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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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सकता है, क्योंकि वैसा रहने पर होने वाला नाट्यप्रयोग एक अतिहीन या
सस्ता मनोरंजन का रूप लेकर उसे अधम श्रेणी की ओर धकेल देगा।
इस प्रकार लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी के विवरण से जहाँ उनकी स्थिति
तथा स्वरूप पर प्रकाश पड़ता है वहीं उनकी पारस्परिक विभेदकरेखाएँ भी
स्पष्टतः परिलक्षित हो जाती हैं। अतएव वाचिक अभिनय में प्रयुक्त संवाद
जहाँ लोकधर्मी होंगे वही 'गान' नाट्यधर्मी हो जायगा। इसी प्रकार स्वगत,
जनान्तिक, अपवारितक तथा आकाशभाषित जैसी विधियाँ नाट्यधर्मी ही
रहेंगी। आहार्याभिनय के अन्तर्गत अलङ्कारों तथा वस्त्रों का परिधान
लोकधर्मी होगा तो गति प्रचार में आने वाली आरोहण तथा अवरोहण आदि
की विधियाँ नाट्यधर्मी होंगी। सात्विक अभिनय के अन्तर्गत सहजभाव में
अश्रुप्रवाह की अवस्था लोकधर्मी तथा भावों के प्रदर्शन की स्थिति में शास्त्रीय
विधान के अन्तर्गत प्रस्तुत यही विधि 'नाट्यधर्मी' हो जायगी। इस प्रकार
इन विभेदों की कल्पना से ही स्पष्ट है कि 'लोकधर्मी' रूढ़ियाँ नाट्यधर्मी
रूढ़ियों की आधार तथा अनुग्राहक है अतः उनकी नाट्यप्रयोग की सिद्धि में
समान उपयोगिता तथा सहकार रहता है तथा किसी एक ही परम्परा से
रूपक को मञ्च पर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है ( नहीं इसमें विशुद्धता
का कोई आग्रह ही होना चाहिए )।
भरतमुनि के उत्तरभावी नाट्याचार्यों की दृष्टि ऐसी प्रयोगप्रधान नहीं
रही तथा इसी कारण धनञ्जय, धनिक आदि ने नाट्यधर्मी तथा लोकधर्मी
तथ्यों पर कोई विवरण नहीं दिये। महाराणा कुम्भ, वेमभूपाल आदि के
विवरण भी इस तथ्य पर अधिक नवीनता नहीं देते। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में
अवश्य इस विषय में कुछ विशेष विवरण मिलता है। तदनुसार लोकधर्मी
तथा नाट्यधर्मी विधाओं की स्थिति को दिखलाते हुए बतलाया गया कि ये
'धर्मी' दो प्रकार के हैं लोक तथा नाट्य। इनमें 'लोकधर्मी विधा के दो
विभाग होंगे—( १ ) चित्तवृत्यर्थिका तथा ( २ ) बाह्यवस्त्वनुकारिणी। इसी
प्रकार नाट्यधर्मी के भी—(१) कैशिकी शोभिनी तथा (२) अंशोपजीविनो
जैसे विभाग होंगे।
इनमें लोकधर्मी रूढि के अन्तर्गत जिन दो भेदों को दिखलाया गया उनमें
एक के अन्तर्गत मानवके सुखदुःखात्मक स्वभावगत प्रकृत अभिनय का विधान
है जहाँ आन्तरचित्तवृत्तियों का प्रस्फुटन होता है। दूसरे में नाट्यवस्तुओं का
संकेत रहता है जो मानव जीवन के चारों ओर स्थित प्राकृतिक सौन्दर्य है।
मानव जीवन उसकी आन्तरवृत्तियों तथा नाट्यपरिवेश दोनों ही लोकधर्मी