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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

(राजसूयारम्भपर्व)

(राजसूयारम्भपर्व)

त्रयोदशोऽध्यायः

युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना

वैशम्पायन उवाच

ऋषेस्तद् वचनं श्रुत्वा निशश्वास युधिष्ठिरः ।
चिन्तयन् राजसूयेष्टिं न लेभे शर्म भारत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवर्षि नारदका वह वचन सुनकर युधिष्ठिरने लंबी साँस खींची। राजसूययज्ञके सम्बन्धमें चिन्तन करते हुए उन्हें शान्ति नहीं मिली ॥ १ ॥

राजर्षीणां च तं श्रुत्वा महिमानं महात्मनाम् ।
यज्वनां कर्मभिः पुण्यैर्लोकप्राप्तिं समीक्ष्य च ॥ २ ॥
हरिश्चन्द्रं च राजर्षिं रोचमानं विशेषतः ।
यज्वानं यज्ञमाहर्तुं राजसूयमिषेष सः ॥ ३ ॥
राजसूययज्ञ करनेवाले महात्मा राजर्षियोंकी वैसी महिमा सुनकर तथा पुण्यकर्मोंद्वारा उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती देखकर एवं यज्ञ करनेवाले राजर्षि हरिश्चन्द्रका महान् तेज (तथा विशेष वैभव एवं आदर-सत्कार) सुनकर उनके मनमें राजसूययज्ञ करनेकी इच्छा हुई ॥ २-३ ॥

युधिष्ठिरस्ततः सर्वानर्चयित्वा सभासदः ।
प्रत्यर्चितश्च तैः सर्वैर्यज्ञायैव मनो दधे ॥ ४ ॥
तदनन्तर युधिष्ठिरने अपने समस्त सभासदोंका सत्कार किया और उन सब सदस्योंने भी उनका बड़ा सम्मान किया। अन्तमें (सबकी सम्मतिसे) उनका मन यज्ञ करनेके ही संकल्पपर दृढ़ हो गया ॥ ४ ॥

स राजसूयं राजेन्द्र कुरूणामृषभस्तदा ।
आहर्तुं प्रवणं चक्रे मनः संचिन्त्य चासकृत् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उस समय बार-बार विचार करके राजसूययज्ञके अनुष्ठानमें ही मन लगाया ॥ ५ ॥

भूयश्चाद्भुतवीर्यौजा धर्ममेवानुचिन्तयन् ।

किं हितं सर्वलोकानां भवेदिति मनो दधे ॥ ६ ॥
अद्भुत बल और पराक्रमवाले धर्मराजने पुनः अपने धर्मका ही चिन्तन किया और सम्पूर्ण लोकोंका हित कैसे हो, इसी ओर वे ध्यान देने लगे ॥ ६ ॥

अनुगृह्णन् प्रजाः सर्वाः सर्वधर्मभृतां वरः ।
अविशेषेण सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे। वे सारी प्रजापर अनुग्रह करके सबका समानरूपसे हितसाधन करने लगे ॥ ७ ॥

सर्वेषां दीयतां देयं मुञ्चन् कोपमदावुभौ ।
साधु धर्मेति धर्मेति नान्यच्छ्रूयेत भाषितम् ॥ ८ ॥
क्रोध और अभिमानसे रहित होकर राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंसे कह दिया कि 'देनेयोग्य वस्तुएँ सबको दी जायँ अथवा सारी जनताका पावना (ऋण) चुका दिया जाय।' उनके राज्यमें 'धर्मराज! आप धन्य हैं। धर्मस्वरूप युधिष्ठिर आपको साधुवाद!' इसके सिवा और कोई बात नहीं सुनी जाती थी ॥ ८ ॥

एवंगते ततस्तस्मिन् पितरीवाश्वसज्जनाः ।
न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता ॥ ९ ॥
उनका ऐसा व्यवहार देख सारी प्रजा उनके ऊपर पिताके समान भरोसा रखने लगी। उनके प्रति द्वेष रखनेवाला कोई नहीं रहा। इसीलिये वे 'अजातशत्रु' नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ९ ॥

परिग्रहान्नरेन्द्रस्य भीमस्य परिपालनात् ।
शत्रूणां क्षपणाच्चैव बीभत्सोः सव्यसाचिनः ॥ १० ॥
धीमतः सहदेवस्य धर्माणामनुशासनात् ।
वैनत्यात् सर्वतश्चैव नकुलस्य स्वभावतः ।
अविग्रहा वीतभयाः स्वधर्मनिरताः सदा ॥ ११ ॥
निकामवर्षाः स्फीताश्च आसञ्जनपदास्तथा ।
महाराज युधिष्ठिर सबको आत्मीयजनोंकी भाँति अपनाते, भीमसेन सबकी रक्षा करते, सव्यसाची अर्जुन शत्रुओंके संहारमें लगे रहते, बुद्धिमान् सहदेव सबको धर्मका उपदेश दिया करते और नकुल स्वभावसे ही सबके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करते थे। इससे उनके राज्यके सभी जनपद कलहशून्य, निर्भय, स्वधर्मपरायण तथा उन्नतिशील थे। वहाँ उनकी इच्छाके अनुसार समयपर वर्षा होती थी ॥ १०-११ ½ ॥

वार्धुषी यज्ञसत्त्वानि गोरक्षं कर्षणं वणिक् ॥ १२ ॥
विशेषात् सर्वमेवैतत् संजज्ञे राजकर्मणा ।
अनुकर्षं च निष्कर्षं व्याधिपावकमूर्च्छनम् ॥ १३ ॥
सर्वमेव न तत्रासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ।

उन दिनों राजाके सुप्रबन्धसे ब्याजकी आजीविका, यज्ञकी सामग्री, गोरक्षा, खेती और व्यापार—इन सबकी विशेष उन्नति होने लगी। निर्धन प्रजाजनोंसे पिछले वर्षका बाकी कर नहीं लिया जाता था तथा चालू वर्षका कर वसूल करनेके लिये किसीको पीड़ा नहीं दी जाती थी। सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले युधिष्ठिरके शासनकालमें रोग तथा अग्निका प्रकोप आदि कोई भी उपद्रव नहीं था ।। १२-१३ ½ ।।

दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यश्च राज्ञः प्रति परस्परम् ।। १४ ।।
राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयत मृषा कृतम् ।

लुटेरोंसे, ठगोंसे, राजासे तथा राजाके प्रिय व्यक्तियोंसे प्रजाके प्रति अत्याचार या मिथ्या व्यवहार कभी नहीं सुना जाता था और आपसमें भी सारी प्रजा एक-दूसरेसे मिथ्या व्यवहार नहीं करती थी ।। १४ ½ ।।

प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वकर्मजम् ।। १५ ।।
अभिहर्तुं नृपाः षट्सु पृथग् जात्यैश्च नैगमैः ।
ववृधे विषयस्तत्र धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ।। १६ ।।
कामतोऽप्युपयुञ्जानै राजसैर्लोभजैर्जनैः ।

दूसरे राजालोग विभिन्न देशके कुलीन वैश्योंके साथ धर्मराज युधिष्ठिरका प्रिय करने, उन्हें कर देने, अपने उपार्जित धन-रत्न आदिकी भेंट देने तथा संधि-विग्रहादि छः कार्योंमें राजाको सहयोग देनेके लिये उनके पास आते थे। सदा धर्ममें ही लगे रहनेवाले राजा युधिष्ठिरके शासनकालमें राजस स्वभाववाले तथा लोभी मनुष्योंद्वारा इच्छानुसार धन आदिका उपभोग किये जानेपर भी उनका देश दिनोदिन उन्नति करने लगा ।। १५-१६ ½ ।।

सर्वव्यापी सर्वगुणी सर्वसाहः स सर्वराट् ।। १७ ।।

राजा युधिष्ठिरकी ख्याति सर्वत्र फैल रही थी। सभी सद्गुण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे शीत एवं उष्ण आदि सभी द्वन्द्वोंको सहनेमें समर्थ तथा अपने राजोचित गुणोंसे सर्वत्र सुशोभित होते थे ।। १७ ।।

यस्मिन्नधिकृतः सम्राड् भ्राजमानो महायशाः ।
यत्र राजन् दश दिशः पितृतो मातृतस्तथा ।
अनुरक्ताः प्रजा आसन्नागोपाला द्विजातयः ।। १८ ।।

राजन्! दसों दिशाओंमें प्रकाशित होनेवाले वे महायशस्वी सम्राट् जिस देशपर अधिकार जमाते, वहाँ ग्वालोंसे लेकर ब्राह्मणोंतक सारी प्रजा उनके प्रति पिता-माताके समान भाव रखकर प्रेम करने लगती थी ।। १८ ।।

वैशम्पायन उवाच

स मन्त्रिणः समानाय्य भ्रातॄंश्च वदतां वरः ।
राजसूयं प्रति तदा पुनः पुनरपृच्छत ।। १९ ।।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उस समय अपने मन्त्रियों और भाइयोंको बुलाकर उनसे बार-बार पूछा—‘राजसूययज्ञके सम्बन्धमें आपलोगोंकी क्या सम्मति है?’॥ १९॥

ते पृच्छमानाः सहिता वचोऽर्थ्यं मन्त्रिणस्तदा।
युधिष्ठिरं महाप्राज्ञं यियक्षुमिदमब्रुवन्॥ २०॥
इस प्रकार पूछे जानेपर उन सब मन्त्रियोंने एक साथ यज्ञकी इच्छावाले परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरसे उस समय यह अर्थयुक्त बात कही—॥ २०॥

येनाभिषिक्तो नृपतिर्वारुणं गुणमृच्छति।
तेन राजापि तं कृत्स्नं सम्राड्गुणमभीप्सति॥ २१॥
‘महाराज! राजसूययज्ञके द्वारा अभिषिक्त होनेपर राजा वरुणके गुणोंको प्राप्त कर लेता है; इसलिये प्रत्येक नरेश उस यज्ञके द्वारा सम्राट्के समस्त गुणोंको पानेकी अभिलाषा रखता है॥ २१॥

तस्य सम्राड्गुणार्हस्य भवतः कुरुनन्दन।
राजसूयस्य समयं मन्यन्ते सुहृदस्तव॥ २२॥
‘कुरुनन्दन! आप तो सम्राट्के गुणोंको पानेके सर्वथा योग्य हैं; अतः आपके हितैषी सुहृद् आपके द्वारा राजसूययज्ञके अनुष्ठानका यह उचित अवसर प्राप्त हुआ मानते हैं॥ २२॥

तस्य यज्ञस्य समयः स्वाधीनः क्षत्रसम्पदा।
साम्ना षडग्नयो यस्मिंछ्रीयन्ते शंसितव्रतैः॥ २३॥
‘उस यज्ञका समय क्षत्रसम्पत्ति यानी सेना आदिके अधीन है। उसमें उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले ब्राह्मण सामवेदके मन्त्रोंद्वारा अग्निकी स्थापनाके लिये छः अग्निवेदियोंका निर्माण करते हैं॥ २३॥

दर्वीहोमानुपादाय सर्वान् यः प्राप्नुते क्रतून्।
अभिषेकं च यस्यान्ते सर्वजित् तेन चोच्यते॥ २४॥
‘जो उस यज्ञका अनुष्ठान करता है, वह ‘दर्वीहोम’ (अग्निहोत्र आदि)-से लेकर समस्त यज्ञोंके फलको प्राप्त कर लेता है एवं यज्ञके अन्तमें जो अभिषेक होता है, उससे वह यज्ञकर्ता नरेश ‘सर्वजित् सम्राट्’ कहलाने लगता है॥ २४॥

समर्थोऽसि महाबाहो सर्वे ते वशगा वयम्।
अचिरात् त्वं महाराज राजसूयमवाप्स्यसि॥ २५॥
‘महाबाहो! आप उस यज्ञके सम्पादनमें समर्थ हैं। हम सब लोग आपकी आज्ञाके अधीन हैं। महाराज! आप शीघ्र ही राजसूययज्ञ पूर्ण कर सकेंगे॥ २५॥

अविचार्य महाराज राजसूये मनः कुरु।
इत्येवं सुहृदः सर्वे पृथक् च सह चाब्रुवन्॥ २६॥

‘अतः किसी प्रकारका सोच-विचार न करके आप राजसूयके अनुष्ठानमें मन लगाइये।’ इस प्रकार उनके सभी सुहृदोंने अलग-अलग और सम्मिलित होकर अपनी यही सम्मति प्रकट की॥ २६॥

स धर्म्यं पाण्डवस्तेषां वचः श्रुत्वा विशाम्पते।
धृष्टमिष्टं वरिष्ठं च जग्राह मनसारिहा॥ २७॥
प्रजानाथ! शत्रुसूदन पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने उनका यह साहसपूर्ण, प्रिय एवं श्रेष्ठ वचन सुनकर उसे मन-ही-मन ग्रहण किया॥ २७॥

श्रुत्वा सुहृद्वचस्तच्च जानंश्चाप्यात्मनः क्षमम्।
पुनः पुनर्मनो दध्रे राजसूयाय भारत॥ २८॥
भारत! उन्होंने सुहृदोंका वह सम्मतिसूचक वचन सुनकर तथा यह भी जानते हुए कि राजसूययज्ञ अपने लिये साध्य है, उसके विषयमें बारम्बार मन-ही-मन विचार किया॥ २८॥

स भ्रातृभिः पुनर्धीमानृत्विग्भिश्च महात्मभिः।
मन्त्रिभिश्चापि सहितो धर्मराजो युधिष्ठिरः।
धौम्यद्वैपायनाद्यैश्च मन्त्रयामास मन्त्रवित्॥ २९॥
फिर मन्त्रणाका महत्त्व जाननेवाले बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों, महात्मा ऋत्विजों, मन्त्रियों तथा धौम्य एवं व्यास आदि महर्षियोंके साथ इस विषयपर पुनः विचार करने लगे॥ २९॥

युधिष्ठिर उवाच

इयं या राजसूयस्य सम्राडर्हस्य सुक्रतोः।
श्रद्दधानस्य वदतः स्पृहा मे सा कथं भवेत्॥ ३०॥
**युधिष्ठिरने कहा—**महात्माओ! राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किसी सम्राट्के ही योग्य है, तो भी मैं उसके प्रति श्रद्धा रखने लगा हूँ; अतः आपलोग बताइये, मेरे मनमें जो यह राजसूययज्ञ करनेकी अभिलाषा हुई है, कैसी है?॥ ३०॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तास्तु ते तेन राज्ञा राजीवलोचन।
इदमूचुर्वचः काले धर्मराजं युधिष्ठिरम्॥ ३१॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कमलनयन जनमेजय! राजाके इस प्रकार पूछनेपर वे सब लोग उस समय धर्मराज युधिष्ठिरसे यों बोले—॥ ३१॥

अर्हस्त्वमसि धर्मज्ञ राजसूयं महाक्रतुम्।
अथैवमुक्ते नृपतावृत्विग्भिर्ऋषिभिस्तथा॥ ३२॥
मन्त्रिणो भ्रातरश्चान्ये तद्वचः प्रत्यपूजयन्।

‘धर्मज्ञ! आप राजसूय महायज्ञ करनेके सर्वथा योग्य हैं।’ ऋत्विजों तथा महर्षियोंने जब राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा, तब उनके मन्त्रियों और भाइयोंने उन महात्माओंके वचनका बड़ा आदर किया ।। ३२१/२ ।।

स तु राजा महाप्राज्ञः पुनरेवात्मनाऽऽत्मवान् ।। ३३ ।।
भूयो विममृशे पार्थो लोकानां हितकाम्यया ।
सामर्थ्ययोगं सम्प्रेक्ष्य देशकालौ व्ययागमौ ।। ३४ ।।
विमृश्य सम्यक् च धिया कुर्वन् प्राज्ञो न सीदति ।
न हि यज्ञसमारम्भः केवल आत्मविनिश्चयात् ।। ३५ ।।
भवतीति समाज्ञाय यत्नतः कार्यमुद्वहन् ।
स निश्चयार्थं कार्यस्य कृष्णमेव जनार्दनम् ।। ३६ ।।
सर्वलोकात् परं मत्वा जगाम मनसा हरिम् ।
अप्रमेयं महाबाहुं कामाज्जातमजं नृषु ।। ३७ ।।

तदनन्तर मनको वशमें रखनेवाले महाबुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे पुनः इस विषयपर मन-ही-मन विचार किया—‘जो बुद्धिमान् अपनी शक्ति और साधनोंको देखकर तथा देश, काल, आय और व्ययको बुद्धिके द्वारा भलीभाँति समझ करके कार्य आरम्भ करता है, वह कष्टमें नहीं पड़ता। केवल अपने ही निश्चयसे यज्ञका आरम्भ नहीं किया जाता।’ ऐसा समझकर यत्नपूर्वक कार्यभार वहन करनेवाले युधिष्ठिरने उस कार्यके विषयमें पूर्ण निश्चय करनेके लिये जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णको ही सब लोगोंसे उत्तम माना और वे मन-ही-मन उन अप्रमेय महाबाहु श्रीहरिकी शरणमें गये, जो अजन्मा होते हुए भी धर्म एवं साधु पुरुषोंकी रक्षा आदिकी इच्छासे मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे ।। ३३-३७ ।।

पाण्डवस्तर्कयामास कर्मभिर्देवसम्मतैः ।
नास्य किंचिदविज्ञातं नास्य किंचिदकर्मजम् ।। ३८ ।।

पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने श्रीकृष्णके देवपूजित अलौकिक कर्मोंद्वारा यह अनुमान किया कि श्रीकृष्णके लिये कुछ भी अज्ञात नहीं है तथा कोई भी ऐसा कार्य नहीं है, जिसे वे कर न सकें ।। ३८ ।।

न स किंचिन्न विषहेदिति कृष्णममन्यत ।
स तु तां नैष्ठिकीं बुद्धिं कृत्वा पार्थो युधिष्ठिरः ।। ३९ ।।
गुरुवद् भूतगुरवे प्राहिणोद् दूतमञ्जसा ।
शीघ्रगेन रथेनाशु स दूतः प्राप्य यादवान् ।। ४० ।।
द्वारकावासिनं कृष्णं द्वारवत्यां समासदत् ।

उनके लिये कुछ भी असह्य नहीं है। इस तरह उन्होंने उन्हें सर्वशक्तिमान् एवं सर्वज्ञ माना। ऐसी निश्चयात्मक बुद्धि करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने गुरुजनोंके प्रति निवेदन करनेकी भाँति समस्त प्राणियोंके गुरु श्रीकृष्णके पास शीघ्र ही एक दूत भेजा। वह दूत शीघ्रगामी रथके द्वारा तुरंत यादवोंके यहाँ पहुँचकर द्वारकावासी श्रीकृष्णसे द्वारकामें ही मिला ।। ३९-४० १/३ ।।

(स प्रह्वः प्राञ्जलिर्भूत्वा व्यज्ञापयत माधवम् ।।
उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़ भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार निवेदन किया।

दूत उवाच

धर्मराजो हृषीकेश धौम्यव्यासादिभिः सह ।
पाञ्चालमात्स्यसहितैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वशः ।।
त्वद्दर्शनं महाबाहो काङ्क्षते स युधिष्ठिरः ।
दूतने कहा—महाबाहु हृषीकेश! धर्मराज युधिष्ठिर धौम्य एवं व्यास आदि महर्षियों, द्रुपद और विराट आदि नरेशों तथा अपने समस्त भाइयोंके साथ आपका दर्शन करना चाहते हैं।

वैशम्पायन उवाच

इन्द्रसेनवचः श्रुत्वा यादवप्रवरो बली ।)
दर्शनाकाङ्क्षिणं पार्थं दर्शनाकाङ्क्षयाच्युतः ।। ४१ ।।
इन्द्रसेनेन सहित इन्द्रप्रस्थमगात् तदा ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—दूत इन्द्रसेनकी यह बात सुनकर यदुवंशशिरोमणि महाबली भगवान् श्रीकृष्ण दर्शनाभिलाषी युधिष्ठिरके पास स्वयं भी उनके दर्शनकी अभिलाषासे दूत इन्द्रसेनके साथ इन्द्रप्रस्थ नगरमें आये ।। ४१ १/३ ।।

व्यतीत्य विविधान् देशांस्त्वरावान् क्षिप्रवाहनः ।। ४२ ।।
मार्गमें अनेक देशोंको लाँघते हुए वे बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ रहे थे। उनके रथके घोड़े बहुत तेज चलनेवाले थे ।। ४२ ।।

इन्द्रप्रस्थगतं पार्थमभ्यगच्छज्जनार्दनः ।
स गृहे पितृवद् भ्रात्रा धर्मराजेन पूजितः ।
भीमेन च ततोऽपश्यत् स्वसारं प्रीतिमान् पितुः ।। ४३ ।।
भगवान् जनार्दन इन्द्रप्रस्थमें आकर राजा युधिष्ठिरसे मिले। फुफेरे भाई धर्मराज युधिष्ठिर तथा भीमसेनने अपने घरमें श्रीकृष्णका पिताकी भाँति पूजन किया। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण अपनी बुआ कुन्तीसे प्रसन्नतापूर्वक मिले ।। ४३ ।।

प्रीत: प्रीतेन सुहृदा रेमे स सहितस्तदा ।
अर्जुनेन यमाभ्यां च गुरुवत् पर्युपासितः ।। ४४ ।।

तदनन्तर प्रेमी सुहृद् अर्जुनसे मिलकर वे बहुत प्रसन्न हुए। फिर नकुल-सहदेवने गुरुकी भाँति उनकी सेवा-पूजा की॥ ४४॥
तं विश्रान्तं शुभे देशे क्षणिनं कल्पमच्युतम् ।
धर्मराजः समागम्याज्ञापयत् स्वप्रयोजनम् ॥ ४५ ॥
इसके बाद उन्होंने एक उत्तम भवनमें विश्राम किया। थोड़ी देर बाद जब वे मिलनेके योग्य हुए और इसके लिये उन्होंने अवसर निकाल लिया, तब धर्मराज युधिष्ठिरने आकर उनसे अपना सारा प्रयोजन बतलाया ॥ ४५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

प्रार्थितो राजसूयो मे न चासौ केवलिप्सया ।
प्राप्यते येन तत् ते हि विदितं कृष्ण सर्वशः ॥ ४६ ॥
युधिष्ठिर बोले—श्रीकृष्ण! मैं राजसूययज्ञ करना चाहता हूँ; परंतु वह केवल चाहनेभरसे ही पूरा नहीं हो सकता। जिस उपायसे उस यज्ञकी पूर्ति हो सकती है, वह सब आपको ही ज्ञात है॥ ४६॥
यस्मिन् सर्वं सम्भवति यश्च सर्वत्र पूज्यते ।
यश्च सर्वेश्वरो राजा राजसूयं स विन्दति ॥ ४७ ॥
जिसमें सब कुछ सम्भव है अर्थात् जो सब कुछ कर सकता है, जिसकी सर्वत्र पूजा होती है तथा जो सर्वेश्वर होता है, वही राजा राजसूययज्ञ सम्पन्न कर सकता है॥ ४७॥
तं राजसूयं सुहृदः कार्यमाहुः समेत्य मे ।
तत्र मे निश्चिततमं तव कृष्ण गिरा भवेत् ॥ ४८ ॥
मेरे सब सुहृद् एकत्र होकर मुझसे वही राजसूययज्ञ करनेके लिये कहते हैं; परंतु इसके विषयमें अन्तिम निश्चय तो आपके कहनेसे ही होगा ॥ ४८ ॥
केचिद्धि सौहृदादेव न दोषं परिचक्षते ।
स्वार्थहेतोस्तथैवान्ये प्रियमैव वदन्त्युत ॥ ४९ ॥
कुछ लोग प्रेम-सम्बन्धके नाते ही मेरे दोषों या त्रुटियोंको नहीं बताते हैं। दूसरे लोग स्वार्थवश वही बात कहते हैं, जो मुझे प्रिय लगे ॥ ४९ ॥
प्रियमेव परीप्सन्ते केचिदात्मनि यद्धितम् ।
एवंप्रायाश्च दृश्यन्ते जनवादाः प्रयोजने ॥ ५० ॥
कुछ लोग जो अपने लिये हितकर है, उसीको मेरे लिये भी प्रिय एवं हितकर समझ बैठते हैं। इस प्रकार अपने-अपने प्रयोजनको लेकर प्रायः लोगोंकी भिन्न-भिन्न बातें देखी जाती हैं॥ ५० ॥
त्वं तु हेतूनतीत्यैतान् कामक्रोधौ व्युदस्य च ।
परमं यत् क्षमं लोके यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ५१ ॥

परंतु आप उपर्युक्त सभी हेतुओंसे एवं काम-क्रोधसे रहित होकर (अपने स्वरूपमें स्थित हैं। अतः) इस लोकमें मेरे लिये जो उत्तम एवं करनेयोग्य हो, उसको ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें।। ५१ ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि वासुदेवागमने त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें वासुदेवागमनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५३ १/३ श्लोक हैं)