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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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२४ भूमिका ।
तृतीय परिच्छेद ।
इस परिच्छेदमें परार्थानुमानका वर्णन है । आरम्भमें उसकी परिभाषा दी हुई है,
जिसका पीछे वर्णन कर आये हैं । इसके पश्चात् उसके साधर्म्यवत् और वैधर्म्यवत् दो
भेद बतलाकर स्वयं ही कह दिया है कि इनमें अर्थसे कोई भेद नहीं है केवल प्रयोगका
भेद है (न्या० पृ० ४७ पं० १७) । अतएव इन दोनोंके विषयमें हम यहाँ कुछ नहीं लिखेंगे ।
इन दोनों ही प्रयोगोंमें पक्षका अवश्य ही निर्देश किया जाना चाहिये । अतएव
परार्थानुमानके भेदोंके पश्चात् पक्षका वर्णन किया गया है । जो कि लगभग सभी
न्यायोंमें एक ही प्रकारसे कहा गया है । यहाँ सामान्यरूपसे परार्थानुमानका वर्णन
समाप्त हो गया है ।
इसके पश्चात् हेत्वाभासोंका वर्णन है । यह पीछे बतलाया जा चुका है कि बौद्ध
हेतुमें पक्षधर्मत्व आदि तीन बातोंका होना आवश्यक मानते हैं । अतएव उन तीनों
रूपोंमेंसे एक भी रूपके न होने अथवा संदिग्ध होनेपर हेत्वाभास हो जाता है । अतएव
त्रिरूपलिङ्ग माननेसे बौद्धोंको तीन ही हेत्वाभास भी मानने पड़े हैं । जो कि ये हैं—
असिद्ध, विरुद्ध और अनैकान्तिक ।
पीछे दिखलाया जा चुका है कि मध्यकालीन नैयायिक हेतुमें पाँच बातोंका होना
आवश्यक मानते थे । अतएव उनके मतके अनुसार इन्हीं तीनमें बाधितविषय और
सत्प्रतिपक्ष ये दो और जोड़ देनेसे पाँच हेत्वाभास होते हैं ।
न्याय दर्शनमें सव्यभिचार, विरुद्ध, प्रकरणसम, साध्यसम और कालातीत ये पाँच
हेत्वाभास माने हैं, जो कि ऊपर वालोंसे अविरुद्ध ही हैं ।
जैनियोंने असिद्ध, विरुद्ध, अनैकान्तिक और अकिञ्चित्कर ये चार हेत्वाभास माने
हैं । जिनमें अकिञ्चित्कर हेत्वाभास नया हेत्वाभास है ।
न्यायबिन्दुमें इनके भेद प्रभेद भी बहुतसे दिखलाये हैं जो अन्य नैयायिकोंसे
विशेष भिन्न नहीं है ।
हेत्वाभासोंके पश्चात् दृष्टान्त और दृष्टान्ताभासोंका वर्णन है ।
(८) न्यायबिन्दुमें अन्य दर्शनोंके सिद्धान्त ।
हम पीछे बतला आये हैं कि आरम्भिक बौद्धन्यायपर गौतमीय न्यायकी पूरी
छाप लगी हुई है । न्यायबिन्दुको देखनेसे पता चलता है कि वह छाप इतनी पक्की हो
गई थी कि धर्मकीर्ति भी उसकी उपेक्षा न कर सके । और इसी कारणसे उन्होंने ग्रन्थ
समाप्त करते २ विशेष आवश्यक न होनेपर भी दूषण, जाति और जात्युत्तरका थोड़ा
सा वर्णन कर ही डाला । इनमें से जाति न्यायदर्शनका एक मुख्य विषय है । न्याय-
बिन्दु की समालोचनाको समाप्त करते हुए इतना लिख देना और आवश्यक प्रतीत होता
है कि न्यायबिन्दु पद्य तो है ही नहीं, किन्तु यह सूत्र या वार्तिक भी नहीं है । सूत्र
किसी अपेक्षासे इसको कह भी सकते हैं । किन्तु लेखके बीचमें संख्या इत्यादिका