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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 29

भूमिका। २३
अवसर पर हमको फिर जैनियोंका हेतुका लक्षण स्मरण हो आता है जो इनसे अधिक
परिष्कृत, संक्षिप्त तथा युक्तिपूर्ण है। वह यह है—
'साध्याविनाभावित्वेन निश्चितो हेतुः' । ( परीक्षामुख उद्देश ३ सूत्र १५ । )
अर्थात् जिसका साध्य ( अनुमेय ) के साथ अविनाभावी सम्बन्ध निश्चित हो वह
हेतु होता है।
वास्तवमें विचार किया जावे तो त्रिरूपलिङ्ग अविनाभावनियम अथवा व्याप्तिके
अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
इस प्रकार न्यायबिन्दुकारने हेतुके लक्षणका वर्णन करके फिर उसके भेदोंका
वर्णन किया है। किन्तु उन बेचारोंको अपना अभिप्राय प्रगट करने योग्य पर्याप्त शब्द
यहाँ भी नहीं मिले हैं। क्योंकि कभी वह पक्षधर्मत्व आदिको त्रिरूपलिङ्ग कहते हैं तथा
कभी वह हेतुके भेद अनुपलब्धि, स्वभावलिङ्ग और कार्यलिङ्गको त्रिरूपलिङ्ग कहते हैं।
इसी मुसीबतमें पड़ जानेसे उन्होंने त्रिरूपलिङ्गको एक स्थानपर 'त्रैरूप्य' ( न्या०
पृ० २२ पं० ९ ) तथा दूसरे स्थान पर भेदोंको 'त्रिरूपलिङ्ग' कहा है ( न्या०
पृ० २५ पं० १४ )
अब थोड़ा विचार बौद्धोंके इन तीनों हेतुओं पर भी कर लें। प्राचीन नैयायिकोंने
तो हेतुके भेद करनेपर विशेष ध्यान ही नहीं दिया है। हाँ, जैन नैयायिकोंमें हेतुके भेद
बौद्धोंसे भी अधिक किये हैं। किन्तु विषयान्तर हो जानेसे हम यहाँ केवल बौद्धोंके ही
हेतुके भेदोंपर विचार करेंगे ।
यह पीछे दिखलाया जा चुका है कि बौद्धोंने हेतुके तीन भेद माने हैं—
स्वभाव, कार्य और अनुपलब्धि ।
जो पदार्थ उपलब्ध हैं वह अनुपलब्ध नहीं हो सकते अतएव उपलब्ध होना
पदार्थका स्वभाव है। स्वभाव लिङ्गमें पदार्थी की यह उपलब्धि ही हेतु रूपमें उपस्थित
की जाती है। जैसे—'यह वृक्ष है, क्योंकि यह शीशम है'
कार्यलिङ्ग अनुमेय ( साध्य ) के कार्यको देखकर उसकी उपलब्धिका अनुमान
करता है। जैसे किसीने धुवाँ देखकर कहा कि—'यहाँ अग्नि है क्योंकि यहाँ धुवाँ है।'
पदार्थका न मिलना अनुपलब्धि है। बौद्धोंने इसको भी हेतु माना है। जैसे—
देवदत्तको उसके घरमें अनुपस्थित देखकर कोई कहे—'देवदत्त घरमें नहीं है। क्योंकि
वह वहाँ अनुपलब्ध है।'
इन तीनों हेतुओंमेंसे स्वभाव और कार्य वस्तु की उपस्थिति और अनुपलब्धि
अनुपस्थितिको साधन करते हैं।
इसके पश्चात् कुछ इन हेतुओंका ही वर्णन करके अनुपलब्धिके भेद बतलाकर
द्वितीय परिच्छेद समाप्त किया गया है। अनुपलब्धिके भेदोंको हम विस्तारके भयसे
यहाँ नहीं लिख रहे हैं।