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सर्वकोश
मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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जीवन-चरित्र ९

कि कहीं कुछ कम्बल निकाल न लिये हों इसलिये उसे थोड़ा सा खाना देकर खिलाने
के बहाने कोठरी में बन्द कर दिया कि जब बेटा आवे तो गठरी का माल सहेज कर
उसे जाने दें । जब मलूकदास जी पहुँचे तो वह क्रोध से बोली कि ऐसी बेपरवाही क्यों
करते हो अब गट्ठर खोल कर कम्बल गिन लो अगर पूरे निकलें तो कोठरी से
मज़दूर को जाने दो मैंने उसे खाने को दे दिया है । बाबाजी घबराये हुए कोठरी खोल
कर भीतर घुसे तो देखा कि मज़दूर गायब है सिर्फ एक टुकड़ा रोटी का पड़ा है जिसे
प्रसाद के भाव से बाबाजी ने उठाकर खा लिया और माँ के चरनों पर गिरकर बोले कि
तू बड़ी भाग्यमान है कि ईश्वर ने तुझे मज़दूर के रूप में दर्शन दिया और मुझे बहका
दिया अब मैं इसी कोठरी में बैठता हूँ, जब तक न कहूँ मत खोलना और न शोरगुल
करना । इस तरह बाबाजी भगवन्त के ध्यान में बैठ गये जब दूसरे या तीसरे दिन
साक्षात दर्शन पाये तब बाहर निकले और माँ के चरनों पर मत्था टेका । फिर इसी तरह
ध्यान और भजन का नेम कर लिया ।
अब तो बाबा मलूकदासजी की कीर्ति चारों ओर फैली और हजारों आदमी दूर
दूर से दर्शन को आने लगे और नित प्रति सतसंग और सत उपदेश से अनेक जीव
लाभ उठाने लगे ।
बाबाजी के चमत्कार और करामात की ऐसी ही और इससे बढ़ कर बहुत सी
कथा प्रसिद्ध हैं जिन सबके यहाँ लिखने की जरूरत नहीं है लेकिन थोड़े से कौतुक जो
उनके प्रेमी स्वग्रामी लाला रामचरनदासजी मेहरोत्रे खत्री ने लिख भेजे हैं वह संक्षेप
में नीचे छापे जाते हैं, पाठक जन जैसा जिसका निश्चय हो मानें । इसमें सन्देह नहीं
कि पूरे साध और मालिक के सच्चे भक्त सर्व-समरथ हैं परन्तु वह अपनी शक्ति को
कहाँ तक बाहर प्रगट करते हैं इसको हर एक अन्तर अभ्यासी जानता है :—
(१) कहा जाता है कि एक बार भारी अकाल पड़ा यहाँ तक कि पेड़ों में पत्ती
तक खाने को नहीं रह गई, हजारों आदमी वर्षा के लिये हाहाकार करते बाबाजी के
चरनों पर आ गिरे । बाबाजी ने पहिले तो अपनी असमर्थ्यता बहुत कुछ बयान की
पर जब वह लोग किसी तरह न माने तो दया बस उनके साथ मैदान में प्रार्थना करने
को चले । इस बीच में बाबाजी का एक गुरुमुख चेला लालदास आया और अपने गुरु
को गद्दी पर न पाकर हाल पूछा तो मालूम हुआ कि गाँव वालों के साथ बस्ती के
बाहर पानी बरसाने के लिये प्रार्थना करने गये हैं । यह सुनकर चेले को इन्द्र पर बड़ा
क्रोध आया कि वह ऐसा अहंकारी है कि जब हमारे गुरु महाराज उठ कर जावैं तब
वह पानी बरसावै यह कह कर एक साधू का भंग-घोटना उठाकर बोला कि अभी एक
साँटा इन्द्र को ऐसा लगाता हूँ कि इन्द्रासन सहित यहीं गिरता है परन्तु भंग-घोटने का
सोंटा उठाते ही इन्द्र काँप उठा और उसी दम बड़े वेग से पानी बरसने लगा । बाबाजी
अभी मैदान में न पहुँचे थे कि वर्षा देख कर रास्ते से आश्रम को लौट आये और यहाँ
सब वृत्तान्त सुनाकर चेले पर बहुत अप्रसन्न हुए कि देवताओं पर इस तरह जोर
न चलाना चाहिये — उनसे राजी से काम लेना चाहिये । चेले ने बड़ी दीनता से छिमा
माँगी जिस पर गुरुजी ने आज्ञा की कि जाकर पृथवी परिक्रमा कर आओ तब तुम्हारा
अपराध छिमा होगा । चेला यह आज्ञा पाते ही गुरु को दंडवत करके रवाना हुआ और
गंगा नदी में कूद पड़ा और वहाँ से समुद्र में एक जहाज के पास जा निकला । खला-
सियों ने उसे बहता देखकर निकाल लिया और जहाज़ के मालिक सौदागर के पास