नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
२० :नाट्यशास्त्रम्
(अवशिष्ट) व्यभिचारीभावों की अभिव्यंजक दृष्टियों की योजना
बतलाता हूँ ॥ ८५ ॥
संचारी दृष्टियों की योजना—
शून्या दृष्टिस्तु चिन्तायामभितप्तापि कीर्तिता ।
निर्वेदे चापि मलिना वैवर्ण्ये च विधीयते ॥ ८६ ॥
चिन्ता में ‘शून्या’ तथा ‘अभितप्ता’ दृष्टि की एवं निर्वेद तथा वैवर्ण्य
में ‘मलिना दृष्टि’ की योजना करनी चाहिए ॥ ८६ ॥
श्रान्ता श्रमार्त्ते२ स्वेदे च लज्जायां ललिता तथा ।
अपस्मारे तथा व्याधौ ग्लानेयां३ ग्लाना विधीयते ॥ ८७ ॥
श्रम तथा स्वेद में ‘श्रान्ता’ दृष्टि की, लज्जा में ‘ललिता’ की एवं अपस्मार,
व्याधि तथा ग्लानि में ‘ग्लाना’ दृष्टि की योजना की जाए ॥ ८७ ॥
शङ्कायां शङ्किता ज्ञेया विषादार्थे विषादिनी ।
निद्रास्वप्नसुखार्थेषु मुकुला दृष्टिरिष्यते ॥ ८८ ॥
शंका में ‘शंकिता’ की, विषाद में ‘विषादिनी’ की और निद्रा स्वप्न,
तथा प्रसन्नता में ‘मुकुला’ दृष्टि की योजना की जाए ॥ ८८ ॥
कुञ्चितासूयितानिष्टदुष्प्रेक्षाक्षिव्यथासु च ।
अभितप्ता च निर्वेदे ह्यभिघाताभितापयोः ॥ ८९ ॥
असूया, अनिष्ट, तथा कष्ट से अनवलोकनीय वस्तु और आँखों की
पीड़ा में ‘कुञ्चिता’ दृष्टि की तथा निर्वेद, आकस्मिक चोट तथा अति-सन्ताप
में ‘अभितप्ता’ दृष्टि की योजना की जाए ॥ ८९ ॥
जिह्मा दृष्टिरसूयायां जडतालस्ययोस्तथा ।
धृतौ हर्षे सललिता स्मृतौ तर्के वितर्किता४ ॥ ९० ॥
असूया, जड़ता तथा आलस्य में ‘जिह्मा’ की, धैर्य (धृति) तथा हर्ष
में ‘ललिता’ की तथा स्मृति और तर्क में ‘वितर्किता’ दृष्टि की योजना की
जाए ॥ ९० ॥
आह्लादि५ष्वर्धमुकुला गन्धस्पर्शसुखादिषु ।
विभ्रान्ता दृष्टिरावेगे सम्भ्रमे विभ्रमे तथा ॥ ९१ ॥
१ स्तम्भे चापि प्रकीर्तिता—ग० । २. श्रमार्तौ—ख० ।
३. म्लाने ग्लाना—ख, म्लाने ग्लाना—ग० ।
४ स्मृता तर्के च तर्किता—ख०, ग० ।
५ आह्लादेष्वर्ध—ख, ग० । ६. गण्डस्पर्श—क० ।
मधुर गन्ध तथा स्पर्श से होने वाले आनन्द में 'अर्धमुकुला' की और
आवेग, संभ्रम तथा विश्रम में 'विभ्रान्ता' दृष्टि की योजना की जाए ॥९१॥
विप्लुता चापलो^१न्माददुःखार्त्तिमरणादिषु ।
आकेकरा दुरालोके विच्छेदेप्रो^२क्षितेषु च ॥ ९२ ॥
चपलता, उन्माद, दुःख, मानसिक व्यथा तथा मरण आदि में
'विप्लुता' की, दूरी के कारण न दिखलाई देने वाले पदार्थ, वियोग तथा
प्रोक्षण से संस्कृत वस्तु में 'आकेकरा' दृष्टि की योजना करना चाहिए ॥९२॥
विबोधगर्वामर्षौग्र्यमतिषु स्याद् विको^३शिता ।
त्रस्ता त्रासे भवेद्दृष्टिः मदिरा च मदेष्विति ॥ ९३ ॥
विबोध, मति, गर्व, अमर्ष, उग्रता तथा मति में 'विकोशिता' (दृष्टि)
की त्रास में 'त्रस्ता' की तथा मद में 'मदिरा' दृष्टि की योजना करनी
चाहिए ॥ ९३ ॥
षट्त्रिंशद्दृष्टयो ह्येता यथावत् समुदाहृताः ।
रसजानां तु दृष्टीनां भावजानां तथैव च ॥ ९४ ॥
तारापुटभ्रुवां कर्म गदतो मे निबोधत ।
इस प्रकार मैंने इन छत्तीस प्रकार की दृष्टियों का उचित प्रकार से
वर्णन कर दिया। अब रस तथा भाव में होने वाले पुतलियों, पलकों तथा
भौंहों के कार्य बतलाता हूँ ॥ ९४-९५ ॥
पुतलियों के कार्य (तारा-कर्म)—
भ्रमणं वलनं पातश्चलनं सम्प्रवेशनम् ॥ ९५ ॥
विवर्त्तनं समुद्वृत्तं निष्क्रामः प्राकृतं तथा ।
ए^४तानि नवकर्माणि ताराकर्म द्विजोत्तमाः ॥ ९६ ॥
पुतलियों के नव कार्य होते हैं—(१) भ्रमण (२) वलन (३)
पात (४) चलन (५) सम्प्रवेशन (६) विवर्तन (७) समुद्वृत्त (८)
निष्क्राम तथा (९) प्राकृत ॥ ९५-९६ ॥
शृणुध्वं लक्षणं तावत् साम्प्रतं प्रीतितः स्फुटम् ।
पुटा^५न्तर्मण्डलावृत्तिस्तारयोर्भ्रमणं स्मृतम् ॥ ९७ ॥
१. च चलोन्माद—क०, चापलो—ख० । २. विच्छेदे प्रेक्षितेषु—ख, ग० ।
३. द्विकासिता—ख० । ४. पद्यार्धमेतत् ख–ग–पुस्तकयोर्नास्ति ।
५. पर्यन्तमण्डला—क०, पर्यस्तं—ग० ।
२२ नाट्यशास्त्रम्
वलनं गमनं त्र्यश्रं पातनं स्रस्तता तथा।
चलनं कम्पनं ज्ञेयः प्रवेशोऽन्तः प्रवेशनम् ॥ ९८ ॥
विवर्तनं कटाक्षस्तु समुद्वृत्तं समुन्नतिः ।
निष्कामो निर्गमः प्रोक्तः प्राकृतन्तु स्वभावजम् ॥ ९९ ॥
हे मुनियों, पुतलियों के कार्य के ये ९ प्रकार हैं। अब प्रीति पूर्वक
इनके स्फुट लक्षण सुनिये—
पलकों में पुतलियों के गोल घुमाव को 'भ्रमण,' पुतली को तिरछा ले
जाना 'वलन' पुतली का ऊपर से (सीधा) नीचे आना 'पात,' पुतली का
दोनों ओर बराबर घूमना (हिलना) 'चलन,' पुतली का अन्दर खिंचना
या जाना 'सम्प्रवेशन,' एक कोने में पुतली ले जाकर कटाक्षपूर्ण देखना
'विवर्तन,' पुतलियों का फैलाव लेते हुए ऊपर की ओर उठना 'समुद्वृत्त,'
बाहर की ओर पुतलियों का धकेलना 'निष्काम' तथा पुतलियों का अपनी
स्वाभाविक अवस्था में रहना 'प्राकृत' (कर्म) कहलाता है ॥ ९७-९९)
ताराकर्म की अभिनय योजना—
अथै²षां रसभावेषु विनियोगं निबोधत ।
भ्रमणं वल³नोद्वृत्ते निष्कामो वीररौद्रयोः ॥ १०० ॥
निष्क्रामणं सं⁴वलनं कर्त्तव्यं हि भयानके ।
हास्यबीभत्सयोश्चापि प्रवेशनमिहेष्यते ॥ १०१ ॥
पातनं करुणे कार्यं निष्क्रामणमथाद्भुते ।
प्राकृतं शेषभावेषु शृङ्गारे च विवर्त्तितम् ॥ १०२ ॥
स्वभावसिद्धमेवैतत् कर्म लोकक्रियाश्रयम् ।
एवं रसे⁵षु भावेषु ताराकर्माणि योजयेत् ॥ १०३ ॥
अब मैं इनकी रस तथा भावों में की जानेवाली योजना बतलाता हूँ—
भ्रमण, वलन, उद्भृत तथा निष्काम की वीर तथा रौद्र रस में, निष्काम तथा
वलन की भयानक रस में, प्रवेशन की हास्य तथा बीभत्स में, पातन की करुण
में, निष्काम की अद्भुत में, प्राकृत की अवशिष्ट भावों में तथा शृङ्गार रस
में विवर्तित की योजना की जाए । ये पुतलियों के स्वाभाविक तथा लोक-
१. चलनं—ख-ग० । २ तथैषां—ग० । ३. चलनो—ग० ।
४. सचलनं—क०, सञ्चलनं—ख०, संवलनं-ग० ।
५. सर्वेषु—ग० ।
क्रियाओं के आश्रित रहने वाले कार्य हैं। इनकी इसी विधि से रस तथा
भावों में संयोजना की जाए ॥ १००-१०३ ॥
दर्शन (अवलोकन) के विविध प्रकार—
अथात्रैव प्रवक्ष्यामि प्रकारान् दर्शनस्य तु ।
समं साच्यनुवृत्ते च ह्यालोकितविलोकिते ॥ १०४ ॥
प्रलोकितोल्लोकिते चाप्यवलोकितमेव च ।
समतारश्च सौम्यश्च यद् दृष्टं तत्समं स्मृतम् ॥ १०५ ॥
पक्ष्मान्तर्गततारं यत् त्र्यश्रं साचीकृतन्तु तत् ।
रूपनिर्वर्णनायुक्तमनुवृत्तमिति स्मृतम् ॥ १०६ ॥
सहसा दर्शनं यत् स्यात् तदालोकितमुच्यते ।
विलोकितं पृष्ठतस्तु पार्श्वाभ्यान्तु प्रलोकितम् ॥ १०७ ॥
ऊर्ध्वमुल्लोकितं ज्ञेयमवलोकितमप्यधः ।
इत्येष दर्शनविधिः सर्वभावरसाश्रयः ॥ १०८ ॥
अब मैं इन्हीं से सम्बद्ध दर्शन के (विभिन्न) प्रकारों को बतलाता
हूँ। ये आठ होते हैं—(१) सम, (२) साची (३) अनुवृत्त (४) आलोकित
(५) विलोकित (६) प्रलोकित (७) उल्लोकित तथा (८) अवलोकित ।
इनके क्रमशः लक्षण इस प्रकार हैं :—
जिसमें पुतलियां समान तथा सौम्य (विश्रामयुक्त या किसी विशेष
भाव से रहित) हों तो उसे 'सम', जिसमें पुतलियाँ पलकों के अन्दर
दबकर तिरछी हो जाए तो 'साची', चारों ओर किसी भी स्वरूप को ध्यान
पूर्वक देखने पर 'अनुवृत्त', सहसा किसी वस्तु का देखना 'आलोकित',
पीछे की ओर देखना 'विलोकित', (क्रमशः) दोनों कोखों की ओर देखना
'प्रलोकित', ऊपर की ओर देखना 'उल्लोकित' तथा नीचे की (भूमि की)
ओर देखना 'अवलोकित' समझना चाहिए। (इस प्रकार) सभी रसों तथा
भावों में होने वाला दर्शन का यह विधान मैंने बतलाया ॥ १०४-१०८ ॥
पुट-कर्म (पलकों के प्रकार)—
तारागतोऽस्यानुगतं पुटकर्म निबोधत ।
उन्मेषश्च निमेषश्च प्रसृतं कुञ्चितं समम् ॥ १०९ ॥
१. तथा तत्रैव वक्ष्यामः प्रकारं—ग० । २. निर्वापणा—ग० ।
३. स्फुटम्—ग० । ४. इत्यष्टौ—क० ।
२४ नाट्यशास्त्रम्
विवर्तितं सं१ स्फुरितं पिहितं सविता२डितम् ।
अब मैं पुतलियों की गति के अनुसार होने वाले 'पुटकर्म' विधान
(पलकों के विभेदों) को बतलाता हूँ। ये पुटकर्म ९ हैं—(१) उन्मेष
(२) निमेष (३) प्रसृत (४) कुञ्चित (५) सम (६) विवर्तित
(७) स्फुरित (८) पिहित तथा (९) विताडित ॥ १०९-११० ॥
विश्लेषः पुटयोर्यस्तु स३ उन्मेषः प्रकीर्तितः ॥ ११० ॥
समागमो निमेषः स्यादायामः प्रसृतं भवेत् ।
आकुञ्चितं कुञ्चितं स्यात् समं स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ १११ ॥
विवर्तितं समुद्वृत्तं स्फुरितं स्पन्दितं तथा ।
स्थगितं पिहितं प्रोक्तमाहतन्तु विताडितम् ॥ ११२ ॥
इनके क्रमशः लक्षण इस प्रकार हैं :—
पलकों का एक दूसरे से अलग होना 'उन्मेष', उनका इकट्ठा होना
(मिलना) 'निमेष', पलकों का फैलाव 'प्रसृत', पलकों का सिकुड़ना
'कुञ्चित', पलकों का अपनी स्वाभाविक अवस्था में रहना 'सम', पलकों का
ऊपर की ओर उठाना 'विवर्तित', पलकों का स्पन्दन (अर्थात् सिकुड़ाकर
फैलाना) 'स्फुरित', पलकों का बन्द करना 'पिहित' तथा आकस्मिक
रूप में पलकों का पटपटाना 'विताड़ित' कहलाता है ॥ ११०-११२ ॥
पुटकर्म की अभिनय-योजना—
अथैषां रसभावेषु विनियोगं निबोधत ।
क्रोधे विवर्तितं कार्यं निमेषोन्मेषणैः सह ॥ ११३ ॥
विस्मयार्थे च हर्षे च वीरे९ च प्रसृतं स्मृतम् ।
अनिष्टदर्शने गन्धे रसे स्पर्शे च कुञ्चितम् ॥ ११४ ॥
शृङ्गारे च समं कार्यमीर्ष्यासु स्फुरितं तथा१०।
सुप्तमूर्च्छितवातोष्णधूमवर्षाञ्जनात्तिषु११ ॥ ११५ ॥
१. प्रस्फुरितं—ख० । २. सविताडितम्—ख-ग० ।
३. स तून्मेषः—ख, ग० । ४. समागतो—ग० ।
५. आयामस्तु प्रसारितम्—ग । ६ स्पन्दितं—ग० ।
७ वितालितम्—ख-ग० । ८. विवर्तितः कार्यः—ग० ।
९. वीर्ये चैव प्रसारितम्—ग० । १०. भवेत्—ग० ।
११. वर्षाञ्जनादिषु—ख, वर्षाशनाथिषु—ग० ।
अष्टमोऽध्यायः ३६
नेत्ररोगे च पिहितमभिघाते विताडितम् ।
इत्येषु रसभावेषु तारकापुटयोर्विधिः ॥ ११६ ॥
अब इनकी रस तथा भावों में योजना बतलाता हूँ । निमेष, उन्मेष,
तथा विवर्तन की क्रोध भाव में, अद्भुत, वीररस तथा हर्ष भाव में 'प्रसृत'
की, कुत्सित पदार्थ के अवलोकन, गन्ध, रस तथा स्पर्श में 'कुञ्चित' की,
शृङ्गार में 'सम' की, ईर्ष्या में 'स्फुरित' की, निद्रा, मूच्छा, पवन, उष्णता, धुआं,
वर्षा, अंजन-लेपन, पीडा तथा नेत्र-रोग में 'पिहित' की तथा आकस्मिक
चोट में 'विताड़ित' की योजना करनी चाहिए ।
इस प्रकार मैंने रस तथा भाव में होने वाला पुतलियों तथा पलकों का
अभिनय विधान बतलाया ॥ ११६ ॥
भ्रुकुटी-कर्म—
कार्यानुगतमस्यैव भ्रुवोः कर्म निबोधत ।
उत्क्षेपः पातनं चैव भ्रुकुटी चतुरन्तथा ॥ ११७ ॥
कुञ्चितं रेचितञ्चैव सहजञ्चेति सप्तधा ।
अब इन्हीं (पुतलियों तथा पलकों) के अनुसार होने वाले भ्रुकुटी के
कार्यों को बतलाता हूँ। भ्रुकुटीकर्म के सात प्रकार होते हैं—(१) उत्क्षेप,
(२) पातन, (३) भ्रुकुटी, (४) चतुर, (५) कुञ्चित, (६) रेचित
तथा (७) सहज ॥ ११७-११८ ॥
भ्रुवोरुन्नतिरुत्क्षेपः सममेकैकशोऽपि वा ॥ ११८ ॥
अनेनैव क्रमेणैव पातनं स्यादधोमुखम् ।
भ्रुवोर्मूलसमुत्क्षेपाद् भ्रुकुटी परिकीर्तिता ॥ ११९ ॥
चतुरं किञ्चिदुच्छ्वासान्मधुरायतं ता भ्रुवोः ।
एकस्या हि द्वयोर्वापि मृदुभङ्गस्तु कुञ्चितम् ॥ १२० ॥
एकस्या एक ललितादुत्क्षेपाद् रेचितं भ्रुवः ।
सहजातं तु सहजं कर्म स्वाभाविकं स्मृतम् ॥ १२१ ॥
१. वितालितम्—ख० । २. इत्येवं—ग० ।
३. कार्येऽनुगत—ग० । ४. भ्रुवोः—ख० ।
५. चैव—ग० । ६. रुद्रति—ख० ।
७. एकस्य वा द्वयोर्वापि—ग० । ८. द्वयो—क० ।
९. मधुरायतयोर्भ्रुवोः—ग० । १० उभयो—ख-ग० ।
११. मृदुभागेन--क; मृदुभङ्गेन—ख-ग० ।
२६ नाट्यशास्त्रम्
इनके लक्षण इस प्रकार हैं—भ्रुकुटियों का एक साथ या क्रमशः ऊपर
चढ़ाना 'उत्क्षेप', इसी क्रम से ( उनका ) नीचे उतारता 'पातन', भ्रुकुटी
के ( दोनों ) मूलों को एक साथ ऊपर चढ़ाना 'भ्रुकुटी', दोनों भ्रुकुटियों
की थोड़े हलन चलन के द्वारा मधुरता तथा विस्तार को 'चतुर', भ्रुकुटियों
का क्रमशः धीरे धीरे या ( दोनों को ) एक साथ पास पास झुकाना (लाना)
'कुंचित', एक भ्रुकुटी को लालित्य पूर्ण ढंग से ऊपर की ओर उठाना
'रेचित' तथा भ्रुकुटियों का अपनी स्वाभाविक दशा में होने वाला कर्म
'सहज' कहलाता है ॥ ११८-१२१ ॥
भ्रुकुटी-कर्म की ( अभिनय ) योजना—
अथैषां सम्प्रवक्ष्यामि रसभावप्रयोजनम् ।
कोपे वितर्के हेलायां लीलादौ सहजे तथा ॥ १२२ ॥
दर्शने श्रवणे चैव भ्रू वमेकां समुत्क्षिपेत् ।
उत्क्षेपो विस्मये हर्षे रोषे चैव द्वयोरपि ॥ १२३ ॥
असूयिते जुगुप्सायां हासे घ्राणे च पातनम् ।
क्रोधस्थानेषु दीप्तेषु योजयेद् भ्रुकुटीं बुधः ॥ १२४ ॥
शृङ्गारे ललिते सौम्ये सुखस्पर्शे प्रबोधने ।
एवं विधेषु भावेषु चतुरन्तु प्रयोजयेत् ॥ १२५ ॥
अब मैं इनकी रस तथा भावों में योजना बतलाता हूँ :—
क्रोध, वितर्क, हेला, लीला, सहज अवलोकन तथा श्रवण की दशा में
एक भ्रुकुटी को ऊपर की ओर उठाकर तथा विस्मय, हर्ष और रोष की दशा
में दोनों भ्रुकुटी को ऊपर उठाकर 'उत्क्षेप' की योजना की जाए । असूया,
जुगुप्सा, हास तथा सुगन्धित पदार्थ के सूंघने की दशा में 'पातन' की
योजना होती है। क्रोध के विषय तथा दीप्त प्रदेश में 'भ्रुकुटी' की योजना
होती है। शृङ्गार, ललित, सौम्य वस्तु तथा स्पर्श और प्रबोध ( जागना )
भाव में तथा इसी प्रकार के अन्य भावों में 'चतुर' की योजना
की जाए ॥ १२२-१२५ ॥
१. उत्क्षेते—ग० । २. असूयितजुगुप्सायां—ख०; आसूयित—ग० ।
३. स्पर्शे च चतुरं भवेत्—ख—ग ।
४. पद्यार्धमेतत् ख-ग-पुस्तकयोर्नास्ति ।
अष्टमोऽध्यायः २७
[ स्त्रीपुरुषयोश्च संल्लापे नानावस्थान्तरात्मके । ]
मोट्टायिते कुट्टमिते तथा च किलकिञ्चिते ।
निकुञ्चितञ्च कर्तव्यं नृत्ते योज्यन्तु रेचितम् ॥ १२६ ॥
अनाविद्धेषु भावेषु कुर्यात्¹ स्वाभाविकं तथा ।
इत्येवं तु भ्रुवोः प्रोक्तं² नासाकर्म निबोधत ॥ १२७ ॥
( अनेक अवस्थाओं तथा भावों से पूर्ण स्त्री तथा पुरुषों के संलापों में
तथा ) मोट्टायित, कुट्टमित और किलकिंचित में 'कुंचित' का प्रयोग करना
चाहिए। नृत में 'रेचित' का तथा अन्य सामान्य भावों में 'सहज' का
प्रयोग करना चाहिए । इस प्रकार मैंने 'भ्रुकुटी' का कर्म बतलाया । अब मैं
नासिका का कर्म बतलाता हूँ ॥ १२६-१२७ ॥
नासा-कर्म ( लक्षण ) :—
नता मन्दा विकृष्टा च सोच्छ्वासाथ विकूणिता ।
स्वाभाविका चेति बुधैः षड्विधा नासिका स्मृता ॥ १२८ ॥
नता मुहुः श्लिष्टपुटा मन्दा तु निभृता स्मृता ।
विकृष्टा फुल्लितपुटा सोच्छ्वासाकृष्टमारुता ॥ १२९ ॥
विकूणिता सङ्कुचिता समा स्वाभाविकी स्मृता ।
नासिका लक्षणं ह्येतद्विनियोगं निबोधत ॥ १३० ॥
ये नासाकर्म छः प्रकार का होता है—( १ ) नता ( २ ) मन्दा ( ३ )
विकृष्टा ( ४ ) सोच्छ्वासा ( ५ ) विकूणिता तथा ( ६ ) स्वाभाविका ।
बार-बार यदि नासापुट मिलते हों ( चपटे हो जाएँ ) तो 'नता', यदि
नासापुट स्थिर हों तो 'मन्दा', यदि नासापुट फूले हों तो 'विकृष्टा', सांस
नासापुटों में खींचा जाए तो 'सोच्छ्वासा' यदि नासापुट सिकुड़े हों तो
'विकूणिता' तथा सहज भाव में नासापुट रहने पर 'समा' दशा होती है ।
मैंने ये नासिका के लक्षण बतलाए अब मैं इनकी योजना बतलाता
हूँ ॥ १२८-१३० ॥
१. विद्यात्—ख-ग० । २. प्रोक्ता—ख-ग० ।
३. विघूर्णिता—ख० ग० । ४. विकृष्टोत्फुल्लित—ख-ग० ।
५. विघूर्णिता—ख-ग० । ६. स्वाभाविका—ख-ग० ।
२८ :नाट्यशास्त्रम्
योजना—
मंदोत्कम्पसमायुक्ते नारीणामनुरोधने ।
१निश्वासे च नता कार्या नासिका नाट्ययोक्तृभिः ॥१३१॥
निर्वेदोत्सुक्यचिन्तासु मन्दा शोके चं योजयेत् ।
४विकृष्टा तीव्रगन्धे च श्वासरोषभयार्त्तिषु ॥ १३२ ॥
५सोच्छ्वासा मधुरे गन्धे दीर्घोच्छ्वासकृतेषु च ।
६विकूणिता च कर्त्तव्या जुगुप्सासूयितादिषु ॥ १३३ ॥
कार्या शेषेषु भावेषु तज्ज्ञैः स्वाभाविकी तथा ।
स्त्री जन (नायिका) को मनाने, मन्द कम्पन से युक्त रहने तथा सांस
लेने में 'नता' की (पाठान्तर-रोदन के रुक जाने या मन्द हो जाने
तथा उसाँस लेने में 'नता' की) निर्वेद, औत्सुक्य, चिन्ता तथा शोक
में 'मन्दा' की, तीव्रगन्ध, श्वास, रोष भय तथा पीड़ा में (पाठान्तर-तीव्र
गन्ध, रौद्र तथा वीर रस में) 'विकृष्टा' की, मीठी सुगन्ध (इष्ट गन्ध)
दीर्घ श्वास तथा उसाँस में 'सोच्छ्वासा' की, जुगुप्सा, असूया आदि में
'विकूणिता' की (पाठान्तर-हास्य, जुगुप्सा तथा असूया में 'विकूणिता'
की) तथा अवशिष्ट सहज भावों में 'समा' की योजना करनी चाहिए ॥
कपोल-कर्म-लक्षण—
क्षामं फुल्लञ्च पूर्णञ्च कम्पितं कुञ्चितं समम् ॥ १३४ ॥
षड्विधं गण्डमुद्दिष्टमस्य लक्षणमुच्यते ।
क्षामं चार्वनतं ज्ञेयं फुल्लं विकसितं भवेत् ॥ १३५ ॥
९उन्नतं पूर्णमत्रोक्तं कम्पितं स्फुरितं भवेत् ।
स्यात् कुञ्चितं सङ्कुचितं समं प्राकृतमुच्यते ॥ १३६ ॥
१. विच्छिन्नमन्दरुदिते सोच्छ्वासे च नता स्मृता—ख-ग ।
२. पद्यार्धमेतत् ख-ग पुस्तकर्योनास्ति ।
३. प्रकीर्तिता—ख०, तु कीर्तिता—ग० ।
४. तीव्रगन्धे विकृष्टां तां रौद्रे वीरे तथैव च—क०; विकृष्टा तीव्रगन्धोर्ध्व-
श्वासरोषभयार्त्तिषु—ख-ग०।
५. इष्टघ्राणे तथोच्छ्वासे दीर्घोच्छ्वासां प्रयोजयेत्—क० ।
६. विधूर्णिताक्ता हास्ये च जुगुप्सायामसूयिते—ख० ग० ।
७. स्वाभाविकाशेषभावेष्वित्येवं नासिका स्मृता—ख० ।
८. त्ववनतं—ग० । ९. विततं घूर्णमत्रोक्तं—क० ।
अष्टमोऽध्यायः २९
कपोल कर्म के छः प्रकार हैं:—यथा—(१) क्षाम, (२) फुल्ल,
(३) पूर्ण, (४) कम्पित, (५) कुंचित तथा (६) सम । अब मैं इनके
लक्षणों को बतलाता हूँ ।
अवनत या बैठे हुए कपोल हों तो 'क्षाम', फूले या भरे हुए कपोल
'विकसित', उन्नत या ऊँचे उठे हुए कपोल 'पूर्ण', कम्पित या धूजते हुए
कपोल 'कम्पित', सिकुड़े हुए कपोल 'कुंचित' तथा स्वाभाविक दशा में स्थित
कपोल 'सम' कहलाते हैं ॥ १३४-१३६ ॥
योजना—
गण्डयोर्लक्षणं प्रोक्तं विनियोगं निबोधत ।
क्षामं दुःखेषु कर्तव्यं प्रहर्षे फुल्लमेव च ॥ १३७ ॥
१पूर्णमुत्साहगर्वेषु रोषहर्षेषु कम्पितम् ।
कुञ्चितञ्च सरोमाञ्चं २स्पर्शं शीते भये ज्वरे ॥ १३८ ॥
प्राकृतं शेषभावेषु गण्डकर्म भवेदिति ।
इस प्रकार मैने कपोलों के लक्षण वर्णन किये अब मैं इनकी योजना
बतलाता हूँ । दुःख में 'क्षाम' की, हर्ष में 'फुल्ल' की, उत्साह तथा गर्व में
'पूर्ण' की, रोष तथा हर्ष में 'कम्पित' की, रोमांच, स्पर्श, शीत, भय तथा
ज्वर में 'कुंचित' की तथा शेषभावों में 'सम' कपोल की योजना करनी
चाहिए ॥ १३७-१३८ ॥
अधरोष्ठ कर्म-लक्षण—
विवर्त्तनं कम्पनञ्च विसर्गो विनिगूहनम् ॥ १३९ ॥
सन्दष्टकं समुद्गञ्च षट्कर्माण्यधरस्य तु ।
विकू॑णनं विवर्त्तस्तु वेपनं कम्पनं स्मृतम् ॥ १४० ॥
विनिष्कामो विसर्गस्तु प्रवेशो विनिगूहनम् ।
सन्दष्टकं द्विजैर्दष्टं समुद्गः सहितोद्गतिः ॥ १४१ ॥
इत्योष्ठलक्षणं प्रोक्तं विनियोगं निबोधत ।
अधरोष्ठ कर्म के छः प्रकार हैं—(१) विवर्तन, (२) कंपन, (३)
विसर्ग, (४) विनिगूहन, (५) सन्दष्टक तथा (६) समुद्गक ।
१. घूर्ण—क० । २. कम्पे—ख० ।
३. विवर्त्तने—ग० । ४. विधूर्णनं—ख० ।
५. सन्दष्टको द्विजैर्दष्टः—ख-ग० । ६. समुद्गः सहजोन्नतिः—क० ।
३० नाट्यशास्त्रम्
नीचले ओठ का फड़कना ( या नीचे झुकना ) 'विवर्तन', ओठ का
धूजना 'कम्पन', ओठ का बाहर निकलना 'विसर्ग', ओठ का अन्दर ले
जाना 'विनिगूहन', ओठ का दाँतों से दबाना 'सन्दष्टक' तथा ओंठ को
बाहर की ओर ऊँचा करना 'समुद्गक' कहलाता है । ये अधरोष्ठ के लक्षण
हैं । अब इनकी योजना सुनिये ॥ १३९-१४१ ॥
योजना—
असूयावेदनावज्ञा¹द्धास्यादिषु विवर्तनम् ॥ १४२ ॥
कम्पनं वेद²नाशीतभयरोषजवादिषु ।
स्त्रीणां विलासे बिब्बोके विसर्गो र³ञ्जने तथा ॥ १४३ ॥
विनिगूहनमायासे सन्दष्टं क्रोधकर्म⁴सु ।
समुद्गस्त्वनुकम्पायां चुम्बने चाभिनन्दने ॥ १४४ ॥
असूया, वेदना, लज्जा, अनादर तथा हास्य आदि में 'विवर्तन' की,
वेदना, शीत, भय, क्रोध, वेग आदि में 'कम्पन' की; स्त्रियों के विलास,
बिब्बोक तथा रंजन में 'विसर्ग' की; ( श्रम तथा ) आयास में 'विनिगूहन'
की, क्रोध के कार्य आदि में 'सन्दष्टक' की तथा अनुकम्पा, अभिनन्दन और
चुम्बन में 'समुद्गक' की योजना करनी चाहिए ॥ १४२-१४४ ॥
चिबुक कर्म—( लक्षण )—
इत्योष्ठकर्माण्युक्तानि चिबुकस्य निबोधत ।
कुट्टनं खण्डनं छिन्नं चुक्कितं ⁶लेहितं समम् ॥ १४५ ॥
दष्टञ्च दन्तक्रियया चिबुकन्त्विह लक्ष्यते ।
कुट्टनं दन्तसङ्घर्षः सम्फोटः खण्डनं मुहुः ॥ १४६ ॥
छिन्नन्तु गाढ़संश्लेषश्चुक्कितं⁷ दूरविय्युतिः ।
लेहनं जिह्वया लेहः किञ्चिच्छ्लेषः समं भवेत् ॥ १४७ ॥
दन्तैर्दष्टेऽधरे दष्टमित्येषां विनियोजनम् ।
१. वेदनालज्जालस्यादिषु—ख–ग० ।
२. वेपनं शीतज्वररोगजयादिषु—ग० ।
३. विसर्ग सुरते स्मृतः—ख० । ४. क्रोधकर्मणि—ग० ।
५. चिकितं—ख; चुक्षितं—ग० । ६. लेहनं—ख–ग० ।
७. चिकितं—ख; चुक्षितं—ग० । ८. किञ्चिच्चेष्टः—ख–ग० ।
अष्टमोऽध्यायः ३१
इस प्रकार मैंने ओठों के अभिनय कार्य बतलाए, अब मैं चिबुक के
(ठुड्डी के) कर्म बतलाता हूँ। चिबुक के ७ प्रकार होते हैं—यथा—
(१) कुट्टन, (२) खण्डन, (३) छिन्न, (४) चुक्कित, (५) लेहित,
(६) सम तथा (७) दष्ट। यहाँ दाँतों की क्रिया के अनुसार ही चिबुक
कर्मों के लक्षण बतलाए जाते हैं (अर्थात् ये दांतों के लक्षण हैं तथा
चिबुक के भेद और लक्षण भी इसी प्रकार से होते हैं) दाँतों के संघर्ष
(कड़कड़ाने) को 'कुट्टन', दाँतों के बार-बार चबाने को 'खण्डन', दाँतों
का जोर से मिलाना 'छिन्न' दाँतों को परस्पर ऊपर तक हटा लेना 'चुक्कित'
जिह्वा से दाँतों का चाटना 'लेहित' दाँतों का थोड़ा मिलना 'सम' तथा
दाँतों से ओठ का दबाना 'दष्ट' कहलाता है ॥ १४५-१४८ ॥
योजना—
भयशीतज्वरक्रोधैर्ग्रस्तानां कुट्टनं भवेत् ॥ १४८ ॥
जपोऽध्ययनसल्लापभक्ष्ययोगे च खण्डनम् ।
छिन्नं व्याधौ भये शीते व्यायामे रुदिते ३मृते ॥ १४९ ॥
जृम्भणे चुक्कितं कार्यं तथा लौल्ये ५ च लेहनम् ।
समं स्वभावभावेषु सन्दष्टं क्रोधकर्मसु ॥ १५० ॥
इति दन्तोष्ठजिह्वानां करणे चिबुकक्रिया।
इनमें भय, शीत व्याधि तथा ज्वर में 'कुट्टन' की; जप, अध्ययन,
संलाप (संवाद) तथा भक्षण करने में 'खण्डन' की, व्याधि, भय, शीत,
व्यायाम, रूदित तथा मृत में 'छिन्न' की, चुम्बन लेने में 'चुक्कित' की;
लेहन कर्म (चाटने) में (पाठान्तर—चंचलता में) 'लेहन' की;
स्वाभाविक चेष्टाओं में 'सम' की तथा क्रोध के कार्यों में 'सन्दष्ट' की योजना
करनी चाहिए।
इस प्रकार मैंने दन्त, ओष्ठ तथा जिह्वा से सम्बद्ध (इन) चिबुकों के
कार्य बतलाए ॥ १४८-१५१॥
मुखज कर्म—
६विनिवृत्तञ्च विधुतं निर्भुग्नं भुग्नमेव च ॥ १५१ ॥
१. व्याधि—ख-ग०। २. जप्या—ख० ग०। ३. रुषितेक्षिते—ख० ।
४. चिकिर्त—ख, चुक्षितं—ग०। ५. लेह्यो—स-ग० ।
६. 'विनिवृत्तञ्च विधुतम्' इत्यादयोऽष्टौ श्लोकाः क्वचनादर्शेषु प्रक्षिप्ताः ।
३२ नाट्यशास्त्रम्
विवृत्तञ्च तथोद्वाहि कर्माण्यत्रास्यजानि तु ।
व्यावृत्तं विनिवृत्तं स्याद्विधुतं तिर्यगायतम् ॥ १५२ ॥
अवाङ्मुखत्वं निर्भुग्नं व्याभुग्नं किञ्चिदायतम् ।
विश्लेष्ठोष्ठञ्च विवृत्तमुद्वाह्याक्षिप्तमेव च ॥ १५३ ॥
मुखज कर्म ६ हैं—यथा-(१) विनिवृत्त, (२) विधुत (३) निर्भुग्न, (४)
भुग्न (५) विवर्त तथा (६) उद्वाही ।
सीधा खुला हुआ 'विनिवृत्त', तिरछा खुला हुआ मुंह 'विधुत', नीचे
की ओर झुका हुआ 'निर्भुग्न', कुछ खुला हुआ 'भुग्न' (व्याभुग्न), ओठों
से लगा हुआ मुँह 'विवर्त' तथा ऊपर की ओर उठा हुआ मुंह 'उद्वाही'
कहलाता है ॥ १५१-१५३ ॥
योजना—
विनिवृत्तमसूयायामीर्ष्याकोपकृतेषु¹ च ।
अवज्ञाविहृतादौ च स्त्रीणां कार्यं प्रयोक्तृभिः ॥ १५४ ॥
विधुतं वारणे चैव नैवमित्येवमादिषु ।
निर्भुग्नञ्चापि विज्ञेयं गम्भीरालोकनादिषु ॥ १५५ ॥
भुग्नं लज्जान्विते योज्यं यतीनां तु स्वभावतः² ।
निर्वेदौत्सुक्यचिन्तासु तथा विनयमन्त्रणे³ ॥ १५६ ॥
स्त्रियों के असूया, ईर्ष्या, कोप, अवज्ञा तथा विहृत आदि भावों में
'विनिवृत्त' की; निवारण तथा निषेध कथन में 'विधुत' की; गम्भीर
आलोकनन आदि में 'निर्भुग्न' की तथा लज्जित व्यक्ति तथा निर्वेद, औत्सुक्य
चिन्ता, विनय विचार (मन्त्रणा) भावों में 'भुग्न' की योजना करनी
चाहिए। यह यतीजन में स्वाभाविक होता है॥ १५४-१५६ ॥
विवृतं वापि विज्ञेयं हास्यशोकभयादिषु ।
स्त्रीणामुद्वाहि लीलायां गर्वे गच्छत्यनादरे⁴ ॥ १५७ ॥
एवं नामेति कार्यञ्च कोपवाक्ये विचक्षणैः ।
समँसाचीकृतायुक्तं⁵ यच्च दृष्टिविकल्पनम्⁶ ॥ १५८ ॥
१. क्रोधकृतेत—ग० । २. स्वभावजम्—ख-ग ।
३. तथा च विनिमन्त्रणे—ख-ग० । ४. गच्छत्वना—ख-ग० ।
५. समं साचीकृताद्युक्ता—ख-ग०। ६. विकल्पितम्—ख-ग० ।
अष्टमोऽध्यायः ३३
तज्ज्ञैस्तदेनुसारेण कार्यं तदनुगं मुखम् ।
हास्य, शोक तथा भय आदि में 'विवृत', स्त्रियों की लीला तथा गर्व
में, अनादर, 'जाओ' तथा ऐसा ही कार्य है इस प्रकार के कथन में एवं
क्रोध पूर्ण वचनों में 'उद्वाही' मुख की योजना करनी चाहिए ।
नाट्यप्रयोक्ताजन द्वारा दृष्टि भेदों के जो सम तथा साची भेद पहिले
बतलाए गए उन्हीं के अनुसार मुख की भी योजना करनी चाहिए ।
मुख-राग—
अथातो मुखरागस्तु चतुर्धा सम्प्रकीर्तितः ॥ १५६ ॥
स्वाभाविकः प्रसन्नश्च रक्तः श्यामोऽर्थसंश्रयः ।
अब मैं 'मुख-राग' को बतलाता हूँ । ये अपने अर्थों के अनुसार चार
प्रकार के होते हैं । यथा—(१) स्वाभाविक, (२) प्रसन्न, (३) रक्त तथा (४)
श्याम ॥ १५९-१६० ॥
योजना—
स्वाभाविकस्तु कर्तव्यः स्वभावाभिनयाश्रयः ॥ १६० ॥
मध्यस्थादिषु भावेषु मुखरागः प्रकीर्तितः ।
प्रसन्नस्त्वद्भुते कार्यो हास्यशृङ्गारयोस्तथा ॥ १६१ ॥
वीररौद्रमदाद्येषु रक्तः स्यात् करुणे तथा ।
भयानके सबीभत्से श्यामं सञ्जायते मुखम् ॥ १६२ ॥
एवं भावरसार्थेषु मुखरागं प्रयोजयेत् ।
'स्वाभाविक मुखराग' की; स्वाभाविक अभिनय में तथा मध्यस्थ आदि
भाव में; 'प्रसन्न मुख राग' की अद्भुत, हास्य तथा शृंगार में; रक्त मुखराग
की वीर, रौद्र रस और मद तथा करुण, भयानक तथा बीभत्स रस में
श्याम मुख राग की योजना करनी चाहिए ।
इसी प्रकार भाव तथा रस के प्रस्तुत करने में मुख राग की योजना
की जाए ॥ १६०-१६३ ॥
शाखाङ्गोपाङ्गसंयुक्तः कृतोऽप्य³भिनयः शुभः ॥ १६३ ॥
मुखरागविहीनस्तु नैव शोभान्वितो भवेत् ।
शारीराभिनयोऽल्पोऽपि मुखरागसमन्वितः ॥ १६४ ॥
१. स्तेनानुसारेण—ख० ग० । २. प्रयोक्तृभिः—ख० ग० ।
३. ह्यभिनयः—ख० ।
३ ना० शा० द्वि०
३४ नाट्यशास्त्रम्
द्विगुणां लभते शोभां रात्राविव निशाकरः ।
नयनाभिनयोऽपि स्यान्नानाभावरसस्फुटः ॥ १६५ ॥
मुखरागान्वितो यस्मान्नाट्यमत्र प्रतिष्ठितम् ।
यथा नेत्रं प्रसपेंत मुखभ्रूदृष्टिसंयुतम् ॥ १६६ ॥
तथा भावरसोपेतं मुखरागं प्रयोजयेत् ।
इत्येष मुखरागस्तु प्रोक्तो भावरसाश्रयः ॥ १६७ ॥
शाखा, अंग तथा उपांग के अभिनय अच्छी प्रकार किये जाने पर
भी यदि वे 'मुखराग' से रहित हो तो उसकी शोभा नहीं होती ।
पर जब शारीराभिनय के अल्प मात्रा में प्रस्तुत करते हुए भी यदि
उसे मुखराग से युक्त रखा जाए तो रात्रि में चन्द्र के समान द्विगुणित
शोभा को प्राप्त करता है ।
नयनाभिनय भी यदि मुखराग से युक्त रहे तो वह अनेक भाव तथा
रसों को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है क्योंकि 'नाट्य' इसी पर निर्भर
है (स्थित है) ।
मुख, भ्रू, दृष्टि आदि से युक्त हो जिस प्रकार नेत्र हों मुखराग भी
उसी प्रकार के भाव तथा रसों से युक्त रखते हुए प्रयुक्त करना चाहिए ।
इस प्रकार मैंने भाव तथा रस का आधारभूत तत्त्व 'मुखराग' का स्वरूप
यहाँ बतलाया ॥ १६३-१६७ ॥
ग्रीवाकर्म—लक्षण तथा योजना—
अतः परं प्रवक्ष्यामि ग्रीवाकर्माणि वै द्विजाः ।
समा नतोन्नता त्र्यस्रा रेचिता कुञ्चिताञ्चिता ॥ १६८ ॥
वलिता च विवृत्ता च ग्रीवा नवविधार्थतः ।
हे मुनिजन ! अब मैं आपको ग्रीवा के कार्य बतलाता हूँ । ये ग्रीवा कर्म
नौ प्रकार के हैं । यथा :—(१) समा, (२) नता, (३) उन्नता, (४) त्र्यस्रा,
(५) रेचिता, (६) कुञ्चिता, (७) अञ्चिता, (८) वलिता, तथा( ९ )
विवृत्ता ॥ १६८–१६६ ॥
समा स्वाभाविकी ध्यानस्वभावजपकर्मसु ॥ १६९ ॥
नता नतास्यालङ्कारबन्धे कण्ठावलम्बने ।
१. भावरसान्वितः—ख० । २. इत्येवं—ख० ।
३. ग्रीवाकर्म द्विजोत्तमाः—ख० । ४. निवृत्ता—ख० ।
अष्टमोऽध्यायः ३५
उन्नताभ्युन्नतमुखी ग्रीवा चोर्ध्वादिदर्शने ॥ १७० ॥
त्र्यस्रा पार्श्वगता ज्ञेया स्कन्धभारे च दुःखिते ।
रेचिता विधुताँ भ्रान्ता भावे मथनवृत्तयोः ॥ १७१ ॥
कुञ्चिताऽकुञ्चिता मूर्ध्नि भारिते गलरक्षणे ।
अपनी सहज अवस्था में विद्यमान ग्रीवा 'समा' कहलाती है, इसकी
योजना ध्यान, सहज भाव तथा जपकर्म में की जाए । यदि ग्रीवा झुकी हो
तो 'नता' कहलाती है, इसकी योजना अलंकारों के धारण करने तथा
किसी व्यक्ति के कण्ठ का सहारा लेने में करना चाहिए ।
ऊपर की ओर चेहरे को उठा कर रखी हुई ग्रीवा 'उन्नता' कहलाती
है । इसे ऊपर की ओर देखने के भाव में प्रयुक्त करना चाहिए ।
यदि ग्रीवा को किसी एक ओर मोड़ा जाए तो यह 'त्र्यस्रा' कहलाती
है । इसकी कन्धों से भार वहन तथा दुःख के प्रदर्शन में योजना की जाए ।
यदि ग्रीवा कम्पित या घूमते हुए रखी जाए तो 'रेचिता' कहलाती
है । इसकी योजना भाव, मथन तथा नृत्त में की जाए ।
यदि मस्तक सहित ग्रीवा को नीचे की ओर झुकाया जाय तो
'कुञ्चिता' कहलाती है । इसकी योजना भारयुक्त होने तथा गले का बचाव
करने में की जाए ॥ १६९-१७२ ॥
अञ्चितापसृतोद्वृद्धकेशौकर्षोर्ध्वदर्शने ५ ॥ १७२ ॥
पार्श्वोन्मुखी स्याद् वलिता ग्रीवाभङ्गे च वीक्षिते ६ ।
विवृत्ताभिमुखीभूता स्वस्थानाभिमुखादिषु ॥ १७३ ॥
यदि ग्रीवा को मस्तक सहित पीछे की ओर मोड़ा जाए तो 'अञ्चिता'
कहलाती है । इसकी योजना ऊपर की ओर लटकने, ( फांसी लगा कर
मरने हेतु ), बालों को खींचने तथा ऊपर देखने में की जाए ।
यदि ग्रीवा चहरे सहित बगल में मोड़ ली जाए तो 'वलिता' कहलाती
है । इसकी योजना ग्रीवा को झुका कर देखने के भाव में की जाए ।
यदि ग्रीवा सामने की ओर स्थित रहे ( अभिमुखीभूता ) तो 'विवृत्ता'
कहलाती है । इसकी योजना अपने उद्दिष्ट स्थान की ओर प्रस्थान करने
में की जाए ॥ १७२-१७३ ॥
१. चोर्ध्वनिवेशने—ख० । २. चैव—ख० ।
३. विधुतभ्रान्ता हावे—ख० । ४. कुञ्चिताकुञ्चिते मूर्ध्नि धारिते—ख, ग० ।
५. केशकर्णोर्ध्वदर्शने—ख०, ग० । ६. वीक्षणे—ख० ।
३६ नाट्यशास्त्रम्
इत्यादिलोकभावार्था ग्रीवोभेदैरनेकधा ।
ग्रीवाकर्माणि सर्वाणि शिरःकर्मानुगानि हि ॥ १७४ ॥
शिरसः कर्मणा कर्म ग्रीवायाः सम्प्रवर्तते ।
इस प्रकार मनुष्यों के भाव तथा व्यवहार आदि के अनुसार ये ग्रीवा
के अनेक भेद बतलाए गये हैं। ये सभी ग्रीवाकर्म मस्तक की क्रिया का
अनुसरण करते हैं और मस्तक के कर्म ग्रीवा के कर्मों से ही प्रवृत्त होते
हैं ॥ १७४-१७५ ॥
इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं शीर्षोपाङ्गसमाश्रयम् ॥ १७५ ॥
अङ्गकर्माणि शेषाणि गदतो मे निबोधत ॥ १७६ ॥
इस प्रकार मैंने मस्तक के उपांगसहित सभी लक्षण बतलाए। अब मैं
शेष अंगों के कर्म तथा लक्षण बतलाता हूँ जिन्हें आप समझिए ॥१७५-१७६॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे उत्तमाङ्गाभिनयो [ उपाङ्गाभिनयो ]
नाम अष्टमोऽध्यायः ।
भरत नाट्यशास्त्र का उत्तमांगाभिनय ( उपांगाभिनय ) नामक
अष्टम-अध्याय समाप्त ।
१. ग्रीवाभङ्गे—ख० ।
नवमोऽध्यायः
एवमेतच्छिरोनेत्रं¹ भ्रूनासोष्ठकपोलजम्² ।
कर्म लक्षणसंयुक्तमुपाङ्गानां मयोदितम् ॥ १ ॥
हस्तो³नान्तु प्रवक्ष्यामि कर्म नाट्यप्रयोजकम् ।
यथा येनाभिनेयश्च गदंतो⁴ मे निबोधत ॥ २ ॥
भरतमुनि बोले—
हे मुनिजन ! अब तक आपको मैंने लक्षणों से युक्त शिर, नेत्र, भौंहें,
नासिका, ओठ एवं कपोल से होनेवाले उपांगों के अभिनय को बतलाया ।
अब मैं हाथों का नाट्यप्रयोगों में होने वाला अभिनय-कार्य—जैसे और
जिस व्यक्ति के द्वारा अभिनीत किया जाए—बतलाता हूँ ॥ १-२ ॥
हस्तोरःपार्श्वजठरकटीजङ्घोरुपादतः ।
लक्षणं सम्प्रवक्ष्यामि विनियोगश्च तत्त्वतः ॥ ३ ॥
अब मैं क्रमशः हाथ, उरःस्थल, पार्श्व, उदर, कटी, जंघा, ऊरू,
(पिंडलियाँ) तथा पैरों के अभिनय कार्य तथा लक्षणों को बतलाता हूँ ॥३॥
हस्तमुद्राएँ—¹
पताकस्त्रिपताकश्च तथा वै कर्तरीमुखः ।
अर्धचन्द्रो ह्यरालश्च शुकतुण्डस्तथैव च ॥ ४ ॥
१. हस्तमुद्राओं के विषय में आचार्यों में अतिशय मतभेद दृष्टिगोचर होता
है तथा नाट्यशास्त्र की कई प्रतियों में उपलब्ध पाठान्तरों के अनुसार भी अनेक
भिन्नताएं दृष्टिगोचर होती हैं। जैसे-सूचीमुख को सूच्यास्य, कांगुलम् को लांगुलम्,
अलपद्मम् को अलपल्लव या उत्पलपद्मम्, उत्पलपदम् इत्यादि । अभिनयदर्पण में
असंयुक्त मुद्राएं २८ तथा ४ पूरक मुद्राओं सहित ३२ मिलती है। इसमें
नाट्य-शास्त्र के अतिरिक्त ये मुद्राएँ हैं—अर्धपताक, मयूर, चन्द्रकला, सिंहमुख,
त्रिशूल, व्याघ्र, अर्धसूची, कंटक तथा पल्ली । (इनमें नाट्यशास्त्र की ऊर्णनाभ मुद्रा
को छोड़ शेष सभी अतिरिक्त मुद्राएँ हैं ।) नाट्यशास्त्र तथा अभिनय-दर्पण की १६
१. इत्येतच्छिरसो नेत्र—क, च्छिरसो नेत्रे, ख–ग० ।
२. कपोलकम्—क० । ३. हस्तादीनां—क० ।
४. तन्मे निगदतः शृणु—ग० ।
३८ नाट्यशास्त्रम्
मुष्टिश्च शिखराख्यश्च कपित्थः कटकामुखः ।
सूच्यास्यः पद्मकोशश्च तथा वै सर्पशीर्षकः ॥ ५ ॥
मृगशीर्षः परो ज्ञेयो हस्ताभिनययोक्तृभिः ।
लाङ्गूलोत्पलपद्मश्च चतुरो भ्रमरस्तथा ॥ ६ ॥
हंसास्यो हंसपक्षश्च सन्दंशो मुकुलस्तथा ।
ऊर्णनाभस्ताम्रचूडश्चतुर्विंशतिरीरिताः ॥ ७ ॥
असंयुता संयुताश्च गदतो मे निबोधत ।
अञ्जलिश्च कपोतश्च कर्कटः स्वस्तिकस्तथा ॥ ८ ॥
कटकावर्धमानश्च ह्युत्सङ्गो निषधस्तथा ।
दोलः पुष्पपुटश्चैव तथा मकर एव च ॥ ९॥
मुद्राएँ ही समान हैं परन्तु इन मुद्राओं के अभिनय-दर्पण में जहाँ नाम समान है
तो लक्षण भिन्न हैं । ये हैं—कर्तरीमुख, कटकामुख, सूचीमुख, हंसमुख, (हंसास्य )
मृगशीर्ष, सन्दंश तथा ताम्रचूड़ । इस प्रकार यहाँ संयुक्त और असंयुक्त हस्तमुद्राओं
के विषय में संक्षेप में बतलाया गया है । विशेष विवेचन के लिए परिशिष्ट देखिये ।
नाट्यशास्त्र में हस्तमुद्राओं का कुलयोग ६४ बतलाया गया है परन्तु हैं
वे ६७ तथा भरतमुनि द्वारा प्रतिपादित भी और ये (नाट्यशास्त्र में) भरतमुनि
सम्मत ही मुद्राएँ निरूपित भी की गयी हैं । इस संख्या का उल्लेख श्रीकण्ठकृत
रसमंजरी में (इस प्रकार) किया गया है :—'एतेऽभिनयहस्ताः स्युः सप्तत्रिंश-
न्मुनेर्मताः' (रसमंजरी ms—पत्र ६४ B. O. R. I. Poona )
हस्तमुद्राएं (विशेष)—मुद्रा का स्वरूप तथा उसका विनियोग नाट्यशास्त्र
में सलक्षण दिया गया है। इसके अतिरिक्त भी इन मुद्राओं के द्वारा अनेक अर्थ
सूचित किये जा सकते हैं जिनका आगे चित्राभिनय (नाट्यशास्त्र अध्याय २६)
में वर्णन हैं। कुछ अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों में मूल मुद्राओं की उद्भव कथाएं तथा
रस के समान इन मुद्राओं का भी वर्ण (रंग) जाति तथा अधिदेवता भी
बतलायी गयी हैं। इन उल्लेखों से आचार्यों के नृत्य-शास्त्र में सौन्दर्य-पूर्ण सूक्ष्म
तथा संशोधकदृष्टि के दर्शन सहज प्राप्य हैं। अभिनय-दर्पण आदि ग्रन्थों के द्वारा
प्रदर्शित विभिन्न अर्थों को (जो नाट्यशास्त्र में नहीं दर्शाये गए) हमने परिशिष्ट
में बतलाने का उद्योग किया है। यह विषय विस्तृत तथा अध्ययन सापेक्ष है।
१. खटकामुखः—क-ख० । २. पद्यार्धमेतत् क-पुस्तके नास्ति ।
३. काङ्गूलकोत्पलपद्मश्च—क० । ४. खटका—क० ।
नवमोऽध्यायः ३९
गजदन्तोऽवहित्थश्च वर्धमानस्तथैव च।
एते तु संयुता हस्ता मया प्रोक्तास्त्रयोदश ॥ १० ॥
असंयुक्त हस्तमुद्राएं २४ हैं। जिनके नाम हैं—( १ ) पताक, ( २ )
यहाँ केवल उनकी मुद्रा, जाति, वर्ण तथा देवता दिये जा रहे हैं। प्रत्येक मुद्रा की
उत्पत्तिकथा उस मुद्रा के लक्षण के नीचे पाद टिप्पणी में दे दी गई है तथा इसी
कारण इस अध्याय में टिप्पणियाँ भी संक्षिप्त ही रखी हैं।
मुद्रानाम देवता जाति वर्णं
( १ ) पताक ब्रह्मा ब्राह्मण श्वेत
( २ ) त्रिपताक शिव क्षत्रिय रक्त
( ३ ) कतरीमुख चक्रपाणि-विष्णु क्षत्रिय ताम्र
( ४ ) अर्धचन्द्र महादेव वैश्य धूम्र
( ५ ) अराल वासुदेव मिश्र रक्त
( ६ ) शुकतुण्ड मरीचि ब्राह्मण रक्त
( ७ ) मुष्टि चन्द्र शूद्र नील
( ८ ) शिखर कामदेव गान्धर्व धूलियाँ
( ९ ) कपित्थ पद्मगर्भ-विष्णु ऋषि श्वेत
( १० ) कटकामुख रघुराम देव ताम्र
( ११ ) सूचीमुख विश्वकर्मा देव श्वेत
( १२ ) पद्मकोष भार्गव यक्षकिन्नर श्वेत
( १३ ) सर्पशीर्ष शिव देव पीत
( १४ ) मृगशीर्ष महेश्वरशिव ऋषि श्वेत
( १५ ) कंगुल पद्म सिद्ध सुवर्ण
( १६ ) अलपद्म सूर्य गान्धर्व धूलि
( १७ ) चतुर सूर्य मिश्र धूलि
( १८ ) भ्रमर गरुड मिश्र घन (काला)
( १९ ) हंसास्य ब्रह्मा मिश्र श्वेत
( २० ) हंसपक्ष कामदेव अप्सरा नील
( २१ ) सन्दंश वाल्मीकि विद्याधर श्वेत
( २२ ) मुकुल चन्द्र संकीर्ण श्वेत
( २३ ) ऊर्णनाभ इन्द्र देव श्वेत
( २४ ) ताम्रचूड कूर्मावतार क्षत्रिय रक्त