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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 668 में से

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पृष्ठ 55

एक भूमिका का निर्वाह करने के बाद पुनः दूसरी भूमिका को भी धारण कर
उसका भी अपने अभिनय कौशल से निर्वाह करता हो, जो स्त्री एक बार
अगम्य ( पूज्य या वृद्ध ) स्त्री की भूमिका ( को अभिनय द्वारा ) प्रस्तुत कर
पुनः गम्या ( नायिका या अन्य युवती स्त्री ) की भूमिका ले लेती हो तो यह
भी 'नाट्यधर्मी' हो जाता है।
इस प्रकार मुनि ने काव्य एवं नाट्य में चमत्कार तथा सौन्दर्य के
उद्भावन में लोकधर्मी रूढ़ियों की भाँति कुछ आधार ग्रहण करते हुए
सिद्धान्ततः 'नाट्यधर्मी' को दिखलाया है। यहाँ इतिहासादि प्रसिद्ध इतिवृत्त में
कल्पना के योग से नाट्यधर्मी' भाव रूढ़िबद्ध हो जाता है। इसी प्रकार
लक्षणादि सम्पन्न आङ्गिक अभिनय का अंगहारादि शास्त्रीय अङ्गों के साथ
प्रस्तुतीकरण तथा वाचिक अभिनय में अलङ्कारादि की योजना के साथ स्वर,
गीत आदि के साथ काव्य का व्यवस्थित रूप में नियमबद्ध उपस्थापन भी
'नाट्यधर्मी' है। नाट्यधर्मी का क्षेत्र व्यापक है जहाँ पात्रों की भूमिका में
विपर्यय होना, पात्रों का स्वभाव त्याग तथा परभाव में अभिनय करना,
संसार प्रसिद्ध पदार्थों एवं भावों का प्रतीकादि रूपों में प्रदर्शन तथा एक पात्र
का एक से अधिक भूमिका में आना, आङ्गिक अभिनय को विविध
वाद्यवादनादि के साथ प्रस्तुत करना, कक्ष्याविभाग के अन्तर्गत निर्दिष्ट
विधानों का अनुसरण करना तथा चित्राभिनयादि के सङ्केतात्मक विशिष्ट
अभिनय को सम्पन्न करना आदि अनेक बातें आती हैं।
इस प्रकार स्पष्ट है कि लोक के सहज जीवन या भाव का अनुकरण करने
वाला सहज अभिनय 'लोकधर्मी' तथा शास्त्रीय परम्परा का अनुगमन करने
वाला प्रतीकात्मक अभिनय 'नाट्यधर्मी' होता है। प्राचीन नाट्याचार्यों का
भी ध्यान नाट्यप्रयोग में स्वाभाविकता तथा प्रभावोत्पादकता की समस्या पर
गया था जिसके लिये उनने इन दो धर्मियों का विभाग करते हुए अपना
प्रयोगगत रास्ता निकाल लिया। इस प्रकार से स्त्री-पुरुषों के सहज
प्रस्तुतियाँ भी नाट्यप्रयोग में रहे तथा आवश्यकतानुसार उसमें परिष्कार
तथा अभिनयगत दक्षता के शास्त्रीय नियम तथा रूढ़ियों का भी
संयोजन रखा जाए। प्राचीन रङ्गकर्म के उपदेष्टा तथा प्रयोक्ता आचार्यों ने
इस सत्य को बहुत पहिले ही पहिचान लिया था कि वास्तविक कला की
उपलब्धि के लिये नाट्यधर्मी रूढ़ियों का परम्परानुगमन आवश्यक है। यदि
अतिवास्तविकतावादी ऐसी स्थिति में अस्वाभाविकता का दोषारोपण करें