सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 668 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

( ४१ )
प्रवृत्ति के पात्रों का रङ्गमञ्च पर प्रवेश उत्तर दिशा से तथा पाञ्चालमध्यमा
एवं औड्रमागधी प्रवृत्ति के पात्रों का दक्षिण दिशा के द्वार से होता है । जहाँ
मञ्च पर द्वार न हो वहाँ आवन्ती और दाक्षिणात्या के पात्र दाहिनी बाजू से
तथा पाञ्चाल मध्यमा एवं औड्रमागधी के पात्र बाईं बाजू से प्रवेश करते हैं ।
इस प्रकार नाट्य में किया गया यह विधान प्रवृत्तिभेद को दिखलाता है ।
प्रवृत्तियों की इन विभिन्नताओं का प्रयोग नाट्य ( अभिनय ) में ही होता है
गीत में नहीं । गीत में इनका समन्वित प्रयोग ही इष्ट होता है ।
महाराजाधिराज भोज ने भी प्रवृत्तियों का विस्तृत विवरण दिया है तथा
एक अतिरिक्त प्रवृत्ति पाञ्चाली या पौरस्त्या की भी परिगणना की है । यह
प्रवृत्ति पूर्व देशों का सङ्केत करती है परन्तु पूर्वदेशों का संकेत करने वाली
औड्रमागधी का भी उल्लेख भोज ने किया है । भोज के प्रवृत्तिविधान में
वेषभूषा की विभिन्नता का विवेचन करते हुए बतलाया गया कि लोक में
वेषभूषा केवल पात्र की विभिन्नता से ही परिवर्तित नहीं हो जाती परन्तु एक
ही पात्र की वेषभूषा अनेक कारणों एवं अवस्थाओं के सन्दर्भ में परिवर्तित भी
होती रहती है । इन कारणों तथा अवस्थाओं की परिगणना यद्यपि सम्भव
नहीं है परन्तु भोज ने इसे प्रवृत्ति के हेतु दिखलाया है । तदनुसार देश, काल,
पात्र, वय, शक्ति, साधन, अभिप्राय, व्याघात, विपरिणाम, निमित्त, बिहार,
उपहार, थल, छन्द, आश्रय, जाति, व्यक्ति, तथा विभव आदि के कारण
पात्र की ( मनुष्य की ) वेषभूषा में अन्तर आ जाता है तथा तदनुसार
नाट्यप्रयोग में उस लोकाचार का प्रयोग उचित होता है । उसे आहार्य
अभिनय के प्रसंग में भरत मुनि ने वेष, वय, अवस्था के अनुसार कथा के
परिवर्तन से प्रवृत्ति के विधान का संकेत किया है ।
भरतमुनि ने प्रवृत्तियों का विभाग मुख्यतः वृत्तियों के आधार पर ही
किया था । वृत्ति पात्रों की शारीरिक तथा मानसिक अवस्थाओं से सम्बद्ध
होती है जब कि प्रवृत्ति पात्रों की वेषभूषा, व्यवहार आदि से सम्बद्ध होती
है । वृत्ति व्यक्ति की अन्तश्चेतना तथा प्रवृत्ति उसकी बाह्य अभिव्यक्ति
होती है । इसीलिये नाट्यप्रयोग के चित्तवृत्ति प्रधान होने से उसमें वेषभूषादि
का प्रयोग सहायक हो जाता है ! इसका मूलतत्त्व यह है कि चित्तवृत्ति से
वेषभूषादि का प्रयोग होता है, जो वेष एवं भाषागत भेद तथा देशभेद से
स्वभाव भेद को नाट्यायित करने का है । स्वभावभिन्नता के आधार पर
ही उद्धत या मृदु वृत्तियों का विनिश्चय भी होता है । इस तथ्य को मुनि ने