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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना

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त्र्यशीतितमोऽध्यायः

देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठकर पिताके पास जाना, शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा कुमारं जातं तु देवयानी शुचिस्मिता ।
चिन्तयामास दुःखार्ता शर्मिष्ठां प्रति भारत ॥ १ ॥
अभिगम्य च शर्मिष्ठां देवयान्यब्रवीदिदम् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पवित्र मुसकानवाली देवयानीने जब सुना कि शर्मिष्ठाके पुत्र हुआ है, तब वह दुःखसे पीड़ित हो शर्मिष्ठाके व्यवहारको लेकर बड़ी चिन्ता करने लगी। वह शर्मिष्ठाके पास गयी और इस प्रकार बोली ॥ १ १/२ ॥

देवयान्युवाच

किमिदं वृजिनं सुभ्रु कृतं वै कामलुब्धया ॥ २ ॥
**देवयानीने कहा—**सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठे! तुमने कामलोलुप होकर यह कैसा पाप कर डाला? ॥ २ ॥

शर्मिष्ठोवाच

ऋषिरभ्यागतः कश्चिद् धर्मात्मा वेदपारगः ।
स मया वरदः कामं याचितो धर्मसंहितम् ॥ ३ ॥
**शर्मिष्ठा बोली—**सखी! कोई धर्मात्मा ऋषि आये थे, जो वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। मैंने उन वरदायक ऋषिसे धर्मानुसार कामकी याचना की ॥ ३ ॥
नाहमन्यायत: काममाचरामि शुचिस्मिते ।
तस्मादृषेर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४ ॥
शुचिस्मिते! मैं न्यायविरुद्ध कामका आचरण नहीं करती। उन ऋषिसे ही मुझे संतान पैदा हुई है, यह तुमसे सत्य कहती हूँ ॥ ४ ॥

देवयान्युवाच

शोभनं भीरु यद्येवमथ स ज्ञायते द्विजः ।
गोत्रनामाभिजनतो वेत्तुमिच्छामि तं द्विजम् ॥ ५ ॥
**देवयानीने कहा—**भीरु! यदि ऐसी बात है तो बहुत अच्छा हुआ। क्या उन द्विजके गोत्र, नाम और कुलका कुछ परिचय मिला है? मैं उनको जानना चाहती हूँ ॥ ५ ॥

शर्मिष्ठोवाच

तपसा तेजसा चैव दीप्यमानं यथा रविम् ।
तं दृष्ट्वा मम सम्प्रष्टुं शक्तिर्नासीच्छुचिस्मिते ॥ ६ ॥
**शर्मिष्ठा बोली—**शुचिस्मिते! वे अपने तप और तेजसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें देखकर मुझे कुछ पूछनेका साहस ही नहीं हुआ ॥ ६ ॥

देवयान्युवाच

यद्येतदेवं शर्मिष्ठे न मन्युर्विद्यते मम ।
अपत्यं यदि ते लब्धं ज्येष्ठाच्छ्रेष्ठाच्च वै द्विजात् ॥ ७ ॥
**देवयानीने कहा—**शर्मिष्ठे! यदि ऐसी बात है; यदि तुमने ज्येष्ठ और श्रेष्ठ द्विजसे संतान प्राप्त की है तो तुम्हारे ऊपर मेरा क्रोध नहीं रहा ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच

अन्योन्यमेवमुक्त्वा तु सम्प्रहस्य च ते मिथः ।
जगाम भार्गवी वेश्म तथ्यमित्यवजग्मुषी ॥ ८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वे दोनों आपसमें इस प्रकार बातें करके हँस पड़ीं। देवयानीको प्रतीत हुआ कि शर्मिष्ठा ठीक कहती है; अतः वह चुपचाप महलमें चली गयी ॥ ८ ॥

ययातिर्देवयान्यां तु पुत्रावजनयन्नृपः ।
यदुं च तुर्वसुं चैव शक्रविष्णू इवापरौ ॥ ९ ॥
राजा ययातिने देवयानीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम थे यदु और तुर्वसु। वे दोनों दूसरे इन्द्र और विष्णुकी भाँति प्रतीत होते थे ॥ ९ ॥

तस्मादेव तु राजर्षेः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।
द्रुह्युं चानुं च पूरुं च त्रीन् कुमारानजीजनत् ॥ १० ॥
उन्हीं राजर्षिसे वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने तीन पुत्रोंको जन्म दिया, जिनके नाम थे द्रुह्यु, अनु और पूरु ॥ १० ॥

ततः काले तु कस्मिंश्चिद् देवयानी शुचिस्मिता ।
ययातिसहिता राजञ्जगाम रहितं वनम् ॥ ११ ॥
राजन्! तदनन्तर किसी समय पवित्र मुसकानवाली देवयानी ययातिके साथ एकान्त वनमें गयी ॥ ११ ॥

ददर्श च तदा तत्र कुमारान् देवरूपिणः ।
क्रीडमानान् सुविश्रब्धान् विस्मिता चेदमब्रवीत् ॥ १२ ॥
वहाँ उसने देवताओंके समान सुन्दर रूपवाले कुछ बालकोंको निर्भय होकर क्रीड़ा करते देखा। उन्हें देखकर आश्चर्यचकित हो वह इस प्रकार बोली ॥ १२ ॥

देवयान्युवाच

कस्यैते दारका राजन् देवपुत्रोपमाः शुभाः ।
वर्चसा रूपतश्चैव सदृशा मे मतास्तव ।। १३ ।।
देवयानीने पूछा—राजन्! ये देवबालकोंके तुल्य शुभ लक्षणसम्पन्न कुमार किसके हैं? तेज और रूपमें तो ये मुझे आपहीके समान जान पड़ते हैं ।। १३ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवं पृष्ट्वा तु राजानं कुमारान् पर्यपृच्छत ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजासे इस प्रकार पूछकर उसने उन कुमारोंसे प्रश्न किया ।। १३ १/२ ।।

देवयान्युवाच

किं नामधेयं वंशो वः पुत्रकाः कश्च वः पिता ।
प्रब्रूत मे यथातथ्यं श्रोतुमिच्छामि तं ह्यहम् ।। १४ ।।
देवयानीने पूछा—बच्चो! तुम्हारे कुलका क्या नाम है? तुम्हारे पिता कौन हैं? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ। मैं तुम्हारे पिताका नाम सुनना चाहती हूँ ।। १४ ।।
(एवमुक्ताः कुमारास्ते देवयान्या सुमध्यमा ।)
तेऽदर्शयन् प्रदेशिन्या तमेव नृपसत्तमम् ।
शर्मिष्ठां मातरं चैव तथाऽऽचचक्षुश्च दारकाः ।। १५ ।।
सुन्दरी देवयानीके इस प्रकार पूछनेपर उन बालकोंने पिताका परिचय देते हुए तर्जनी अँगुलीसे उन्हीं नृपश्रेष्ठ ययातिको दिखा दिया और शर्मिष्ठाको अपनी माता बताया ।। १५ ।।

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा सहितास्ते तु राजानमुपचक्रमुः ।
नाभ्यनन्दत तान् राजा देवयान्यास्तदान्तिके ।। १६ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—ऐसा कहकर वे सब बालक एक साथ राजाके समीप आ गये; परंतु उस समय देवयानीके निकट राजाने उनका अभिनन्दन नहीं किया—उन्हें गोदमें नहीं उठाया ।। १६ ।।

रुदन्तस्तेऽथ शर्मिष्ठामभ्ययुर्बालकास्ततः ।
श्रुत्वा तु तेषां बालानां सव्रीड इव पार्थिवः ॥ १७ ॥
तब वे बालक रोते हुए शर्मिष्ठाके पास चले गये। उनकी बातें सुनकर राजा ययाति लज्जित-से हो गये ॥ १७ ॥

दृष्ट्वा तु तेषां बालानां प्रणयं पार्थिवं प्रति ।
बुद्ध्वा च तत्त्वं सा देवी शर्मिष्ठामिदमब्रवीत् ॥ १८ ॥
उन बालकोंका राजाके प्रति विशेष प्रेम देखकर देवयानी सारा रहस्य समझ गयी और शर्मिष्ठासे इस प्रकार बोली ॥ १८ ॥

देवयान्युवाच

(अभ्यागच्छति मां कश्चिदृषिरित्येवमब्रवीः ।
ययातिमेव नूनं त्वं प्रोत्साहयसि भामिनि ॥
पूर्वमेव मया प्रोक्तं त्वया तु वृजिनं कृतम् ।)
मदधीना सती कस्मादकार्षीर्विप्रियं मम ।
तमेवासुरधर्मं त्वमास्थिता न बिभेषि मे ॥ १९ ॥
**देवयानी बोली—**भामिनि! तुम तो कहती थीं कि मेरे पास कोई ऋषि आया करते हैं। यह बहाना लेकर तुम राजा ययातिको ही अपने पास आनेके लिये प्रोत्साहन देती रहीं। मैंने

पहले ही कह दिया था कि तुमने कोई पाप किया है। शर्मिष्ठे! तुमने मेरे अधीन होकर भी मुझे अप्रिय लगनेवाला बर्ताव क्यों किया? तुम फिर उसी असुर-धर्मपर उतर आयीं। मुझसे डरती भी नहीं हो? ॥ १९ ॥

शर्मिष्ठोवाच

यदुक्तमृषिरित्येव तत् सत्यं चारुहासिनि ।
न्यायतो धर्मतश्चैव चरन्ती न बिभेमि ते ॥ २० ॥
**शर्मिष्ठा बोली—**मनोहर मुसकानवाली सखी! मैंने जो ऋषि कहकर अपने स्वामीका परिचय दिया था, सो सत्य ही है। मैं न्याय और धर्मके अनुकूल आचरण करती हूँ, अतः तुमसे नहीं डरती ॥ २० ॥
यदा त्वया वृतो भर्ता वृत एव तदा मया ।
सखीभर्ता हि धर्मेण भर्ता भवति शोभने ॥ २१ ॥
पूज्यासि मम मान्या च ज्येष्ठा च ब्राह्मणी ह्यसि ।
त्वत्तोऽपि मे पूज्यतमो राजर्षिः किं न वेत्थ तत् ॥ २२ ॥
(त्वत्पित्रा गुरुणा मे च सह दत्ते उभे शुभे ।
तव भर्ता च पूज्यश्च पोष्यां पोषयतीह माम् ॥)
जब तुमने पतिका वरण किया था, उसी समय मैंने भी कर लिया। शोभने! जो सखीका स्वामी होता है, वही उसके अधीन रहनेवाली अन्य अविवाहिता सखियोंका भी धर्मतः पति होता है। तुम ज्येष्ठ हो, ब्राह्मणकी पुत्री हो, अतः मेरे लिये माननीय एवं पूजनीय हो; परंतु ये राजर्षि मेरे लिये तुमसे भी अधिक पूजनीय हैं। क्या यह बात तुम नहीं जानतीं? ॥ २१-२२ ॥
शुभे! तुम्हारे पिता और मेरे गुरु (शुक्राचार्यजी)-ने हम दोनोंको एक ही साथ महाराजकी सेवामें समर्पित किया है। तुम्हारे पति और पूजनीय महाराज ययाति भी मुझे पालन करनेयोग्य मानकर मेरा पोषण करते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवयान्यब्रवीदिदम् ।
राजन् नाद्येह वत्स्यामि विप्रियं मे कृतं त्वया ॥ २३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**शर्मिष्ठाका यह वचन सुनकर देवयानीने कहा—'राजन्! अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी। आपने मेरा अत्यन्त अप्रिय किया है' ॥ २३ ॥
सहसोत्पतितां श्यामां दृष्ट्वा तां साश्रुलोचनाम् ।
तूर्णं सकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा ॥ २४ ॥
ऐसा कहकर तरुणी देवयानी आँखोंमें आँसू भरकर सहसा उठी और तुरंत ही शुक्राचार्यजीके पास जानेके लिये वहाँसे चल दी। यह देख उस समय राजा ययाति व्यथित

हो गये ॥ २४ ॥
अनुवव्राज सम्भ्रान्तः पृष्ठतः सान्त्वयन् नृपः ।
न्यवर्तत न चैव स्म क्रोधसंरक्तलोचना ॥ २५ ॥
वे व्याकुल हो देवयानीको समझाते हुए उसके पीछे-पीछे गये, किंतु वह नहीं लौटी। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं ॥ २५ ॥
अविब्रुवन्ती किंचित् सा राजानं साश्रुलोचना ।
अचिरादेव सम्प्राप्ता काव्यस्योशनसोऽन्तिकम् ॥ २६ ॥
वह राजासे कुछ न बोलकर केवल नेत्रोंसे आँसू बहाये जाती थी। कुछ ही देरमें वह कविपुत्र शुक्राचार्यके पास जा पहुँची ॥ २६ ॥
सा तु दृष्ट्वैव पितरमभिवाद्याग्रतः स्थिता ।
अनन्तरं ययातिस्तु पूजयामास भार्गवम् ॥ २७ ॥
पिताको देखते ही वह प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हो गयी। तदनन्तर राजा ययातिने भी शुक्राचार्यकी वन्दना की ॥ २७ ॥

देवयान्युवाच

अधर्मेण जितो धर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम् ।
शर्मिष्ठयातिवृत्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः ॥ २८ ॥
देवयानीने कहा— पिताजी! अधर्मने धर्मको जीत लिया। नीचकी उन्नति हुई और उच्चकी अवनति। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मुझे लाँघकर आगे बढ़ गयी ॥ २८ ॥
त्रयोऽस्यां जनिताः पुत्रा राज्ञानेन ययातिना ।
दुर्भागाया मम द्वौ तु पुत्रौ तात ब्रवीमि ते ॥ २९ ॥
इन महाराज ययातिसे ही उसके तीन पुत्र हुए हैं, किंतु तात! मुझ भाग्यहीनाके दो ही पुत्र हुए हैं। यह मैं आपसे ठीक बता रही हूँ ॥ २९ ॥
धर्मज्ञ इति विख्यात एष राजा भृगूद्वह ।
अतिक्रान्तश्च मर्यादां काव्यैतत् कथयामि ते ॥ ३० ॥
भृगुश्रेष्ठ! ये महाराज धर्मज्ञके रूपमें प्रसिद्ध हैं; किंतु इन्होंने ही मर्यादाका उल्लंघन किया है। कविनन्दन! यह आपसे यथार्थ कह रही हूँ ॥ ३० ॥

शुक्र उवाच

धर्मज्ञः सन् महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम् ।
तस्माज्जरा त्वामचिराद् धर्षयिष्यति दुर्जया ॥ ३१ ॥
शुक्राचार्यने कहा— महाराज! तुमने धर्मज्ञ होकर भी अधर्मको प्रिय मानकर उसका आचरण किया है। इसलिये जिसको जीतना कठिन है, वह वृद्धावस्था तुम्हें शीघ्र ही धर दबायेगी ॥ ३१ ॥

ययातिरुवाच

ऋतुं वै याचमानाया भगवन् नान्यचेतसा ।
दुहितुर्दानवेन्द्रस्य धर्म्यमेतत् कृतं मया ॥ ३२ ॥
ऋतुं वै याचमानाया न ददाति पुमानृतुम् ।
भ्रूणहेत्युच्यते ब्रह्मन् स इह ब्रह्मवादिभिः ॥ ३३ ॥
अभिकामां स्त्रियं यश्च गम्यां रहसि याचितः ।
नोपैति स च धर्मेषु भ्रूणहेत्युच्यते बुधैः ॥ ३४ ॥

ययाति बोले— भगवन्! दानवराजकी पुत्री मुझसे ऋतुदान माँग रही थी; अतः मैंने धर्म-सम्मत मानकर यह कार्य किया, किसी दूसरे विचारसे नहीं। ब्रह्मन्! जो पुरुष न्याययुक्त ऋतुकी याचना करनेवाली स्त्रीको ऋतुदान नहीं देता, वह ब्रह्मवादी विद्वानोंद्वारा भ्रूणहत्या करनेवाला कहा जाता है। जो न्यायसम्मत कामनासे युक्त गम्या स्त्रीके द्वारा एकान्तमें प्रार्थना करनेपर उसके साथ समागम नहीं करता, वह धर्म-शास्त्रमें विद्वानोंद्वारा गर्भकी हत्या करनेवाला बताया जाता है ॥ ३२—३४ ॥

(यद् यद् याचति मां कश्चित् तत् तद् देयमिति व्रतम् ।
त्वया च सापि दत्ता मे नान्यं नाथमिहेच्छति ॥
मत्वैतन्मे धर्म इति कृतं ब्रह्मन् क्षमस्व माम् ।)

इत्येतानि समीक्ष्याहं कारणानि भृगूद्वह ।
अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान् ॥ ३५ ॥
ब्रह्मन्! मेरा यह व्रत है कि मुझसे कोई जो भी वस्तु माँगे, उसे वह अवश्य दे दूँगा। आपके ही द्वारा मुझे सौंपी हुई शर्मिष्ठा इस जगत्में दूसरे किसी पुरुषको अपना पति बनाना नहीं चाहती थी। अतः उसकी इच्छा पूर्ण करना धर्म समझकर मैंने वैसा किया है। आप इसके लिये मुझे क्षमा करें। भृगुश्रेष्ठ! इन्हीं सब कारणोंका विचार करके अधर्मके भयसे उद्विग्न हो मैं शर्मिष्ठाके पास गया था ॥ ३५ ॥

शुक्र उवाच
नन्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनोऽसि पार्थिव ।
मिथ्याचारस्य धर्मेषु चौर्यं भवति नहुष ॥ ३६ ॥
**शुक्राचार्यने कहा—**राजन्! तुम्हें इस विषयमें मेरे आदेशकी भी प्रतीक्षा करनी चाहिये थी; क्योंकि तुम मेरे अधीन हो। नहुषनन्दन! धर्ममें मिथ्या आचरण करनेवाले पुरुषको चोरीका पाप लगता है ॥ ३६ ॥

वैशम्पायन उवाच
क्रुद्धेनोशनसा शप्तो ययातिर्नाहुषस्तदा ।
पूर्वं वयः परित्यज्य जरां सद्योऽन्वपद्यत ॥ ३७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**क्रोधमें भरे हुए शुक्राचार्यके शाप देनेपर नहुषपुत्र राजा ययाति उसी समय पूर्वावस्था (यौवन)-का परित्याग करके तत्काल बूढ़े हो गये ॥ ३७ ॥

ययातिरुवाच
अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह ।
प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं न विशेच्च माम् ॥ ३८ ॥
**ययाति बोले—**भृगुश्रेष्ठ! मैं देवयानीके साथ युवावस्थामें रहकर तृप्त नहीं हो सका हूँ; अतः ब्रह्मन्! मुझपर ऐसी कृपा कीजिये, जिससे यह बुढ़ापा मेरे शरीरमें प्रवेश न करे ॥ ३८ ॥

शुक्र उवाच
नाहं मृषा ब्रवीम्येतज्जरां प्राप्तोऽसि भूमिप ।
जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन् संक्रामय यदीच्छसि ॥ ३९ ॥
**शुक्राचार्यजीने कहा—**भूमिपाल! मैं झूठ नहीं बोलता; बूढ़े तो तुम हो ही गये; किंतु तुम्हें इतनी सुविधा देता हूँ कि यदि चाहो तो किसी दूसरेसे जवानी लेकर इस बुढ़ापाको उसके शरीरमें डाल सकते हो ॥ ३९ ॥

ययातिरुवाच

राज्यभाक् स भवेद् ब्रह्मन् पुण्यभाक् कीर्तिभाक् तथा ।
यो मे दद्यात् वयः पुत्रस्तद् भवाननुमन्यताम् ॥ ४० ॥
**ययाति बोले—**ब्रह्मन्! मेरा जो पुत्र अपनी युवावस्था मुझे दे, वही पुण्य और कीर्तिका भागी होनेके साथ ही मेरे राज्यका भी भागी हो। आप इसका अनुमोदन करें ॥ ४० ॥

शुक्र उवाच
संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज ।
मामनुध्याय भावेन न च पापमवाप्स्यसि ॥ ४१ ॥
वयो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति ।
आयुष्मान् कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च ॥ ४२ ॥
**शुक्राचार्यने कहा—**नहुषनन्दन! तुम भक्तिभावसे मेरा चिन्तन करके अपनी वृद्धावस्थाका इच्छानुसार दूसरेके शरीरमें संचार कर सकोगे। उस दशामें तुम्हें पाप भी नहीं लगेगा। जो पुत्र तुम्हें (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी युवावस्था देगा, वही राजा होगा, साथ ही दीर्घायु, यशस्वी तथा अनेक संतानोंसे युक्त होगा ॥ ४१-४२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४६ १/३ श्लोक हैं)