाभास माना
है । किन्तु दिङ्नागने अपने न्यायप्रवेशमें हेतुके अभिलषित ( Implied ) साध्यके
( जिस समय साध्य अनिश्चित अथवा संदिग्ध हो ) विपरीत होनेको पृथक् हेत्वाभास
माना है, जिसको उन्होंने इष्टविघातकृत् विरुद्ध नाम दिया है । किन्तु धर्मकीर्तिने
अपने ग्रन्थ न्यायबिन्दुमें इस सम्मतिको यह कह कर अग्राह्य माना है कि दूसरा
विरुद्ध हेत्वाभास प्रथममें ही गर्भित हो जाता है । ( तत्र च तृतीयोऽपि इष्टविघात-
कृत् विरुद्धः ?···स इह कस्मान्नोक्तः । अनयोरेव अन्तर्भावात् । अयं च विरुद्धः
आचार्यदिङ्नागेनोक्तः । स कस्मात् वार्तिककारेण सता त्वया नोक्तः । न्या० पृष्ठ
७९, ८०भाषा पृ० २२ ) इष्टविघातकृत् विरुद्धका एक उदाहरण दिया जाता है—
नेत्र आदि दूसरेके उपयोगके लिये हैं । क्योंकि वह संघातरूप हैं । जैसे-शयन,
आसन आदि ।
यहाँ साध्य दूसरेके लिये अनिश्चित या संदिग्ध है । क्योंकि वह संघात
१६ भूमिका।
(उदाहरणके लिये शरीर) और असंघात (उदाहरणके लिये जीव) दोनोंको
ही बतला सकता है। यदि वक्ता 'दूसरेके लिये' शब्दको असंघात अर्थमें प्रयोग
करे जिसको श्रोता संघात अर्थमें समझ जावे तो उस समय साध्य हेतुके विरुद्ध हो
जावेगा। उस समय वह हेतु इष्टविघातकृत् विरुद्ध कहलाता है।
धर्मकीर्तिने अपने ग्रन्थ न्यायबिन्दुमें इसको पहिले विरुद्धका ही उदाहरण माना
है। क्योंकि अनुमान वाक्यमें प्रयोग किये हुए साध्यवाचक शब्दका एक ही अर्थ
हो सकता है। और यदि कहे हुए और समझे हुए अर्थोंमें सन्देह हो तो प्रकरणसे
पहिले वास्तविक अर्थ निश्चय कर लेना चाहिये। यदि प्रयोग किया हुआ अर्थ
वास्तविक होगा तो सा य और हेतुमें स्वाभाविक विरोध होगा।
विरुद्धव्यभिचारी।
दिङ्नागने एक और हेत्वाभास 'विरुद्धाव्यभिचारी' भी माना है, जिसको उसने
सन्देहका कारण कहा है। यह ऐसे स्थानपर होता है जब दो विरुद्ध परिणाम एक ही
हेतु (Valid truth reason) से पुष्ट किये जाते हैं।
उदाहरणके लिये-एक वैशेषिक दार्शनिक कहता है-
शब्द अनित्य है क्योंकि वह उत्पन्न होता है।
एक मीमांसक उत्तर देता है-
शब्द नित्य है क्योंकि वह श्रव्य (सुनने योग्य) है।
उपरोक्त मामलों में काममें लाये हुए दोनों हेतु क्रमसे वैशेषिक और मीमांसाके
सिद्धान्तके पुष्ट करनेके कारण उन २ दर्शनकारों द्वारा ठीक माने जाते हैं। किन्तु
दो विरुद्ध परिणामोंपर लेजानेसे वह अनिश्चित है। और इसीलिये वह हेत्वाभास है।
धर्मकीर्तिने न्यायबिन्दुमें विरुद्धाव्यभिचारी हेत्वाभासका निषेध (न्या० पृ०
८६-८८ भाषा० पृ० २४-२५) किया है। इसका कारण उन्होंने यह दिया है
कि यह न तो अनुमानके विषयमें ही उठता है और न शास्त्र ही इसका आधार है।
हेतुका साध्यमें स्वभाव, कार्य या अनुपलब्धि रूपमें रहना आवश्यक है और उसके
द्वारा ठीक परिणाम निकलना चाहिये।
परस्परविरोधी दो परिणाम ऐसे हेतुओंसे पुष्ट नहीं हो सकते जो ठीक (Valid)
हैं। परस्पर विरुद्ध दो परिणामोंके सिद्ध करने में दो शास्त्र उसी प्रकार सहायता नहीं
कर सकते जिस प्रकार एक शास्त्र प्रत्यक्ष और अनुमानको पुष्ट नहीं कर सकता और
वह केवल बुद्धिके न पहुँचने योग्य विषयोंमें ही प्रमाण होता है। इसलिये विरुद्धव्य-
भिचारी असंभव है।
दृष्टान्तका कार्य।
दिङ्नागके विरोधमें धर्मकीर्ति (त्रिरूपो हेतुरुक्तः। तावतैव अर्थप्रतीतिरिति न
पृथग् दृष्टान्तो नाम साधनायवः कश्चित्। तेनास्य लक्षणं पृथग् [ न ] उच्यते गतार्थ-
त्वात्। (न्या० पृ० ९१ भाषा० पृ० २६) सम्भवतः 'न' भूलसे छूट गया है।
भूमिका । १७
तिब्बती अनुवादमें ‘न’ मिलता है ।) कहता है कि ‘दृष्टान्त’ नामका कोई साधनका
अवयव नहीं है । क्योंकि इसका हेतुमें अन्तर्भाव हो जाता है । जैसे—
पर्वतमें अग्नि है क्योंकि वहाँ धूम है । जैसे पाकशाला में ।
इस वाक्यमें दृष्टान्त पाकशाला और उसी प्रकारकी अन्य वस्तुएं हेतु में ही
आजाती हैं । अतएव ‘दृष्टान्त’ पाकशालाको पृथग् कहना व्यर्थ है । धर्मकीर्ति
कहता है कि इतना होने पर भी दृष्टान्त का यह मूल्य है ही (...................
उक्तम् अभेदेन···पुनर्विशेषेण दर्शनीयायुक्तौ ) कि यह हेतुके द्वारा साधारण रूपसे
कथन लिये हुए को विशेषरूपसे बतला देता है । इस प्रकार साधारण कथन ‘सब
धूम वाली वस्तु अग्नि वाली होती हैं’ को विशेष दृष्टान्त पाकशाला ने अधिक
जोरदार बना दिया जो कि धूम वाली भी है और अग्नि वाली भी है ।
( ७ ) न्यायबिन्दु तथा उसका न्याय ।
इस बातको प्रमाणित करने की अब कोई आवश्यकता नहीं रह गई है कि प्राचीन
कालमें सब दर्शनकारोंने अपनी २ प्रमाण व्यवस्था पृथक् ही खड़ी की थी । यद्यपि
यह आवश्यक नहीं था कि उन सबकी व्यवस्थाएं एक दूसरेसे भिन्न ही हों तथापि
अपनी मानी हुई वस्तुके स्वरूपको बतलाने तथा अपनी युक्तियोंको सिद्ध करनेके लिये
पृथक् ही प्रमाणकी आवश्यकता थी । जहां दर्शन पदार्थोंका वर्णन करता है वहां
न्याय उन पदार्थोंको सिद्ध करने वाली युक्तियोंका वर्णन करता है । इस प्रकार दर्शन
और न्याय दोनों सापेक्ष हैं । प्रमाण सामान्यका लक्षण तो एक प्रकारसे विशुद्ध
दार्शनिक विषय है अतएव इस पर हम पृथक् विचार करेंगे ।
यह पीछे प्रमाणित किया जा चुका है कि यद्यपि बौद्धन्याय गौतमके न्यायदर्शन-
के पीछे बना है तथापि भारतके दार्शनिकोंको विशुद्ध न्यायके ही ग्रन्थोंको लिखनेका
मार्ग बौद्ध नैयायिकोंने ही दिखलाया है । गौतमीय न्याय अथवा प्राचीन न्याय, दर्शन
और न्यायका मिला हुआ ग्रन्थ है । किन्तु बौद्धोंने अपने न्यायग्रन्थोंकी स्वतन्त्र रचना
करके उस समय भारतपर अपना सिक्का जमा लिया । ब्राह्मणोंके पास तो पहिलेसे
ही न्याय दर्शन था । अतएव उन्होंने उसकी ही टीका प्रटीकाओं तथा उसी ढंगके
अन्य ग्रन्थोंपर ही भरोसा रखा, किन्तु जैन नैयायिकोंसे यह सहन न हुआ । अस्तु,
उन्होंने भी बौद्धोंके समान न्यायके ऊपर स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखने आरम्भ किये । भारतका
मध्यकालीन दार्शनिक इतिहास जैन और बौद्ध धर्मोंके ही शास्त्रार्थोंसे भरा पड़ा है ।
धीरे २ कालयोगसे ब्राह्मणोंका फिर प्राबल्य हुआ । उस समय अपनी कुछ आन्तरिक
निर्बलताओं तथा कुछ जैन और ब्राह्मणोंके धक्केसे बौद्ध धर्मपर तो ऐसा आघात
पहुंचा कि वह भारतसे अदृश्य ही हो गया । किन्तु जैन धर्म किसी प्रकार सबकी
चोटें सहता हुआ अभी तक भारतवर्षमें फैल ही रहा है । मिथिला तथा नवद्वीपके
नैयायिकोंने अभी लगभग छः सौ वर्ष पूर्व प्राचीन न्यायका परिष्कार करके एक नव्य
न्याय खड़ा किया है किन्तु यह प्राचीन न्यायका ही रूपान्तर है । अतएव मुख्य न्याय
१८ भूमिका ।
तीन ही हैं। गौतमीय न्याय, जैन न्याय और बौद्धन्याय । किन्तु इससे यह न समझ
लेना चाहिये कि अन्य दर्शनकारोंने न्यायपर कुछ लिखा ही नहीं। क्योंकि उनके
ग्रन्थोंमें भी न्यायके बहुतसे अङ्गोंपर बहुत कुछ प्रकाश मिलता है ।
आचार्य धर्मकीर्तिने न्यायबिन्दुको तीन परिच्छेदोंमें विभक्त किया है। जिनमेंसे
प्रथम परिच्छेदमें प्रत्यक्ष, द्वितीयमें स्वार्थानुमान और तृतीयमें परार्थानुमानका वर्णन
है। आचार्य धर्मोत्तरने इसी क्रमका अनुसरण करते हुए इसके ऊपर एक विस्तृत टीका
बनाई है जो कि पाठकोंके हाथमें है ।
यद्यपि यह टीका बहुत अच्छी है और इसमें प्रत्येक बातको भलीप्रकार समझाया
गया है तथापि यह टीका अपने असली रूपमें केवल उन्हींके कामकी रह गई है जो
बौद्ध दर्शनके विद्वान् हैं। क्योंकि यदि गौतमीय और जैन न्यायके कोई विद्वान् बिना
बौद्ध दर्शनका अभ्यास किये इसको स्वयं पढना चाहें तो उनके लिये भी इसका पढ़ना
बहुत कष्ट साध्य है। क्योंकि इसमें कुछ ऐसे बौद्ध पारिभाषिक शब्द आगये हैं जिनका
अर्थ लाख प्रयत्न करनेपर भी बिना बतलाये हुए समझमें नहीं आ सकता । हमने
इस त्रुटिको यथाशक्ति अपनी संस्कृत टिप्पणी और भाषाटीकामें दूर करनेका प्रयत्न
किया है। किन्तु यह कहना कठिन है कि हम इस प्रयत्नमें कहाँ तक सफल हुए हैं ।
अब हमको यह देखना है कि न्यायबिन्दुके पृथक् २ परिच्छेदोंमें क्या कहा
गया है—
प्रथम परिच्छेद ।
हम पीछे कह आये हैं कि प्रमाण सामान्य एक दार्शनिक विषय है। अतएव
प्रथम यहाँ उसीके लक्षणपर विचार किया जाता है—
सांख्यदर्शनमें कहा है—
'द्वयोरेकतरस्य वाप्यसन्निकृष्टार्थपरिच्छित्तिः प्रमा तत्साधकतमं यत्तत् त्रिविधं
प्रमाणम् ।' अध्याय १ सूत्र ८७ ।
अर्थात् असन्निकृष्ट ( प्रमातामें अप्राप्त ) अर्थका निश्चय करना प्रमा है। वह प्रमा
चाहे बुद्धि और पुरुष दोनों का धर्म हो, अथवा बुद्धिका ही धर्म हो, अथवा पुरुषका
ही धर्म हो। जो उस प्रमाका साधकतम ( फलका एकमात्र और अभिन्न कारण ) हो
वह प्रमाण होता है। वह तीन प्रकारका है।
यहां यदि प्रमाणरूप फलको पुरुषमें रहनेवाला माना जावे तो बुद्धिवृत्ति प्रमाण
होगा। क्योंकि पुरुषजन्य प्रमा बुद्धिवृत्तिसे ही हो सकती है अन्यसे नहीं हो सकती ।
अथवा यदि प्रमाणरूप फलको बुद्धिमें ही रहने वाला माना जावे (क्योंकि पुरुष तो
ज्ञानसे बिलकुल पृथक् है) तो इन्द्रियवृत्ति सन्निकर्ष आदि ही प्रमाण होंगे । क्योंकि
पुरुष तो प्रमाका साक्षी है उसको प्रमाता कहनेमें उसमें कर्तृत्वका आरोप करना
पड़ेगा अथवा यदि पौरुषेय बोध और बुद्धिवृत्ति दोनोंको ही प्रमा कहा जावेगा तो
उक्त दोनोंको ही प्रमाण मानना पड़ेगा ।
भूमिका । १६
योगदर्शनके पातञ्जल भाष्यमें प्रथम मतको ही स्वीकार किया गया है। किन्तु
सांख्यका प्राचीन मत उपरोक्त मतोंमेंसे दूसरा प्रतीत होता है। इस प्रकार सांख्य तथा
योगदर्शनका प्रमाण अस्वसंवित् और अचेतन है।
प्रमाणका लक्षण न्यायदर्शन या वात्स्यायनभाष्य किसीमें भी नहीं मिलता। न्याय-
भाष्यकी टीका न्यायवार्तिकमें निम्नलिखित वाक्य मिलते हैं—
इन्द्रियं खलु अर्थप्रकाशकत्वात् प्रमाणं····················उपलब्धिहेतुः प्रमाणम्।···
प्रमाणोत्पत्ताविन्द्रियार्थसन्निकर्षमपेक्षमाणाभ्यां प्रमातृप्रमेयाभ्यां प्रमाणं जन्यते।
अर्थात् अर्थके प्रकाशक होने से इन्द्रिय ही प्रमाण है। क्योंकि उपलब्धिका
हेतु प्रमाण होता है। और प्रमाणकी उत्पत्तिमें इन्द्रिय और अर्थके सन्निकर्षकी अपेक्षा
करनेवाले प्रमाता और प्रमेय ज्ञानके जनक होते हैं।
किन्तु अन्य ग्रन्थोंको परिशीलन करनेसे पता चलता है नैयायिक मतमें भी
सन्निकर्षको ही प्रमाण माना है।
वैशेषिक दर्शनके प्रशस्तपाद भाष्यमें लिखा है—
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इति पर्यायाः।··········तस्या सत्यप्यनेकविधत्वे समा-
सतो द्वे विधे विद्या चाविद्या चेति।·········विद्यापि चतुर्विधा। प्रत्यक्षलैङ्गिक-
स्मृत्यार्षलक्षणा।
अर्थात् बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान और प्रत्यय ये सब ही एकार्थवाची हैं। उसके
(बुद्धिके) अनेक भेद होने पर भी संक्षेपसे दो भेद हैं। विद्या और अविद्या। विद्याके
भी चार भेद हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान, स्मृति और आर्ष।
इससे प्रतीत होता है कि वैशेषिकोंके विद्या और प्रमाण भिन्न २ नहीं हैं। अतएव
वैशेषिक दर्शनके अनुसार प्रमाण ज्ञान है।
मीमांसामें मुख्य रूपसे दो आचार्योंके मत लिये जाते हैं। कुमारिलभट्ट और
प्रभाकरके—
कुमारिलने प्रमाणका यह लक्षण किया है—
‘अनधिगततथाभूतार्थनिश्चायकं प्रमाणम्’ अर्थात् जो न जाने हुए और तथाभूत
(वास्तविक) अर्थका निश्चय करावे वह प्रमाण है। यह एक प्रकारका ‘प्रमाकरणं
प्रमाणम्’ ही हुआ।
प्रभाकरका प्रमाणका लक्षण यह है—
‘अर्थतथात्वप्रकाशको ज्ञातृव्यापारोऽज्ञानरूपोऽपि प्रमाणम्’ अथवा ‘अनुभूतिः प्रमाणम्’।
अर्थात् अर्थके वास्तविक रूपको प्रकाशित करने वाला ज्ञाताका अज्ञानरूप अनुभव
व्यापार प्रमाण है अथवा अनुभूति या अनुभव ही प्रमाण है। यहाँ भी प्रमाण
ज्ञान रूप है—
जैनियोंके न्यायके प्रसिद्ध ग्रन्थ परीक्षा मुखमें प्रमाणका यह लक्षण किया गया
है—‘स्वापूर्वार्थव्यवसायात्मकं ज्ञानं प्रमाणम्’।
२० भूमिका ।
अर्थात् अपने और अपूर्व अर्थको निश्चय करानेवाले ज्ञानको प्रमाण कहते हैं।
इसमें भी ज्ञानको ही प्रमाण कहा है।
अब अन्तमें देखना चाहिये कि बौद्ध दर्शनमें इस विषयमें क्या कहा है। न्याय-
बिन्दु मूलमें प्रमाणके स्थानपर प्रायः सम्यग्ज्ञान शब्दका प्रयोग मिलता है। सम्यग्ज्ञानके
विषयमें टीकामें लिखा है—
'अविसंवादकं ज्ञानं सम्यग्ज्ञानम्' । न्याय वि० पृ० ४ पं० ६
जो पहिले से जाने हुए पदार्थमें प्रवृत्ति करता है उसे लोकमें संवादक कहते हैं।
ज्ञानके विषयमें भी यही बात घटती है क्योंकि ज्ञान भी उसी प्रकार स्वयं दिखलाये
हुए अर्थमें प्रवृत्ति करता हुआ संवादक कहा जाता है। अतएव अविदित अर्थको बतलाने
वाला ज्ञान सम्यग्ज्ञान कहलाता है। जैसा कि कहा है—
'अनधिगतविषयं प्रमाणम् ।' न्याय वि० पृ० ४ पं० १३
अर्थात् प्रमाण अविदित विषय वाला है।
बौद्धोंने प्रमाण और ज्ञानको दो पदार्थ न मानकर एक ही माना है। जैसा कि
जैनियोंने भी किया है। ज्ञानमें 'सम्यक्' विशेषणसे संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय
ज्ञानोंको स्पष्टतया प्रमाणपनेका निषेध किया है। 'अविसंवादक' अथवा 'अनधिगत-
विषय' से भट्टद्वारा स्वीकार किये हुए धारावाहिक ज्ञानमें प्रामाण्यका निषेध किया है।
बौद्धोंकी प्रमाणसंख्या यद्यपि और सबोंसे तो भिन्न है किन्तु वैशेषिकोंके समान
ही है। उन्होंने प्रत्यक्ष और परोक्ष दो ही प्रमाण माने हैं। (न्यायबिन्दु पृ० ७
भाषाटीका पृ० १) अन्तर दोनोंमें केवल इतना ही है कि वैशेषिक तो उपमान और
अर्थापत्ति आदिका अनुमान में अन्तर्भाव कर लेता है किन्तु बौद्ध कार्य, स्वभाव और
अनुपलब्धि हेतु जनित ज्ञानको ही अनुमान मानता है। अतएव बौद्ध अनुमानमें उनका
पूर्ण अन्तर्भाव नहीं है।
बौद्धोंका प्रत्यक्ष जितना विचित्र है उतना ही उसको समझना भी कठिन है।
वैदिक दर्शनकारोंने इन्द्रियों और पदार्थके सन्निकर्षसे उत्पन्न हुए ज्ञानको प्रत्यक्ष माना
है। जैनियोंका प्रत्यक्ष भी यद्यपि विचित्र ही है किन्तु उसका समझना उतना कठिन
नहीं है। जैनियोंने प्रत्यक्षके दो भेद किये हैं—एक इन्द्रियप्रत्यक्ष (अथवा सांव्यव-
हारिक प्रत्यक्ष) दूसरा अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष (अथवा पारमार्थिक या मुख्य प्रत्यक्ष)।
जैनियोंका इन्द्रिय प्रत्यक्ष लगभग वैदिक दर्शनकारोंके ही जैसा है किन्तु अतीन्द्रिय
प्रत्यक्ष एक प्रकार का योगिज्ञान है, जो केवल आत्मिक शक्तिसे आत्मामें ही होता
है। बौद्ध लोग कल्पना रहित और निर्भ्रान्त ज्ञानको प्रत्यक्ष कहते हैं। (न्या० पृ० ८
भा० पृ० १) कल्पना रहितको प्रत्यक्ष कहनेका कारण यह है कि कल्पना अर्थकी
उपस्थितिकी अपेक्षा नहीं रखती किन्तु बौद्ध प्रत्यक्ष अर्थके सान्निध्यमें ही हो सकता है।
अन्य अवस्थाओंमें नहीं हो सकता (न्या० पृ० १०, ११)
भूमिका । २१
इन्होंने प्रत्यक्षके चार भेद माने हैं—
इन्द्रियप्रत्यक्ष, मनःप्रत्यक्ष, स्वसंवेदनप्रत्यक्ष और योगिप्रत्यक्ष, जो ज्ञान इन्द्रियोंके
आश्रित होता है उसे इन्द्रियप्रत्यक्ष कहते हैं । ( न्या० पृ० १२ भा० पृ० २ )
इन्द्रियविज्ञान ( इन्द्रियप्रत्यक्ष ) के दूसरे क्षणमें जब कि इन्द्रियज्ञान समनन्तरप्रत्यय
( भा० पृ० २ पं० ७ ) हो गया हो, जो ज्ञान होता है वह मनोविज्ञान या मनःप्रत्यक्ष
कहलाता है । ( पृ० १२, १३, १४ भा० पृ० २ ) इसमें और इन्द्रिय विज्ञानमें अन्तर
केवल इतना ही है कि इसमें आलम्बन प्रत्यय ( भा० पृ० २ पं० १० ) इन्द्रिय विज्ञान
होता है और इन्द्रियविज्ञानमें आलम्बन प्रत्यय घट पट आदि पदार्थ होते हैं ।
यद्यपि बौद्ध दर्शनमें आत्मा या जीव नामका कोई पदार्थ नहीं है तथापि सुख दुःख
आदिमें 'मैं सुखको भोगता हूँ' अथवा 'मैं दुःखको भोगता हूँ' आदि प्रत्यय होते ही
हैं । इस अनुभवको ही स्वसंवेदन प्रत्यक्ष या आत्मसंवेदन कहते हैं ।
योगिप्रत्यक्ष स्पष्ट ही है वह योगियोंको ही होता है ।
प्रत्यक्षका विषय भी एकक्षणवर्ती पदार्थ है । किन्तु अनुमानका विषय सामान्य
लक्षण है । अर्थात् अनुमानके द्वारा अनेक क्षणोंकी बातको भी जान सकते हैं ।
प्रत्यक्ष प्रमाणका फल प्रत्यक्ष ज्ञान है और ज्ञानका पदार्थके समान बन जाना ही
प्रमाण है । क्योंकि उसीसे पदार्थका ज्ञान होता है । (न्या० पृ० १६ की न० ३ की टिप्पणी)
द्वितीय परिच्छेद ।
आचार्य धर्मकीर्तिने जिस प्रकार प्रथम परिच्छेदमें प्रमाणका लक्षण किये बिना ही
उसके भेद कर डाले हैं उसी प्रकार यहाँ भी अनुमानका लक्षण किये बिना ही पहिले
अनुमानके स्वार्थानुमान और परार्थानुमान दो भेद किये हैं । हमारा अनुमान है कि
यह बात धर्मोत्तराचार्य को भी अवश्य खटकी थी किन्तु प्रथम परिच्छेद में उन्होंने
इसको प्रगट न करते हुए स्वयं ही प्रमाणका लक्षण कह दिया है । क्योंकि उसमें लक्षण
कहनेके लिये भेदवाले वाक्यसे पहिले एक और भी वाक्य था । किन्तु इस परिच्छेदमें
पहिले ही वाक्यसे भेद चल पड़े । यहाँ टीकाकारको अपनी खटक शंकाके रूपमें प्रगट
करनी ही पड़ी ( न्या० पृ० २१ पं० ४ ) किन्तु आगे चलकर उन्होंने इसका स्वयं ही
समाधान किया है कि भेदका कहना ही लक्षणका कहना है । क्योंकि दोनोंके लक्षण
बिलकुल पृथक् २ होनेसे उनका एक लक्षण सम्भव नहीं है । (न्या० पृ० २१ पं० ५ )
किन्तु युक्तिपूर्वक विचार करनेसे धर्मोत्तराचार्य की यह दलील कमजोर बैठती है ।
क्योंकि उन दोनोंके अत्यन्त पृथक् होते हुए भी अनुमानकी अपेक्षा तो उनमें एकता
ही है । आचार्य धर्मकीर्ति ने दोनों अनुमानोंके ये लक्षण किये हैं—
'तत्र स्वार्थं त्रिरूपाल्लिङ्गाद्यनुमेये ज्ञानं तदनुमानम्' । न्यायबिन्दु पृ० २१ 'त्रिरूप-
लिङ्गाख्यानं परार्थानुमानम्' न्यायबिन्दु पृ० ४६ ।
अर्थात् जो ज्ञान अनुमेयमें ( न्या० पृ० २४ ) त्रिरूपलिङ्गसे उत्पन्न होता है उसे
स्वार्थानुमान कहते हैं ।
४ न्या० भू०
तथा त्रिरूपलिङ्गका कहना परार्थानुमान है।
यद्यपि इन लक्षणोंसे स्वार्थानुमानका ज्ञानरूप तथा परार्थानुमान का वचन रूप
होना स्पष्ट है तथापि इन दोनोंका एक लक्षण हो सकता था । क्योंकि यद्यपि ये दोनों
ज्ञान तथा वचन रूप हैं तथापि दोनों ही त्रिरूपलिङ्गसे उत्पन्न होते हैं । अतएव आचार्य
धर्मकीर्ति अथवा धर्मोत्तर अनुमानका लक्षण 'त्रिरूपलिङ्गत्वमनुमानम्' कर सकते थे ।
जैसा कि प्राचीन न्यायके नये ग्रन्थ सिद्धान्तमुक्तावली, तर्कभाषा तथा तर्कसंग्रहकारने भी
किया है । इन सबने ही ज्ञानात्मक स्वार्थानुमान तथा वचनात्मक परार्थानुमान माना
है । तथापि 'लिङ्गपरामर्श' दोनोंमें समान होनेसे इन्होंने 'लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम्' अनु-
मानका लक्षण कहा है ।
जैनियोंका अनुमानका लक्षण इन सबसे अधिक परिष्कृत है । वह यह है—
'साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानम्' ( परीक्षामुखसूत्र उद्देश ३ सूत्र ९) अर्थात् साधन
या हेतुसे साध्यका ज्ञान होना अनुमान है । इसमें यह बात ध्यान रखने योग्य है कि
जैनी ज्ञानको ही अनुमान मानते हैं । परार्थानुमान भी उनके यहाँ ज्ञान रूप ही है ।
अन्तर दोनों अनुमानोंमें केवल इतना ही है कि स्वार्थानुमान बिना किसीके उपदेशके
अनुमाता ( अनुमान करने वाला ) स्वयं करता है । किन्तु परार्थानुमानका ज्ञान
अनुमाताको दूसरेके वचनसे होता है। आचार्य धर्मकीर्तिका भी परार्थानुमानसे सम्भवतः
यही आशय था किन्तु उस समय योग्य शब्द स्मरण न आनेसे वह सीधे आचार्य
दिङ्नागके पीछे ही चले गये । क्योंकि परार्थानुमानके लक्षणकी पुष्टिमें उन्होंने हेतु यह
दिया है 'कारणे कार्योपचारात्' (न्या० पृ० ६१)। अर्थात् यहाँ कारण 'वचन' में
कार्य 'ज्ञान' का उपचार कर लेनेसे वचन ही परार्थानुमान माना गया है ।
ऐसा विदित होता है कि अनुमानके स्वार्थ और परार्थभेद बौद्ध नैयायिकोंके
आविष्कार थे । क्योंकि न तो उनका सिद्धसेन दिवाकर ( लगभग ४८०-५५० ई०)
से पहिलेके जैन न्यायके ग्रन्थोंमें ही उल्लेख है और न न्याय दर्शनमें ही है । इसके
विरुद्ध न्याय दर्शनमें उसके और ही पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट नामके
तीन २ भेद उपलब्ध होते हैं ।
ऊपर न्यायबिन्दुकथित स्वार्थानुमानका लक्षण कहा जा चुका है । यदि सूक्ष्म
दृष्टिसे विचार किया जावे तो बौद्धोंका 'तत्र स्वार्थं त्रिरूपाल्लिङ्गाद्यदनुमेये ज्ञानं तदनुमानम्'
और जैनियों 'साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानम्' एक ही बात है । क्योंकि अनुमेय साध्य
होता ही है (न्या० पृ० २४ पं० १२) और त्रिरूपलिङ्ग भी हेतुके अतिरिक्त और
कुछ नहीं है । जैसा कि न्यायबिन्दुके बहुतसे स्थलोंसे प्रगट होता है । इसीलिये
स्वार्थानुमानके लक्षणके पश्चात् न्यायबिन्दुमें पक्षधर्मत्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षाद्व्या-
वृत्ति नामक त्रिरूपलिङ्गका वर्णन किया गया है। यदि विस्तारसे कहना हो तब तो
मध्यकालीन नैयायिकोंके समान इनमें अबाधितविषयत्व और असत्प्रतिपक्षत्व और
बढ़ाये जा सकते हैं किन्तु बौद्धोंने तीन ही रूप रखकर हेतुका कथन किया है । इस
भूमिका। २३
अवसर पर हमको फिर जैनियोंका हेतुका लक्षण स्मरण हो आता है जो इनसे अधिक
परिष्कृत, संक्षिप्त तथा युक्तिपूर्ण है। वह यह है—
'साध्याविनाभावित्वेन निश्चितो हेतुः' । ( परीक्षामुख उद्देश ३ सूत्र १५ । )
अर्थात् जिसका साध्य ( अनुमेय ) के साथ अविनाभावी सम्बन्ध निश्चित हो वह
हेतु होता है।
वास्तवमें विचार किया जावे तो त्रिरूपलिङ्ग अविनाभावनियम अथवा व्याप्तिके
अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
इस प्रकार न्यायबिन्दुकारने हेतुके लक्षणका वर्णन करके फिर उसके भेदोंका
वर्णन किया है। किन्तु उन बेचारोंको अपना अभिप्राय प्रगट करने योग्य पर्याप्त शब्द
यहाँ भी नहीं मिले हैं। क्योंकि कभी वह पक्षधर्मत्व आदिको त्रिरूपलिङ्ग कहते हैं तथा
कभी वह हेतुके भेद अनुपलब्धि, स्वभावलिङ्ग और कार्यलिङ्गको त्रिरूपलिङ्ग कहते हैं।
इसी मुसीबतमें पड़ जानेसे उन्होंने त्रिरूपलिङ्गको एक स्थानपर 'त्रैरूप्य' ( न्या०
पृ० २२ पं० ९ ) तथा दूसरे स्थान पर भेदोंको 'त्रिरूपलिङ्ग' कहा है ( न्या०
पृ० २५ पं० १४ )
अब थोड़ा विचार बौद्धोंके इन तीनों हेतुओं पर भी कर लें। प्राचीन नैयायिकोंने
तो हेतुके भेद करनेपर विशेष ध्यान ही नहीं दिया है। हाँ, जैन नैयायिकोंमें हेतुके भेद
बौद्धोंसे भी अधिक किये हैं। किन्तु विषयान्तर हो जानेसे हम यहाँ केवल बौद्धोंके ही
हेतुके भेदोंपर विचार करेंगे ।
यह पीछे दिखलाया जा चुका है कि बौद्धोंने हेतुके तीन भेद माने हैं—
स्वभाव, कार्य और अनुपलब्धि ।
जो पदार्थ उपलब्ध हैं वह अनुपलब्ध नहीं हो सकते अतएव उपलब्ध होना
पदार्थका स्वभाव है। स्वभाव लिङ्गमें पदार्थी की यह उपलब्धि ही हेतु रूपमें उपस्थित
की जाती है। जैसे—'यह वृक्ष है, क्योंकि यह शीशम है'
कार्यलिङ्ग अनुमेय ( साध्य ) के कार्यको देखकर उसकी उपलब्धिका अनुमान
करता है। जैसे किसीने धुवाँ देखकर कहा कि—'यहाँ अग्नि है क्योंकि यहाँ धुवाँ है।'
पदार्थका न मिलना अनुपलब्धि है। बौद्धोंने इसको भी हेतु माना है। जैसे—
देवदत्तको उसके घरमें अनुपस्थित देखकर कोई कहे—'देवदत्त घरमें नहीं है। क्योंकि
वह वहाँ अनुपलब्ध है।'
इन तीनों हेतुओंमेंसे स्वभाव और कार्य वस्तु की उपस्थिति और अनुपलब्धि
अनुपस्थितिको साधन करते हैं।
इसके पश्चात् कुछ इन हेतुओंका ही वर्णन करके अनुपलब्धिके भेद बतलाकर
द्वितीय परिच्छेद समाप्त किया गया है। अनुपलब्धिके भेदोंको हम विस्तारके भयसे
यहाँ नहीं लिख रहे हैं।
२४ भूमिका ।
तृतीय परिच्छेद ।
इस परिच्छेदमें परार्थानुमानका वर्णन है । आरम्भमें उसकी परिभाषा दी हुई है,
जिसका पीछे वर्णन कर आये हैं । इसके पश्चात् उसके साधर्म्यवत् और वैधर्म्यवत् दो
भेद बतलाकर स्वयं ही कह दिया है कि इनमें अर्थसे कोई भेद नहीं है केवल प्रयोगका
भेद है (न्या० पृ० ४७ पं० १७) । अतएव इन दोनोंके विषयमें हम यहाँ कुछ नहीं लिखेंगे ।
इन दोनों ही प्रयोगोंमें पक्षका अवश्य ही निर्देश किया जाना चाहिये । अतएव
परार्थानुमानके भेदोंके पश्चात् पक्षका वर्णन किया गया है । जो कि लगभग सभी
न्यायोंमें एक ही प्रकारसे कहा गया है । यहाँ सामान्यरूपसे परार्थानुमानका वर्णन
समाप्त हो गया है ।
इसके पश्चात् हेत्वाभासोंका वर्णन है । यह पीछे बतलाया जा चुका है कि बौद्ध
हेतुमें पक्षधर्मत्व आदि तीन बातोंका होना आवश्यक मानते हैं । अतएव उन तीनों
रूपोंमेंसे एक भी रूपके न होने अथवा संदिग्ध होनेपर हेत्वाभास हो जाता है । अतएव
त्रिरूपलिङ्ग माननेसे बौद्धोंको तीन ही हेत्वाभास भी मानने पड़े हैं । जो कि ये हैं—
असिद्ध, विरुद्ध और अनैकान्तिक ।
पीछे दिखलाया जा चुका है कि मध्यकालीन नैयायिक हेतुमें पाँच बातोंका होना
आवश्यक मानते थे । अतएव उनके मतके अनुसार इन्हीं तीनमें बाधितविषय और
सत्प्रतिपक्ष ये दो और जोड़ देनेसे पाँच हेत्वाभास होते हैं ।
न्याय दर्शनमें सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम, साध्यसम और कालातीत ये पाँच
हेत्वाभास माने हैं, जो कि ऊपर वालोंसे अविरुद्ध ही हैं ।
जैनियोंने असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक और अकिञ्चित्कर ये चार हेत्वाभास माने
हैं । जिनमें अकिञ्चित्कर हेत्वाभास नया हेत्वाभास है ।
न्यायबिन्दुमें इनके भेद प्रभेद भी बहुतसे दिखलाये हैं जो अन्य नैयायिकोंसे
विशेष भिन्न नहीं है ।
हेत्वाभासोंके पश्चात् दृष्टान्त और दृष्टान्ताभासोंका वर्णन है ।
(८) न्यायबिन्दुमें अन्य दर्शनोंके सिद्धान्त ।
हम पीछे बतला आये हैं कि आरम्भिक बौद्धन्यायपर गौतमीय न्यायकी पूरी
छाप लगी हुई है । न्यायबिन्दुको देखनेसे पता चलता है कि वह छाप इतनी पक्की हो
गई थी कि धर्मकीर्ति भी उसकी उपेक्षा न कर सके । और इसी कारणसे उन्होंने ग्रन्थ
समाप्त करते २ विशेष आवश्यक न होनेपर भी दूषण, जाति और जात्युत्तरका थोड़ा
सा वर्णन कर ही डाला । इनमें से जाति न्यायदर्शनका एक मुख्य विषय है । न्याय-
बिन्दु की समालोचनाको समाप्त करते हुए इतना लिख देना और आवश्यक प्रतीत होता
है कि न्यायबिन्दु पद्य तो है ही नहीं, किन्तु यह सूत्र या वार्तिक भी नहीं है । सूत्र
किसी अपेक्षासे इसको कह भी सकते हैं । किन्तु लेखके बीचमें संख्या इत्यादिका
भूमिका । २५
बिलकुल अभाव होनेसे इसको सूत्र समझना भी कठिन है । हमारी सम्मतिमें यह
बौद्ध न्यायके ऊपर एक स्वतन्त्र निबन्ध है जो कि विचारकर ऐसे ढंगसे लिखा गया है
कि उसका प्रत्येक वाक्य सूत्र सा प्रतीत होता है ।
न्यायबिन्दु टीकामें पृष्ठ ५२ पं० २३ में 'तस्यैवेति' पाठ है किन्तु उसका मूल
उपलब्ध नहीं है । यद्यपि 'तस्यैव' को अगले वाक्यमें मिला देनेसे वह वाक्य ( तस्यैव
तत्स्वभावत्वात्स्वभावस्य च हेतुत्वात् ) पूरा हो जाता है तथापि चित्तमें यह खटका
बना ही रहता है कि न जाने और कहाँ २ पाठ छूट गया हो ।
न्यायबिन्दुसे प्रगट होता है कि आचार्य धर्मकीर्ति और धर्मोत्तर दोनों अन्य
भारतीय दर्शनोंके भी धुरन्धर विद्वान् थे । क्योंकि दृष्टान्ताभासके वर्णन तथा अन्य ऐसे
ही स्थलों पर उन्होंने थोड़े २ शब्दोंमें अन्य दर्शनोंके सिद्धान्तोंका अच्छा वर्णन किया है ।
आचार्य धर्मकीर्तिने न्यायबिन्दु पृ० ९८ पं० १५ तथा पृ० १०० पं० ७ में
जैनियोंके तीर्थंकर ऋषभका उल्लेख दोनों स्थल पर तथा वर्धमानका उल्लेख प्रथम
स्थलपर किया है । इससे प्रगट होता है कि उनके समय आठवीं शताब्दीमें भी जैनेतर
विद्वान् जैनधर्मका प्रथम उपदेश देनेवाला भगवान् ऋषभदेवको ही समझते थे न कि
भगवान् वर्धमानको । जैनधर्मका प्रथम उपदेष्टा भगवान् महावीर या पार्श्वनाथको कहने
की धारणा पाश्चात्य ऐतिहासिकोंके ही मस्तिष्ककी उपज विदित होती है ।
( ६ ) न्यायबिन्दु की टीकाएँ ।
न्यायबिन्दु जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ है वैसी ही प्रचुर संख्यामें इसकी टीकायें नहीं मिलतीं ।
यद्यपि टीकायें इसकी भी कम नहीं बनीं तथापि उनमेंसे अधिकांशका मूल संस्कृत
लुप्त हो गया है, केवल उनका तिब्बी अनुवाद शेष है । न्यायबिन्दुकी निम्नलिखित
टीकायें बनी हैं—
१—न्यायबिन्दुपिण्डार्थ—आचार्य जिनमित्र ( लगभग १०२५ ई० ) कृत । इसमें
न्यायबिन्दु का सारांश है ।
२—न्यायबिन्दुपूर्वपक्ष संक्षिप्त—आचार्य कमलशील ( लगभग ७५० ई० ) कृत
इसमें न्यायबिन्दु की समालोचनाओंका संक्षेप है ।
३—धर्मोत्तरटिप्पणक-श्वेताम्बर जैन आचार्य मल्लवादिन् ( लगभग ८२७ ई० )
कृत । धर्मोत्तरकृत न्यायबिन्दु टीका की टीका । यह अनहिलवाड़ा पाटनमें ताड़पत्र पर
लिखी हुई रखी है ।
४—न्यायबिन्दुटीका—आचार्य विनीतदेव ( लगभग ७०० ई० ) कृत, यह
न्यायबिन्दुके ऊपर विस्तृत टीका है ।
५—न्यायबिन्दुटीका-आचार्य धर्मोत्तर ( लगभग ८४७ ई० ) कृत । यह पाठकोंके
हाथोंमें विद्यमान है । यह भी न्यायबिन्दुके ऊपर विस्तृत टीका है ।
२६ भूमिका।
(१०) न्यायबिन्दुमें बौद्धदर्शनके सिद्धान्त।
यद्यपि न्यायबिन्दु विशुद्ध न्यायका ही ग्रन्थ है तथापि प्रसङ्गवश कहीं २
आचार्यने उसमें ऐसे वाक्य भी लिखे हैं जिनसे बौद्ध सिद्धान्तोंकी बहुत कुछ झलक
मिलती है। हमने ऐसे वाक्योंको यथाशक्ति प्रयत्न करके न्यायबिन्दुमें से निकाला है
और उनके अन्दरसे हमारी सम्मतिमें जो दार्शनिक सिद्धान्त निकाले जा सकते हैं उनको
नीचे दिया है—
(१) जहाँ सांख्य सत्से सत् की उत्पत्ति मानता है वहाँ बौद्ध असत्की उत्पत्ति
और सत्का निरन्वय विनाश मानता है। जैसा कि कहा है—
‘परस्य चासत उत्पाद उत्पत्तिमत्त्वम् । सतश्च निरन्वयो विनाशोऽनित्यत्वं सिद्धम्’ ।
(न्या० पृ० ६९ पं० १४)
(२) बौद्धोंने विज्ञान, इन्द्रिय और आयुके निरोधको ही मरण माना है। जैसा
कि धर्मकीर्तिने कहा है—
‘विज्ञानेन्द्रियायुर्निरोधलक्षणस्य मरणस्यानेनाभ्युपगमात्’ । (न्या० पृ० ६८ पं० १०)
(३) बौद्धदर्शन वृक्षोंमें विज्ञान आदिका सद्भाव नहीं मानता। अतएव मरने या
जीनेका उनमें विकल्प ही नहीं है—
‘तस्य च विज्ञानादिनिरोधात्मकस्य तरुष्वसंभवात्’ । (न्या० पृ० ६८ पं० १९)
(४) बौद्ध सुख आदिको अचेतन मानते हैं। जैसा कि धर्मकीर्ति के निम्नलिखित
वाक्यसे प्रगट होता है—
‘अचेतनाः सुखादय इति साध्य उत्पत्तिमत्त्वमनित्यत्वं वा सांख्यस्य स्वयं वादिनोऽ-
सिद्धम्’ । (न्या० पृ० ६७ पं० ७)
(५) बौद्ध आत्माको नहीं मानता। जैसा कि टीकामें कहा गया है—
‘तदिह बौद्धस्यात्मैव न सिद्धः’ । (पृ० ७१ पं० ५) तथा ‘बौद्धेनोक्तं नास्त्यात्मा’ ।
(पृ० ६३ पं० १२)
(६) पीछे बतला दिया है कि बौद्ध दर्शन विज्ञान, इन्द्रिय और आयुके निरोध
को मरण मानता है किन्तु आत्माको नहीं मानता। यहाँ यह शङ्का होती है कि जब
आत्मा ही नहीं है तो मरण किसका होता है। उसका समाधान यह है कि बौद्ध
वास्तवमें मरण नहीं मानता किन्तु निरोध (रुकना) मानता है। बौद्ध प्राण आदिको
मानता है किन्तु अनात्मवादी होनेसे न तो उनको सात्मक ही मानता है और न निरा-
त्मक ही मानता है। जब तक विज्ञान आदि शरीरमें रहते हैं तब तक शरीर जीता है
जब नहीं रहते तो मर जाता है। इसलिये प्राण आदि जीवित शरीर सम्बन्धी हैं।
जैसा कि धर्मकीर्तिने कहा है—
‘सात्मकत्वेन निरात्मकत्वेन वा प्रसिद्धे प्राणोदरसिद्धिः’ । (पृ० ८३ पं० २) ।
तथा ‘तस्माज्जीवच्छरीरसम्बन्धी प्राणादिः’ । (पृ० ८३ पं० ७)
भूमिका । २७
(७) कर्मको अन्य दर्शनकारोंके समान बौद्धने भी अनित्य ही माना है। जैसा कि टीकामें कहा है—
'साध्यविकलं कर्म तस्यानित्यत्वात्' (पृ० ९५ पं० १)
(८) परमाणुको बौद्ध भी मूर्त मानता है। जैसा कि टीकामें कहा है—
'असर्वगतं द्रव्यपरिमाणं मूर्तिः । असर्वगताश्च द्रव्यरूपाश्च परमाणवः । (पृ० ९५ पं० ३)
(९) घटको अनित्य भी माना है और मूर्त भी माना है। जैसा कि कहा है—
( घटस्तूभयविकलः । अनित्यत्वान्मूर्तत्वाच्च घटस्ये'त । (पृ० ९५ पं० ४)
(१०) बौद्ध दर्शनमें जो पदार्थ विद्यमान हैं वे सब अनित्य हैं। जैसा कि धर्मकीर्तिने कहा है—
'यत्सत्तत्सर्वमनित्यं यथा घटादिरिति' । (पृ० ४९ पं० १५)
(११) बौद्ध दर्शनमें साध्य और साधनको बिल्कुल अभिन्न मानकर उनका तादात्म्य सम्बन्ध माना है। उनमें भेद समारोप जनित है। जैसा कि कहा है—
'साध्यसाधनयोस्तादात्म्यम् । समारोपितस्तु साध्यसाधनयोर्भेदः' । (पृ० ५३ पं० ११)
हमने न्यायबिन्दुके उपरोक्त वाक्योंमें से स्थूल सिद्धान्तोंको ही निकाला है। सूक्ष्म सिद्धान्तोंको निकालनेका काम अपने लिये असाध्य समझकर विशेष विद्वानोंके लिये छोड़ दिया है।
धन्यवाद ।
इस भूमिकाको समाप्त करनेके पूर्व मुझे एक और कर्तव्यका पालन करना है। सबसे प्रथम मुझे डाक्टर सतीशचन्द्रजी विद्याभूषणको धन्यवाद देना है जिनकी पुस्तकसे मैं इस भूमिकामें ऐतिहासिक अंश देनेमें सफल हुआ हूँ। यद्यपि हमने इस विषयके अन्य भी कई ग्रन्थ देखे, किन्तु उनसे कुछ भी विशेष लाभ न हो सका।
दूसरे मुझे हिन्दू विश्वविद्यालयके फिलासफीके प्रोफेसर तथा सहायक रजिस्ट्रार पं० इन्द्रदेव जी तिवारी एम० ए० को देना है जिनसे मुझको समय २ पर योग्य सम्मति तथा अनेक प्रकारकी सहायता मिली है। वास्तवमें आपकी सहायताके बिना मेरा काम अत्यन्त गुरुतर हो जाता। गवर्नमेन्ट संस्कृत कालेजके प्रिंसिपल तथा संस्कृत परीक्षाओंके रजिस्ट्रार पं० गोपीनाथजी कविराज एम० ए० की सहायता का तो मैं अत्यन्त आभारी हूँ, जिन्होंने अपने अमूल्य समयको नष्टकर मुझे विविध प्रकारकी सहायता दी है।
भदैनी, बनारस } चन्द्रशेखर शास्त्री ।
दि० २८ जून १९२४ ई० । } काव्यसाहित्यतीर्थाचार्य ।
द्वितीय संस्करण की भूमिका
भारत में बौद्ध विषयक ग्रन्थों के सम्बन्ध में जनता की रुचि का पता इस तथ्य
से भली प्रकार लगता है कि इस ग्रन्थ के द्वितीय संस्करण का उत्थान सन् १९२४ के
पश्चात् आज ३० वर्ष की लम्बी अवधि के उपरान्त आया है । यद्यपि यह ग्रंथ कई
विश्वविद्यालयों के एम० ए० तथा संस्कृत की अनेक स्नातकोत्तर परीक्षाओं का पाठ्य
ग्रन्थ है, किन्तु संभवतः विद्यार्थियों के अतिरिक्त अन्य विद्वानों ने इसमें अधिक रुचि प्रकट
नहीं की । इसको देश के दुर्भाग्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझा जा सकता ।
न्यायबिन्दु के १९२४ में प्रकाशित होने के उपरान्त विद्वानों ने बौद्धन्याय के
सम्बन्ध में पर्याप्त खोज की भारत के कुछ विद्वानों ने तिब्बत के प्राचीन ग्रन्थ भण्डारों
में जाकर तिब्बती में लिखे हुए संस्कृत ग्रन्थों के अन्वेषण में अपना सारा जीवन लगा
दिया । इस खोज के फलस्वरूप आचार्य धर्मकीर्ति के कुछ अन्य न्याय ग्रन्थों का
अपने मूल संस्कृतरूप में पता लग गया । धर्मकीर्ति के अतिरिक्त अन्य भी अनेक
बौद्ध आचार्यों के ग्रन्थों का अपने मूल संस्कृतरूप में पता लग चुका है ।
प्राचीन भारतीय वाङ्मय की इस महत्त्वपूर्ण खोज के फलस्वरूप पटना की बिहार
रिसर्च सोसाइटी ने बौद्धन्याय के निम्नलिखित संस्कृत ग्रन्थों को प्रकाशित किया है—
१. प्रमाणवार्तिक—यह आचार्य धर्मकीर्ति की रचना अपने मूल संस्कृत
रूप में छपी है ।
२. वादन्याय अथवा तर्कन्याय—भी धर्मकीर्ति का ग्रन्थ है ।
३. प्रमाणवार्तिकवृत्ति—इसकी रचना मनोरथनन्दी ने की है ।
४. प्रमाणवार्तिकभाष्य—इसकी रचना प्रज्ञाकर गुप्त ने की है बिहार रिसर्च
सोसाइटी के जर्नल में ।
५. धर्मकीर्ति का प्रमाणवार्तिक स्ववृत्ति टीका भी प्रकाशित हुई है । इसकी रचना
कर्णकगोमी ने की है । बाद में इसको प्रयाग के किताबमहल ने प्रकाशित किया ।
पटना से रत्नकीर्ति के अन्य भी अनेक न्यायनिबन्धों के प्रकाशित होने की आशा
है । वहां ज्ञानश्रीमित्र के न्यायग्रन्थों का संपादन तथा प्रकाशन करने का भी
आयोजन किया जा रहा है ।
इसके अतिरिक्त गायकवाड़ ओरिएंटल सीरीज़ में हेतुबिन्द टीका अपनी अनुटीका
सहित छपी है ।
इन ग्रन्थों को प्रकाश में लाने का बहुत कुछ श्रेय महापण्डित राहुल सांकृत्या-
यन को है ।
इस प्रकार यद्यपि विशेष विद्वान् बौद्धन्याय के सम्बन्ध में अधिकाधिक खोज करते
जाते हैं, किन्तु जनता की उनमें पर्याप्त रुचि नहीं होती । स्वाधीन भारत के नागरिकों
को गंभीर अध्ययन के क्षेत्र में अपने दृष्टिकोण को अत्यधिक उदार बनाना चाहिये ।
४५६६ बाजार पहाड़गंज
नई दिल्ली-१ ❭ चन्द्रशेखर शास्त्री
दनांक १९ अगस्त १९५४ ई० /
न्यायबिन्दु-विषयानुक्रमणिका
प्रथमः परिच्छेदः।
विषयः पृष्ठं पंक्तिः
मङ्गलाचरणम् ... १ ४
ग्रन्थस्याभिधेयप्रयोजनम् ... ,, ६
अभिधेयादीनामावश्यकताप्रदर्शनम् ... ३ ११
सम्यग्ज्ञानस्य लक्षणम् ... ४ ६
प्रमाणसामान्यवर्णनम् ... ,, १३
सम्यग्ज्ञानस्य द्वैविध्यम् ... ७ ११
प्रत्यक्षलक्षणम् ... ८ १६
कल्पनाया लक्षणम् ... १० ६
प्रत्यक्षस्य चातुर्विध्यम् ... १२ २०
इन्द्रियज्ञानम् ... ,, २१
मनोविज्ञानम् ... १३ ३
स्वसंवेदनप्रत्यक्षम् ... १४ ५
योगिप्रत्यक्षम् ... ,, २०
प्रत्यक्षस्य विषयः ... १५ ,,
स्वलक्षणम् ... १६ १०
परमार्थसत् ... १७ ३
सामान्यलक्षणम् ... ,, १८
अनुमानस्य विषयः ... १८ ४
प्रमाणफलम् ... ,, १०
प्रमाणम् ... ,, २२
४॥ न्या०
[ २ ]
द्वितीयः परिच्छेदः ।
विषयः पृष्ठं पंक्तिः
अनुमानस्य द्वैविध्यम् ... २१ २
स्वार्थानुमानम् ... " १५
अनुमानस्य फलम् ... " २३
त्रैरूप्यम् ... २२ ६
पक्षधर्मत्वम् ... " १२
सपक्षसत्त्वम् ... २३ ३
विपक्षाद्व्यावृत्तिः ... " १२
अनुमेयः ... २४ "
सपक्षः ... " १७
असपक्षः ... २५ ५
त्रिरूपलिङ्गानि ... " १४
अनुपलब्धिः ... " २१
उपलब्धिलक्षणप्राप्तिः ... २६ २
स्वभावविशेषः ... २७ "
कार्यस्योदाहरणम् ... २८ १६
त्रिरूपलिङ्गानामेव हेतुत्वम् ... २९ १६
स्वभावकार्ययोरेव तादात्म्यतदुत्पत्ती ... ३१ २१
दृश्यानुपलब्धिः ... ३३ ९
अनुपलब्धेः प्रकारभेदप्रदर्शनम् ... ३५ १९
स्वभावानुपलब्धिः ... " १६
कार्यानुपलब्धिः ... ३६ १
व्यापकानुपलब्धिः ... " २३
स्वभावविरुद्धोपलब्धिः ... ३७ १०
विरुद्धकार्योपलब्धिः ... " १६
विरुद्धव्याप्तोपलब्धिः ... ३८ १
कार्यविरुद्धोपलब्धिः ... ३९ ३
व्यापकविरुद्धोपलब्धिः ... " १२
[ ३ ]
विषयः पृष्ठं पंक्तिः
कारणानुपलब्धिः ... ३६ २१
कारणविरुद्धोपलब्धिः ... ४० ७
कारणविरुद्धकार्योपलब्धिः ... ,, २१
तासां स्वभावानुपलब्धावन्तर्भावः ... ४१ १३
विप्रकृष्टविषयानुपलब्धिः ... ४४ २१
──-००:०:००-──
तृतीयः परिच्छेदः।
परार्थानुमानस्य लक्षणम् ... ४६ २
तस्य द्वैविध्यम् ... ४७ ,,
साधर्म्यवत् ... ,, ८
स्वभावहेतोः प्रयोगः ... ४८ १४
शुद्धस्य स्वभावहेतोः प्रयोगः ... ,, २२
स्वभावभूतधर्मभेदेन स्वभावस्य प्रयोगः ... ५० ६
कृतकत्वम् ... ५१ १
प्रत्ययभेदभेदित्वादयः ... ,, १२
साध्यधर्मः साधनस्य स्वभावः ... ५२ १
तस्मिन्नेव विषये हेतुः ... ५३ ,,
तस्य प्रतिज्ञातैकदेशहेतुत्वस्य परिहारः ... ,, ६
कार्यहेतोः प्रयोगः ... ५४ ,,
वैधर्म्यवतः प्रयोगः ... ,, २२
स्वभावहेतोर्वैधर्म्यप्रयोगः ... ५५ १३
कार्यहेतोर्वैधर्म्यप्रयोगः ... ,, २२
साधर्म्येणापि प्रयोगेऽर्थाद्वैधर्म्यगतिः ... ५६ ५
वैधर्म्येणाप्यन्वयगतिः ... ,, १६
स्वभावप्रतिबन्धस्य द्वैविध्यम् ... ५७ ३
पक्षस्य लक्षणम् ... ६० १०
प्रत्यक्षनिराकृतः ... ६३ २२
अनुमाननिराकृतः ... ६४ ६
[ ४ ]
विषयः पृष्ठं पंक्तिः
प्रतीतिनिराकृतः ... ६४ ११
स्ववचननिराकृतः ... ,, २४
हेत्वाभासः ... ६७ १४
असिद्धहेत्वाभासः ... ,, १५
संदिग्धासिद्धः ... ६९ २१
स्वात्मना संदिह्यमानः ... ७० २
आश्रयणसिद्धः ... ,, ११
धर्मिणः सिद्धावप्यसिद्धः ... ,, २३
अनैकान्तिको हेत्वाभासः ... ७१ १०
अविकलकारणस्य भवतोऽन्यभावो नाम प्रथमो विरोधः ... ७४ ४
परस्परपरिहारस्थितलक्षणता नाम द्वितीयो विरुद्धः ... ७५ २१
विरुद्धहेत्वाभासः ... ७८ १०
दिङ्नागेनाभ्युपगत इष्टविघातकृद्विरुद्धः ... ७९ ६
धर्मकीर्तिना तस्य निराकरणम् ... ८० ६
संदिग्धोऽन्वयः ... ८१ ४
दिङ्नागेनाभ्युपगतो विरुद्धाव्यभिचारी हेतुः ... ८६ ३
तस्य धर्मकीर्तिना निराकरणम् ... ,, १०
विरुद्धाव्यभिचारिण्युदाहरणम् ... ८८ ८
अस्य स्वभावहेतुत्वम् ... ,, २२
दिङ्नागेनाभ्युपगतस्य दृष्टान्तस्य साधना- ...
वयवत्वस्य निराकरणम् ... ९१ १
दृष्टान्ताभासाः ... ९४ १७
दूषणा ... १०३ ४
जातयः ... ,, १८
जात्युत्तराणि ... ,, २३
टीकाकारकृतमन्तिममङ्गलम् ... १०४ ४
ग्रन्थसमाप्तिः ... ,, ७
—००:०:००—
नमः सर्वज्ञाय
न्यायबिन्दुः
प्रथमपरिच्छेदः
जयन्ति(१) ज्ञातिव्यसनप्रबन्धप्रसूतिहेतोर्जगतो विजेतुः ।
रागाद्यरातेः सुगतस्य वाचो मनस्तमस्तानवमादधानाः ॥
सम्यग्ज्ञानपूर्विकेत्योदिनास्य प्रकरणस्याभिधेयप्रयोजनमुच्यते—
सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्वपुरुषार्थसिद्धिरिति तद् व्युत्पाद्यते ।
(१) तत्र विदुषामग्रणीः श्रीधर्मोत्तराचार्यः न्यायविन्दुं व्याचिख्यासुः प्रारिप्सितग्रन्थस्य
निर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थं शिष्टाचारपरिपालनार्थं वा स्वमतं स्थापयन् भगवतो बुद्धस्य गुणसं-
स्तवनं करोति । ‘जयन्ति’ इत्यादिना । सुगतस्य भगवतो बुद्धस्य वाचः वाण्यः जयन्ति ।
कथम्भूतस्य बुद्धस्येत्यत आह-जातीनाम् प्राणिसामान्यानां । ‘जातिर्जातञ्च सामान्यम्’
इत्यमरः । व्यसनस्य विपदः ‘व्यसनं विपदि भ्रंशे दोषे कामजकोपजे’ इत्यमरः।
प्रबन्धस्य सन्दर्भस्य परम्परायाः इत्यर्थः । या प्रसूतिः श्च्योतः क्षरणं नाश इत्यर्थः ।
‘प्रसूतिः प्रसवे श्च्योते’ इत्यमरः । तस्या हेतुः कारणभूतस्तस्य । एतेन संसारस्य दुःख-
मयत्वं बुद्धस्य तद्विनाशे कारणत्वञ्च प्रदर्शितम् । जगतः संसारस्य विजेतुः जयकर्त्तुस्त-
स्मिन्ननासक्तस्येत्यर्थः । एतेन बुद्धस्य सर्वसंसारसम्बन्धिविकारेषु जयित्वं जगतस्तरणत्वञ्च
सूचितम् । रागादीनाम् रागद्वेषलोभमोहादिसंसारसम्बन्धिभावानामरातिश्शत्रुस्तस्य । एतेन
तस्य वीतरागत्वं द्योतितम् । एतादृशः सुगतस्य बुद्धस्य वाचः जयन्ति । कथम्भूता वाचः
इत्यत आह-मनः इत्यादि । मनसो यत्तमस्तस्य तानवं तनोः भावस्तं कार्श्यमादधानाः
सम्पादयन्त्यः । एतेन बुद्धस्य वाचि ज्ञानप्रदत्वं प्रकटीकृतम् ।
सौगताः ‘बुद्धः परमेश्वरस्यावतार’ इति नाभिमन्यन्ते । किन्तु तेषां मते सर्वसंसारि-
१ ‘सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्व्वेत्यादिना’ इति पाठान्तरम् ‘क’ पुस्तके ।