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सर्वकोश
न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

न्यायबिन्दु (आचार्य धर्मकीर्ति - धर्मोत्तर टीका एवं पं. चन्द्रशेखर शास्त्री सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Nyayabindu of Dharmakirti with Dharmottara Tika

आचार्य धर्मकीर्ति (टीकाकार: धर्मोत्तरोपाध्याय / चन्द्रशेखर शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished176 पृष्ठ

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भूमिका । २५
बिलकुल अभाव होनेसे इसको सूत्र समझना भी कठिन है । हमारी सम्मतिमें यह
बौद्ध न्यायके ऊपर एक स्वतन्त्र निबन्ध है जो कि विचारकर ऐसे ढंगसे लिखा गया है
कि उसका प्रत्येक वाक्य सूत्र सा प्रतीत होता है ।
न्यायबिन्दु टीकामें पृष्ठ ५२ पं० २३ में 'तस्यैवेति' पाठ है किन्तु उसका मूल
उपलब्ध नहीं है । यद्यपि 'तस्यैव' को अगले वाक्यमें मिला देनेसे वह वाक्य ( तस्यैव
तत्स्वभावत्वात्स्वभावस्य च हेतुत्वात् ) पूरा हो जाता है तथापि चित्तमें यह खटका
बना ही रहता है कि न जाने और कहाँ २ पाठ छूट गया हो ।
न्यायबिन्दुसे प्रगट होता है कि आचार्य धर्मकीर्ति और धर्मोत्तर दोनों अन्य
भारतीय दर्शनोंके भी धुरन्धर विद्वान् थे । क्योंकि दृष्टान्ताभासके वर्णन तथा अन्य ऐसे
ही स्थलों पर उन्होंने थोड़े २ शब्दोंमें अन्य दर्शनोंके सिद्धान्तोंका अच्छा वर्णन किया है ।
आचार्य धर्मकीर्तिने न्यायबिन्दु पृ० ९८ पं० १५ तथा पृ० १०० पं० ७ में
जैनियोंके तीर्थंकर ऋषभका उल्लेख दोनों स्थल पर तथा वर्धमानका उल्लेख प्रथम
स्थलपर किया है । इससे प्रगट होता है कि उनके समय आठवीं शताब्दीमें भी जैनेतर
विद्वान् जैनधर्मका प्रथम उपदेश देनेवाला भगवान् ऋषभदेवको ही समझते थे न कि
भगवान् वर्धमानको । जैनधर्मका प्रथम उपदेष्टा भगवान् महावीर या पार्श्वनाथको कहने
की धारणा पाश्चात्य ऐतिहासिकोंके ही मस्तिष्ककी उपज विदित होती है ।
( ६ ) न्यायबिन्दु की टीकाएँ ।
न्यायबिन्दु जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ है वैसी ही प्रचुर संख्यामें इसकी टीकायें नहीं मिलतीं ।
यद्यपि टीकायें इसकी भी कम नहीं बनीं तथापि उनमेंसे अधिकांशका मूल संस्कृत
लुप्त हो गया है, केवल उनका तिब्बी अनुवाद शेष है । न्यायबिन्दुकी निम्नलिखित
टीकायें बनी हैं—
१—न्यायबिन्दुपिण्डार्थ—आचार्य जिनमित्र ( लगभग १०२५ ई० ) कृत । इसमें
न्यायबिन्दु का सारांश है ।
२—न्यायबिन्दुपूर्वपक्ष संक्षिप्त—आचार्य कमलशील ( लगभग ७५० ई० ) कृत
इसमें न्यायबिन्दु की समालोचनाओंका संक्षेप है ।
३—धर्मोत्तरटिप्पणक-श्वेताम्बर जैन आचार्य मल्लवादिन् ( लगभग ८२७ ई० )
कृत । धर्मोत्तरकृत न्यायबिन्दु टीका की टीका । यह अनहिलवाड़ा पाटनमें ताड़पत्र पर
लिखी हुई रखी है ।
४—न्यायबिन्दुटीका—आचार्य विनीतदेव ( लगभग ७०० ई० ) कृत, यह
न्यायबिन्दुके ऊपर विस्तृत टीका है ।
५—न्यायबिन्दुटीका-आचार्य धर्मोत्तर ( लगभग ८४७ ई० ) कृत । यह पाठकोंके
हाथोंमें विद्यमान है । यह भी न्यायबिन्दुके ऊपर विस्तृत टीका है ।