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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 668 में से

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पृष्ठ 54

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अभिनयविधान एवं उनका प्रतिपादक यह नाट्यशास्त्र—ये सभी नाट्यधर्मी
कहलाते हैं।
लोकधर्मी (स्वरूप)—लोकधर्मी का स्वरूप बतलाते हुए मुनि ने
(नाट्यशास्त्र १४।६६-७० में) कहा कि—'यदि कोई रूपक लोकस्वभाव
के अनुसार भावप्रदर्शित करनेवाला, सादगी और बिना बाहरी दिखावट
वाला (अविकृत) कथावस्तु में प्रजाजन के सामान्य आचार, अवस्था
एवं क्रियाओं को प्रदर्शित करने वाला, लीला आदि ललित वर्तन से रहित
आङ्गिक चेष्टाओं से सहज भावों को प्रस्तुत करे तथा जिसमें अनेकविध
स्त्री एवं पुरुष पात्र हों तो वह 'लोकधर्मी' नाट्य है। आचार्य अभिनवगुप्त
ने भी कवि के द्वारा लोकधर्मी रूढ़ि के अनुसार यथावत् वस्तु मात्र के
रचना द्वारा तथा अभिनेता के द्वारा उसे तथैव प्रस्तुत करने को 'लोकधर्मी'
बतलाया क्योंकि इसमें स्वप्रतिभा से निर्मित अनुरञ्जनकारी वैचित्र्य की
कल्पित उद्भावनायें नहीं होतीं। आशय यही हैं कि यहाँ लोकानुसारी मानव
पात्रों की सहज प्रवृत्तियों को प्रमुखता देकर उपस्थित करने का उद्योग
रहता है अतः यह लोकधर्मी प्रयोग कहलाता है। इसके अतिरिक्त मानव की
सुख दुःखात्मक भावों में रहने वाली स्थिति का प्रकृतिसम्मत अङ्कन या प्रकृत
स्थिति में अभिनयविधान भी 'लोकधर्मी' ही होगा।
नाट्यधर्मी (स्वरूप)—इसी क्रम में भरतमुनि ने नाट्यधर्मी का
भी विशद विवरण दिया तथा उसे लोकधर्मी रूढ़ि की अपेक्षा अधिक
वैचित्र्याधायक, कल्पनासम्भरित तथा अनुरञ्जनक्षम बतलाया। तदनुसार
यदि किसी रूपकादि में इतिहास, पुराण आदि में प्रसिद्ध इतिवृत्त को
कल्पनात्मक परिवर्तन के द्वारा रंगमञ्च पर प्रस्तुत किया जाए तो वह
'नाट्यधर्मी' होता है। इसी प्रकार नाट्यरचना या रूपकादि में वाक्यावलि,
क्रियायें, प्राणिवर्ग (पुरुष तथा स्त्री पात्रादि) तथा भाव असामान्य रहें,
लक्षण से युक्त अङ्गहारों, नृत्त, अभिनयादि को स्वर तथा अलङ्कारादि
की योजना से युक्त रखा जाए तथा दिव्य तथा अदिव्य पात्रों के चरित्र
कुशलतापूर्वक वहन किये जाए तो यह भी 'नाट्यधर्मी' ही होगा। इसी प्रकार
जहाँ लोकप्रसिद्ध वस्तु के मूर्त रूप में कुशलता से प्रयोग किया जाता हो, जहाँ
समीपवर्ती पात्र के कथन न सुने जाते हों तथा अनुक्त कथन को सुनकर
उसका प्रत्युत्तर दिया जाय, जहाँ पर्वत, वाहन, विमान तथा ढाल, कवच,
शस्त्र तथा ध्वज आदि का मूर्त रूप में प्रयोग होता हो, जहाँ एक अभिनेता