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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

वरुणकी सभाका वर्णन

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नवमोऽध्यायः

वरुणकी सभाका वर्णन

नारद उवाच

युधिष्ठिर सभा दिव्या वरुणस्यामितप्रभा ।
प्रमाणेन यथा याम्या शुभप्राकारतोरणा ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! वरुणदेवकी दिव्य सभा अपनी अनन्त कान्तिसे प्रकाशित होती रहती है। उसकी भी लंबाई-चौड़ाईका मान वही है, जो यम-राजकी सभाका है। उसके परकोटे और फाटक बड़े सुन्दर हैं ॥ १ ॥

अन्तःसलिलमास्थाय विहिता विश्वकर्मणा ।
दिव्यै रत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युता ॥ २ ॥
विश्वकर्माने उस सभाको जलके भीतर रहकर बनाया है। वह फल-फूल देनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे सुशोभित होती है ॥ २ ॥

नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैरपि ।
अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीजालधारिभिः ॥ ३ ॥
उस सभाके भिन्न-भिन्न प्रदेश नीले-पीले, काले, सफेद और लाल रंगके लतागुल्मोंसे आच्छादित हैं। उन लताओंने मनोहर मंजरीपुंज धारण कर रखे हैं ॥ ३ ॥

तथा शकुनयस्तस्यां विचित्रा मधुरस्वराः ।
अनिर्देश्या वपुष्मन्तः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४ ॥
सभाभवनके भीतर विचित्र और मधुर स्वरसे बोलनेवाले सैकड़ों-हजारों पक्षी चहकते रहते हैं। उनके विलक्षण रूप-सौन्दर्यका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी आकृति बड़ी सुन्दर है ॥ ४ ॥

सा सभा सुखसंस्पर्शा न शीता न च घर्मदा ।
वेश्मासनवती रम्या सिता वरुणपालिता ॥ ५ ॥
वरुणकी सभाका स्पर्श बड़ा ही सुखद है, वहाँ न सर्दी है, न गर्मी। उसका रंग श्वेत है, उसमें कितने ही कमरे और आसन (दिव्य मंच आदि) सजाये गये हैं। वरुणजीके द्वारा सुरक्षित वह सभा बड़ी रमणीय जान पड़ती है ॥ ५ ॥

यस्यामास्ते स वरुणो वारुण्या च समन्वितः ।
दिव्यरत्नाम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः ॥ ६ ॥
उसमें दिव्य रत्नों और वस्त्रोंको धारण करनेवाले तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत वरुणदेव वारुणी देवीके साथ विराजमान होते हैं ॥ ६ ॥

स्रग्विणो दिव्यगन्धाश्च दिव्यगन्धानुलेपनाः ।

आदित्यास्तत्र वरुणं जलेश्वरमुपासते ।। ७ ।।
उस सभामें दिव्य हार, दिव्य सुगन्ध तथा दिव्य चन्दनका अंगराग धारण करनेवाले आदित्यगण जलके स्वामी वरुणकी उपासना करते हैं ।। ७ ।।
वासुकिस्तक्षकश्चैव नागश्चैरावतस्तथा ।
कृष्णश्च लोहितश्चैव पद्मश्चित्रश्च वीर्यवान् ।। ८ ।।
वासुकि नाग, तक्षक, ऐरावतनाग, कृष्ण, लोहित, पद्म और पराक्रमी चित्र, ।। ८ ।।
कम्बलाश्वतरौ नागौ धृतराष्ट्रबलाहकौ ।
(मणिनागश्च नागश्च मणिः शङ्खनखस्तथा ।
कौरव्यः स्वस्तिकश्चैव एलापत्रश्च वामनः ।।
अपराजितश्च दोषश्च नन्दकः पूरणस्तथा ।
अभीकः शिभिकः श्वेतो भद्रो भद्रेश्वरस्तथा ।।)
मणिमान् कुण्डधारश्च कर्कोटकधनंजयौ ।। ९ ।।
कम्बल, अश्वतर, धृतराष्ट्र, बलाहक, मणिनाग, नाग, मणि, शंखनख, कौरव्य, स्वस्तिक, एलापत्र, वामन, अपराजित, दोष, नन्दक, पूरण, अभीक, शिभिक, श्वेत, भद्र, भद्रेश्वर, मणिमान्, कुण्डधार, कर्कोटक, धनंजय, ।। ९ ।।
पाणिमान् कुण्डधारश्च बलवान् पृथिवीपते ।
प्रह्लादो मूषिकादश्च तथैव जनमेजयः ।। १० ।।
पताकिनो मण्डलिनः फणावन्तश्च सर्वशः ।
(अनन्तश्च महानागो यं स दृष्ट्वा जलेश्वरः ।
अभ्यर्चयति सत्कारैरासनेन च तं विभुम् ।।
वासुकिप्रमुखाश्चैव सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ।
अनुज्ञाताश्च शेषेण यथार्हमुपविश्य च ।।)
एते चान्ये च बहवः सर्पास्तस्यां युधिष्ठिर ।
उपासते महात्मानं वरुणं विगतक्लमाः ।। ११ ।।
पाणिमान्, बलवान् कुण्डधार, प्रह्लाद, मूषिकाद, जनमेजय आदि नाग जो पताका, मण्डल और फणोंसे सुशोभित वहाँ उपस्थित होते हैं, महानाग भगवान् अनन्त भी वहाँ स्थित होते हैं, जिन्हें देखते ही जलके स्वामी वरुण आसन आदि देते और सत्कारपूर्वक उनका पूजन करते हैं। वासुकि आदि सभी नाग हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े होते और भगवान् शेषकी आज्ञा पाकर यथायोग्य आसनोंपर बैठकर वहाँकी शोभा बढ़ाते हैं। युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुतसे नाग उस सभामें क्लेशरहित हो महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं ।। १०-११ ।।
बलिवैरोचनो राजा नरकः पृथिवींजयः ।
प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च कालखञ्जाश्च दानवाः ।। १२ ।।

सुहनुर्दुर्मुखः शङ्खः सुमनाः सुमतिस्ततः ।
घटोदरो महापार्श्वः क्रथनः पिठरस्तथा ॥ १३ ॥
विश्वरूपः स्वरूपश्च विरूपोऽथ महाशिराः ।
दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा दशावरः ॥ १४ ॥
टिट्टिभो विटभूतश्च संह्लादश्चेन्द्रतापनः ।
दैत्यदानवसङ्घाश्च सर्वे रुचिरकुण्डलाः ॥ १५ ॥
स्रग्विणो मौलिनश्चैव तथा दिव्यपरिच्छदाः ।
सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्यवः ॥ १६ ॥
ते तस्यां वरुणं देवं धर्मपाशधरं सदा ।
उपासते महात्मानं सर्वे सुचरितव्रताः ॥ १७ ॥
विरोचनपुत्र राजा बलि, पृथ्विविजयी नरकासुर, प्रह्लाद, विप्रचित्ति, कालखंज दानव, सुहनु, दुर्मुख, शंख, सुमना, सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूप, विरूप, महाशिरा, दशमुख रावण, वाली, मेघवासा, दशावर, टिट्टिभ, विटभूत, संह्लाद तथा इन्द्रतापन आदि सभी दैत्यों और दानवोंके समुदाय मनोहर कुण्डल, सुन्दर हार, किरीट तथा दिव्य वस्त्राभूषण धारण किये उस सभामें धर्मपाशधारी महात्मा वरुणदेवकी सदा उपासना करते हैं। वे सभी दैत्य वरदान पाकर शौर्यसम्पन्न हो मृत्युरहित हो गये हैं। उनका चरित्र एवं व्रत बहुत उत्तम है ॥ १२—१७ ॥
तथा समुद्राश्चत्वारो नदी भागीरथी च सा ।
कालिन्दी विदिशा वेणा नर्मदा वेगवाहिनी ॥ १८ ॥
चारों समुद्र, भागीरथी नदी, कालिन्दी, विदिशा, वेणा, नर्मदा, वेगवाहिनी, ॥ १८ ॥
विपाशा च शतद्रुश्च चन्द्रभागा सरस्वती ।
इरावती वितस्ता च सिन्धुर्देवनदी तथा ॥ १९ ॥
विपाशा, शतद्रु, चन्द्रभागा, सरस्वती, इरावती, वितस्ता, सिन्धु, देवनदी, ॥ १९ ॥
गोदावरी कृष्णवेणा कावेरी च सरिद्वरा ।
किम्पुना च विशल्या च तथा वैतरणी नदी ॥ २० ॥
गोदावरी, कृष्णवेणा, सरिताओंमें श्रेष्ठ कावेरी, किम्पुना, विशल्या, वैतरणी नदी, ॥ २० ॥
तृतीया ज्येष्ठीला चैव शोणश्चापि महानदः ।
चर्मण्वती तथा चैव पर्णाशा च महानदी ॥ २१ ॥
तृतीया, ज्येष्ठीला, महानद शोण, चर्मण्वती, पर्णाशा, महानदी, ॥ २१ ॥
सरयूर्वारवत्याथ लाङ्गली च सरिद्वरा ।
करतोया तथात्रेयी लौहित्यश्च महानदः ॥ २२ ॥

सरयू, वारवत्या, सरिताओंमें श्रेष्ठ लांगली, करतोया, आत्रेयी, महानद लौहित्य, ।। २२ ।।

लङ्घती गोमती चैव संध्या त्रिःस्रोतसी तथा ।
एताश्चान्याश्च राजेन्द्र सुतीर्था लोकविश्रुताः ।। २३ ।।
भरतवंशी राजेन्द्र युधिष्ठिर! लंघती, गोमती, संध्या और त्रिस्रोतसी, ये तथा दूसरे लोकविख्यात उत्तम तीर्थ (वहाँ वरुणकी उपासना करते हैं), ।। २३ ।।

सरितः सर्वतश्चान्यास्तीर्थानि च सरांसि च ।
कूपाश्च सप्रस्रवणा देहवन्तो युधिष्ठिर ।। २४ ।।
पल्वलानि तडागानि देहवन्त्यथ भारत ।
दिशस्तथा मही चैव तथा सर्वे महीधराः ।। २५ ।।
उपासते महात्मानं सर्वे जलचरास्तथा ।
समस्त सरिताएँ, जलाशय, सरोवर, कूप, झरने, पोखरे और तालाब, सम्पूर्ण दिशाएँ, पृथ्वी, पर्वत तथा सम्पूर्ण जलचर जीव अपने-अपने स्वरूप धारण करके महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं ।। २४-२५ १/२ ।।

गीतवादित्रवन्तश्च गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। २६ ।।
स्तुवन्तो वरुणं तस्यां सर्व एव समासते ।
सभी गन्धर्व और अप्सराओंके समुदाय भी गीत गाते और बाजे बजाते हुए उस सभामें वरुणदेवताकी स्तुति एवं उपासना करते हैं ।। २६ १/२ ।।

महीधरा रत्नवन्तो रसा ये च प्रतिष्ठिताः ।। २७ ।।
कथयन्तः सुमधुराः कथास्तत्र समासते ।
रत्नयुक्त पर्वत और प्रतिष्ठित रस (मूर्तिमान् होकर) अत्यन्त मधुर कथाएँ कहते हुए वहाँ निवास करते हैं ।। २७ १/२ ।।

वारुणश्च तथा मन्त्री सुनाभः पर्युपासते ।। २८ ।।
पुत्रपौत्रैः परिवृतो गोनाम्ना पुष्करेण च ।
वरुणका मन्त्री सुनाभ अपने पुत्र-पौत्रोंसे घिरा हुआ गौ तथा पुष्कर नामवाले तीर्थके साथ वरुणदेवकी उपासना करता है ।। २८ १/२ ।।

सर्वे विग्रहवन्तस्ते तमीश्वरमुपासते ।। २९ ।।
ये सभी शरीर धारण करके लोकेश्वर वरुणकी उपासना करते रहते हैं ।। २९ ।।

एषा मया सम्पत्तता वारुणी भरतर्षभ ।
दृष्टपूर्वा सभा रम्या कुबेरस्य सभां शृणु ।। ३० ।।
भरतश्रेष्ठ! पहले सब ओर घूमते हुए मैंने वरुणजीकी इस रमणीय सभाका भी दर्शन किया है। अब तुम कुबेरकी सभाका वर्णन सुनो ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि वरुणसभावर्णने
नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें वरुणसभा-
वर्णनविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं)