नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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आदि की स्थानीय विशेषतायें नाट्य में दिखलाना अभीष्ट होता है, जिससे
नाट्याभिनय में यथार्थता आ सके। यद्यपि प्रवृत्ति को अन्य विद्वान् आहार्य-
अभिनय के अन्तर्गत भी ( इसमें स्थित वेष के कारण ) मानते हैं तथा उसके
अन्तर्गत स्थानीय संस्कार, व्यवहार एवं भाषा का समावेश करते हैं, जो
नाट्यकार के सूक्ष्मनिरीक्षण के कारण अभिनय में समायोजित करना
नाट्याचार्य के द्वारा आवश्यक भी होता है। क्योंकि नाट्यकार अपनी कृति
में विभिन्न प्रदेश के पात्रों की सहज प्रवृत्ति रखता है। यदि नाट्यकार सभी
पात्रों को एक समान रूप में अङ्कित करें तो उसे सामाजिक सहृदय ठीक से
नहीं देखते न ही उनकी रुचि उसमें आ पाएगी।
नाट्यप्रयोक्ताजन एवं शास्त्रपरम्परा की मान्यता के अनुरोध पर भरत-
मुनि प्रतिपादित प्रवृत्ति के चार भेदों का संकेत पूर्व में दिया जा चुका है। ये
चार प्रभेद हैं—( १ ) आवन्ती, ( २ ) दाक्षिणात्या, ( ३ ) पाञ्चाल
मध्यमा तथा ( ४ ) औढ्रमागधी। भोज ने बाद में एक पाञ्चाली प्रवृत्ति
को जोड़ कर प्रवृत्तियों की संख्या पाँच मानी थी। यहाँ यह भी ध्यान देने
योग्य बात है कि प्रवृत्ति का यह विभाजन भरतकालीन भारत के भौगोलिक
विभाजन तथा वेषभूषा से सम्बद्ध लोकव्यवहारों पर निर्भर था। इसलिये
कई जनपदों को मिला कर बनाए गये एक बड़े भूभाग के लिये एक प्रवृत्ति
का प्रधानतः उपयोग होता था जो उसकी प्रधानता को सूचक भी हो जाती
थी। जैसे यदि किसी विस्तीर्ण भूभाग में शृङ्गार की प्रधानता है तो किसी में
अन्य। अतएव इन विविध विशेषताओं से युक्त एवं प्रसाधित होकर ही पात्र
अपना नाट्यप्रयोग प्रस्तुत करते थे परन्तु उनकी वेषभूषा, भाषा तथा
व्यवहार उन्हें अन्य पात्रों से विशिष्ट बना देते थे। वेष और भाषा तो
वास्तविक रूप में अवान्तर कारण थे किन्तु यहाँ देशभेद एवं स्वभाव की
भिन्नता भी प्रवृत्ति भेद में भिन्नता का संकेत देते ही हैं।
दाक्षिणात्या प्रवृत्ति—यह प्रवृत्ति शृंगारप्रधान होती है। इसका
कारण है दक्षिणदेशवासियों की नृत्य, गीत एवं वाद्यप्रियता रहना। इसी
कारण उनके अभिनय चतुर, मधुर तथा ललित रहते हैं। दाक्षिणात्य देश के
अन्तर्गत दक्षिण के सभी प्रदेशों का समावेश समझना चाहिए। महेन्द्र, मलय,
सह्य, मेकल तथा पालमंजर पर्वतों के मध्य स्थित प्रदेश दाक्षिणात्य माने जाते
हैं। इनके वेष, भाषा तथा आचार में परस्पर अतिशय साम्य रहता है।
दाक्षिणात्य प्रवृत्ति सुकुमारता लिये रहने से वैदर्भी रीति से भी साम्य रखती
है, क्योंकि विदर्भ दाक्षिणात्य देश के रूप में भी प्रसिद्ध है ही। दाक्षिणात्यों