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सर्वकोश
मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 45 में से

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पृष्ठ 6

जीवन-चरित्र ४
बाबा मलूकदास पूरे साहबकमाल हैं और उनसे बड़ी दीनता के साथ कुछ माँगने को
कहा परन्तु बाबाजी ने इनकार किया, फिर बादशाह के बहुत गिड़गिड़ाने पर बोले कि
अच्छा तो एक जज़िया टिकस जो हिन्दुओं पर लगा है उस को कड़ा के लिये माफ़
कर दो, दूसरे दोनों अहदियों को एक एक सूबा बख़्श दो और परवाना लिख दो कि
मुझको यहाँ न लावें। बादशाह ने उसी दम यह दोनों हुक्म लिखकर बाबाजी के
हवाले किये जिनको लेकर बाबाजी सतसङ्ग में आधी रात को फिर प्रगट हुए और
अँगोछा जिसको सिर से पैर तक डाले रहा करते थे उठाकर सतसंगियों से बोले कि
आज बड़ी देर हो गई अब तुम लोग अपने अपने घर जाओ। सबेरे दोनों अहदियों
को शाही परवाना दिखलाया उनमें से एक तो सूबेदारी के लालच से लौट आया
लेकिन दूसरे ने कहा कि मैं ऐसा दरबार छोड़कर बादशाहीत मिले तो उसको भी धूल
समझता हूँ—इस दूसरे अहदी की क़बर आज तक बाबाजी की समाधि के पास
मौजूद है।
(४) बाबाजी अपना मकान बनवा रहे थे उसमें बहुत से मज़दूर दब गये जब
निकाले गये तो सब जीते निकले और बयान किया कि बाबाजी की सूरत के एक
आदमी ने हमारी दबी हुई दशा में प्रगट होकर रक्षा की।
(५) एक अहीरन का इकलौता लड़का मर गया माँ के बहुत रोने और प्रार्थना
करने पर बाबाजी ने अपनी उँगली चीरकर ज़रासा लोहू लड़के के मुँह में डाल कर
जिला दिया।
बाबा मलूकदास के गुरू बिट्ठलदास द्राविड़ देश के एक महात्मा थे। बाबाजी
गृहस्त आश्रम में थे और उनके एक बेटी हुई, परन्तु थोड़े ही काल में स्त्री और पुत्री
दोनों का देहान्त हो गया।
सम्बत् १७३६ में १०८ बरस की अवस्था को प्राप्त होकर बाबाजी ने चोला
छोड़ा। गुप्त होने के छः महीना पहिले उन्होंने अपने भतीजे रामस्नेही से कहा कि तुम
हमारी गद्दी पर बैठो। उन्होंने अपनी असमस्थता बयान की जिस पर बाबाजी ने
ढारस दी की ताक़त बख़्शी जायगी तब वह गद्दी पर बैठे और बाबाजी के बारह्रों गुरमुख
चेलों ने जो एक से एक बढ़कर थे आकर उनको मत्था टेका और सेवा में आये।
जब बाबाजी के चोला छोड़ने का दिन आया तो उन्होंने अपने चेलों और
कुटुम्बियों को बुलाकर कहा कि दोपहर को जब तुम लोगों के अंतर में घंटा और
संख का शब्द गाजने लगे तब समझना कि हमने चोला छोड़ दिया और हमारे शरीर
को गंगा में प्रवाह कर देना, जलाना मत, सो इस आज्ञा का पूरे तौर पर पालन किया
गया और कड़े में उनकी समाधि बना दी गई।
कहते हैं कि बाबाजी का मृतक शरीर पहिले प्रयाग के घाट पर ठहरा और एक
घाटिये से पीने को पानी माँगा और फिर डुबकी मार कर काशी में निकला और वहाँ
भी पानी और फिर क़लम दवात माँगी जिससे लिख दिया कि मलूका काशी पहुँचा,
वहाँ से गोता लगाकर जगन्नाथपुरी में पहुँचा। जगन्नाथजी ने अपने पण्डों को स्वप्न
दिया कि समुद्र तट पर एक रथी है उसे उठा लाओ। जब वह रथी आई तो पंडे उसे
मूर्ति के सम्मुख धर कर आप बाहर निकल आये और मन्दिर के पट आप से आप बंद
हो गये। बाबाजी ने जगन्नाथजी से प्रार्थना की कि हमारे विश्राम को आपके पनाले के