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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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पृष्ठ 27

भूमिका । २१
इन्होंने प्रत्यक्षके चार भेद माने हैं—
इन्द्रियप्रत्यक्ष, मनःप्रत्यक्ष, स्वसंवेदनप्रत्यक्ष और योगिप्रत्यक्ष, जो ज्ञान इन्द्रियोंके
आश्रित होता है उसे इन्द्रियप्रत्यक्ष कहते हैं । ( न्या० पृ० १२ भा० पृ० २ )
इन्द्रियविज्ञान ( इन्द्रियप्रत्यक्ष ) के दूसरे क्षणमें जब कि इन्द्रियज्ञान समनन्तरप्रत्यय
( भा० पृ० २ पं० ७ ) हो गया हो, जो ज्ञान होता है वह मनोविज्ञान या मनःप्रत्यक्ष
कहलाता है । ( पृ० १२, १३, १४ भा० पृ० २ ) इसमें और इन्द्रिय विज्ञानमें अन्तर
केवल इतना ही है कि इसमें आलम्बन प्रत्यय ( भा० पृ० २ पं० १० ) इन्द्रिय विज्ञान
होता है और इन्द्रियविज्ञानमें आलम्बन प्रत्यय घट पट आदि पदार्थ होते हैं ।
यद्यपि बौद्ध दर्शनमें आत्मा या जीव नामका कोई पदार्थ नहीं है तथापि सुख दुःख
आदिमें 'मैं सुखको भोगता हूँ' अथवा 'मैं दुःखको भोगता हूँ' आदि प्रत्यय होते ही
हैं । इस अनुभवको ही स्वसंवेदन प्रत्यक्ष या आत्मसंवेदन कहते हैं ।
योगिप्रत्यक्ष स्पष्ट ही है वह योगियोंको ही होता है ।
प्रत्यक्षका विषय भी एकक्षणवर्ती पदार्थ है । किन्तु अनुमानका विषय सामान्य
लक्षण है । अर्थात् अनुमानके द्वारा अनेक क्षणोंकी बातको भी जान सकते हैं ।
प्रत्यक्ष प्रमाणका फल प्रत्यक्ष ज्ञान है और ज्ञानका पदार्थके समान बन जाना ही
प्रमाण है । क्योंकि उसीसे पदार्थका ज्ञान होता है । (न्या० पृ० १६ की न० ३ की टिप्पणी)
द्वितीय परिच्छेद ।
आचार्य धर्मकीर्तिने जिस प्रकार प्रथम परिच्छेदमें प्रमाणका लक्षण किये बिना ही
उसके भेद कर डाले हैं उसी प्रकार यहाँ भी अनुमानका लक्षण किये बिना ही पहिले
अनुमानके स्वार्थानुमान और परार्थानुमान दो भेद किये हैं । हमारा अनुमान है कि
यह बात धर्मोत्तराचार्य को भी अवश्य खटकी थी किन्तु प्रथम परिच्छेद में उन्होंने
इसको प्रगट न करते हुए स्वयं ही प्रमाणका लक्षण कह दिया है । क्योंकि उसमें लक्षण
कहनेके लिये भेदवाले वाक्यसे पहिले एक और भी वाक्य था । किन्तु इस परिच्छेदमें
पहिले ही वाक्यसे भेद चल पड़े । यहाँ टीकाकारको अपनी खटक शंकाके रूपमें प्रगट
करनी ही पड़ी ( न्या० पृ० २१ पं० ४ ) किन्तु आगे चलकर उन्होंने इसका स्वयं ही
समाधान किया है कि भेदका कहना ही लक्षणका कहना है । क्योंकि दोनोंके लक्षण
बिलकुल पृथक् २ होनेसे उनका एक लक्षण सम्भव नहीं है । (न्या० पृ० २१ पं० ५ )
किन्तु युक्तिपूर्वक विचार करनेसे धर्मोत्तराचार्य की यह दलील कमजोर बैठती है ।
क्योंकि उन दोनोंके अत्यन्त पृथक् होते हुए भी अनुमानकी अपेक्षा तो उनमें एकता
ही है । आचार्य धर्मकीर्ति ने दोनों अनुमानोंके ये लक्षण किये हैं—
'तत्र स्वार्थं त्रिरूपाल्लिङ्गाद्यनुमेये ज्ञानं तदनुमानम्' । न्यायबिन्दु पृ० २१ 'त्रिरूप-
लिङ्गाख्यानं परार्थानुमानम्' न्यायबिन्दु पृ० ४६ ।
अर्थात् जो ज्ञान अनुमेयमें ( न्या० पृ० २४ ) त्रिरूपलिङ्गसे उत्पन्न होता है उसे
स्वार्थानुमान कहते हैं ।
४ न्या० भू०