न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय संस्करण की भूमिका
भारत में बौद्ध विषयक ग्रन्थों के सम्बन्ध में जनता की रुचि का पता इस तथ्य
से भली प्रकार लगता है कि इस ग्रन्थ के द्वितीय संस्करण का उत्थान सन् १९२४ के
पश्चात् आज ३० वर्ष की लम्बी अवधि के उपरान्त आया है । यद्यपि यह ग्रंथ कई
विश्वविद्यालयों के एम० ए० तथा संस्कृत की अनेक स्नातकोत्तर परीक्षाओं का पाठ्य
ग्रन्थ है, किन्तु संभवतः विद्यार्थियों के अतिरिक्त अन्य विद्वानों ने इसमें अधिक रुचि प्रकट
नहीं की । इसको देश के दुर्भाग्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझा जा सकता ।
न्यायबिन्दु के १९२४ में प्रकाशित होने के उपरान्त विद्वानों ने बौद्धन्याय के
सम्बन्ध में पर्याप्त खोज की भारत के कुछ विद्वानों ने तिब्बत के प्राचीन ग्रन्थ भण्डारों
में जाकर तिब्बती में लिखे हुए संस्कृत ग्रन्थों के अन्वेषण में अपना सारा जीवन लगा
दिया । इस खोज के फलस्वरूप आचार्य धर्मकीर्ति के कुछ अन्य न्याय ग्रन्थों का
अपने मूल संस्कृतरूप में पता लग गया । धर्मकीर्ति के अतिरिक्त अन्य भी अनेक
बौद्ध आचार्यों के ग्रन्थों का अपने मूल संस्कृतरूप में पता लग चुका है ।
प्राचीन भारतीय वाङ्मय की इस महत्त्वपूर्ण खोज के फलस्वरूप पटना की बिहार
रिसर्च सोसाइटी ने बौद्धन्याय के निम्नलिखित संस्कृत ग्रन्थों को प्रकाशित किया है—
१. प्रमाणवार्तिक—यह आचार्य धर्मकीर्ति की रचना अपने मूल संस्कृत
रूप में छपी है ।
२. वादन्याय अथवा तर्कन्याय—भी धर्मकीर्ति का ग्रन्थ है ।
३. प्रमाणवार्तिकवृत्ति—इसकी रचना मनोरथनन्दी ने की है ।
४. प्रमाणवार्तिकभाष्य—इसकी रचना प्रज्ञाकर गुप्त ने की है बिहार रिसर्च
सोसाइटी के जर्नल में ।
५. धर्मकीर्ति का प्रमाणवार्तिक स्ववृत्ति टीका भी प्रकाशित हुई है । इसकी रचना
कर्णकगोमी ने की है । बाद में इसको प्रयाग के किताबमहल ने प्रकाशित किया ।
पटना से रत्नकीर्ति के अन्य भी अनेक न्यायनिबन्धों के प्रकाशित होने की आशा
है । वहां ज्ञानश्रीमित्र के न्यायग्रन्थों का संपादन तथा प्रकाशन करने का भी
आयोजन किया जा रहा है ।
इसके अतिरिक्त गायकवाड़ ओरिएंटल सीरीज़ में हेतुबिन्द टीका अपनी अनुटीका
सहित छपी है ।
इन ग्रन्थों को प्रकाश में लाने का बहुत कुछ श्रेय महापण्डित राहुल सांकृत्या-
यन को है ।
इस प्रकार यद्यपि विशेष विद्वान् बौद्धन्याय के सम्बन्ध में अधिकाधिक खोज करते
जाते हैं, किन्तु जनता की उनमें पर्याप्त रुचि नहीं होती । स्वाधीन भारत के नागरिकों
को गंभीर अध्ययन के क्षेत्र में अपने दृष्टिकोण को अत्यधिक उदार बनाना चाहिये ।
४५६६ बाजार पहाड़गंज
नई दिल्ली-१ ❭ चन्द्रशेखर शास्त्री
दनांक १९ अगस्त १९५४ ई० /