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मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

प्रारंभिक जीवन-चरित्र एवं सन्त-महिमा

मलूक
दासजी
की
बानी
[ जीवन-चरित सहित ]
प्रकाशक
बेलवीडियर प्रिंटिंग वर्क्स, इलाहाबाद
मूल्य ...

मलूकदासजी की बानी
[ जीवन चरित्र-सहित ]
जिसमें
उन महात्मा के चुने हुए शब्द, कबित्त
और साखियाँ छपी हैं और गूढ़
शब्दों के अर्थ भी फुट
नोट में लिखे हैं ।
[ All Rights Reserved ]
[ कोई साहेब बिना इजाज़त के इस पुस्तक को नहीं छाप सकते ]
प्रकाशक
बेलवीडियर प्रिंटिंग वर्क्स
इलाहाबाद-२
चतुर्थ बार १००० ] सन् १६७१
[ मूल्य ॥-) ]
Printed at The Belvedere Printing Works, Allahabad, By Sheel Mohan.

मलूकदासजी का जीवन-चरित्र
बाबा मलूकदास जी ज़िला इलाहाबाद के कड़ा नामी गाँव में बैसाख बदी ५
सम्बत १६३१ विक्रमी में लाला सुन्दरदास खत्री कक्कड़ के घर प्रगट हुए। जब पाँच
बरस के हुए तो मकान से बाहर गली में खेला करते थे और खेल के दर्मियान जो
कुछ काँटा कूड़ा करकट गली में पड़ा होता उसे उठाकर एक कोने में डाल देते कि
किसी के पाँव में न लग कर कष्ट न हो। एक दिन की बात है कि जब वह मामूल
मुवाफ़िक खेल रहे थे एक पूरे महात्मा उसी गली में आ निकले और उनको देख कर
लोगों से पूछा कि यह किसका लड़का है और यह सुनकर कि वह सुन्दरदास का बेटा
है बाप को बुलवाया और कहा कि अचरज है कि यह लड़का गली में इस तरह
अकेला खेल रहा है इसकी अजानु बाहु यानी लम्बी भुजा इस बात की सूचक हैं कि या
तो यह सात दीप का अखंड राजा हो या ऊँची साध गति को प्राप्त हो—बाबा मलूक-
दास जी की इतनी लम्बी बाँह थीं जो खड़े होने से घुटने के नीचे पहुँचती थीं। इस बात
को सुनकर सुन्दरदास तो अचरज में आकर हक्के बक्के हो गये पर बाबा मलूकदासजी
बोले कि महात्मा जी आप ठीक कहते हैं।
मलूकदासजी साध सेवा लड़कपन ही से बड़ी निष्ठा से करते थे, जो साधू और
भूखे आते उनका सम्मान और खाने पीने की फ़िकर रखते। एक दिन का ज़िकर है कि
एक मंडली साधुओं की आई और भोजन माँगा। बाबाजी ने घर के भंडार घर में सेंध
लगा कर जो कुछ सामग्री थी निकाल ली और साधुओं को खिला दिया। जब उनकी
माँ रसोई के समय सीधा निकालने गईं तो वहाँ कुछ न पाया बेचारी रोने लगीं कि
अब घर के लिए कहाँ से खाना बनाऊँ और बोलीं कि यह काम मल्लू का है। इसी
दर्मियान में बाबा मलूकदासजी आ पहुँचे और पूछा कि माँ क्यों रोती है। माँ बोली कि
बेटा तुम्हारी करतूत पर रोती हूँ कि भंडारे की सब सामग्री साधुओं को खिलाकर बाप
माँ को भूखा रक्खोगे। बाबाजी बोले कि मैंने तो एक दाना नहीं लिया है जिस पर माँ
झुँझला कर उन्हें भंडार घर में पकड़ ले गई कि देख सब बर्तन तो खाली पड़े हैं लेकिन
वहाँ पहुँच कर जो देखा तो सब सामग्री ज्यों की त्यों भरी पाई।
जब इनकी अवस्था दस ग्यारह बरस की हुई तो बाप ने इन्हें व्योपार में लगाना
चाहा और कम्बल थोक में लेकर कहा कि इनको बाजार में बेच लाया करो। देहात में
हर आठवें दिन पैंठ लगती है सो यह आठवें दिन कम्बल बेचने जाते थे और इस
दर्मियान में कोई साधू या गरीब इनसे माँगता तो उसे योंही दे देते।
एक बार यह एक दूर के गाँव में कम्बल बेचने गये लेकिन उस दिन न तो कोई
कम्बल बिका और न कोई मँगता मिला जिसे मुफ्त दे देते, पूरा गट्ठर कम्मलों का कड़ी
धूप में सिर पर लाद कर घर लाने में थक गये और इसलिये रास्ते में एक नीम के पेड़
की छाया में बैठ गये कि एक मज़दूर आया और कहा कि एक टका पर हम तुम्हारा
गट्ठर घर पर पहुँचा देंगे। मज़दूर तेज़ चाल से आगे बढ़ गया और बाबाजी बेफ़िकर
भजन करते हुए घर लौटे। मज़दूर के अकेले गठरी लाने पर इनकी माँ को संदेह हुआ

जीवन-चरित्र ९

कि कहीं कुछ कम्बल निकाल न लिये हों इसलिये उसे थोड़ा सा खाना देकर खिलाने
के बहाने कोठरी में बन्द कर दिया कि जब बेटा आवे तो गठरी का माल सहेज कर
उसे जाने दें । जब मलूकदास जी पहुँचे तो वह क्रोध से बोली कि ऐसी बेपरवाही क्यों
करते हो अब गट्ठर खोल कर कम्बल गिन लो अगर पूरे निकलें तो कोठरी से
मज़दूर को जाने दो मैंने उसे खाने को दे दिया है । बाबाजी घबराये हुए कोठरी खोल
कर भीतर घुसे तो देखा कि मज़दूर गायब है सिर्फ एक टुकड़ा रोटी का पड़ा है जिसे
प्रसाद के भाव से बाबाजी ने उठाकर खा लिया और माँ के चरनों पर गिरकर बोले कि
तू बड़ी भाग्यमान है कि ईश्वर ने तुझे मज़दूर के रूप में दर्शन दिया और मुझे बहका
दिया अब मैं इसी कोठरी में बैठता हूँ, जब तक न कहूँ मत खोलना और न शोरगुल
करना । इस तरह बाबाजी भगवन्त के ध्यान में बैठ गये जब दूसरे या तीसरे दिन
साक्षात दर्शन पाये तब बाहर निकले और माँ के चरनों पर मत्था टेका । फिर इसी तरह
ध्यान और भजन का नेम कर लिया ।
अब तो बाबा मलूकदासजी की कीर्ति चारों ओर फैली और हजारों आदमी दूर
दूर से दर्शन को आने लगे और नित प्रति सतसंग और सत उपदेश से अनेक जीव
लाभ उठाने लगे ।
बाबाजी के चमत्कार और करामात की ऐसी ही और इससे बढ़ कर बहुत सी
कथा प्रसिद्ध हैं जिन सबके यहाँ लिखने की जरूरत नहीं है लेकिन थोड़े से कौतुक जो
उनके प्रेमी स्वग्रामी लाला रामचरनदासजी मेहरोत्रे खत्री ने लिख भेजे हैं वह संक्षेप
में नीचे छापे जाते हैं, पाठक जन जैसा जिसका निश्चय हो मानें । इसमें सन्देह नहीं
कि पूरे साध और मालिक के सच्चे भक्त सर्व-समरथ हैं परन्तु वह अपनी शक्ति को
कहाँ तक बाहर प्रगट करते हैं इसको हर एक अन्तर अभ्यासी जानता है :—
(१) कहा जाता है कि एक बार भारी अकाल पड़ा यहाँ तक कि पेड़ों में पत्ती
तक खाने को नहीं रह गई, हजारों आदमी वर्षा के लिये हाहाकार करते बाबाजी के
चरनों पर आ गिरे । बाबाजी ने पहिले तो अपनी असमर्थ्यता बहुत कुछ बयान की
पर जब वह लोग किसी तरह न माने तो दया बस उनके साथ मैदान में प्रार्थना करने
को चले । इस बीच में बाबाजी का एक गुरुमुख चेला लालदास आया और अपने गुरु
को गद्दी पर न पाकर हाल पूछा तो मालूम हुआ कि गाँव वालों के साथ बस्ती के
बाहर पानी बरसाने के लिये प्रार्थना करने गये हैं । यह सुनकर चेले को इन्द्र पर बड़ा
क्रोध आया कि वह ऐसा अहंकारी है कि जब हमारे गुरु महाराज उठ कर जावैं तब
वह पानी बरसावै यह कह कर एक साधू का भंग-घोटना उठाकर बोला कि अभी एक
साँटा इन्द्र को ऐसा लगाता हूँ कि इन्द्रासन सहित यहीं गिरता है परन्तु भंग-घोटने का
सोंटा उठाते ही इन्द्र काँप उठा और उसी दम बड़े वेग से पानी बरसने लगा । बाबाजी
अभी मैदान में न पहुँचे थे कि वर्षा देख कर रास्ते से आश्रम को लौट आये और यहाँ
सब वृत्तान्त सुनाकर चेले पर बहुत अप्रसन्न हुए कि देवताओं पर इस तरह जोर
न चलाना चाहिये — उनसे राजी से काम लेना चाहिये । चेले ने बड़ी दीनता से छिमा
माँगी जिस पर गुरुजी ने आज्ञा की कि जाकर पृथवी परिक्रमा कर आओ तब तुम्हारा
अपराध छिमा होगा । चेला यह आज्ञा पाते ही गुरु को दंडवत करके रवाना हुआ और
गंगा नदी में कूद पड़ा और वहाँ से समुद्र में एक जहाज के पास जा निकला । खला-
सियों ने उसे बहता देखकर निकाल लिया और जहाज़ के मालिक सौदागर के पास

३ जीवन-चरित्र
लाये। सौदागर ने पूछा कि तुम्हारा जहाज़ कहाँ तबाह हुआ जिस पर उसने जवाब
दिया कि कहीं नहीं। हम अपने गुरु कि आज्ञा से पृथ्वी-परिक्रमा को निकले हैं और
उसके विशेष प्रश्न करने पर कुल हाल कह सुनाया और अपने गुरु का पूरा पता
ठिकाना बतला दिया और फिर समुद्र में कूद कर गोता मार कर गायब हो गया।
सौदागर अचरज में पड़ गया और उसके मन में गुरुजी की महिमा पूरे तौर
पर समा गई।
(२) कुछ दिन पीछे सौदागर का जहाज़ बड़े ख़तरे में पड़ा तब उसने सङ्कल्प
किया कि अगर जहाज़ बाबा मलूकदासजी की दया दृष्टि से बच जाय तो मैं चौथाई
माल उनके चरणों में भेंट करूँगा। दया से जहाज़ बच गया और सौदागर बाबाजी
की सेवा में चौथाई माल लेकर कड़ा में हाज़िर हुआ और सब हाल कह सुनाया।
उस समय के बादशाह आलमगीर का वज़ीर बाबाजी के पास मौजूद था। उसका मन
मोती की एक क़ीमती माला देखकर बहुत ललचाया जिसे सौदागर बाबाजी के गले में
पहिराने को हाथ में लिये था। बाबाजी सौदागर से बोले कि किसी का माल सेंत में
लेना दोष की बात है पर हमने तुम्हारे जहाज़ को तबाही से बचाने में बड़ा परिश्रम
किया है यह कह कर अँगोछे को अपने कन्धे से उठा कर पीठ को दिखलाया जिस पर
बहुत से दाग मौजूद थे। फिर माला को सौदागर के हाथ से लेकर वज़ीर के गले में
डाल दिया।
(३) वज़ीर वहाँ से मगन होकर बादशाह के यहाँ आया और बाबा मलूकदास
का सब हाल कह सुनाया और बड़ी महिमा गाई। आलमगीर ने जो बड़ा कट्टर था
हुक्म दिया कि तीन अहदी तुरंत जायँ और बाबा मलूकदास को जिस तरह से बैठे हों
लाकर हाज़िर करें। उन तीन अहदियों में दो भले आदमी थे और एक लुच्चा जिसने
हठ किया कि जिस सूरत में बाबाजी बैठे होंगे उसी दम पकड़ लावेंगे परन्तु मौज से
यह तीसरा अहदी रास्ते में ही मर गया। बाक़ी दो बाबाजी के आश्रम पर पहुँचे
और बाबाजी के इस कहने को कि दूसरे दिन सबेरे उनके साथ चलेंगे मंजूर किया।
लेकिन पहिले ही दिन साँझ को बाबाजी सतसंग से अन्तर्ध्यान हो कर दिल्ली जा पहुँचे
और बादशाही महल में जहाँ बादशाह अपनी बेगम के साथ बैठे थे जा खड़े हुए।
बादशाह ने घबराकर पूछा कि तुम कौन हो? बाबाजी ने जवाब दिया कि मलूका जिसको
आपने याद किया है। बेगम हट गई और बादशाह ने बाबाजी को बड़े आदर से
बैठाया और उनकी जाति पूछी। बाबाजी ने जवाब दिया कि फ़कीरों के जाति पाँत नहीं
होती इस पर बादशाह ने उनके खाने को खिचड़ी पकाने का हुक्म दिया जब पक कर
देगची आई और खोली गई तो उसमें से खिचड़ी के बदले कुत्ते के पिल्ले जीते हुए
निकल आये जिन्हें देखकर बाबाजी ने बादशाह से पूछा कि आप यही खिचड़ी खाते
हैं। बादशाह ने बावरची पर बहुत क्रोध कर दूसरी खिचड़ी बनाने का हुक्म दिया।
इस बार देगची खोलने पर उसमें से राख निकली। बाबाजी बोले कि यह खाना
फ़क़ीरों के योग्य है और उसमें से एक चिटकी राख लेकर फूँक दिया तो ऐसी आँधी
पानी दिल्ली भर में आया कि शहर गारत होने लगा। फिर बादशाह की प्रार्थना पर
बाबाजी ने दया करके वह उत्पात हटा लिया। ऐसे ही लिखा है कि आलमगीर ने कुएँ के
मुँह पर खड़े होकर नमाज़ पढ़ी जिसके जवाब में बाबाजी ने अधर में बेसहारे लटकते
हुए भजन किया। इन सब चमत्कारों को देखकर शाह आलमगीर को विश्वास हुआ कि

जीवन-चरित्र ४
बाबा मलूकदास पूरे साहबकमाल हैं और उनसे बड़ी दीनता के साथ कुछ माँगने को
कहा परन्तु बाबाजी ने इनकार किया, फिर बादशाह के बहुत गिड़गिड़ाने पर बोले कि
अच्छा तो एक जज़िया टिकस जो हिन्दुओं पर लगा है उस को कड़ा के लिये माफ़
कर दो, दूसरे दोनों अहदियों को एक एक सूबा बख़्श दो और परवाना लिख दो कि
मुझको यहाँ न लावें। बादशाह ने उसी दम यह दोनों हुक्म लिखकर बाबाजी के
हवाले किये जिनको लेकर बाबाजी सतसङ्ग में आधी रात को फिर प्रगट हुए और
अँगोछा जिसको सिर से पैर तक डाले रहा करते थे उठाकर सतसंगियों से बोले कि
आज बड़ी देर हो गई अब तुम लोग अपने अपने घर जाओ। सबेरे दोनों अहदियों
को शाही परवाना दिखलाया उनमें से एक तो सूबेदारी के लालच से लौट आया
लेकिन दूसरे ने कहा कि मैं ऐसा दरबार छोड़कर बादशाहीत मिले तो उसको भी धूल
समझता हूँ—इस दूसरे अहदी की क़बर आज तक बाबाजी की समाधि के पास
मौजूद है।
(४) बाबाजी अपना मकान बनवा रहे थे उसमें बहुत से मज़दूर दब गये जब
निकाले गये तो सब जीते निकले और बयान किया कि बाबाजी की सूरत के एक
आदमी ने हमारी दबी हुई दशा में प्रगट होकर रक्षा की।
(५) एक अहीरन का इकलौता लड़का मर गया माँ के बहुत रोने और प्रार्थना
करने पर बाबाजी ने अपनी उँगली चीरकर ज़रासा लोहू लड़के के मुँह में डाल कर
जिला दिया।
बाबा मलूकदास के गुरू बिट्ठलदास द्राविड़ देश के एक महात्मा थे। बाबाजी
गृहस्त आश्रम में थे और उनके एक बेटी हुई, परन्तु थोड़े ही काल में स्त्री और पुत्री
दोनों का देहान्त हो गया।
सम्बत् १७३६ में १०८ बरस की अवस्था को प्राप्त होकर बाबाजी ने चोला
छोड़ा। गुप्त होने के छः महीना पहिले उन्होंने अपने भतीजे रामस्नेही से कहा कि तुम
हमारी गद्दी पर बैठो। उन्होंने अपनी असमस्थता बयान की जिस पर बाबाजी ने
ढारस दी की ताक़त बख़्शी जायगी तब वह गद्दी पर बैठे और बाबाजी के बारह्रों गुरमुख
चेलों ने जो एक से एक बढ़कर थे आकर उनको मत्था टेका और सेवा में आये।
जब बाबाजी के चोला छोड़ने का दिन आया तो उन्होंने अपने चेलों और
कुटुम्बियों को बुलाकर कहा कि दोपहर को जब तुम लोगों के अंतर में घंटा और
संख का शब्द गाजने लगे तब समझना कि हमने चोला छोड़ दिया और हमारे शरीर
को गंगा में प्रवाह कर देना, जलाना मत, सो इस आज्ञा का पूरे तौर पर पालन किया
गया और कड़े में उनकी समाधि बना दी गई।
कहते हैं कि बाबाजी का मृतक शरीर पहिले प्रयाग के घाट पर ठहरा और एक
घाटिये से पीने को पानी माँगा और फिर डुबकी मार कर काशी में निकला और वहाँ
भी पानी और फिर क़लम दवात माँगी जिससे लिख दिया कि मलूका काशी पहुँचा,
वहाँ से गोता लगाकर जगन्नाथपुरी में पहुँचा। जगन्नाथजी ने अपने पण्डों को स्वप्न
दिया कि समुद्र तट पर एक रथी है उसे उठा लाओ। जब वह रथी आई तो पंडे उसे
मूर्ति के सम्मुख धर कर आप बाहर निकल आये और मन्दिर के पट आप से आप बंद
हो गये। बाबाजी ने जगन्नाथजी से प्रार्थना की कि हमारे विश्राम को आपके पनाले के

[Page 5]

५
जीवन-चरित्र
पास का स्थान और भोजन को आपके भोग के दाल चावल के पछोरन किनका का
रोट और तरकारी के छीलन की भाजी मिले जगन्नाथजी ने स्वीकार करके आज्ञा दी
कि हमारे भोग से बढ़कर संवाद तुम्हारे भोग में होगा । जगन्नाथजी के पनाले के पास
मलूकदासजी का स्थान अब तक मौजूद है और उनके नाम का रोट अब तक जारी है,
जो जात्रियों को जगन्नाथजी के भोग के साथ प्रसाद में मिलता है ।
बाबा मलूकदासजी के पंथ की मुख्य गद्दियाँ मौज़ा कड़ा ज़िला प्रयाग, जैपुर,
इस्फ़हाबाद, गुजरात, मुलतान, पटना ( बिहार ), सीताकोयल ( दक्खिन ), कलापुर,
नैपाल और काबुल में हैं । उनके रचे हुए ग्रन्थ भी कितने ही हैं जिनमें मुख्य रत्नखान
और ज्ञानबोध समझे जाते हैं परन्तु वह ऐसे हिन्दी अक्षर में हैं जिन्हें उनके कुनबेवाले
आप नहीं पढ़ सकते और न उनके पढ़ने का जतन करते छपवाने की बात तो दूर है ।
यह थोड़े से चुने हुए शब्द और साखियाँ जो छापी जाती हैं हम को कृपा पूर्बक
बाबाजी के परम भक्त लाला रामचरनदासजी मेहरोत्रे खत्री कड़ा वाले ( बाबू
शिव प्रसादजी अकौन्टेन्ट इलाहाबाद बैंक के पिता ) ने बाबाजी के असल दस्तखती
पुस्तक से नक़ल करा दी हैं जिसके लिये हम उनको अनेक धन्यवाद देते हैं ।
संत चरण-धूर,
एडिटर, संतबानी पुस्तक-माला ।

बाबा मलूकदासजी
अपने मुख्य चेलों के साथ
Copyright reserved

इस पृष्ठ पर कोई मुद्रित पाठ (टेक्स्ट) नहीं है। यह एक सादा/कोरा पृष्ठ (blank page) है।

मलूकदासजी की बानी
सतगुरु और निज रूप की महिमा
॥ शब्द १ ॥
अब मैं सतगुरु पूरा पाया।
मन तैं जनम जनम डहकाया¹ ॥ १ ॥
कई लाख तुम रंडी² छाँड़ी, केते बेटी बेटा।
कितने बैठे सिरदा³ करते, माया जाल लपेटा ॥ २ ॥
कितने के तुम पित्र कहाये, केते पित्र तुम्हारे।
गया बनारस कर कर थाके, देत देत पिंड हारे ॥ ३ ॥
कई लाख तुम लसकर जोड़े, केते घोड़े हाथी।
तेऊ गये बिलाय छिनक में, कोई रहा न साथी ॥ ४ ॥
आवागवन मिटाया सतगुरु, पूजी मन की आसा।
जीवन मुक्त किया परमेसुर, कहत मलूकादासा ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
हमारा सतगुरु बिरले जानै।
सुई के नाके सुमेर चलावै, सो यह रूप बखानै ॥ १ ॥
की तो जानै दास कबीरा, की हरिनाकस पूता।
की तो नामदेव औ नानक, की गोरख अवधूता ॥ २ ॥
हमरे गुरु की अद्भुत लीला, ना कछु खाय न पीवै।
ना वह सोवै ना वह जागै, ना वह मरै न जीवै ॥ ३ ॥
बिन तरवर फल फूल लगावै, सो तो वा का चेला।
छिन में रूप अनेक धरत है, छिन में रहै अकेला ॥ ४ ॥
(१) ठगाया। (२) स्त्री। (३) सिजदा, दंडवत।

प्रथम भाग: साखी संग्रह (गुरु, नाम, विरह व ज्ञान अंग)

२ मलूकदासजी की बानी
बिन दीपक उँजियारा देखे, एँड़ी समुँद थहावै ।
चींटी के पग कुंजर१ बाँधै, जा को गुरू लखावै ॥ ५ ॥
बिन पंखन उड़ि जाय अकासे, बिन पंखन उड़ि आवै ।
सोई सिष्य गुरू का प्यारा, सूखे नाव चलावै ॥ ६ ॥
बिन पायन सब जग फिरि आवै, सो मेरा गुरु भाई ।
कहै मलूक ता की बलिहारी, जिन यह जुगत बताई ॥ ७ ॥
॥ शब्द ३ ॥
नाम तुम्हारा निरमला, निरमोलक हीरा ।
तू साहेब समरत्थ, हम मल मुत्र कै कीरा ॥ १ ॥
पाप न राखै देह में, जब सुमिरन करिये ।
एक अच्छर के कहत ही, भौसागर तरिये ॥ २ ॥
अधम-उधारन सब कहैं, प्रभु बिरद तुम्हारा ।
सुनि सरनागत आइया, तब पार उतारा ॥ ३ ॥
तुझ सा गरुवा औ धनी, जा में बड़ई समाई ।
जरत उबारे पांडवा, बाव२ न लाई ॥ ४ ॥
कोटिक औगुन जन करै, प्रभु मनहि न आनै ।
कहत मलूकादास को, अपना करि जानै ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
हरि समान दाता कोउ नाहीं, सदा बिराजैं संतन माहीं ॥१॥
नाम बिसंभर बिस्व जियावै, साँझ बिहान रिजिक३ पहुंचावै ॥२॥
देइ अनेकन मुख पर ऐने,४ औगुन करै सो गुन कर मानै ॥३॥
काहू भाँति अजार५ न देई, जाही को अपना कर लेई ॥४॥
घरी घरी देता दीदार, जन अपने का खिजमतगार ॥५॥
तीन लोक जाके औसाफ६, जन का गुनह करै सब माफ ॥६॥
गरुवा ठाकुर है खुदाइ, कहै मलूक क्या करूँ बड़ाई ॥७॥
(१) हाथी । (२) गरम हवा । (३) अहार । (४) दर्पण । (५) दुख । (६) गुण ।

भेद बानी ३
॥ शब्द ५ ॥
सदा सोहागिन नारि सो, जा के राम भतारा।
मुख माँगे सुख देत हैं, जगजीवन प्यारा ॥ १ ॥
कबहुँ न चढ़ै रँडपुरा१, जानै सब कोई।
अजर अमर अबिनासिया, ता को नास न होई ॥ २ ॥
नर देंही दिन दोय की, सुन गुरजन मेरी।
क्या ऐसों का नेहरा, मुए बिपति घनेरी ॥ ३ ॥
ना उपजै ना बीनसे, संतन सुखदाई।
कहैं मलूक यह जानि के, मैं प्रीति लगाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
नैया मेरी नोके चलने लागी।
आँधी मेंह तनिक नहिं डोलै, साहु चढ़े बड़भागी ॥ १ ॥
रामराय डगमगी छोड़ाई, निर्भय कड़िया२ लैया।
गुन लहासि की हाजत३ नाहीं, आछा साज बनैया ॥ २ ॥
अवसर पड़े तो पर्वत बोझै, तँहूँ न होवै भारी।
धन सतगुरु यह जुगत बताई, तिन को मैं बलिहारी ॥ ३ ॥
सूखे पड़े तो कछु डर नाहीं, ना गहिरे का संसा।
उलटि जाय तो बार न बाँकै, या का अजब तमासा ॥ ४ ॥
कहत मलूक जो बिन सिर खेवै, सो यह रूप बखानै।
या नैया की अजब कथा, कोइ बिरला केवट जानै ॥ ५ ॥
भेद बानी
॥ शब्द १ ॥
मुरसिद मेरा दिल दरियाई, दिल गहि अंदर खोजा।
जा अंदर में सत्तर काबा, मक्का तीसो रोजा ॥ १ ॥
सातो तबक औलिया जा में, भेद न होय जुदाई।
सम्स कमर४ ठाढ़े निमाज में, दरसै जहाँ खोदाई ॥ २ ॥
(१) रँडापा। (२) डाँड़ा। (३) ज़रूरत। (४) सूरज और चाँद।

४ मलूकदासजी की बानी
हवा हिरिस खुदी१ में खोवा, अनल हक्क जहँ जानी ।
बिन चिराग रोसन सब खाना, ता में तख्त सुभानी२ ॥ ३ ॥
बिना आब३ जहँ बहु गुल फूले, अब्र४ बिना जहँ बरसै ।
हूर बिना सरोद५ सब बाजै, चस्म बिना सब दरसै ॥ ४ ॥
ता दरगाह मुसल्ला डारे, बैठा कादिर काजी ।
न्याव करै सीने की जानै, सब को राखै राजी ॥ ५ ॥
जो देखै तो कमला होवै, तब कमाल पद पावै ।
साहेब मिलि तब साहिब होवै, ज्यों जल बूँद समावै ॥ ६ ॥
तिस के पल६ दीदार किये तें, नादिर होय फकीरा ।
मारे काल कलंदर दिल सों, दरदमंद धर धीरा ॥ ७ ॥
ऐसा होय तब पीर कहावै, मनी मान जब खोवै ।
तब मलूक रोसन-जमीर होय, पाँव पसारे सोवै ॥ ८ ॥
॥ शब्द २ ॥
अबधू का कहि तोहि बखानों ।
गगन मँडल में अनहद बोलै, जाति बरन नहिं जानौं ॥ १ ॥
अहो अहो मैं कहा कहों तोहि, नाँव न जानौं देवा ।
सुन्न महल की जुगति बतावे, केहि बिधि कीजे सेवा ॥ २ ॥
तीरथ भरमैँ बड़े कहावैँ, बाद करत हैं सोई ।
अंधधुंध चल जात निरंजन, मर्म न जानै कोई ॥ ३ ॥
अबिगत गति तुम्हरी अबिनासी, घट घट रहत चलाया ।
जहाँ तहाँ तेरी माया खेलै, सतगुरु मोहि लखाया ॥ ४ ॥
वेद पढ़े पढ़ि पंडित भूले, ज्ञानी कथि कथि ज्ञाना ।
कह मलूक तेरी अद्भुत लीला, सो काहू नहि जाना ॥ ५ ॥
(१) आशा, तृष्णा और अहङ्कार । (२) मालिक । (३) पानी । (४) बादल ।
(५) राग । (६) छिन मात्र ।

बिनती ५
बिनती
॥ शब्द १ ॥
अब तेरी सरन आयो राम ॥ १ ॥
जबै सुनिया साध के मुख, पतित - पावन नाम ॥ २ ॥
यही जान पुकार कीन्ही, अति सतायो काम ॥ ३ ॥
बिषय सेती भयो आजिज१, कह मलूक गुलाम ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
साँचा तू गोपाल, साँच तेरा नाम है।
जहवाँ सुमिरन होय, धन्य सो ठाम है ॥ १ ॥
साँचा तेरा भक्त, जो तुझको जानता।
तीन लोक को राज, मनै नहिं आनता ॥ २ ॥
झूठा नाता छोड़ि, तुझे लव लाइया।
सुमिरि तिहारो नाम, परम पद पाइया ॥ ३ ॥
जिन यह लाहा२ पायो, यह जग आइ कै।
उतरि गयो भव पार, तेरो गुन गाइ कै ॥ ४ ॥
तुही मातु तुही पिता, तुही हितु बंधु है।
कहत मलूकादास, बिना तुझ धुंध३ है ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
एक तुम्हें प्रभु चाहौं राज ॥ टेक ॥
भूपति रंक सेंति४ नहिं पूछों, चरन तुम्हार सँवारयो काज ॥१॥
पाँचो पंडव जरत उबारयो, द्रुपद सुता को राख्यो लाज ॥२॥
संत - बिरोधी ऐसो मारो, ज्यों तीतर पर छूटे बाज ॥३॥
तुम्हें छोड़ि जाने जो दूजा, तेहि पापी पर परिहै गाज ॥४॥
कहैं मलूक मेरो प्रान रमइया, तीन लोक ऊपर सिरताज ॥५॥
(१) लाचार। (२) लाभ । (३) अँधियारा । (४) मुफ्त ।

६ मलूकदासजी की बानी
प्रेम
॥ शब्द १ ॥
कौन मिलावै जोगिया हो, जोगिया बिन रह्यो न जाय ॥टेक॥
मैं जो प्यासी पीव की, रटत फिरों पिउ पीव ।
जो जोगिया नहिं मिलिहै हो, तो तुरत निकासूँ जीव ॥ १ ॥
गुरुजी अहेरी मैं हिरनी, गुरु मारै प्रेम का बान ।
जेहि लागै सोइ जानई हो, और दरद नहिं जान ॥ २ ॥
कहैं मलूक सुनु जोगिनी रे, तनहिं में मनहिं समाय ।
तेरे प्रेम के कारने जोगी, सहज मिला मोहिं आय ॥ ३ ॥
॥ शब्द २ ॥
तेरा मैं दीदार - दिवाना ।
घड़ी घड़ी तुझे देखा चाहूँ, सुन साहेब रहमाना ॥ १ ॥
हुआ अलमस्त खबर नहिं तन की, पिया प्रेम पियाला ।
ठाढ़ होउँ तो गिरि गिरि परता, तेरे रँग मतवाला ॥ २ ॥
खड़ा रहूँ दरबार तुम्हारे, ज्यों घर का बंदाजादा१।
नेकी की कुलाह२ सिर दीये, गले पैरहन३ साजा ॥ ३ ॥
तौजी और निमाज न जानूँ, ना जानूँ धरि रोजा ।
बाँग जिकिर४ तबही से बिसरी, जबसे यह दिल खोजा ॥ ४ ॥
कहैं मलूक अब कजा५ न करिहौं, दिल ही सों दिल लाया ।
मक्का हज्ज हिये में देखा, पूरा मुरसिद पाया ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
दर्द - दिवाने बावरे, अलमस्त फकीरा ।
एक अकीदा६ लै रहे, ऐसे मन - धीरा ॥ १ ॥
प्रेम पियाला पीवते, बिसरे सब साथी ।
आठ पहर यों झूमते, ज्यों माता हाथी ॥ २ ॥
(१) गुलाम । (२) टोपी । (३) मेखली । (४) सुमिरन । (५) छूटी हुई नमाज़
पढ़ना । (६) प्रतीत ।

प्रेम ७
उनकी नजर न आवते, कोइ राजा रंक ।
बंधन तोड़े मोह के, फिरते निहसंक ॥ ३ ॥
साहेब मिल साहेब भये, कछु रही न तमाई१ ।
कहैं मलूक तिस घर गये, जहँ पवन न जाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
मोरा पीर निरंजना, मैं खिजमतगार ।
तुहीं तुहीं निस दिन रटौं, ठाढ़ा दरबार ॥ १ ॥
महल मियाँ का दिलहिं में, औ महजिद काया ।
छुरी देता ज्ञान की, जब तैं लौ लाया ॥ २ ॥
तसबी फेरौं प्रेम की, हिया करौं निवाज ।
जहँ तहँ फिरौं दिदार को, उसही के काज ॥ ३ ॥
कहैं मलूक अलेख के, अब हाथ बिकाना ।
नाहीं खबर वजूद२ की, मैं फकीर दिवाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
अब की लागी खेप हमारी ।
लेखा दिया साह अपने को, सहजै चीठी फारी ॥ १ ॥
सौदा करत बहुत जुग बीते, दिन दिन टूटी आई ।
अब की बार बेबाक भये हम, जम की तलब छोड़ाई ॥ २ ॥
चार पदारथ नफा भया मोहि, बनिजै कबहूँ न जइहौं ।
अब डहकाय बलाय हमारी, घर ही बैठे खइहौं ॥ ३ ॥
बस्तु अमोलक गुप्तै पाई, ताती वायु न लाऔं ।
हरि हीरा मेरा ज्ञान जौहरी, ताही सों परखाऔं ॥ ४ ॥
देव पितर औ राजा रानी, काहू से दीन न भाखौं ।
कह मलूक मेरे रामै पूँजी, जीव बराबर राखौं ॥ ५ ॥
(१) इच्छा चाह । (२) आपा, शरीर ।

८ मलूकदासजी की बानी
भक्त महिमा
॥ शब्द १ ॥
सोई सहर सुबस बसे, जहँ हरि के दासा ।
दरस किये सुख पाइये, पूजै मन आसा ॥ १ ॥
साकट के घर साधजन, सुपने नहिं जाहीं ।
तेइ तेइ नगर उजाड़ हैं, जहँ साधू नाहीं ॥ २ ॥
मूरत पूजैं बहुत मति, नित नाम पुकारैं ।
कोटि कसाई तुल्य हैं, जो आतम मारैं ॥ ३ ॥
पर दुख दुखिया भक्त है, सो रामहिं प्यारा ।
एक पलक प्रभु आप तें, नहिं राखैं न्यारा ॥ ४ ॥
दीन-बंधु करुना-मयी, ऐसे रघुराजा ।
कहैं मलूक जन आपने को, कौन निवाजा ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
देव पितर मेरे हरि के दास । गाजत हौं तिन के बिस्वास ॥ १ ॥
साधू जन पूजौं चित लाई । जिनके दरसन हिया जुड़ाई ॥ २ ॥
चरन पखारत होइ अनंदा । जन्म जन्म के काटे फंदा ॥ ३ ॥
भाव भक्ति करते निस्काम । निसि दिन सुमिरैं केवल राम ॥ ४ ॥
घर बन का उनके भय नाहीं । ज्यों पुरइनि रहता जल माहीं ॥ ५ ॥
भूत परेतन दैंव बहाई । देवखर लीपै मोर बलाई ॥ ६ ॥
बस्तु अनूठी संतन लाऊँ । कहैं मलूक सब भर्म नसाऊँ ॥ ७ ॥
मन और माया के चरित्र
॥ शब्द १ ॥
माया काली नागिनी, जिन डसिया सब संसार हो ॥ टेक ॥
इन्द्र डसा ब्रह्मा डसा, डसिया नारद ब्यास ।
बात कहत सिव को डसा, जेहि घरि एक१ बैठे पास हो ॥ १ ॥
(१) घड़ी भर।

मन और माया के चरित्र ९
कंस डसा सिसुपाल डसा, उन रावन डसिया जाय ।
दस सिर दै लंका मिली, सो छिन में दई बहाय हो ॥ २ ॥
बड़े बड़े गारुड़¹ डसे, कोउ इक थिर न रहाय ।
कच्छ² देस गोरख डसा, जा का अगम बिचार हो ॥ ३ ॥
चुनि चुनि खाये सूरमा, जा की करै जग आस ।
हम से गरीबन को गनै, कहत मलूकादास हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
क्या प्रपंच यह पंच रचा ॥ टेक ॥
आसा तृष्ना सब घट ब्यापी, मुनि गंधर्ब कोई न बचा ॥१॥
उठे बिहान पेट का धंधा, माया लाय किया जग अंधा ॥२॥
तन मन छीन कुटुंब ले लाया, छिप रही आप लोग भर्माया॥३॥
औंधी खोपरी फिरै बिचारे, भूले भक्ति छुधा के मारे ॥४॥
बिनती करत मलूकादासा, थकित भया तेरा देख तमासा॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
राम नाम क्यों लीजै मन राजा ।
काहु भाँति मेरे हाथ न आवै, महा बिकट दल साजा ॥ १ ॥
कई बार इन पैंड़े चलते, लस्कर लूटा मेरा ।
चहुँ जुग राज बिराजी करता, अदब न मानै तेरा ॥ २ ॥
येही सब घट दुन्द मचावै, मारै रैयत खासी ।
काहू नृप को नजर न आनै, एते मान मवासी ॥ ३ ॥
कह मलूक जिय ऐसी आवै, छल बल करि येही गहिये ।
इसहि मारि काया गढ़ लेके, तब खासे घर रहिये ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
हम से जनि लागे तू माया ।
थोरे से फिर बहुत होयगी, सुनि पैहें रघुराया ॥ १ ॥
(१) साँप के बिष उतारने का मन्त्र जानने वाले । (२) गोरखनाथ की जन्म भूमि ।
२

१० मलूकदासजी की बानी
अपने में है साहेब हमरा, अजहूँ चेतु दिवानी ।
काहू जन के बस परि जैहौ, भरत मरहुगी पानी ॥ २ ॥
तर ह्वै चितै१ लाज करु जन की, डारु हाथ की फाँसी ।
जन तें तेरो जोर न लहिहै२, रच्छपाल अबिनासी ॥ ३ ॥
कहै मलूका चुप करु ठगनी, औगुन राखु दुराई ।
जो जन उबरै राम नाम कहि, तातें कछु न बसाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
माया के गुलाम, गीदी क्या जानैं बंदगी ॥ टेक ॥
साधुन से धूम धाम, करत चोरन के काम ।
द्विजन को पूजा देयँ, गरीबन से रिन्दगी ॥ १ ॥
कपट को माला लिये, छापा मुद्रा तिलक दिये ।
बगल में पोथी दावे, लायो फरफंदगी ॥ २ ॥
कहत मलूकदास, छोडु दगाबाजी आस ।
भजहु गोविन्द राय, मेटैं तेरी गंदगी ॥ ३ ॥
॥ चेतावनी ॥
॥ शब्द १ ॥
जा दिन का डर मानता, सोइ बेला आई ।
भक्ति न कीन्ही राम की, ठकमूरी३ खाई ॥ १ ॥
जिन के कारन पचि मुवा, सब दुख की रासी ।
रोइ रोइ जन्म गँवाइया, परी मोह की फाँसी ॥ २ ॥
तन मन धन नहिं आपना, नहिं सुत औ नारी ।
बिछुरत बार न लागई, जिय देखु बिचारी ॥ ३ ॥
मनुष जन्म दुर्लभ अहै, बड़े पुन्ने पाया ।
सोउ अकारथ खोइया, नहिं ठौर लगाया ॥ ४ ॥
(१) नीची निगाह कर देख । (२) चलेगा । (३) चकाचौंधी, हवास पैतरे हो जाना ।

चेतावनी ११
साध सँगत कब करोगे, यह औसर बीता ।
कहै मलूका पाँच में, बैरी एक न जोता ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
राम मिलन क्यों पइये, मोहिं राखा ठगवन घेरि हो ॥
क्रोध तो काला नाग है, काम तो परघट काल ।
आप आप को खैंचते, मोहिं कर डाला बेहाल हो ॥ १ ॥
एक कनक और कामिनी, यह दोनों बटपार ।
मिसरी को छुरी गर लाय के, इन मारा सब संसार हो ॥ २ ॥
इन में कोई ना भला, सब का एक बिचार ।
पैंड़ा मारैं भजन का, कोइ कैसे के उतरै पार हो ॥ ३ ॥
उपजत बिनसत थकि पड़ा, जियरा गया उकताय ।
कहैं मलूक बहु भरमिया, मो पै अब नहिं भरमो जाय हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
इन्द्री खाय गई जग सारा ।
निस दिन चरा करे बन काया, कोई न हाँकनहारा ॥ १ ॥
पीप रक्त करै तन भँझरा, सरबस जाय नसाई ।
जैसी भाँति काठ घुन लागै, बहुरि रहै फोकलाई१ ॥ २ ॥
होता बीज औंट के लोहू, सो देंही का राजा ।
ऐसी बस्तु अकारथ खोवै, अपना करै अकाजा ॥ ३ ॥
मनुवा मार भजै भगवंतहिं, या मति कबहूँ न ठाना२ ।
जियरा दोय घरी के सुख को, कहत मलूक दिवाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
अजब तमासा देखा तेरा । ता तें उदास भया मन मेरा ॥१॥
उतपति परलय नित उठ होई । जग में अमर न देखा कोई ॥२॥
माटी के पुतरे माया लाई । कोइ कहे बहिन कोई कहे भाई ॥३॥
(१) छिलका । (२) दृढ़ किया ।