न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथा त्रिरूपलिङ्गका कहना परार्थानुमान है।
यद्यपि इन लक्षणोंसे स्वार्थानुमानका ज्ञानरूप तथा परार्थानुमान का वचन रूप
होना स्पष्ट है तथापि इन दोनोंका एक लक्षण हो सकता था । क्योंकि यद्यपि ये दोनों
ज्ञान तथा वचन रूप हैं तथापि दोनों ही त्रिरूपलिङ्गसे उत्पन्न होते हैं । अतएव आचार्य
धर्मकीर्ति अथवा धर्मोत्तर अनुमानका लक्षण 'त्रिरूपलिङ्गत्वमनुमानम्' कर सकते थे ।
जैसा कि प्राचीन न्यायके नये ग्रन्थ सिद्धान्तमुक्तावली, तर्कभाषा तथा तर्कसंग्रहकारने भी
किया है । इन सबने ही ज्ञानात्मक स्वार्थानुमान तथा वचनात्मक परार्थानुमान माना
है । तथापि 'लिङ्गपरामर्श' दोनोंमें समान होनेसे इन्होंने 'लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम्' अनु-
मानका लक्षण कहा है ।
जैनियोंका अनुमानका लक्षण इन सबसे अधिक परिष्कृत है । वह यह है—
'साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानम्' ( परीक्षामुखसूत्र उद्देश ३ सूत्र ९) अर्थात् साधन
या हेतुसे साध्यका ज्ञान होना अनुमान है । इसमें यह बात ध्यान रखने योग्य है कि
जैनी ज्ञानको ही अनुमान मानते हैं । परार्थानुमान भी उनके यहाँ ज्ञान रूप ही है ।
अन्तर दोनों अनुमानोंमें केवल इतना ही है कि स्वार्थानुमान बिना किसीके उपदेशके
अनुमाता ( अनुमान करने वाला ) स्वयं करता है । किन्तु परार्थानुमानका ज्ञान
अनुमाताको दूसरेके वचनसे होता है। आचार्य धर्मकीर्तिका भी परार्थानुमानसे सम्भवतः
यही आशय था किन्तु उस समय योग्य शब्द स्मरण न आनेसे वह सीधे आचार्य
दिङ्नागके पीछे ही चले गये । क्योंकि परार्थानुमानके लक्षणकी पुष्टिमें उन्होंने हेतु यह
दिया है 'कारणे कार्योपचारात्' (न्या० पृ० ६१)। अर्थात् यहाँ कारण 'वचन' में
कार्य 'ज्ञान' का उपचार कर लेनेसे वचन ही परार्थानुमान माना गया है ।
ऐसा विदित होता है कि अनुमानके स्वार्थ और परार्थभेद बौद्ध नैयायिकोंके
आविष्कार थे । क्योंकि न तो उनका सिद्धसेन दिवाकर ( लगभग ४८०-५५० ई०)
से पहिलेके जैन न्यायके ग्रन्थोंमें ही उल्लेख है और न न्याय दर्शनमें ही है । इसके
विरुद्ध न्याय दर्शनमें उसके और ही पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट नामके
तीन २ भेद उपलब्ध होते हैं ।
ऊपर न्यायबिन्दुकथित स्वार्थानुमानका लक्षण कहा जा चुका है । यदि सूक्ष्म
दृष्टिसे विचार किया जावे तो बौद्धोंका 'तत्र स्वार्थं त्रिरूपाल्लिङ्गाद्यदनुमेये ज्ञानं तदनुमानम्'
और जैनियों 'साधनात्साध्यविज्ञानमनुमानम्' एक ही बात है । क्योंकि अनुमेय साध्य
होता ही है (न्या० पृ० २४ पं० १२) और त्रिरूपलिङ्ग भी हेतुके अतिरिक्त और
कुछ नहीं है । जैसा कि न्यायबिन्दुके बहुतसे स्थलोंसे प्रगट होता है । इसीलिये
स्वार्थानुमानके लक्षणके पश्चात् न्यायबिन्दुमें पक्षधर्मत्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षाद्व्या-
वृत्ति नामक त्रिरूपलिङ्गका वर्णन किया गया है। यदि विस्तारसे कहना हो तब तो
मध्यकालीन नैयायिकोंके समान इनमें अबाधितविषयत्व और असत्प्रतिपक्षत्व और
बढ़ाये जा सकते हैं किन्तु बौद्धोंने तीन ही रूप रखकर हेतुका कथन किया है । इस