नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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भी तो भी इस तथ्य से नकारा नहीं जा सकता है कि रूपक की रचनागत
स्थितियों के साथ-साथ उसके रङ्गमञ्च पर प्रयोग की सम्भावनाओं का
सूक्ष्म परीक्षण करने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रेक्षकवर्ग यदि वास्तविकता
का अतिशय कठोरता से आग्रह रखते होंगे तो किसी प्रकार भी रंगमञ्च पर
कोई भी नाट्यप्रयोग प्रस्तुत होना सम्भव नहीं है।
इससे यह भी विचार अल्पचिन्तन से विनिश्चित लगता है कि १"भरत-
काल में लोकधर्मी तथा नाटयधर्मी परम्पराएँ स्वतन्त्र रूप में विकसित हो
रहीं थीं। धर्मी पद्धति की अनभिज्ञता, रंगमञ्च निर्माण की विस्तृतविधियों
से अपरिचय तथा वस्तुगत वैचित्र्य के अभाव में भी 'लोकधर्मी 'तत्व
जनपदों की छाया में विकसित हो रहा था। जब कि नगरों में आयोजित
नाट्यप्रयोग शास्त्रानुमोदित तथा सुसंस्कृत होते थे तो ग्रामों के आयोजन शुद्ध
तथा प्रकृतरूप में। इस प्रकार ग्रामों तथा नगरों में प्रचलित नाट्य की दो
धाराओं को भरतमुनि ने लोक तथा नाट्यधर्मी के रूप में परिगणित किया
है"। क्योंकि दोनों विधाएँ ही नाट्यप्रयोग को प्रभावित करती है तथा
इनकी समान रूप से विकासयात्रा भी रहती है। अतः जनपदीय नाट्यरूपों
को किसी भी स्थिति में शास्त्रसम्मत लोकधर्मी का उदाहरण नहीं माना जा
सकता है। इसी प्रकार यह भी समझने की बात है कि नाट्यप्रयोग जिसे
धारण करता हो वही 'धर्मी' होता है तो नाट्यप्रयोग एक ओर तो अनुकरण
मूलक होगा तथा दूसरी कल्पनामूलक भी। नाटक फिर चाहे संस्कृत का हो
या ग्रामीण भाषा का—अपने अभिनयन के लिये उन्हें स्वाभाविकता के साथ-
साथ प्रतीकात्मकता का आधार लेना ही पड़ेगा। परन्तु स्वाभाविक अभिनय
विधान को लोकधर्मी तथा प्रतीकात्मक विधि को 'नाट्यधर्मी' मान कर
प्रयोग की समस्या का भरतमुनि ने समाधान निकाला था। अतः देशी
नाट्यपद्धति के नाम पर अभिनय व्यापार को प्रयोग में प्रविष्ट कर श्री
हबीब तनवीर ने भवभूति के जिस परिनिष्ठित रूपक 'उत्तररामचरित'
नाटक का भोंड़ा प्रदर्शन उज्जयिनी के "कालिदास समारोह" (वि०
सं० २०३२) में किया था वह किसी भी प्रकार रंगकर्मिता की प्रतिष्ठित
लोकपरम्परा का अनुगमन नहीं करता, न ही अभिनय की एक शैली कहकर
उसे भारतीय परम्परा से अनुगत वस्तु माना जा सकता है। इनमें स्थित
अस्वाभाविकता को लोकवृत्ति का विशेष या अनगढ़ रूप भी नहीं माना जा
१. द्रष्ट-भरत और भारतीय नाट्यकला—पृष्ठ ४४८