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मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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मलूकदासजी का जीवन-चरित्र
बाबा मलूकदास जी ज़िला इलाहाबाद के कड़ा नामी गाँव में बैसाख बदी ५
सम्बत १६३१ विक्रमी में लाला सुन्दरदास खत्री कक्कड़ के घर प्रगट हुए। जब पाँच
बरस के हुए तो मकान से बाहर गली में खेला करते थे और खेल के दर्मियान जो
कुछ काँटा कूड़ा करकट गली में पड़ा होता उसे उठाकर एक कोने में डाल देते कि
किसी के पाँव में न लग कर कष्ट न हो। एक दिन की बात है कि जब वह मामूल
मुवाफ़िक खेल रहे थे एक पूरे महात्मा उसी गली में आ निकले और उनको देख कर
लोगों से पूछा कि यह किसका लड़का है और यह सुनकर कि वह सुन्दरदास का बेटा
है बाप को बुलवाया और कहा कि अचरज है कि यह लड़का गली में इस तरह
अकेला खेल रहा है इसकी अजानु बाहु यानी लम्बी भुजा इस बात की सूचक हैं कि या
तो यह सात दीप का अखंड राजा हो या ऊँची साध गति को प्राप्त हो—बाबा मलूक-
दास जी की इतनी लम्बी बाँह थीं जो खड़े होने से घुटने के नीचे पहुँचती थीं। इस बात
को सुनकर सुन्दरदास तो अचरज में आकर हक्के बक्के हो गये पर बाबा मलूकदासजी
बोले कि महात्मा जी आप ठीक कहते हैं।
मलूकदासजी साध सेवा लड़कपन ही से बड़ी निष्ठा से करते थे, जो साधू और
भूखे आते उनका सम्मान और खाने पीने की फ़िकर रखते। एक दिन का ज़िकर है कि
एक मंडली साधुओं की आई और भोजन माँगा। बाबाजी ने घर के भंडार घर में सेंध
लगा कर जो कुछ सामग्री थी निकाल ली और साधुओं को खिला दिया। जब उनकी
माँ रसोई के समय सीधा निकालने गईं तो वहाँ कुछ न पाया बेचारी रोने लगीं कि
अब घर के लिए कहाँ से खाना बनाऊँ और बोलीं कि यह काम मल्लू का है। इसी
दर्मियान में बाबा मलूकदासजी आ पहुँचे और पूछा कि माँ क्यों रोती है। माँ बोली कि
बेटा तुम्हारी करतूत पर रोती हूँ कि भंडारे की सब सामग्री साधुओं को खिलाकर बाप
माँ को भूखा रक्खोगे। बाबाजी बोले कि मैंने तो एक दाना नहीं लिया है जिस पर माँ
झुँझला कर उन्हें भंडार घर में पकड़ ले गई कि देख सब बर्तन तो खाली पड़े हैं लेकिन
वहाँ पहुँच कर जो देखा तो सब सामग्री ज्यों की त्यों भरी पाई।
जब इनकी अवस्था दस ग्यारह बरस की हुई तो बाप ने इन्हें व्योपार में लगाना
चाहा और कम्बल थोक में लेकर कहा कि इनको बाजार में बेच लाया करो। देहात में
हर आठवें दिन पैंठ लगती है सो यह आठवें दिन कम्बल बेचने जाते थे और इस
दर्मियान में कोई साधू या गरीब इनसे माँगता तो उसे योंही दे देते।
एक बार यह एक दूर के गाँव में कम्बल बेचने गये लेकिन उस दिन न तो कोई
कम्बल बिका और न कोई मँगता मिला जिसे मुफ्त दे देते, पूरा गट्ठर कम्मलों का कड़ी
धूप में सिर पर लाद कर घर लाने में थक गये और इसलिये रास्ते में एक नीम के पेड़
की छाया में बैठ गये कि एक मज़दूर आया और कहा कि एक टका पर हम तुम्हारा
गट्ठर घर पर पहुँचा देंगे। मज़दूर तेज़ चाल से आगे बढ़ गया और बाबाजी बेफ़िकर
भजन करते हुए घर लौटे। मज़दूर के अकेले गठरी लाने पर इनकी माँ को संदेह हुआ