नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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की संगीत विषयक सुस्वरता एवं ध्वनि की सहज रमणीयता को तो कुन्तक ने
अपने 'वक्रोक्ति-जीवित' नामक ग्रन्थ में दिखलाया भी है ।
आवन्तिकी-प्रवृत्ति—यह प्रवृत्ति अवन्ती, विदिशा, सौराष्ट्र, मालव,
सिन्धु, सौवीर, आर्बुद, दशार्ण, त्रिपुर, मृत्तिकावत् प्रदेशों के वासियों की भाषा,
वेषभूषा तथा आचार-विचार आदि से सम्बद्ध होती है । अतः जब इन देशों के
पात्र नाट्यप्रयोग में प्रस्तुत होते हैं तो उनकी वेषभूषा तथा भाषा तदनुसार
रहती है । इसमें सात्वती तथा कैशिकी वृत्तियों का प्रयोग रहता है । अवन्ती
प्रदेश की स्त्रियों के वेशविन्यास में कुन्तल या घुंघराले केशों में उनका प्रसाधन
रखा जाता है, क्योंकि नाट्यप्रयोग में देशज वेष महत्त्व रखता है । इसमें
धर्मश्रृङ्गार की प्रधानता होती है अतः सात्वती एवं कैशिकी वृत्ति का यहाँ
समन्वय रखा जाता है ।
औढ्रमागधी प्रवृत्ति—यह प्रवृत्ति अङ्ग, कलिङ्ग, वत्स, औढ्रमागध,
पौण्ड्र, नेपाल, अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि, मालद, ब्रह्मोत्तर, प्राग्ज्योतिष, पुलिन्द,
विदेह, ताम्रलिप्त तथा प्राच्य देशों के निवासी पात्रों में प्रयुक्त की जाती है
तथा पूर्वदिशा के निवासी भी इसी का प्रयोग करते हैं । प्राच्यदेश की सीमा
समुद्र तट से चलती हुई दक्षिण तक जाती है तथा इधर उत्तर में मगध देश तक
लगती है, अतः इन दोनों छोरों की मध्यवर्ती होने से इसे औढमागधी कहा
जाता है । यह आन्ध्र तथा कलिङ्ग दोनों के आचारों आदि की उपजीव्यता
धारण करती है तथा दोनों के कारण ही इसके नाम में एकीभाव या मिश्रण
विद्यमान है जो इस प्रवृत्ति में भी परिलक्षित होता है । इसमें भारती तथा
आरभटी वृत्ति का समन्वय रहता है तथा आडम्बर प्रधान घटाटोप भरे
वाक्यों का प्रयोग इसमें प्रचुरता से रखा जाता है । इसके अन्तर्गत जिन-जिन
प्रदेशों की परिगणना हुई है उनका उल्लेख किञ्चित् परिवर्तन से पुराणों में
मिलता है ।
पाञ्चालमध्यमाप्रवृत्ति—यह प्रवृत्ति पांचाल, शूरसेन, काश्मीर,
हस्तिनापुर वाह्लीक, काकल, मद्र, कुशीनर तथा हिमालय के समीपवर्ती प्रदेश
एवं गङ्गानदी के उत्तर की ओर के निवासी जनपदों के पात्रों में प्रयुक्त की
जाती है । इस प्रवृत्ति में सात्वती और आरभटी वृत्तियों की प्रचुरता रखी
जाती है तथा गीतप्रयोग की अल्पता के कारण कैशिकी वृत्ति का प्रयोग
नहीं रहता है ।
इन प्रवृत्तियों के अनुसार ही भरतमुनि ने पात्रों के रंगमञ्च पर प्रवेश की
विधि भी दिखलाई है । इसकी दो विधियां हैं :—आवन्ती तथा दाक्षिणात्या