न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika
आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ भूमिका।
(१०) न्यायबिन्दुमें बौद्धदर्शनके सिद्धान्त।
यद्यपि न्यायबिन्दु विशुद्ध न्यायका ही ग्रन्थ है तथापि प्रसङ्गवश कहीं २
आचार्यने उसमें ऐसे वाक्य भी लिखे हैं जिनसे बौद्ध सिद्धान्तोंकी बहुत कुछ झलक
मिलती है। हमने ऐसे वाक्योंको यथाशक्ति प्रयत्न करके न्यायबिन्दुमें से निकाला है
और उनके अन्दरसे हमारी सम्मतिमें जो दार्शनिक सिद्धान्त निकाले जा सकते हैं उनको
नीचे दिया है—
(१) जहाँ सांख्य सत्से सत् की उत्पत्ति मानता है वहाँ बौद्ध असत्की उत्पत्ति
और सत्का निरन्वय विनाश मानता है। जैसा कि कहा है—
‘परस्य चासत उत्पाद उत्पत्तिमत्त्वम् । सतश्च निरन्वयो विनाशोऽनित्यत्वं सिद्धम्’ ।
(न्या० पृ० ६९ पं० १४)
(२) बौद्धोंने विज्ञान, इन्द्रिय और आयुके निरोधको ही मरण माना है। जैसा
कि धर्मकीर्तिने कहा है—
‘विज्ञानेन्द्रियायुर्निरोधलक्षणस्य मरणस्यानेनाभ्युपगमात्’ । (न्या० पृ० ६८ पं० १०)
(३) बौद्धदर्शन वृक्षोंमें विज्ञान आदिका सद्भाव नहीं मानता। अतएव मरने या
जीनेका उनमें विकल्प ही नहीं है—
‘तस्य च विज्ञानादिनिरोधात्मकस्य तरुष्वसंभवात्’ । (न्या० पृ० ६८ पं० १९)
(४) बौद्ध सुख आदिको अचेतन मानते हैं। जैसा कि धर्मकीर्ति के निम्नलिखित
वाक्यसे प्रगट होता है—
‘अचेतनाः सुखादय इति साध्य उत्पत्तिमत्त्वमनित्यत्वं वा सांख्यस्य स्वयं वादिनोऽ-
सिद्धम्’ । (न्या० पृ० ६७ पं० ७)
(५) बौद्ध आत्माको नहीं मानता। जैसा कि टीकामें कहा गया है—
‘तदिह बौद्धस्यात्मैव न सिद्धः’ । (पृ० ७१ पं० ५) तथा ‘बौद्धेनोक्तं नास्त्यात्मा’ ।
(पृ० ६३ पं० १२)
(६) पीछे बतला दिया है कि बौद्ध दर्शन विज्ञान, इन्द्रिय और आयुके निरोध
को मरण मानता है किन्तु आत्माको नहीं मानता। यहाँ यह शङ्का होती है कि जब
आत्मा ही नहीं है तो मरण किसका होता है। उसका समाधान यह है कि बौद्ध
वास्तवमें मरण नहीं मानता किन्तु निरोध (रुकना) मानता है। बौद्ध प्राण आदिको
मानता है किन्तु अनात्मवादी होनेसे न तो उनको सात्मक ही मानता है और न निरा-
त्मक ही मानता है। जब तक विज्ञान आदि शरीरमें रहते हैं तब तक शरीर जीता है
जब नहीं रहते तो मर जाता है। इसलिये प्राण आदि जीवित शरीर सम्बन्धी हैं।
जैसा कि धर्मकीर्तिने कहा है—
‘सात्मकत्वेन निरात्मकत्वेन वा प्रसिद्धे प्राणोदरसिद्धिः’ । (पृ० ८३ पं० २) ।
तथा ‘तस्माज्जीवच्छरीरसम्बन्धी प्राणादिः’ । (पृ० ८३ पं० ७)