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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

भूमिका । २७
(७) कर्मको अन्य दर्शनकारोंके समान बौद्धने भी अनित्य ही माना है। जैसा कि टीकामें कहा है—
'साध्यविकलं कर्म तस्यानित्यत्वात्' (पृ० ९५ पं० १)
(८) परमाणुको बौद्ध भी मूर्त मानता है। जैसा कि टीकामें कहा है—
'असर्वगतं द्रव्यपरिमाणं मूर्तिः । असर्वगताश्च द्रव्यरूपाश्च परमाणवः । (पृ० ९५ पं० ३)
(९) घटको अनित्य भी माना है और मूर्त भी माना है। जैसा कि कहा है—
( घटस्तूभयविकलः । अनित्यत्वान्मूर्तत्वाच्च घटस्ये'त । (पृ० ९५ पं० ४)
(१०) बौद्ध दर्शनमें जो पदार्थ विद्यमान हैं वे सब अनित्य हैं। जैसा कि धर्मकीर्तिने कहा है—
'यत्सत्तत्सर्वमनित्यं यथा घटादिरिति' । (पृ० ४९ पं० १५)
(११) बौद्ध दर्शनमें साध्य और साधनको बिल्कुल अभिन्न मानकर उनका तादात्म्य सम्बन्ध माना है। उनमें भेद समारोप जनित है। जैसा कि कहा है—
'साध्यसाधनयोस्तादात्म्यम् । समारोपितस्तु साध्यसाधनयोर्भेदः' । (पृ० ५३ पं० ११)
हमने न्यायबिन्दुके उपरोक्त वाक्योंमें से स्थूल सिद्धान्तोंको ही निकाला है। सूक्ष्म सिद्धान्तोंको निकालनेका काम अपने लिये असाध्य समझकर विशेष विद्वानोंके लिये छोड़ दिया है।
धन्यवाद ।
इस भूमिकाको समाप्त करनेके पूर्व मुझे एक और कर्तव्यका पालन करना है। सबसे प्रथम मुझे डाक्टर सतीशचन्द्रजी विद्याभूषणको धन्यवाद देना है जिनकी पुस्तकसे मैं इस भूमिकामें ऐतिहासिक अंश देनेमें सफल हुआ हूँ। यद्यपि हमने इस विषयके अन्य भी कई ग्रन्थ देखे, किन्तु उनसे कुछ भी विशेष लाभ न हो सका।
दूसरे मुझे हिन्दू विश्वविद्यालयके फिलासफीके प्रोफेसर तथा सहायक रजिस्ट्रार पं० इन्द्रदेव जी तिवारी एम० ए० को देना है जिनसे मुझको समय २ पर योग्य सम्मति तथा अनेक प्रकारकी सहायता मिली है। वास्तवमें आपकी सहायताके बिना मेरा काम अत्यन्त गुरुतर हो जाता। गवर्नमेन्ट संस्कृत कालेजके प्रिंसिपल तथा संस्कृत परीक्षाओंके रजिस्ट्रार पं० गोपीनाथजी कविराज एम० ए० की सहायता का तो मैं अत्यन्त आभारी हूँ, जिन्होंने अपने अमूल्य समयको नष्टकर मुझे विविध प्रकारकी सहायता दी है।
भदैनी, बनारस } चन्द्रशेखर शास्त्री ।
दि० २८ जून १९२४ ई० । } काव्यसाहित्यतीर्थाचार्य ।