महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 344)
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
जरत्कारुका शर्तके साथ विवाहके लिये उद्यत होना और नागराज वासुकिका जरत्कारु नामकी कन्याको लेकर आना
सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा जरत्कारुर्भृशं शोकपरायणः ।
उवाच तान् पितॄन् दुःखाद् बाष्पसंदिग्धया गिरा ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनकजी! यह सुनकर जरत्कारु अत्यन्त शोकमें मग्न हो गये और दुःखसे आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें अपने पितरोंसे बोले ॥ १ ॥
जरत्कारुरुवाच
मम पूर्वे भवन्तो वै पितरः सपितामहाः ।
तद् ब्रूत यन्मया कार्यं भवतां प्रियकाम्यया ॥ २ ॥
अहमेव जरत्कारुः किल्बिषी भवतां सुतः ।
ते दण्डं धारयत मे दुष्कृतेरकृतात्मनः ॥ ३ ॥
जरत्कारुने कहा— आप मेरे ही पूर्वज पिता और पितामह आदि हैं। अतः बताइये आपका प्रिय करनेके लिये मुझे क्या करना चाहिये। मैं ही आपलोगोंका पुत्र पापी जरत्कारु हूँ। आप मुझ अकृतात्मा पापीको इच्छानुसार दण्ड दें ॥ २-३ ॥
पितर ऊचुः
पुत्र दिष्ट्यासि सम्प्राप्त इमं देशं यदृच्छया ।
किमर्थं च त्वया ब्रह्मन् न कृतो दारसंग्रहः ॥ ४ ॥
पितर बोले— पुत्र! बड़े सौभाग्यकी बात है जो तुम अकस्मात् इस स्थानपर आ गये। ब्रह्मन्! तुमने अबतक विवाह क्यों नहीं किया? ॥ ४ ॥
जरत्कारुरुवाच
ममायं पितरो नित्यं हृद्यर्थः परिवर्तते ।
ऊर्ध्वरेताः शरीरं वै प्रापयेयममुत्र वै ॥ ५ ॥
जरत्कारुने कहा— पितृगण! मेरे हृदयमें यह बात निरन्तर घूमती रहती थी कि मैं ऊर्ध्वरेता (अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालक) होकर इस शरीरको परलोक (पुष्यधाम)-में पहुँचाऊँ ॥ ५ ॥
न दारान् वै करिष्येऽहमिति मे भावितं मनः ।
एवं दृष्ट्वा तु भवतः शकुन्तानिव लम्बतः ॥ ६ ॥
मया निवर्तिता बुद्धिर्ब्रह्मचर्यात् पितामहाः ।
करिष्ये वः प्रियं कामं निवेश्येऽहमसंशयम् ॥ ७ ॥
अतः मैंने अपने मनमें यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि 'मैं कभी पत्नी-परिग्रह (विवाह) नहीं करूँगा।' किंतु पितामहो! आपको पक्षियोंकी भाँति लटकते देख अखण्ड ब्रह्मचर्यके पालन-सम्बन्धी निश्चयसे मैंने अपनी बुद्धि लौटा ली है। अब मैं आपका प्रिय मनोरथ पूर्ण करूँगा, निश्चय ही विवाह कर लूँगा ॥ ६-७ ॥
सनाम्नीं यद्यहं कन्यामुपलप्स्ये कदाचन ।
भविष्यति च या काचिद् भैक्ष्यवत् स्वयमुद्यता ॥ ८ ॥
प्रतिग्रहीता तामस्मि न भरेयं च यामहम् ।
एवंविधमहं कुर्यां निवेशं प्राप्नुयां यदि ।
अन्यथा न करिष्येऽहं सत्यमेतत् पितामहाः ॥ ९ ॥
(परंतु इसके लिये एक शर्त होगी—) 'यदि मैं कभी अपने ही जैसे नामवाली कुमारी कन्या पाऊँगा, उसमें भी जो भिक्षाकी भाँति बिना माँगे स्वयं ही विवाहके लिये प्रस्तुत हो जायगी और जिसके पालन-पोषणका भार मुझपर न होगा, उसीका मैं पाणिग्रहण करूँगा।' यदि ऐसा विवाह मुझे सुलभ हो जाय तो कर लूँगा, अन्यथा विवाह करूँगा ही नहीं। पितामहो! यह मेरा सत्य निश्चय है ॥ ८-९ ॥
तत्र चोत्पत्स्यते जन्तुर्भवतां तारणाय वै ।
शाश्वताश्चाव्ययाश्चैव तिष्ठन्तु पितरो मम ॥ १० ॥
वैसे विवाहसे जो पत्नी मिलेगी, उसीके गर्भसे आपलोगोंको तारनेके लिये कोई प्राणी उत्पन्न होगा। मैं चाहता हूँ मेरे पितर नित्य शाश्वत लोकोंमें बने रहें, वहाँ वे अक्षय सुखके भागी हों ॥ १० ॥
सौतिरुवाच
एवमुक्त्वा तु स पितॄंश्चचार पृथिवीं मुनिः ।
न च स्म लभते भार्यां वृद्धोऽयमिति शौनक ॥ ११ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनकजी! इस प्रकार पितरोंसे कहकर जरत्कारु मुनि पूर्ववत् पृथ्वीपर विचरने लगे। परंतु 'यह बूढ़ा है' ऐसा समझकर किसीने कन्या नहीं दी, अतः उन्हें पत्नी उपलब्ध न हो सकी ॥ ११ ॥
यदा निर्वेदमापन्नः पितृभिश्चोदितस्तथा ।
तदारण्यं स गत्वोच्चैश्चुक्रोश भृशदुःखितः ॥ १२ ॥
जब वे विवाहकी प्रतीक्षामें खिन्न हो गये, तब पितरोंसे प्रेरित होनेके कारण वनमें जाकर अत्यन्त दुःखी हो जोर-जोरसे ब्याहके लिये पुकारने लगे ॥ १२ ॥
स त्वरण्यगतः प्राज्ञः पितॄणां हितकाम्यया ।
उवाच कन्यां याचामि तिस्रो वाचः शनैरिमाः ॥ १३ ॥
वनमें जानेपर विद्वान् जरत्कारुने पितरोंके हितकी कामनासे तीन बार धीरे-धीरे यह बात कही—'मैं कन्या माँगता हूँ' ॥ १३ ॥
यानि भूतानि सन्तीह स्थावराणि चराणि च ।
अन्तर्हितानि वा यानि तानि शृण्वन्तु मे वचः ॥ १४ ॥
(फिर जोरसे बोले—) 'यहाँ जो स्थावर-जंगम, दृश्य या अदृश्य प्राणी हैं, वे सब मेरी बात सुनें— ॥ १४ ॥
उग्रे तपसि वर्तन्ते पितरश्चोदयन्ति माम् ।
निविशस्वेति दुःखार्ताः संतानस्य चिकीर्षया ॥ १५ ॥
'मेरे पितर भयंकर कष्टमें पड़े हैं और दुःखसे आतुर हो संतान-प्राप्तिकी इच्छा रखकर मुझे प्रेरित कर रहे हैं कि 'तुम विवाह कर लो' ॥ १५ ॥
निवेशायाखिलां भूमिं कन्याभैक्ष्यं चरामि भोः ।
दरिद्रो दुःखशीलश्च पितृभिः संनियोजितः ॥ १६ ॥
'अतः विवाहके लिये मैं सारी पृथ्वीपर घूमकर कन्याकी भिक्षा चाहता हूँ। यद्यपि मैं दरिद्र हूँ और सुविधाओंके अभावमें दुःखी हूँ, तो भी पितरोंकी आज्ञासे विवाहके लिये उद्यत हूँ ॥ १६ ॥
यस्य कन्यास्ति भूतस्य ये मयेह प्रकीर्तिताः ।
ते मे कन्यां प्रयच्छन्तु चरतः सर्वतोदिशम् ॥ १७ ॥
'मैंने यहाँ जिनका नाम लेकर पुकारा है, उनमेंसे जिस किसी भी प्राणीके पास विवाहके योग्य विख्यात गुणोंवाली कन्या हो, वह सब दिशाओंमें विचरनेवाले मुझ ब्राह्मणको अपनी कन्या दे ॥ १७ ॥
मम कन्या सनाम्नी या भैक्ष्यवच्चोदिता भवेत् ।
भरेयं चैव यां नाहं तां मे कन्यां प्रयच्छत ॥ १८ ॥
'जो कन्या मेरे ही जैसे नामवाली हो, भिक्षाकी भाँति मुझे दी जा सकती हो और जिसके भरण-पोषणका भार मुझपर न हो, ऐसी कन्या कोई मुझे दे' ॥ १८ ॥
ततस्ते पन्नगा ये वै जरत्कारौ समाहिताः ।
तामादाय प्रवृत्तिं ते वासुकेः प्रत्यवेदयन् ॥ १९ ॥
तब उन नागोंने जो जरत्कारु मुनिकी खोजमें लगाये गये थे, उनका यह समाचार पाकर उन्होंने नागराज वासुकिको सूचित किया ॥ १९ ॥
तेषां श्रुत्वा स नागेन्द्रस्तां कन्यां समलंकृताम् ।
प्रगृह्यारण्यमगमत् समीपं तस्य पन्नगः ॥ २० ॥
उनकी बात सुनकर नागराज वासुकि अपनी उस कुमारी बहिनको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके साथ ले वनमें मुनिके समीप गये ॥ २० ॥
तत्र तां भैक्ष्यवत् कन्यां प्रादात् तस्मै महात्मने ।
नागेन्द्रो वासुकिर्ब्रह्मन् न स तां प्रत्यगृह्णत ॥ २१ ॥
ब्रह्मन्! वहाँ नागेन्द्र वासुकिने महात्मा जरत्कारुको भिक्षाकी भाँति वह कन्या समर्पित की; किंतु उन्होंने सहसा उसे स्वीकार नहीं किया ॥ २१ ॥
असनामेति वै मत्वा भरणे चाविचारिते ।
मोक्षभावे स्थितश्चापि मन्दीभूतः परिग्रहे ॥ २२ ॥
ततो नाम स कन्यायाः पप्रच्छ भृगुनन्दन ।
वासुकिं भरणं चास्या न कुर्यामित्युवाच ह ॥ २३ ॥
सोचा, सम्भव है। यह कन्या मेरे-जैसे नामवाली न हो। इसके भरण-पोषणका भार किसपर रहेगा, इस बातका निर्णय भी अभीतक नहीं हो पाया है। इसके सिवा मैं मोक्षभावमें स्थित हूँ, यही सोचकर उन्होंने पत्नी-परिग्रहमें शिथिलता दिखायी। भृगुनन्दन! इसीलिये पहले उन्होंने वासुकिसे उस कन्याका नाम पूछा और यह स्पष्ट कह दिया—'मैं इसका भरण-पोषण नहीं करूँगा' ॥ २२-२३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि वासुकिजरत्कारुसमागमे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें वासुकि-जरत्कारु-समागमसम्बन्धी छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥