मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३ जीवन-चरित्र
लाये। सौदागर ने पूछा कि तुम्हारा जहाज़ कहाँ तबाह हुआ जिस पर उसने जवाब
दिया कि कहीं नहीं। हम अपने गुरु कि आज्ञा से पृथ्वी-परिक्रमा को निकले हैं और
उसके विशेष प्रश्न करने पर कुल हाल कह सुनाया और अपने गुरु का पूरा पता
ठिकाना बतला दिया और फिर समुद्र में कूद कर गोता मार कर गायब हो गया।
सौदागर अचरज में पड़ गया और उसके मन में गुरुजी की महिमा पूरे तौर
पर समा गई।
(२) कुछ दिन पीछे सौदागर का जहाज़ बड़े ख़तरे में पड़ा तब उसने सङ्कल्प
किया कि अगर जहाज़ बाबा मलूकदासजी की दया दृष्टि से बच जाय तो मैं चौथाई
माल उनके चरणों में भेंट करूँगा। दया से जहाज़ बच गया और सौदागर बाबाजी
की सेवा में चौथाई माल लेकर कड़ा में हाज़िर हुआ और सब हाल कह सुनाया।
उस समय के बादशाह आलमगीर का वज़ीर बाबाजी के पास मौजूद था। उसका मन
मोती की एक क़ीमती माला देखकर बहुत ललचाया जिसे सौदागर बाबाजी के गले में
पहिराने को हाथ में लिये था। बाबाजी सौदागर से बोले कि किसी का माल सेंत में
लेना दोष की बात है पर हमने तुम्हारे जहाज़ को तबाही से बचाने में बड़ा परिश्रम
किया है यह कह कर अँगोछे को अपने कन्धे से उठा कर पीठ को दिखलाया जिस पर
बहुत से दाग मौजूद थे। फिर माला को सौदागर के हाथ से लेकर वज़ीर के गले में
डाल दिया।
(३) वज़ीर वहाँ से मगन होकर बादशाह के यहाँ आया और बाबा मलूकदास
का सब हाल कह सुनाया और बड़ी महिमा गाई। आलमगीर ने जो बड़ा कट्टर था
हुक्म दिया कि तीन अहदी तुरंत जायँ और बाबा मलूकदास को जिस तरह से बैठे हों
लाकर हाज़िर करें। उन तीन अहदियों में दो भले आदमी थे और एक लुच्चा जिसने
हठ किया कि जिस सूरत में बाबाजी बैठे होंगे उसी दम पकड़ लावेंगे परन्तु मौज से
यह तीसरा अहदी रास्ते में ही मर गया। बाक़ी दो बाबाजी के आश्रम पर पहुँचे
और बाबाजी के इस कहने को कि दूसरे दिन सबेरे उनके साथ चलेंगे मंजूर किया।
लेकिन पहिले ही दिन साँझ को बाबाजी सतसंग से अन्तर्ध्यान हो कर दिल्ली जा पहुँचे
और बादशाही महल में जहाँ बादशाह अपनी बेगम के साथ बैठे थे जा खड़े हुए।
बादशाह ने घबराकर पूछा कि तुम कौन हो? बाबाजी ने जवाब दिया कि मलूका जिसको
आपने याद किया है। बेगम हट गई और बादशाह ने बाबाजी को बड़े आदर से
बैठाया और उनकी जाति पूछी। बाबाजी ने जवाब दिया कि फ़कीरों के जाति पाँत नहीं
होती इस पर बादशाह ने उनके खाने को खिचड़ी पकाने का हुक्म दिया जब पक कर
देगची आई और खोली गई तो उसमें से खिचड़ी के बदले कुत्ते के पिल्ले जीते हुए
निकल आये जिन्हें देखकर बाबाजी ने बादशाह से पूछा कि आप यही खिचड़ी खाते
हैं। बादशाह ने बावरची पर बहुत क्रोध कर दूसरी खिचड़ी बनाने का हुक्म दिया।
इस बार देगची खोलने पर उसमें से राख निकली। बाबाजी बोले कि यह खाना
फ़क़ीरों के योग्य है और उसमें से एक चिटकी राख लेकर फूँक दिया तो ऐसी आँधी
पानी दिल्ली भर में आया कि शहर गारत होने लगा। फिर बादशाह की प्रार्थना पर
बाबाजी ने दया करके वह उत्पात हटा लिया। ऐसे ही लिखा है कि आलमगीर ने कुएँ के
मुँह पर खड़े होकर नमाज़ पढ़ी जिसके जवाब में बाबाजी ने अधर में बेसहारे लटकते
हुए भजन किया। इन सब चमत्कारों को देखकर शाह आलमगीर को विश्वास हुआ कि