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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

( २८ )
समपाद—देवता ब्रह्मा । दोनों पैरों का अन्तर का प्रमाण एक ताल
का तथा दोनों पैर घुटनों के साथ सहज मुड़े हुए ।
वैशाख—देवता कात्तिकेय । पैर एक दूसरे के पीछे तीन बल में लपेट
लिये हुए रख कर नमे हुए होकर खड़ा रहना ।
मण्डल—देवता इन्द्र । दोनों पैरों का यहाँ अन्तर तीन ताल तथा कटि
तथा पृष्ठ सीधी रखकर झुकते हुए खड़े रहना ।
आलीढ—तथा प्रत्यालीढ—दोनों के देव इन्द्र । मण्डल-स्थान में
दाहिने पैर को पांच ताल के अन्तर से आगे रखने पर आलीढ़ तथा इसके
विपरीत दाहिने पैर को सिकुड़ा कर बायें पैर को पाँच ताल के अन्तर से
आगे रखना प्रत्यालीढ है ।
उपर्युक्त छः स्थान पुरुषसंस्थान है तथा नाट्यशास्त्रानुमोदित हैं, परन्तु
शास्त्रीय ग्रन्थों में इनके अतिरिक्त अन्य स्थान भी प्राप्त होते हैं । 'सङ्गीत-
रत्नाकर' में इस सन्दर्भ में तेईस ( देशी ) स्थान दिखलाये गये हैं । जिनका
स्वरूप सहज बोध्य है। ये इस प्रकार हैं—( १ ) स्वस्तिक, ( २ ) वर्धमान,
( ३ ) नन्द्यावर्त, ( ४ ) संहज, ( ५ ) समपाद, ( ६ ) एकपाद,
( ७ ) पृष्ठोत्तानतल, ( ८ ) चतुरस्र, ( ६ ) पाष्णिंविद्ध, ( १० ) पार्ष्णि-
पार्श्वगत, ( ११ ) एकपार्श्वगत, ( १२ ) एकजानुगत, ( १३ ) परावृत्त,
( १४ ) समसूचि, ( १५ ) विषमसूचि, ( १६ ) खण्डसूचि, ( १७ ) ब्राह्म,
( १८ ) वैष्णव, ( १६ ) शैव, ( २० ) गरुड, ( २१ ) कूर्मासन,
( २२ ) नागबन्ध तथा ( २३ ) वृषभासन ।
इनमें समसूची, विषमसूची, खण्डसूची, गरुड, कूर्मासन, नागबन्ध तथा
वृषभासन ये आसन हैं तथा शेष स्थान हैं। इनमें स्थानकों के कुछ चित्र हमने
दिये भी हैं, जिनसे इनका स्वरूप स्पष्टतः समझा जा सके। इन स्थानकों
का ग्रन्थगतरूप स्वरूप इस प्रकार है :—
स्वस्तिक—दाहिने पैर को बायीं ओर तथा बायी ओर रखते हुए
दोनों पैरों की तिरछे करते हुए रखना ( Cross ) । ये सहजभाव में झुके हुए
और एक दूसरे को छूते हुए रखे जाएँ ।
वर्धमान—दोनों पैरों की एड़ी को एक दूसरे की ओर मुँह किये हुए
पास-पास रखकर दाहिने पैर की नोक दाहिनी ओर तथा बायें की बायीं
ओर रखते हुए खड़े रहना ।
नद्यावर्त—वर्धमान स्थिति में खड़े होकर दोनों पैरों का अन्तर छः से
बारह अंगुल रखना ।

( २६ )
संहत—दोनों पैरों को मिला कर रखते हुए उनके अंगूठे तथा टखने
को एक दूसरे से लगा कर खड़े हो जाना ।
समपाद—दोनों पैरों को एक बालिश्त के अन्तर पर समान रूप
में एडी के बल पर खड़े रहना । यह स्थिति वैष्णव-स्थान में आगे
बतलायी गयी है।
एकपाद—समपाद में एक पैर को ऊपर उठाना ।
पृष्ठोत्तान-तल—एक सीधे पैर के पीछे दूसरा पैर एड़ी को ऊँचा कर
पंजे ( के फण ) को ऊँचा करते हुए मोड़ कर रखना और एक पैर से उसे
पीछे ढकेलना ।
चतुरस्र—नद्यावर्त की स्थिति में पैरों का अन्तर ढ़ाई अंगुल के अन्तर
से रखना ।
पार्ष्णिबद्ध—एक पैर की एड़ी को दूसरे पैर के अंगूठे का स्पर्श
हो इस प्रकार खड़े रहना ।
पार्ष्णि-पार्श्वगत—बायाँ पैर सीधा रख दाहिने पैर की एड़ी बाँयीं
पैर की ओर रहे इस प्रकार आड़ी रख कर खड़े रहना ।
एकपार्श्वगत—उपर्युक्त स्थान में दाहिने पैर को उलटी रीति से
अर्थात् दाहिने पैर की एड़ी दाहिनी ओर रखकर खड़े होना ।
एकजानुगत—एक पैर को सीधा रख कर दूसरे पैर को एक बाजू
में चार अंगुल दूर टखने से सहज मोड़ के साथ रखना ।
परावृत्त—बाये पैर की एड़ी के सामने दाहिने पैर का अंगूठा तथा
दाहिने पैर की एड़ी के पास बायें पैर की कनिष्ठिका अंगुली को एक दूसरे
के साथ स्वस्तिक रखना ।
समसूचि—एड़ी तथा जंघा को जमीन से स्पर्श कर दोनों पैरों को
तिरछे तथा लम्बे ( क्रमशः ) करना ।
विषमसूची—समसूचि में एक पैर को पीछे लंबा करना अर्थात् एक
पैर आगे और दूसरा पीछे की ओर लम्बा कर स्थित होना।
खण्डसूची—नियमसूची की स्थिति में एक ( अर्थात् अगले ) पैर को
सिकुड़ा लेना ( तथा पिछले पैर को लम्बा रख कर बैठना । )
ब्राह्म—एक पैर से सीधे खड़े होकर पिछला पैर पीठ की ओर घुटनों
को मिला कर रखना ।
वैष्णव—इसे नाट्यशास्त्र में दिखलाया ही है ।
शैव—बायाँ पैर जमीन पर सीधा रख कर वाहिना पैर घुटने से ऊपर

( ३० )
ऊँचा कर तिरछा मोड़ते हुए ( आगे की ओर ) रखना । ( बैशाख स्थान में
तथा इस स्थान में अतिशय साम्य है )
गारुड—दायाँ बायाँ पैर उलटा कर ऐसे सिकुड़ाते हुए रखना जिसमें
दोनों एड़ियाँ जमीन का स्पर्श पंजे के अगले अंगूठों से करे ।
कूर्मासन—दाहिने पैर को आगे सिकुड़ा कर बैठे तथा पंजा सीधा
रखे जिससे एड़ी ऊपर रहे तथा बायाँ पैर खड़ा जमीन पर टिकाना ।
नागबन्ध—उपर्युक्त मुद्रा में बायें पैर की जंघा पर दाहिने को तिरछी
रख कर बैठना ।
वृषभासन—दोनों घुटने जमीन पर जुड़ा कर अन्तर से रखते हुए दोनों
पंजों के बल बैठना ।
उपर्युक्त स्थान तथा आसनों की करणों में योजना का विवरण मिलता
है । जैसे स्वस्तिककरण की स्वस्तिक, ऊर्ध्वस्वस्तिक, वक्षःस्वस्तिकं, पृष्ठ
स्वस्तिक जैसे स्वस्तिक करणों में योजना होती है । वर्धमानक ( इस ) स्थान
की तलपुष्पपुट, रेचित निकुट्टक, छिन्न तथा अन्य करणों में योजित होता है ।
संहत को समनख तथा लीन करणों में संयुक्त किया जा सकता है । नद्यावर्त
को अपविद्ध, अर्धरेचित, भुजङ्गतस्त, रेचित, जैसे करणों में संयोजित किया
जाता है । चतुरस्र की मण्डलस्वस्तिक, स्वस्तिकरेचित, कटिसम तथा उन्नत
जैसे करणों में योजित होता है । गरुड की कुञ्चित में योजना होती है । इसी
दिशा में अन्य स्थान की भी करणों में योजना हो सकती है यह ध्यान से देखने
पर स्पष्ट हो सकता है । नाट्यशास्त्र के किसी उत्तरकालभव पाठ या
कोहलादि प्रणीत स्थानक विवरण को लेकर ही सङ्गीतरत्नाकरादि¹ में इनका
विस्तार है जो नाट्यशास्त्र का ही है । क्योंकि अभिनयादि प्रयोग में आज भी
इनका उपयोग हो रहा है । अतः ये जो स्थान अतिरिक्त है वे भी नाट्यशास्त्र
के भरत प्रोक्त ही होना ( उचित ) लगता है, तथा इन्हें परम्परागत
नाट्याचार्यों की परम्परा में आज माना भी जाता है ( परन्तु इनका
प्रामाणिक संशोधनपूर्ण उत्तर अभी शेष है । जो भी हो इसपर हमने इसी
कारण प्रस्तुत संस्करण में कुछ ही ऐसे चित्र देकर विषय को रखा है । जिसे
आशा है प्रमाणादि के साथ हम आगे और भी संशोधित कर प्रस्तुत करने का
उद्योग करेंगे— (सम्पा०)
१. ये २३ देशी स्थानक जिनको संगी. रत्ना. में नर्त० पृ० ३२६-३३५
अडचार सं० में देखा जाए ।

( ३१ )

आसन एवं शयन विधान—नाट्यशास्त्र में पात्रों के देश, काल,
प्रकृति तथा चित्तवृत्ति आदि के अनुरूप उपयुक्त आसन तथा शयन विधान का
निरूपण किया गया है। यह विधान राजसभा तथा समाज में प्रचलित
व्यवहारों के आधार पर निर्धारित किया गया है। ये आसन स्वस्थ या
विश्रामदशा में, विचार, चिन्ता, शोक, मूर्च्छा, लज्जा, मद, ग्लानि, रोग
तथा निद्रा की अवस्था में विभिन्न स्वरूप वाले दिखलाये गये हैं। इसी
प्रकार प्रियाप्रसादन, धार्मिकविधि सम्पादन एवं देववन्दना आदि के समय
इनके विभिन्न स्वरूप रहते हैं। इन भावों के लिये विभिन्न शारीरिक
भङ्गिमाओं के तथा मुद्राओं के प्रयोग का भी भरतमुनि ने निर्देश किया है,
तदनुसार शोक की दशा के अभिनय में दोनों हाथों के सहारे चिबुक को रखा
जाता है, मस्तक गर्दन पर झुकाया जाता है तथा इन्द्रिय एवं मन की
निष्क्रियता दिखलाई जाती है। इसी प्रकार प्रिया के प्रसादन में दोनों घुटनों
को पृथ्वी पर रख कर नीचे मुख किये हुए रहते हैं तथा देववन्दना में भी
यही आसन रखा जाता है।
इस प्रकार पात्रों के उत्तम, मध्यम आदि सामाजिक आधारों पर अनेक
प्रकार के आसनों का विधान दिखलाया गया है। तदनुसार राजा एवं
महारानी के लिये सिंहासन, पुरोहित, अमात्य एवं उनकी पत्नियों के
लिये वेत्रासन, सेनापति एवं युवराज के लिये मुण्डासन, ब्राह्मणों के लिये
काष्ठासन, वैश्याओं के लिये मसूरक आसन तथा शेष स्त्रियों एवं सेवकों
आदि के लिये भूम्यासन का विधान बतलाया गया है।
शयन—इसी प्रकार शयनदशा में शरीर की स्थिति एवं भङ्गिमा
के आधार पर छः प्रकार के शयन का विवरण नाट्यशास्त्र में दिया गया
है। यह विधान अतिसङ्क्षिप्त है क्योंकि नाट्यप्रयोग में इसका उपयोग
अधिक नहीं होता। ये छः प्रकार हैं :—( १ ) आकुञ्चित, ( २ ) सम,
( ३ ) प्रसारित, ( ४ ) विवर्तित, ( ५ ) उद्वाहित तथा ( ६ ) नत ।
'आकुञ्चित' में समस्त अङ्ग सिकुड़े हुए तथा दोनों घुटने शयन से
सटे हुए रखते हैं। इसकी योजना ठण्ड से ठिठुरते हुए पात्र के लिये रखी
जाती है। 'सम' में मुँह ऊपर तथा दोनों हाथ शिथिल रहते हैं। इसे सोए
हुए व्यक्ति के लिये प्रयुक्त किया जाता है। 'प्रसारित' में एक भुजा को
सिरहाना बना कर जंघाओं को फैला कर लेटा जाता है। सुख से या
निश्चिन्त होकर नींद लेने की दशा में इसकी योजना रहती है। विवर्तित'
में पात्र नीचा मुँह रख कर सोता है। शस्त्र से क्षत या मृत, उन्मत्त या

( ३२ )
मद्य पान कर मस्त पड़े हुए पात्र की दशा बतलाने में इसका प्रयोग किया
जाता है । 'उद्वाहित' में पात्र अपने मस्तक को हाथ या कलाई पर रख कर
सोता है । इसकी योजना लीला या स्वामी के आने आदि में रखी जाती
है । 'नत' में जंघाएँ फैला कर तथा दोनों हाथों को ढीले रखते हुए शयन
करते हैं । इसकी योजना आलस्य, श्रम तथा थकावट की स्थिति में की
जाती है ।
इस प्रकार नाट्यशास्त्र में गतिविधान के अन्तर्गत हस्त-पाद-प्रचार,
आसन एवं शयन की विधियों का सभी पक्षों को ध्यान में रख कर
यथाशक्य पूर्ण विवरण दिया गया है । ( इसके अतिरिक्त ) मुनि ने इतने
विस्तीर्ण इस विषय पर विवरण देकर भी-जो कि सूक्ष्म तथा प्रयोगात्मकता
से सम्पन्न है—नाट्यार्थ की अपेक्षा होने पर अन्य विधियों की भी स्वतन्त्रता
पूर्वक परिकल्पना करने की छूट नाट्याचार्यों को दे दीं है तथा नाट्यप्रयोग
के सभी उपादेय तत्त्वों को इस क्रम में व्यापकता के साम्य संगृहीत किया है
जो अपने आप में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है, यह निस्सन्दग्ध है ।
परिशेष—( विचार एवं विवरण )
अङ्गभङ्ग—नाट्यशास्त्र में आङ्गिक अभिनय के अन्तर्गत शरीर के द्वारा
होनेवाली क्रियाओं एवं करणों, स्थानकों आदि शरीर रचनाओं ( Postures )
तथा नृत्य में होने वाले विविध अङ्ग परिचालनों का विवरण दिया है किन्तु ये
रचेगये है अङ्गभङ्ग या शरीर के मरोड़ने की क्रियाओं के आधार पर ही ।
अतः अङ्गभङ्ग की सुन्दरता पर नृत्यादि अभिनय की सुन्दरता से प्रस्तुति
निर्भर करती है तथा इसी कारण नृत्यादि में 'अङ्गभङ्ग' का भी अपना स्वतन्त्र
महत्व है ही ।
नाट्यशास्त्र में ऐसे 'अङ्गभङ्ग' का पृथक् से उल्लेख तथा विवरण नहीं
दिया गया है परन्तु शरीर की सुन्दरता भङ्गिमाओं के प्रसङ्ग में इसका विवरण
अभिनय में आवश्यक एवं अपेक्षित अवश्य है क्योंकि अङ्गसौष्ठव का निखार
ही अङ्गभङ्ग से आता है । अन्य शास्त्रीयग्रन्थों में इस विषय का विवरण
मिलता है तदनुसार अङ्गभङ्ग के चार प्रभेद होते हैं । ये हैं:—( १ ) अभङ्ग,
( २ ) समभङ्ग, ( ३ ) त्रिभङ्ग तथा ( ४ ) अतिभङ्ग ।
अभङ्ग—शरीर की सम एवं स्वाभाविक दशा में यह 'भङ्ग' सौष्ठवपूर्ण
भाव लिये हुए होता है। इसमें शरीर बिना किसी मरोड़ या मोड़ के पूर्ण
सीधे भाव में खड़ा रखा जाता है । इस स्थिति को प्राचीन शिल्प में श्रीविष्णु

( ३३ )
की सीधी खड़ी प्रतिमा में देखा जा सकता है। इसे अभङ्ग या अन्य विद्वान
'सहजभङ्ग' भी कहते हैं।
समभङ्ग—सहज भाव की स्थिति एवं सौन्दर्य पूर्ण भङ्गिमा में शरीर
को एक ओर किञ्चित् झुकाना 'समभङ्ग' होता है। इसमें सम्पूर्ण शरीर को
अन्यूनानतिरिक्त समान मुद्रा में एक ओर थोड़ा तिरछा रखते हुए खड़ा रखा
जाता है। इसे 'समभङ्ग' भी इसी कारण कहते हैं कि इसमें तिरछापन एक
समान स्थिति में रहता है। नाट्य में समभङ्ग का प्रचुर प्रयोग रहता है
और शिल्प में इस स्थिति में अवस्थित अनेक प्रतिमाएँ देखी जा सकती है।
त्रिभङ्ग—मुख, शरीर तथा पाद इन तीनों को मरोड़ने या तिरछा करते
हुए खड़े रहना 'त्रिभङ्ग' कहलाता है। शरीर की ऐसी दशा अति सामान्य
होने के कारण प्राचीन शिल्पादि आकृतियों में यह प्रचुर मात्रा में मिलती है
विशेषकर श्रीकृष्ण की बाँसुरीवादन करती हुई प्रतिमा 'त्रिभङ्ग' का उत्तम
निदर्शन है।
अतिभङ्ग—शरीर को अतिशय (या अधिक मात्रा में) मरोड़ते हुए
ओजपूर्ण एवं उग्रभाव में खड़ा रहना 'अतिभङ्ग' कहलाता है। इसकी योजना
'ताण्डव' जैसे नृत्य में रहती ही है तथा इसका निदर्शन 'नटराज' की प्रतिमा
है; जिसमें हस्त, पाद, कटि तथा ग्रीवा अतिशय भङ्गिमा के साथ भङ्गत्व के
ओज भरे पाद प्रचार को लिये हुए दिखलाई पड़ती है।
अभिनय में 'सौष्ठव' का स्थान—यदि आङ्गिक क्रियाकलापों के
शास्त्रानुकूल प्रस्तुतीकरण को एक 'कला' कहा जाए तो इसका आधार-
स्तम्भ मानना पड़ेगा 'सौष्ठव' को, जिस पर नृत्य का समग्र प्रासाद खड़ा
किया जाता है। इसी कारण अङ्गभङ्ग का आधार भी अङ्गसौष्ठव ही है जो
लावण्य एवं सौन्दर्य का आधायक है भी। अङ्गों की सप्राणता के बिना
नृत्य में अपेक्षित स्वरूप दिया जाना सम्भव नहीं रहता तथा बिना शरीर
सन्तुलन के आङ्गिक क्रियाएँ बेडोल हो जाती हैं। अतएव जैसे गायन के
लिये उत्तम कण्ठ की अनिवार्यता होती है इसी तरह नृत्य के लिये सप्रमाण
शरीर की भी। अङ्गसौष्ठव नाट्यशास्त्र में वर्णित सौष्ठव ही है, जो नृत्य में
अपेक्षित बाह्य स्वरूप को सुन्दर बनाता है परन्तु इसके साथ प्रस्तोता का
आन्तरिक भावसौन्दर्य भी यहाँ कार्य करता है; जिसके बिना बाह्य प्रदर्शन
भी मनोरम पद्धति में व्यक्त नहीं किया जा सकता। हृदय में सौन्दर्य का
सुप्त भाव यदि पहिले से विद्यमान रहेगा तो अभ्यास से कलाकार की सुप्त
३ ना० भू० द्वि०

( ३४ )
कला अवश्य जाग्रत हो जाएगी। इसी जाग्रति के लिये कलाकार को प्रशिक्षण
देने का प्रावधान है भी।
रङ्गमञ्च की कक्ष्या-परिधि—नाट्यशास्त्र के चतुर्दशअध्याय में नाट्य-
मण्डप पर प्रस्तुत दृश्यविधान का विवरण है। इस विवरण का एक अंश
रङ्गमञ्च के स्वरूप एवं साजसज्जा को दिखलाते हुए नाट्यशास्त्र के द्वितीय
अध्याय में दिया जा चुका था, किन्तु नाटकीय इतिवृत्त के अनुरोध पर शेष
तत्त्वों का इसी अध्याय में विवेचन हुआ है।
इतिवृत्त के अनुरोध पर रङ्गमञ्च पर अनेक दृश्यों की योजना करनी
पड़ती है। भरत मुनि ने ऐसे दृश्यों को प्रस्तुत करने के लिये अनेक उपयोगी
विधियाँ बतलाईं जिससे दृश्यविधान अधिकाधिक यथार्थ या लोकानुरूपता-
शाली बन सके।
दृश्यविधान की विधियों का आहार्याभिनय के अन्तर्गत नाट्यशास्त्र में
विचार हुआ है जिसका कुछ और विचार उसी प्रसङ्ग में नाट्यशास्त्र की प्रस्तुत
इसी व्याख्या के तृतीय भाग में किया जा रहा है। इसी के लिये कक्ष्याविभाग
की महत्त्वपूर्ण प्रथा ( रूढि ) की ( जिसमें प्रतीकात्मक नाट्यप्रयोगविधान
है ) उद्भावना की गयी थी; यह थी दृश्यविधान में रंगमञ्च पर स्थापित
कक्ष्याविभाग पद्धति। कक्ष्याविभाग का यह प्रयोग परम्परा तथा कल्पना
पर आधृत रख कर किया गया है। कक्ष्याविभाग का सामान्यतः आशय
यही है कि कथानक के अनुरूप रंगमञ्च पर स्थान या देश की कल्पना करना
जो नाट्यधर्मी रूढ़ियों आदि पर आश्रित रखते हुए दिखलाई जाए। भरत के
द्वारा किये गये ऐसे कक्ष्याविभाग निरूपण का उद्देश्य यही है कि नाट्यप्रयोग
अधिकाधिक प्रकृत एवं अनुरूपता पर आधारित हो सके, क्योंकि अनुरूपता
ही यथार्थ के समीप नाट्यविधान को लाने में सक्षम होती है।
इन कक्ष्याओं का विभाजन रंगमञ्च पर इस प्रकार कर लिया जाता
था कि एक विभाग से दूसरे विभाग पर आ जाने पर समझा जाता था कि
पात्र एक स्थान या देश से दूसरे में प्रवेश कर रहा है। मुनि ने कक्ष्या-
विभाग के अन्तर्गत आभ्यन्तर, बाह्य तथा मध्यम भाग की रङ्गमञ्च पर
ही परिकल्पना की तथा रंगमञ्च की परिधि में चलने से ही इनके विभाग
सूचित हो जाते थे। ये कक्ष्यायँ या इनके स्थान कितनी दूर पर निर्दिष्ट
हो—इसका विनिश्चय पात्रों के परिक्रमण की संख्या या स्थिति से होता
था। यदि दूर का स्थान निर्दिष्ट करना हो तो पात्र देर तक परिक्रमण

( ३५ )

करता था तथा समीप की स्थिति में थोड़ा परिक्रमण होता था। इनमें
रङ्गमञ्च का मुख भाग रङ्गपीठ होता है तथा यही आभ्यन्तर भाग कहलाता
है जहाँ पात्र नाट्यप्रयोग प्रस्तुत करते हैं। इनमें नेपथ्यगृह से लगी हुई कक्ष्या
आभ्यन्तर-कक्ष्या, रंगपीठ से लगी कक्ष्या बाह्य-कक्षा तथा इन दोनों की
मध्यवर्ती कक्ष्या मध्यम होती थी। ये कक्ष्यायें रङ्गमंच के दोनों ओर होती
थीं, ये ही बाहर से आड़ या पक्ष (पखवाई) का भी कार्य सम्पन्न करती
थी तथा इन्हीं से पार्श्व की ओर आगम एवं निर्गम होता था और इन्हीं
कक्ष्याओं में विभिन्न दृश्यों की अवतारणा कर ली जाती थी। इस कक्ष्या-
विभाग की परिधि में (जो पात्र के विशेष भाग में स्थित होने से जानी
जाए तथा जहाँ दृश्य निरूपण कथावस्तु के कारण इष्ट हो तो वहीं पर)
ऐसे सभी प्रदेश, नगर, वन, पर्वत आदि आ जाते हैं जो प्रस्तुत दृश्य में
प्रदर्शित होने चाहिए थे। इस प्रकार ये सभी प्रदेश-फिर चाहे वे अन्दर,
बाहर, मध्य, दूर या समीपवर्ती प्रदेश हों—कथावस्तु के कारण परस्पर
सम्बद्ध हो जाते थे। इन कक्ष्या विभागों की विधि या रूढ़ि के अनुसार
जो पात्र रंगमंच पर प्रथम प्रवेश करें वे आभ्यन्तरपात्र मञ्च के अन्तः
स्थान (गृह, प्रासाद) में स्थित रहते हैं तथा आभ्यन्तर प्रकृति कहलाते
हैं। इसके बाद जो पात्र रंगमञ्च पर प्रवेश करते हैं वे बाह्य होते हैं तथा जिस
मार्ग से वे प्रवेश करेंगे वह भाग मध्यम कहलाता है, क्योंकि इसी से वे
अन्दर प्रवेश करते हैं। रंगमंच के आभ्यन्तर भाग से जो पात्र इन पूर्व
प्रविष्ट पात्रों को देखने या मिलने के लिए आए वह अपनी बात दाहिनी
ओर (दक्षिण दिशा की ओर) होकर कहते हैं।
यहाँ रङ्गमञ्च पर दिशा का भो संकेत रखा गया है, इसका आधार है
नेपथ्यगृह तथा वाद्ययन्त्रों के लिये निर्मित द्वार का मुख; क्योंकि यह मुख
जिस ओर रहेगा उसे नाट्यप्रदर्शन के विधानानुसार पूर्व दिशा मानी
जाती है। इसी पूर्वद्वार से पात्रों का प्रवेश या आवागमन भी किया
जाता है, अतः जो पात्र इन निर्दिष्ट द्वारों में से जिस द्वार से निकलता है
उसे उसी द्वार से प्रवेश करना होता है। बाह्य पात्र का प्रवेश तथा निर्गम
एक ही द्वार से होता है। आभ्यन्तरपात्र भी कार्यवश यदि बाह्यपात्र के
साथ निकलता है तो जिस द्वार से बाह्यपात्र आया था उसी द्वार से
निकलेगा। कोई पात्र एकाकी या किसी अन्य पात्र के साथ प्रवेश करता है
तो उसे निर्दिष्ट द्वार से ही प्रवेश करना होता है। किसी कार्यवश बाहर

( ३६ )

निकल जाने पर यदि वही पात्र पुनः लौटे तो वह उसी मार्ग तथा द्वार से
प्रवेश करता है जिससे वह बाहर गया था । पात्रों के प्रवेश के समय अन्य
कक्ष्या की सूचना के लिये रंगमञ्च पर एक या अनेक बार आवश्यकतानुसार
परिक्रमा करने से दूसरी कक्ष्या सूचित हो जाती है । यदि समानस्थिति के
पात्र हों तो साथ-साथ तथा अधम पात्र से युक्त रहने पर उनसे घिरे हुए
चलने वाले नृपपात्र के प्रवेश की स्थिति में प्रतीहारी का उसके आगे चलना
बतलाया जाए । इसके अतिरिक्त प्रेक्षागृह के बाहर खुले स्थान या रंगमञ्च
पर नाट्य-प्रयोग की दशा में वाद्ययन्त्रों की ओर पीठ कर प्रयोक्ता या पात्र
जिस दिशा में मुख रख कर खड़े होते हों उसे भी रूढ़ि के अनुसार पूर्वदिशा
मानकर कार्य सम्पन्न किया जाता है ।
इसी प्रकार इसी कक्ष्याविभाग में दूरी या निकटता के देश का संकेत
विधान भी रखा गया है । पात्र की दूर या निकट प्रदेश की यात्रा का भान
उसके अधिक चलने या घूमने की गति से दूर का प्रदेश तथा कम चलने से
मध्यम व्यवधान वाले अथवा निकट प्रदेश को दिखलाया जाता है । यह क्रम
यद्यपि नाट्यविधान के अन्तर्गत रहता है किन्तु यह नियम लोकपरम्परा से
प्रभावित नियम है । लोकव्यवहार में अधिक दूरी की यात्रा करने में अधिक
चरणसंचार तथा कम दूरी में कम चरणसंचार रहता है यहीं इस नियम का
आधार था यह स्पष्ट प्रतीत होता है ।
दिव्यपात्रों का कक्षावस्तु की अपेक्षा के अनुसार नगर, वन, पर्वत,
सागर, वर्ष, द्वीप आदि सभी प्रदेशों पर आकाश, विमान या अपने से
उद्भावित माया के द्वारा पहुँचना बतलाया जाता है; क्योंकि दिव्य पात्रों की
शक्ति असीम होती है । पात्रों का संचार प्रयोजनवश यदि प्रच्छन्नस्वरूप में
रखा जाए तो उसको पृथ्वी पर ही बतलाया जाए क्योंकि यहाँ वे मनुष्य रूप
में दिखलाई दे सकते हैं । दिव्य तथा दिव्यादिव्य पात्र जम्बूद्वीप आदि सभी
वर्षों में अपनी इच्छानुसार आ जा सकते हैं परन्तु पात्र केवल भारतवर्ष में
घूमने वाले ही रखना चाहिये । यदि किसी पात्र का कार्यवश दूर देश में
प्रस्थान बतलाना ही हो तो अङ्क को वहीं समाप्त करते हुए दूसरे अङ्क के
आरम्भ में प्रवेशक के द्वारा यह दिखलाना चाहिए । इस प्रकार पात्रों की
अपनी स्थिति, सामर्थ्य तथा पहुँच के साथ-साथ प्रयोग के अनुसार कक्ष्या-
विभाग में प्रदेश दिखलाये जाते हैं ।
इसी प्रसंग में भरतमुनि ने दिव्यजातियों के निवास भूत विशिष्ट पर्वत

( ३७ )

तथा प्रदेशों का भी उल्लेख किया है ( जिनका विवरण नाट्यशास्त्र में
यथास्थान प्राप्य है) । नियमवश इन पात्रों का निवास इन्हीं प्रदेशों पर
दिखलाना चाहिए। तदनुसार यक्ष, गृह्यक तथा कुबेर के अनुचरों के लिए
शुभ्रकूट या कैलास, गन्धर्व एवं अप्सराओं के लिये हेमकूट, वासुकी, तक्षक
तथा अन्य नागों के लिये निषध, तैंतीस कोटि देवताओं के लिये महामेरु,
ब्रह्मर्षि एवं सिद्धों के लिये वैदूर्यमणिरञ्जित नीलाचल तथा दैत्य, दानव एवं
पितरों के लिये श्वेतपर्वत पर आवास दिखलाना चाहिए। इस पर आचार्य
अभिनवगुप्तपाद का मत है कि कथावस्तु से सम्बद्ध स्थानों के रहने पर ही
प्रसंगानुसार कक्ष्याविभाग की परिकल्पना से इनका प्रदर्शन करना चाहिए।
तथा यह प्रदर्शन कक्ष्याविधान के द्वारा रंगमञ्च पर अवस्थित एक भाग पर
(काल्पनिकता के साथ) प्रस्तुत करना चाहिए। इन पात्रों के कार्य, भाव
एवं चेष्टाएँ मानवीय रहनी चाहिए तथा यहाँ देवताओं की दृष्टि अनिमेष
नहीं होती। क्योंकि नाट्यप्रदर्शन में सभी भाव दृष्टि पर टिके रहते हैं।
भाव सभी दृष्टि द्वारा ही सर्वप्रथम अभिव्यक्त होकर बाद में अङ्गावयवों से
अभिनीत होते हैं। यह कक्ष्याविभागगत सभी विधान नाट्यधर्मी प्रथा की
रूढ़ि से सम्पन्न होता है तथा इन्हीं नाट्यरूढ़ियों के आधिक्य के कारण
प्राचीन संस्कृत रूपक में आधुनिक नाटकों की तरह दृश्यों का स्पष्ट विभाजन
जैसा प्रावधान नहीं दिखलाई देता है। यहाँ तो पात्र अपनी उदात्त
काव्यशैली में नाटकीय घटना की स्थिति की कल्पना दर्शकों में जागृत कर
देता है, क्योंकि जब प्रेक्षक रसज्ञ हो तो उन्हें नाटकीय सौन्दर्यबोध के लिये
अतिरिक्त या अधिक अपेक्षित ही नहीं था। यह सही है कि नाट्य का
उपयोगी अङ्ग कक्ष्याविधान है जिसका नाट्यप्रदर्शन के लिये उपयोग
अनिवार्य है। इसी कारण नाटकादि में इसका विधान रखा गया है। यह
नाट्यप्रयोग का विषय होने के साथ-साथ आवश्यक भी है केवल कल्पनामात्र
नहीं है। यह विधान भी सिद्धान्त तथा स्वरूप की सीमाओं में आबद्ध है
तथा इससे अति व्यापक अपेक्षाएँ नहीं रखी जा सकती।
प्रवृत्ति—नाट्यप्रयोग को रसानुग्राहक स्वरूप प्रदान करने के लिए
‘प्रवृत्ति’ का विधान है। प्रवृत्ति शब्द अपनी व्युत्पत्ति के (प्र + √वृत् +
क्तिन्) साथ-साथ अनेक अर्थ प्रकट करता है। यह बुद्धि तथा कर्मेन्द्रिय की
चेष्टाएँ, शरीर के लीला विलास आदि व्यापार, उनके हाव हेला आदि
विकार तथा आलाप एवं विलाप आदि वाग् व्यापार, मनुष्य की पाप-पुण्य
वृत्ति आदि ये सभी प्रवृत्ति के अर्थ है। प्रवृत्ति का यहाँ नाट्यप्रयोग के सन्दर्भ

( ३८ )
में व्यापक अर्थ में विधान भी है। भरतमुनि के अनुसार जो वृत्ति भारतवर्ष
के देशों में प्रचलित विभिन्न वेष, भाषा, आचार एवं वार्ता को स्थापन करती
हो वही 'प्रवृत्ति' है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने प्रवृत्ति शब्द की व्यापक
व्याख्या की है। उनके अनुसार प्रवृत्ति शब्द सूचना या प्रख्यापन के अर्थ में
यहाँ प्रयुक्त हुआ है। अतः जो सम्पूर्ण लोक में प्रचलित मानव की जीवन की
प्रवृत्तियों का ज्ञान करवाती हो वही 'प्रवृत्ति' है। यह मानवीय सभ्यता को
जतलाने का एक सशक्त साधन होती है जो बाह्य या ऊपरी ( अर्थ या )
स्वरूप का पूर्णतः ज्ञान करवाती है ।¹
देश, वेष भाषा एवं आचार से मुख्यतः प्रवृत्ति का सम्बन्ध रहता है
जो इनका आधार भी है, परन्तु इनकी विभिन्नताओं के कारण प्रवृत्तियों के
अनेक प्रभेद नहीं हुए वे केवल चार ही रखे गये हैं। इसका कारण भी
अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि—'नाट्य चित्तवृत्ति प्रधान होता है, जिसमें
अनेक मानवीय मनोदशाओं को नाट्यरूप प्रदान करना पड़ता है तथा जिनमें
देश, भाषा, वेष एवं आचार सहायक होते है, परन्तु यदि इन असंख्य
प्रवृत्तियों के वर्गीकरण से व्यवस्थित रूप में इनकी शिक्षा तथा अभ्यास सम्भव
नहीं होगा। इसी कारण विभिन्नता के मध्य भी समान लक्षणों के आधार पर
वर्गीकरण में प्रधानतः प्रवृत्तियों के चार प्रभेद ही रखे गये हैं।
उत्तरकालीन नाट्य एवं साहित्य के आचार्यों ने भी प्रवृत्ति के स्वरूपादि
पर विचार किये हैं। राजशेखर तथा महाराजाधिराज भोज ने वेषविन्यास-
क्रम को 'प्रवृत्ति' माना जब कि धनञ्जय तथा शारदातनय ने देश, वेष,
भाषा तथा व्यवहारों को प्रवृत्ति के अन्तर्गत मान्य किया। इस विवेचन
से भरतमुनि के व्यापक विवरण को प्रगति नहीं मिली। आचार्य विश्वनाथ
कविराज ने स्वतन्त्र रूप में प्रवृत्ति का विवेचन न देकर उसे भाषाविधान
कह कर ही अपना विवरण पूर्ण कर डाला। इस प्रकार भरतमुनि ने जिस
प्रवृत्तिविवेचन को परम्परा के मूलपीठगत आधारके कारण संकेतित किया था
उसे उत्तरवर्ती शास्त्रकारों ने केवल उसका संकेत करते हुए ही विवरण दिया
तथा उसकी उपयोगिता एवं महत्त्व पर अधिक ध्यान नहीं दिया यही प्रतीत
होता है।
परन्तु प्रवृत्ति की उपयोगिता एवं महत्व की नाट्यप्रयोग के क्षेत्र में स्थिति
वही है जो भरत मुनि ने बतलायी है। पात्रों की वेषभूषा, भाष, व्यवहार
१. द्रष्ट—अभि० भा० Vol II B O. S. E. Page. 205 207 202

( ३६ )
आदि की स्थानीय विशेषतायें नाट्य में दिखलाना अभीष्ट होता है, जिससे
नाट्याभिनय में यथार्थता आ सके। यद्यपि प्रवृत्ति को अन्य विद्वान् आहार्य-
अभिनय के अन्तर्गत भी ( इसमें स्थित वेष के कारण ) मानते हैं तथा उसके
अन्तर्गत स्थानीय संस्कार, व्यवहार एवं भाषा का समावेश करते हैं, जो
नाट्यकार के सूक्ष्मनिरीक्षण के कारण अभिनय में समायोजित करना
नाट्याचार्य के द्वारा आवश्यक भी होता है। क्योंकि नाट्यकार अपनी कृति
में विभिन्न प्रदेश के पात्रों की सहज प्रवृत्ति रखता है। यदि नाट्यकार सभी
पात्रों को एक समान रूप में अङ्कित करें तो उसे सामाजिक सहृदय ठीक से
नहीं देखते न ही उनकी रुचि उसमें आ पाएगी।
नाट्यप्रयोक्ताजन एवं शास्त्रपरम्परा की मान्यता के अनुरोध पर भरत-
मुनि प्रतिपादित प्रवृत्ति के चार भेदों का संकेत पूर्व में दिया जा चुका है। ये
चार प्रभेद हैं—( १ ) आवन्ती, ( २ ) दाक्षिणात्या, ( ३ ) पाञ्चाल
मध्यमा तथा ( ४ ) औढ्रमागधी। भोज ने बाद में एक पाञ्चाली प्रवृत्ति
को जोड़ कर प्रवृत्तियों की संख्या पाँच मानी थी। यहाँ यह भी ध्यान देने
योग्य बात है कि प्रवृत्ति का यह विभाजन भरतकालीन भारत के भौगोलिक
विभाजन तथा वेषभूषा से सम्बद्ध लोकव्यवहारों पर निर्भर था। इसलिये
कई जनपदों को मिला कर बनाए गये एक बड़े भूभाग के लिये एक प्रवृत्ति
का प्रधानतः उपयोग होता था जो उसकी प्रधानता को सूचक भी हो जाती
थी। जैसे यदि किसी विस्तीर्ण भूभाग में शृङ्गार की प्रधानता है तो किसी में
अन्य। अतएव इन विविध विशेषताओं से युक्त एवं प्रसाधित होकर ही पात्र
अपना नाट्यप्रयोग प्रस्तुत करते थे परन्तु उनकी वेषभूषा, भाषा तथा
व्यवहार उन्हें अन्य पात्रों से विशिष्ट बना देते थे। वेष और भाषा तो
वास्तविक रूप में अवान्तर कारण थे किन्तु यहाँ देशभेद एवं स्वभाव की
भिन्नता भी प्रवृत्ति भेद में भिन्नता का संकेत देते ही हैं।
दाक्षिणात्या प्रवृत्ति—यह प्रवृत्ति शृंगारप्रधान होती है। इसका
कारण है दक्षिणदेशवासियों की नृत्य, गीत एवं वाद्यप्रियता रहना। इसी
कारण उनके अभिनय चतुर, मधुर तथा ललित रहते हैं। दाक्षिणात्य देश के
अन्तर्गत दक्षिण के सभी प्रदेशों का समावेश समझना चाहिए। महेन्द्र, मलय,
सह्य, मेकल तथा पालमंजर पर्वतों के मध्य स्थित प्रदेश दाक्षिणात्य माने जाते
हैं। इनके वेष, भाषा तथा आचार में परस्पर अतिशय साम्य रहता है।
दाक्षिणात्य प्रवृत्ति सुकुमारता लिये रहने से वैदर्भी रीति से भी साम्य रखती
है, क्योंकि विदर्भ दाक्षिणात्य देश के रूप में भी प्रसिद्ध है ही। दाक्षिणात्यों

( ४० )
की संगीत विषयक सुस्वरता एवं ध्वनि की सहज रमणीयता को तो कुन्तक ने
अपने 'वक्रोक्ति-जीवित' नामक ग्रन्थ में दिखलाया भी है ।
आवन्तिकी-प्रवृत्ति—यह प्रवृत्ति अवन्ती, विदिशा, सौराष्ट्र, मालव,
सिन्धु, सौवीर, आर्बुद, दशार्ण, त्रिपुर, मृत्तिकावत् प्रदेशों के वासियों की भाषा,
वेषभूषा तथा आचार-विचार आदि से सम्बद्ध होती है । अतः जब इन देशों के
पात्र नाट्यप्रयोग में प्रस्तुत होते हैं तो उनकी वेषभूषा तथा भाषा तदनुसार
रहती है । इसमें सात्वती तथा कैशिकी वृत्तियों का प्रयोग रहता है । अवन्ती
प्रदेश की स्त्रियों के वेशविन्यास में कुन्तल या घुंघराले केशों में उनका प्रसाधन
रखा जाता है, क्योंकि नाट्यप्रयोग में देशज वेष महत्त्व रखता है । इसमें
धर्मश्रृङ्गार की प्रधानता होती है अतः सात्वती एवं कैशिकी वृत्ति का यहाँ
समन्वय रखा जाता है ।
औढ्रमागधी प्रवृत्ति—यह प्रवृत्ति अङ्ग, कलिङ्ग, वत्स, औढ्रमागध,
पौण्ड्र, नेपाल, अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि, मालद, ब्रह्मोत्तर, प्राग्ज्योतिष, पुलिन्द,
विदेह, ताम्रलिप्त तथा प्राच्य देशों के निवासी पात्रों में प्रयुक्त की जाती है
तथा पूर्वदिशा के निवासी भी इसी का प्रयोग करते हैं । प्राच्यदेश की सीमा
समुद्र तट से चलती हुई दक्षिण तक जाती है तथा इधर उत्तर में मगध देश तक
लगती है, अतः इन दोनों छोरों की मध्यवर्ती होने से इसे औढमागधी कहा
जाता है । यह आन्ध्र तथा कलिङ्ग दोनों के आचारों आदि की उपजीव्यता
धारण करती है तथा दोनों के कारण ही इसके नाम में एकीभाव या मिश्रण
विद्यमान है जो इस प्रवृत्ति में भी परिलक्षित होता है । इसमें भारती तथा
आरभटी वृत्ति का समन्वय रहता है तथा आडम्बर प्रधान घटाटोप भरे
वाक्यों का प्रयोग इसमें प्रचुरता से रखा जाता है । इसके अन्तर्गत जिन-जिन
प्रदेशों की परिगणना हुई है उनका उल्लेख किञ्चित् परिवर्तन से पुराणों में
मिलता है ।
पाञ्चालमध्यमाप्रवृत्ति—यह प्रवृत्ति पांचाल, शूरसेन, काश्मीर,
हस्तिनापुर वाह्लीक, काकल, मद्र, कुशीनर तथा हिमालय के समीपवर्ती प्रदेश
एवं गङ्गानदी के उत्तर की ओर के निवासी जनपदों के पात्रों में प्रयुक्त की
जाती है । इस प्रवृत्ति में सात्वती और आरभटी वृत्तियों की प्रचुरता रखी
जाती है तथा गीतप्रयोग की अल्पता के कारण कैशिकी वृत्ति का प्रयोग
नहीं रहता है ।
इन प्रवृत्तियों के अनुसार ही भरतमुनि ने पात्रों के रंगमञ्च पर प्रवेश की
विधि भी दिखलाई है । इसकी दो विधियां हैं :—आवन्ती तथा दाक्षिणात्या

( ४१ )
प्रवृत्ति के पात्रों का रङ्गमञ्च पर प्रवेश उत्तर दिशा से तथा पाञ्चालमध्यमा
एवं औड्रमागधी प्रवृत्ति के पात्रों का दक्षिण दिशा के द्वार से होता है । जहाँ
मञ्च पर द्वार न हो वहाँ आवन्ती और दाक्षिणात्या के पात्र दाहिनी बाजू से
तथा पाञ्चाल मध्यमा एवं औड्रमागधी के पात्र बाईं बाजू से प्रवेश करते हैं ।
इस प्रकार नाट्य में किया गया यह विधान प्रवृत्तिभेद को दिखलाता है ।
प्रवृत्तियों की इन विभिन्नताओं का प्रयोग नाट्य ( अभिनय ) में ही होता है
गीत में नहीं । गीत में इनका समन्वित प्रयोग ही इष्ट होता है ।
महाराजाधिराज भोज ने भी प्रवृत्तियों का विस्तृत विवरण दिया है तथा
एक अतिरिक्त प्रवृत्ति पाञ्चाली या पौरस्त्या की भी परिगणना की है । यह
प्रवृत्ति पूर्व देशों का सङ्केत करती है परन्तु पूर्वदेशों का संकेत करने वाली
औड्रमागधी का भी उल्लेख भोज ने किया है । भोज के प्रवृत्तिविधान में
वेषभूषा की विभिन्नता का विवेचन करते हुए बतलाया गया कि लोक में
वेषभूषा केवल पात्र की विभिन्नता से ही परिवर्तित नहीं हो जाती परन्तु एक
ही पात्र की वेषभूषा अनेक कारणों एवं अवस्थाओं के सन्दर्भ में परिवर्तित भी
होती रहती है । इन कारणों तथा अवस्थाओं की परिगणना यद्यपि सम्भव
नहीं है परन्तु भोज ने इसे प्रवृत्ति के हेतु दिखलाया है । तदनुसार देश, काल,
पात्र, वय, शक्ति, साधन, अभिप्राय, व्याघात, विपरिणाम, निमित्त, बिहार,
उपहार, थल, छन्द, आश्रय, जाति, व्यक्ति, तथा विभव आदि के कारण
पात्र की ( मनुष्य की ) वेषभूषा में अन्तर आ जाता है तथा तदनुसार
नाट्यप्रयोग में उस लोकाचार का प्रयोग उचित होता है । उसे आहार्य
अभिनय के प्रसंग में भरत मुनि ने वेष, वय, अवस्था के अनुसार कथा के
परिवर्तन से प्रवृत्ति के विधान का संकेत किया है ।
भरतमुनि ने प्रवृत्तियों का विभाग मुख्यतः वृत्तियों के आधार पर ही
किया था । वृत्ति पात्रों की शारीरिक तथा मानसिक अवस्थाओं से सम्बद्ध
होती है जब कि प्रवृत्ति पात्रों की वेषभूषा, व्यवहार आदि से सम्बद्ध होती
है । वृत्ति व्यक्ति की अन्तश्चेतना तथा प्रवृत्ति उसकी बाह्य अभिव्यक्ति
होती है । इसीलिये नाट्यप्रयोग के चित्तवृत्ति प्रधान होने से उसमें वेषभूषादि
का प्रयोग सहायक हो जाता है ! इसका मूलतत्त्व यह है कि चित्तवृत्ति से
वेषभूषादि का प्रयोग होता है, जो वेष एवं भाषागत भेद तथा देशभेद से
स्वभाव भेद को नाट्यायित करने का है । स्वभावभिन्नता के आधार पर
ही उद्धत या मृदु वृत्तियों का विनिश्चय भी होता है । इस तथ्य को मुनि ने

( ४२ )
व्यापक दृष्टि से देखा था तथा उसे नियोजित करने का विधान भी दिखलाया
जिसकी अभिनवगुप्तपाद ने भी समर्थन करते हुए स्पष्ट व्याख्या दी ।
नाट्यप्रयोग के क्रम में देश, काल एवं अवस्था के अनुरूप प्रवृत्ति विधान
रहने पर ही रसास्वादन शक्य होता है। कभी प्रवृत्तियों का समन्वय भी
नाट्यप्रयोग के सौन्दर्य या अर्थ-युक्ति के आग्रहवश किया जाता है तथा
कभी देश, काल आदि के कारण भी। यदि यह होता है तो ही नाट्य की
समग्र परिकल्पना सम्भव है तथा ऐसे सामञ्जस्य के विपरीत नाट्य-प्रयोग
अयथार्थ एवं रसानुभूति की हीनता से ग्रसित हो सकता है । अतः प्रवृत्ति के
अनुरूप ही पात्रों की नाट्यप्रयोग में योजना का विधान रखा गया, क्योंकि
पात्र प्रेक्षकों के हृदय में भाव अङ्कित करने में इसी बाह्यपरिवेशमयी प्रवृत्ति
के योग से ही सफल होता है। यहाँ इन्हीं कारणों से प्रवृत्ति का ऐतिहासिक
महत्त्व एवं मूल्य भी है। यह सही है कि ये प्रवृत्तियाँ अपने स्वरूप में
कदाचित् भरतमुनि के पूर्व भी विद्यमान रहीं होंगी जिनको मुनि ने शास्त्र
बद्ध कर नाट्यप्रयोग में विनियोजित किया, क्योंकि ऐसा करने से नाट्यप्रयोग
समृद्ध एवं भाव सम्पन्न होता है यह निर्विवाद है ।
लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी—भरतमुनि ने अभिनय के इसी कथन
क्रम में नाट्याभिनय के अनुगामि होने से धर्मी का उल्लेख (अभिनय
कथन में बाद में) किया यद्यपि षष्ठ अध्याय में संग्रह तथा उद्देश्य
के कथन के प्रसंग में रस, भाव आदि एकादश (या त्रयोदश) तत्त्वों में
धर्मी का उल्लेख किया था। अभिनय अर्थात् नाट्यप्रयोग का जो अपना
धर्म या स्वभाव है उसके अनुकूल कार्य 'धर्मी' होता है। धर्म शब्द की
व्युत्पत्ति भी 'ध्रियते अनेन' 'धरति इति वा'। इस प्रकार √ धृ धातु से
मन् प्रत्यय निष्पन्न 'धर्म' शब्द है। अतः धर्मी का अर्थ हुआ जिसमें धर्म हो
या जो धर्म का अनुगमन करता हो। इसी कारण नाट्य में दो प्रकार के
धर्मी निरूपित किये गये—(१) लोकधर्मी तथा (२) नाट्यधर्मी ।
लोक में प्रचलित कार्य, आचार एवं व्यवहारों का शुद्ध अनुकरणात्मक
प्रस्तुतीकरण 'लोकधर्मी' होगा। जिसमें अपने सहज या प्रकृत भाग में स्वरूप
प्रस्तुत होता है तथा इसी कारण उसमें लोकजीवन की सहजवृत्तियों का
प्रभाव दिखता है। नाट्यधर्मी में शास्त्रीय उक्तियाँ या साङ्केतिक वाक्य,
स्वगत या आकाशभाषित आदि तथा रङ्गमञ्च पर प्रयोज्य वस्तु तथा भावों
का सङ्केत करने वाली असंख्य विधियाँ तथा निर्देश आते हैं। इसके अतिरिक्त
लोकदृष्ट सुख, दुःखादि के आङ्गिक अभिनयादि से प्रस्तुत नाट्य तथा

( ४३ )

अभिनयविधान एवं उनका प्रतिपादक यह नाट्यशास्त्र—ये सभी नाट्यधर्मी
कहलाते हैं।
लोकधर्मी (स्वरूप)—लोकधर्मी का स्वरूप बतलाते हुए मुनि ने
(नाट्यशास्त्र १४।६६-७० में) कहा कि—'यदि कोई रूपक लोकस्वभाव
के अनुसार भावप्रदर्शित करनेवाला, सादगी और बिना बाहरी दिखावट
वाला (अविकृत) कथावस्तु में प्रजाजन के सामान्य आचार, अवस्था
एवं क्रियाओं को प्रदर्शित करने वाला, लीला आदि ललित वर्तन से रहित
आङ्गिक चेष्टाओं से सहज भावों को प्रस्तुत करे तथा जिसमें अनेकविध
स्त्री एवं पुरुष पात्र हों तो वह 'लोकधर्मी' नाट्य है। आचार्य अभिनवगुप्त
ने भी कवि के द्वारा लोकधर्मी रूढ़ि के अनुसार यथावत् वस्तु मात्र के
रचना द्वारा तथा अभिनेता के द्वारा उसे तथैव प्रस्तुत करने को 'लोकधर्मी'
बतलाया क्योंकि इसमें स्वप्रतिभा से निर्मित अनुरञ्जनकारी वैचित्र्य की
कल्पित उद्भावनायें नहीं होतीं। आशय यही हैं कि यहाँ लोकानुसारी मानव
पात्रों की सहज प्रवृत्तियों को प्रमुखता देकर उपस्थित करने का उद्योग
रहता है अतः यह लोकधर्मी प्रयोग कहलाता है। इसके अतिरिक्त मानव की
सुख दुःखात्मक भावों में रहने वाली स्थिति का प्रकृतिसम्मत अङ्कन या प्रकृत
स्थिति में अभिनयविधान भी 'लोकधर्मी' ही होगा।
नाट्यधर्मी (स्वरूप)—इसी क्रम में भरतमुनि ने नाट्यधर्मी का
भी विशद विवरण दिया तथा उसे लोकधर्मी रूढ़ि की अपेक्षा अधिक
वैचित्र्याधायक, कल्पनासम्भरित तथा अनुरञ्जनक्षम बतलाया। तदनुसार
यदि किसी रूपकादि में इतिहास, पुराण आदि में प्रसिद्ध इतिवृत्त को
कल्पनात्मक परिवर्तन के द्वारा रंगमञ्च पर प्रस्तुत किया जाए तो वह
'नाट्यधर्मी' होता है। इसी प्रकार नाट्यरचना या रूपकादि में वाक्यावलि,
क्रियायें, प्राणिवर्ग (पुरुष तथा स्त्री पात्रादि) तथा भाव असामान्य रहें,
लक्षण से युक्त अङ्गहारों, नृत्त, अभिनयादि को स्वर तथा अलङ्कारादि
की योजना से युक्त रखा जाए तथा दिव्य तथा अदिव्य पात्रों के चरित्र
कुशलतापूर्वक वहन किये जाए तो यह भी 'नाट्यधर्मी' ही होगा। इसी प्रकार
जहाँ लोकप्रसिद्ध वस्तु के मूर्त रूप में कुशलता से प्रयोग किया जाता हो, जहाँ
समीपवर्ती पात्र के कथन न सुने जाते हों तथा अनुक्त कथन को सुनकर
उसका प्रत्युत्तर दिया जाय, जहाँ पर्वत, वाहन, विमान तथा ढाल, कवच,
शस्त्र तथा ध्वज आदि का मूर्त रूप में प्रयोग होता हो, जहाँ एक अभिनेता

एक भूमिका का निर्वाह करने के बाद पुनः दूसरी भूमिका को भी धारण कर
उसका भी अपने अभिनय कौशल से निर्वाह करता हो, जो स्त्री एक बार
अगम्य ( पूज्य या वृद्ध ) स्त्री की भूमिका ( को अभिनय द्वारा ) प्रस्तुत कर
पुनः गम्या ( नायिका या अन्य युवती स्त्री ) की भूमिका ले लेती हो तो यह
भी 'नाट्यधर्मी' हो जाता है।
इस प्रकार मुनि ने काव्य एवं नाट्य में चमत्कार तथा सौन्दर्य के
उद्भावन में लोकधर्मी रूढ़ियों की भाँति कुछ आधार ग्रहण करते हुए
सिद्धान्ततः 'नाट्यधर्मी' को दिखलाया है। यहाँ इतिहासादि प्रसिद्ध इतिवृत्त में
कल्पना के योग से नाट्यधर्मी' भाव रूढ़िबद्ध हो जाता है। इसी प्रकार
लक्षणादि सम्पन्न आङ्गिक अभिनय का अंगहारादि शास्त्रीय अङ्गों के साथ
प्रस्तुतीकरण तथा वाचिक अभिनय में अलङ्कारादि की योजना के साथ स्वर,
गीत आदि के साथ काव्य का व्यवस्थित रूप में नियमबद्ध उपस्थापन भी
'नाट्यधर्मी' है। नाट्यधर्मी का क्षेत्र व्यापक है जहाँ पात्रों की भूमिका में
विपर्यय होना, पात्रों का स्वभाव त्याग तथा परभाव में अभिनय करना,
संसार प्रसिद्ध पदार्थों एवं भावों का प्रतीकादि रूपों में प्रदर्शन तथा एक पात्र
का एक से अधिक भूमिका में आना, आङ्गिक अभिनय को विविध
वाद्यवादनादि के साथ प्रस्तुत करना, कक्ष्याविभाग के अन्तर्गत निर्दिष्ट
विधानों का अनुसरण करना तथा चित्राभिनयादि के सङ्केतात्मक विशिष्ट
अभिनय को सम्पन्न करना आदि अनेक बातें आती हैं।
इस प्रकार स्पष्ट है कि लोक के सहज जीवन या भाव का अनुकरण करने
वाला सहज अभिनय 'लोकधर्मी' तथा शास्त्रीय परम्परा का अनुगमन करने
वाला प्रतीकात्मक अभिनय 'नाट्यधर्मी' होता है। प्राचीन नाट्याचार्यों का
भी ध्यान नाट्यप्रयोग में स्वाभाविकता तथा प्रभावोत्पादकता की समस्या पर
गया था जिसके लिये उनने इन दो धर्मियों का विभाग करते हुए अपना
प्रयोगगत रास्ता निकाल लिया। इस प्रकार से स्त्री-पुरुषों के सहज
प्रस्तुतियाँ भी नाट्यप्रयोग में रहे तथा आवश्यकतानुसार उसमें परिष्कार
तथा अभिनयगत दक्षता के शास्त्रीय नियम तथा रूढ़ियों का भी
संयोजन रखा जाए। प्राचीन रङ्गकर्म के उपदेष्टा तथा प्रयोक्ता आचार्यों ने
इस सत्य को बहुत पहिले ही पहिचान लिया था कि वास्तविक कला की
उपलब्धि के लिये नाट्यधर्मी रूढ़ियों का परम्परानुगमन आवश्यक है। यदि
अतिवास्तविकतावादी ऐसी स्थिति में अस्वाभाविकता का दोषारोपण करें

( ४५ )
भी तो भी इस तथ्य से नकारा नहीं जा सकता है कि रूपक की रचनागत
स्थितियों के साथ-साथ उसके रङ्गमञ्च पर प्रयोग की सम्भावनाओं का
सूक्ष्म परीक्षण करने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रेक्षकवर्ग यदि वास्तविकता
का अतिशय कठोरता से आग्रह रखते होंगे तो किसी प्रकार भी रंगमञ्च पर
कोई भी नाट्यप्रयोग प्रस्तुत होना सम्भव नहीं है।
इससे यह भी विचार अल्पचिन्तन से विनिश्चित लगता है कि १"भरत-
काल में लोकधर्मी तथा नाटयधर्मी परम्पराएँ स्वतन्त्र रूप में विकसित हो
रहीं थीं। धर्मी पद्धति की अनभिज्ञता, रंगमञ्च निर्माण की विस्तृतविधियों
से अपरिचय तथा वस्तुगत वैचित्र्य के अभाव में भी 'लोकधर्मी 'तत्व
जनपदों की छाया में विकसित हो रहा था। जब कि नगरों में आयोजित
नाट्यप्रयोग शास्त्रानुमोदित तथा सुसंस्कृत होते थे तो ग्रामों के आयोजन शुद्ध
तथा प्रकृतरूप में। इस प्रकार ग्रामों तथा नगरों में प्रचलित नाट्य की दो
धाराओं को भरतमुनि ने लोक तथा नाट्यधर्मी के रूप में परिगणित किया
है"। क्योंकि दोनों विधाएँ ही नाट्यप्रयोग को प्रभावित करती है तथा
इनकी समान रूप से विकासयात्रा भी रहती है। अतः जनपदीय नाट्यरूपों
को किसी भी स्थिति में शास्त्रसम्मत लोकधर्मी का उदाहरण नहीं माना जा
सकता है। इसी प्रकार यह भी समझने की बात है कि नाट्यप्रयोग जिसे
धारण करता हो वही 'धर्मी' होता है तो नाट्यप्रयोग एक ओर तो अनुकरण
मूलक होगा तथा दूसरी कल्पनामूलक भी। नाटक फिर चाहे संस्कृत का हो
या ग्रामीण भाषा का—अपने अभिनयन के लिये उन्हें स्वाभाविकता के साथ-
साथ प्रतीकात्मकता का आधार लेना ही पड़ेगा। परन्तु स्वाभाविक अभिनय
विधान को लोकधर्मी तथा प्रतीकात्मक विधि को 'नाट्यधर्मी' मान कर
प्रयोग की समस्या का भरतमुनि ने समाधान निकाला था। अतः देशी
नाट्यपद्धति के नाम पर अभिनय व्यापार को प्रयोग में प्रविष्ट कर श्री
हबीब तनवीर ने भवभूति के जिस परिनिष्ठित रूपक 'उत्तररामचरित'
नाटक का भोंड़ा प्रदर्शन उज्जयिनी के "कालिदास समारोह" (वि०
सं० २०३२) में किया था वह किसी भी प्रकार रंगकर्मिता की प्रतिष्ठित
लोकपरम्परा का अनुगमन नहीं करता, न ही अभिनय की एक शैली कहकर
उसे भारतीय परम्परा से अनुगत वस्तु माना जा सकता है। इनमें स्थित
अस्वाभाविकता को लोकवृत्ति का विशेष या अनगढ़ रूप भी नहीं माना जा
१. द्रष्ट-भरत और भारतीय नाट्यकला—पृष्ठ ४४८

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सकता है, क्योंकि वैसा रहने पर होने वाला नाट्यप्रयोग एक अतिहीन या
सस्ता मनोरंजन का रूप लेकर उसे अधम श्रेणी की ओर धकेल देगा।
इस प्रकार लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी के विवरण से जहाँ उनकी स्थिति
तथा स्वरूप पर प्रकाश पड़ता है वहीं उनकी पारस्परिक विभेदकरेखाएँ भी
स्पष्टतः परिलक्षित हो जाती हैं। अतएव वाचिक अभिनय में प्रयुक्त संवाद
जहाँ लोकधर्मी होंगे वही 'गान' नाट्यधर्मी हो जायगा। इसी प्रकार स्वगत,
जनान्तिक, अपवारितक तथा आकाशभाषित जैसी विधियाँ नाट्यधर्मी ही
रहेंगी। आहार्याभिनय के अन्तर्गत अलङ्कारों तथा वस्त्रों का परिधान
लोकधर्मी होगा तो गति प्रचार में आने वाली आरोहण तथा अवरोहण आदि
की विधियाँ नाट्यधर्मी होंगी। सात्विक अभिनय के अन्तर्गत सहजभाव में
अश्रुप्रवाह की अवस्था लोकधर्मी तथा भावों के प्रदर्शन की स्थिति में शास्त्रीय
विधान के अन्तर्गत प्रस्तुत यही विधि 'नाट्यधर्मी' हो जायगी। इस प्रकार
इन विभेदों की कल्पना से ही स्पष्ट है कि 'लोकधर्मी' रूढ़ियाँ नाट्यधर्मी
रूढ़ियों की आधार तथा अनुग्राहक है अतः उनकी नाट्यप्रयोग की सिद्धि में
समान उपयोगिता तथा सहकार रहता है तथा किसी एक ही परम्परा से
रूपक को मञ्च पर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है ( नहीं इसमें विशुद्धता
का कोई आग्रह ही होना चाहिए )।
भरतमुनि के उत्तरभावी नाट्याचार्यों की दृष्टि ऐसी प्रयोगप्रधान नहीं
रही तथा इसी कारण धनञ्जय, धनिक आदि ने नाट्यधर्मी तथा लोकधर्मी
तथ्यों पर कोई विवरण नहीं दिये। महाराणा कुम्भ, वेमभूपाल आदि के
विवरण भी इस तथ्य पर अधिक नवीनता नहीं देते। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में
अवश्य इस विषय में कुछ विशेष विवरण मिलता है। तदनुसार लोकधर्मी
तथा नाट्यधर्मी विधाओं की स्थिति को दिखलाते हुए बतलाया गया कि ये
'धर्मी' दो प्रकार के हैं लोक तथा नाट्य। इनमें 'लोकधर्मी विधा के दो
विभाग होंगे—( १ ) चित्तवृत्यर्थिका तथा ( २ ) बाह्यवस्त्वनुकारिणी। इसी
प्रकार नाट्यधर्मी के भी—(१) कैशिकी शोभिनी तथा (२) अंशोपजीविनो
जैसे विभाग होंगे।
इनमें लोकधर्मी रूढि के अन्तर्गत जिन दो भेदों को दिखलाया गया उनमें
एक के अन्तर्गत मानवके सुखदुःखात्मक स्वभावगत प्रकृत अभिनय का विधान
है जहाँ आन्तरचित्तवृत्तियों का प्रस्फुटन होता है। दूसरे में नाट्यवस्तुओं का
संकेत रहता है जो मानव जीवन के चारों ओर स्थित प्राकृतिक सौन्दर्य है।
मानव जीवन उसकी आन्तरवृत्तियों तथा नाट्यपरिवेश दोनों ही लोकधर्मी

( ४७ )
प्रक्रियाओं से प्रयुक्त होता है। नाट्यधर्मी में कैशिकी शोभा की प्रक्रिया के
द्वारा अंगों के विलासपूर्ण हस्तव्यापार, गीत नृत्य आदि का प्रयोग होता है।
इसके अंशोपजीवनी नामक भेद के द्वारा ही कक्ष्याविभाग, प्रसाद, पर्वत, आदि
की विविध मुद्राओं तथा विधानों के द्वारा इच्छानुरूप प्रयोग होता है, क्योंकि
रंगमञ्च की सीमा के सीमित रहने से इनका पूर्णरूप में प्रयोग सम्भव नहीं
इसी कारण उनका अंशतः प्रयोग ही सम्भव रहता है तथा उसकी सूचना
दृश्यरूप में रङ्गमञ्च पर होती है तथा यही अंशोपजीवनी नाट्यधर्मी रूढ़ि या
विधा होती है।
भरतमुनि नाट्यविद्या के सिद्धान्त प्रदर्शक मात्र नहीं थे वे नाट्यप्रयोक्ता
भी थे, अतः स्वभावतः वे इन बातों में सन्तुलन रखते थे। उनकी यही वृत्ति
धर्मी निरूपण के प्रसंग में देखी जा सकती है। उनके लोकानुभूति तथा
लोकाचार से ही नाट्य तथा लोकधर्मी रूढ़ि के विकास को लिया भी था।
अतः लोकधर्मी रूढ़ियाँ नाट्यधर्मी के लिये चित्राधारवत् रहेंगी ही, क्योंकि
जो शास्त्र, कर्म, शिल्प तथा अन्य क्रियाएँ लोकधर्म में प्रवृत्त हैं, वे
ही 'नाट्य' हैं। उनके इस कथन के अतिरिक्त यह भी कहना कि
"लोक जीवन के नितान्त प्रकृतरूप में प्रस्तुत होने पर नाट्यप्रयोग में न
सौन्दर्यविधान होगा न ही जीवन का प्रभावशाली रूप ही चित्रित हो
पाएगा। क्योंकि समस्त अभिनयों की रूपक में योजना नाट्यार्थ को ध्यान
में रख कर ही की जाती है तथा नाट्यधर्मिता रूप आंशिक तत्त्व के
( अभिनय के ) बिना सामाजिक के हृदय में राग की प्रतीति नही होगी
तथा रस की सिद्धि भी।" ( ना० शा० १४।८२ ) अतः उसे प्रयोग की
स्थिति के अनुरूप ही धर्मियों की सामञ्जस्यपूर्ण योजना रखना होगा यह स्पष्ट
हो जाता है।
वाचिक अभिनय—नाट्यशास्त्र के पञ्चदशअध्याय से आरम्भ होकर
उन्नीसवें अध्याय तक ( सामान्यतः ) चलने वाला अभिनय का द्वितीय प्रमुख
प्रभेद है 'वाचिक अभिनय' जिसका नाट्यप्रयोग में संवाद रूप-में विधान
( रहता ) है तथा उपयोग किया जाता है। नाट्य का यह प्रमुख आधार
भूत तत्त्व है तथा सर्वप्रमुख अभिनय भी। इसी कारण भरतमुनि ने इसे
नाट्य का शरीर भी कहा है जिसका कारण है इसका वाणी द्वारा प्रस्तुत
होना तथा वाणी ही जब सब का मूल हो तो फिर अन्य अभिनय इसी का
आधार लेकर प्रवृत्त होगें हीं। यद्यपि मानवीय अन्तर्भावों की अभिव्यक्ति
सात्विक अभिनय से करने का विधान है किन्तु इनकी भी पूर्ति या पूर्णता