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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 668 में से

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में व्यापक अर्थ में विधान भी है। भरतमुनि के अनुसार जो वृत्ति भारतवर्ष
के देशों में प्रचलित विभिन्न वेष, भाषा, आचार एवं वार्ता को स्थापन करती
हो वही 'प्रवृत्ति' है। आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने प्रवृत्ति शब्द की व्यापक
व्याख्या की है। उनके अनुसार प्रवृत्ति शब्द सूचना या प्रख्यापन के अर्थ में
यहाँ प्रयुक्त हुआ है। अतः जो सम्पूर्ण लोक में प्रचलित मानव की जीवन की
प्रवृत्तियों का ज्ञान करवाती हो वही 'प्रवृत्ति' है। यह मानवीय सभ्यता को
जतलाने का एक सशक्त साधन होती है जो बाह्य या ऊपरी ( अर्थ या )
स्वरूप का पूर्णतः ज्ञान करवाती है ।¹
देश, वेष भाषा एवं आचार से मुख्यतः प्रवृत्ति का सम्बन्ध रहता है
जो इनका आधार भी है, परन्तु इनकी विभिन्नताओं के कारण प्रवृत्तियों के
अनेक प्रभेद नहीं हुए वे केवल चार ही रखे गये हैं। इसका कारण भी
अभिनवगुप्तपाद ने बतलाया कि—'नाट्य चित्तवृत्ति प्रधान होता है, जिसमें
अनेक मानवीय मनोदशाओं को नाट्यरूप प्रदान करना पड़ता है तथा जिनमें
देश, भाषा, वेष एवं आचार सहायक होते है, परन्तु यदि इन असंख्य
प्रवृत्तियों के वर्गीकरण से व्यवस्थित रूप में इनकी शिक्षा तथा अभ्यास सम्भव
नहीं होगा। इसी कारण विभिन्नता के मध्य भी समान लक्षणों के आधार पर
वर्गीकरण में प्रधानतः प्रवृत्तियों के चार प्रभेद ही रखे गये हैं।
उत्तरकालीन नाट्य एवं साहित्य के आचार्यों ने भी प्रवृत्ति के स्वरूपादि
पर विचार किये हैं। राजशेखर तथा महाराजाधिराज भोज ने वेषविन्यास-
क्रम को 'प्रवृत्ति' माना जब कि धनञ्जय तथा शारदातनय ने देश, वेष,
भाषा तथा व्यवहारों को प्रवृत्ति के अन्तर्गत मान्य किया। इस विवेचन
से भरतमुनि के व्यापक विवरण को प्रगति नहीं मिली। आचार्य विश्वनाथ
कविराज ने स्वतन्त्र रूप में प्रवृत्ति का विवेचन न देकर उसे भाषाविधान
कह कर ही अपना विवरण पूर्ण कर डाला। इस प्रकार भरतमुनि ने जिस
प्रवृत्तिविवेचन को परम्परा के मूलपीठगत आधारके कारण संकेतित किया था
उसे उत्तरवर्ती शास्त्रकारों ने केवल उसका संकेत करते हुए ही विवरण दिया
तथा उसकी उपयोगिता एवं महत्त्व पर अधिक ध्यान नहीं दिया यही प्रतीत
होता है।
परन्तु प्रवृत्ति की उपयोगिता एवं महत्व की नाट्यप्रयोग के क्षेत्र में स्थिति
वही है जो भरत मुनि ने बतलायी है। पात्रों की वेषभूषा, भाष, व्यवहार
१. द्रष्ट—अभि० भा० Vol II B O. S. E. Page. 205 207 202