महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२२८-
अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
शार्ङ्गोपाख्यान—मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता-शार्ङ्गिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना
जनमेजय उवाच
किमर्थं शार्ङ्गिकानग्निर्न ददाह तथागते ।
तस्मिन् वने दह्यमाने ब्रह्मन्नेतत् प्रचक्ष्व मे ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! इस प्रकार सारे वनके जलाये जानेपर भी अग्निदेवने उन चारों शार्ङ्गकोंको क्यों दग्ध नहीं किया? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
अदाहे ह्यश्वसेनस्य दानवस्य मयस्य च ।
कारणं कीर्तितं ब्रह्मञ्छार्ङ्गिकाणां न कीर्तितम् ॥ २ ॥
विप्रवर! आपने अश्वसेन नाग तथा मयदानवके न जलनेका कारण तो बताया है; परंतु शार्ङ्गकोंके दग्ध न होनेका कारण नहीं कहा है ॥ २ ॥
तदेतदद्भुतं ब्रह्मञ्छार्ङ्गिकाणामनामयम् ।
कीर्तयस्वाग्निसम्मर्दे कथं ते न विनाशिताः ॥ ३ ॥
ब्रह्मन्! उस भयानक अग्निकाण्डमें उन शार्ङ्गकोंका सकुशल बच जाना, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। कृपया बताइये, उनका नाश कैसे नहीं हुआ? ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
यदर्थं शार्ङ्गिकानग्निर्न ददाह तथागते ।
तत् ते सर्वं प्रवक्ष्यामि यथाभूतमरिंदम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— शत्रुदमन जनमेजय! वैसे भयंकर अग्निकाण्डमें भी अग्निदेवने जिस कारणसे शार्ङ्गकोंको दग्ध नहीं किया और जिस प्रकार वह घटना घटित हुई, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ४ ॥
धर्मज्ञानां मुख्यतमस्तपस्वी संशितव्रतः ।
आसीन्महर्षिः श्रुतवान् मन्दपाल इति श्रुतः ॥ ५ ॥
मन्दपाल नामसे विख्यात एक विद्वान् महर्षि थे। वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ और कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे ॥ ५ ॥
स मार्गमाश्रितो राजन्नृषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।
स्वाध्यायवान् धर्मरतस्तपस्वी विजितेन्द्रियः ॥ ६ ॥
राजन्! वे ऊर्ध्वरेता मुनियोंके मार्ग (ब्रह्मचर्य)-का आश्रय लेकर सदा वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न और धर्मपालनमें तत्पर रहते थे। उन्होंने सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें कर लिया था और वे सदा तपस्यामें ही लगे रहते थे ॥ ६ ॥
स गत्वा तपसः पारं देहमुत्सृज्य भारत ।
जगाम पितृलोकाय न लेभे तत्र तत्फलम् ॥ ७ ॥
भारत! वे अपनी तपस्याको पूरी करके शरीरका त्याग करनेपर पितृलोकमें गये; किंतु वहाँ उन्हें अपने तप एवं सत्कर्मोंका फल नहीं मिला ॥ ७ ॥
स लोकानफलान् दृष्ट्वा तपसा निर्जितानपि ।
पप्रच्छ धर्मराजस्य समीपस्थान् दिवौकसः ॥ ८ ॥
उन्होंने तपस्याद्वारा वशमें किये हुए लोकोंको भी निष्फल देखकर धर्मराजके पास बैठे हुए देवताओंसे पूछा ॥ ८ ॥
मन्दपाल उवाच
किमर्थमावृता लोका ममैते तपसार्जिताः ।
किं मया न कृतं तत्र यस्यैतत् कर्मणः फलम् ॥ ९ ॥
मन्दपाल बोले—देवताओ! मेरी तपस्याद्वारा प्राप्त हुए ये लोक बंद क्यों हैं? (उपभोगके साधनोंसे शून्य क्यों हैं?) मैंने वहाँ कौन-सा सत्कर्म नहीं किया है, जिसका फल मुझे इस रूपमें मिला है ॥ ९ ॥
तत्राहं तत् करिष्यामि यदर्थमिदमावृतम् ।
फलमेतस्य तपसः कथयध्वं दिवौकसः ॥ १० ॥
जिसके लिये इस तपस्याका फल ढका हुआ है, मैं उस लोकमें जाकर वह कर्म करूँगा। आपलोग मुझसे उसको बताइये ॥ १० ॥
देवा ऊचुः
ऋणिनो मानवा ब्रह्मन् जायन्ते येन तच्छृणु ।
क्रियाभिर्ब्रह्मचर्येण प्रजया च न संशयः ॥ ११ ॥
तदपाक्रियते सर्वं यज्ञेन तपसा श्रुतैः ।
तपस्वी यज्ञकृच्चासि न च ते विद्यते प्रजा ॥ १२ ॥
देवताओंने कहा—ब्रह्मन्! मनुष्य जिस ऋणसे ऋणी होकर जन्म लेते हैं, उसे सुनिये। यज्ञकर्म, ब्रह्मचर्यपालन और प्रजाकी उत्पत्ति—इन तीनोंके लिये सभी मनुष्योंपर ऋण रहता है, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ, तपस्या और वेदाध्ययनके द्वारा वह सारा ऋण दूर किया जाता है। आप तपस्वी और यज्ञकर्ता तो हैं ही, आपके कोई संतान नहीं है ॥ ११-१२ ॥
त इमे प्रसवस्यार्थे तव लोकाः समावृताः ।
प्रजायस्व ततो लोकानुपभोक्ष्यसि पुष्कलान् ॥ १३ ॥
अतः संतानके लिये ही आपके ये लोक ढके हुए हैं। इसलिये पहले संतान उत्पन्न कीजिये, फिर अपने प्रचुर पुण्यलोकोंका फल भोगियेगा।। १३।।
पुंनाम्नो नरकात् पुत्रस्त्रायते पितरं श्रुतिः।
तस्मादपत्यसंताने यतस्व ब्रह्मसत्तम।। १४।।
श्रुतिका कथन है कि पुत्र 'पुत्' नामक नरकसे पिताका उद्धार करता है। अतः विप्रवर! आप अपनी वंशपरम्पराको अविच्छिन्न बनानेका प्रयत्न कीजिये।। १४।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम्।
क्व नु शीघ्रमपत्यं स्याद् बहुलं चेत्यचिन्तयत्।। १५।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवताओंका वह वचन सुनकर मन्दपालने बहुत सोचा-विचारा कि कहाँ जानेसे मुझे शीघ्र संतान होगी।। १५।।
स चिन्तयन्नभ्यगच्छत् सुबहुप्रसवान् खगान्।
शार्ङ्गिकां शार्ङ्गिको भूत्वा जरितां समुपेयिवान्।। १६।।
यह सोचते हुए वे अधिक बच्चे देनेवाले पक्षियोंके यहाँ गये और शार्ङ्गिक होकर जरिता नामवाली शार्ङ्गिकासे सम्बन्ध स्थापित किया।। १६।।
तस्यां पुत्रानजनयच्चतुरो ब्रह्मवादिनः।
तानपास्य स तत्रैव जगाम लपितां प्रति।। १७।।
बालान् स तानण्डगतान् सह मात्रा मुनिर्वने।
जरिताके गर्भसे चार ब्रह्मवादी पुत्रोंको मुनिने जन्म दिया। अंडेमें पड़े हुए उन बच्चोंको मातासहित वहीं छोड़कर वे मुनि वनमें लपिताके पास चले गये।। १७ १/२ ।।
तस्मिन् गते महाभागे लपितां प्रति भारत।। १८।।
अपत्यस्नेहसंयुक्ता जरिता बह्वचिन्तयत्।
भारत! महाभाग मन्दपाल मुनिके लपिताके पास चले जानेपर संतानके प्रति स्नेहयुक्त जरिताको बड़ी चिन्ता हुई।। १८ १/२ ।।
तेन त्यक्तानसंत्याज्यानृषीनण्डगतान् वने।। १९।।
न जहौ पुत्रशोकार्ता जरिता खाण्डवे सुतान्।
बभार चैतान् संजातान् स्ववृत्त्या स्नेहविप्लवा।। २०।।
अंडेमें स्थित उन मुनियोंको यद्यपि मन्दपालने त्याग दिया था, तो भी वे त्यागने योग्य नहीं थे। अतः पुत्र-शोकसे पीड़ित हुई जरिताने खाण्डववनमें अपने पुत्रोंको नहीं छोड़ा। वह स्नेहसे विह्वल होकर अपनी वृत्तिद्वारा उन नवजात शिशुओंका भरण-पोषण करती रही।। १९-२०।।
ततोऽग्निं खाण्डवं दग्धुमायान्तं दृष्टवानृषिः।
मन्दपालश्चरंस्तस्मिन् वने लपितया सह ॥ २१ ॥
उधर वनमें लपिताके साथ विचरते हुए मन्दपाल मुनिने अग्निदेवको खाण्डववनका दाह करनेके लिये आते देखा ॥ २१ ॥
तं संकल्पं विदित्वाग्नेर्ज्ञात्वा पुत्रांश्च बालकान् ।
सोऽभितुष्टाव विप्रर्षिर्ब्राह्मणो जातवेदसम् ॥ २२ ॥
पुत्रान् प्रति वदन् भीतो लोकपालं महौजसम् ।
अग्निदेवके संकल्पको जानकर और अपने पुत्रोंकी बाल्यावस्थाका विचार करके ब्रह्मर्षि मन्दपाल भयभीत होकर महातेजस्वी लोकपाल अग्निसे अपने पुत्रोंकी रक्षाके लिये निवेदन करते हुए (ईश्वरकी भाँति) उनकी स्तुति करने लगे ॥ २२ १/२ ॥
मन्दपाल उवाच
त्वमग्ने सर्वलोकानां मुखं त्वमसि हव्यवाट् ॥ २३ ॥
**मन्दपालने कहा—**अग्निदेव! आप सब लोकोंके मुख हैं, आप ही देवताओंको हविष्य पहुँचाते हैं ॥ २३ ॥
त्वमन्तः सर्वभूतानां गूढश्चरसि पावक ।
त्वामेकमाहुः कवयस्त्वामाहुस्त्रिविधं पुनः ॥ २४ ॥
पावक! आप समस्त प्राणियोंके अन्तस्तलमें गूढ़-रूपसे विचरते हैं। विद्वान् पुरुष आपको एक (अद्वितीय ब्रह्मरूप) बताते हैं। फिर दिव्य, भौम और जठरानलरूपसे आपके त्रिविध स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं ॥ २४ ॥
त्वामष्टधा कल्पयित्वा यज्ञवाहमकल्पयन् ।
त्वया विश्वमिदं सृष्टं वदन्ति परमर्षयः ॥ २५ ॥
आपको ही पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और यजमान—इन आठ मूर्तियोंमें विभक्त करके ज्ञानी पुरुषोंने आपको यज्ञवाहन बनाया है। महर्षि कहते हैं कि इस सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि आपने ही की है ॥ २५ ॥
त्वदृते हि जगत् कृत्स्नं सद्यो नश्येद् हुताशन ।
तुभ्यं कृत्वा नमो विप्राः स्वकर्मविजितां गतिम् ॥ २६ ॥
गच्छन्ति सह पत्नीभिः सुतैरपि च शाश्वतीम् ।
हुताशन! आपके बिना सम्पूर्ण जगत् तत्काल नष्ट हो जायगा। ब्राह्मणलोग आपको नमस्कार करके अपनी पत्नियों और पुत्रोंके साथ कर्मानुसार प्राप्त की हुई सनातन गतिको प्राप्त होते हैं ॥ २६ १/२ ॥
त्वामग्ने जलदानाहुः खे विषक्तान् सविद्युतः ॥ २७ ॥
अग्ने! आकाशमें विद्युत्कें साथ मेघोंकी जो घटा घिर आती है, उसे भी आपका ही स्वरूप कहते हैं ॥ २७ ॥
दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतयः ।
जातवेदस्त्वयैवेदं विश्वं सृष्टं महाद्युते ॥ २८ ॥
प्रलयकालमें आपसे ही भयंकर ज्वालाएँ निकलकर सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म कर डालती हैं। महान् तेजस्वी जातवेदा! आपसे ही यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है ॥ २८ ॥
तवैव कर्म विहितं भूतं सर्वं चराचरम् ।
त्वयाऽऽपो विहिताः पूर्वं त्वयि सर्वमिदं जगत् ॥ २९ ॥
तथा आपके ही द्वारा कर्मोंका विधान किया गया है और सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है। आपसे ही पूर्वकालमें जलकी सृष्टि हुई है और आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ॥ २९ ॥
त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत् सम्प्रतिष्ठितम् ।
त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पतिः ॥ ३० ॥
त्वमश्विनौ यमौ मित्रः सोमस्त्वमसि चानिलः ।
आपहीमें हव्य और कव्य यथावत् प्रतिष्ठित हैं। देव! आप ही दग्ध करनेवाले अग्नि, धारण-पोषण करनेवाले धाता और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति हैं। आप ही युगल अश्विनीकुमार, मित्र (सूर्य), चन्द्रमा और वायु हैं ॥ ३०१/२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावकः ॥ ३१ ॥
तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजसः ।
उवाच चैनं प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते ॥ ३२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! मन्दपाल मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर अग्निदेव उन अमित-तेजस्वी महर्षिपर बहुत प्रसन्न हुए और प्रसन्नचित्त होकर उनसे बोले—‘मैं आपके किस अभीष्ट कार्यकी सिद्धि करूँ?’ ॥ ३१-३२ ॥
तमब्रवीन्मन्दपालः प्राञ्जलिर्हव्यवाहनम् ।
प्रदहन् खाण्डवं दावं मम पुत्रान् विसर्जैय ॥ ३३ ॥
तब मन्दपालने हाथ जोड़कर हव्यवाहन अग्निसे कहा—‘भगवन्! आप खाण्डववनका दाह करते समय मेरे पुत्रोंको बचा दें’ ॥ ३३ ॥
तथेति तत् प्रतिश्रुत्य भगवान् हव्यवाहनः ।
खाण्डवे तेन कालेन प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ३४ ॥
‘बहुत अच्छा’ कहकर भगवान् हव्यवाहनने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की और उस समय खाण्डववनको जलानेके लिये वे प्रज्वलित हो उठे ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्यानेऽष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २२८ ।।