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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2204)

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

गान्धारीकी धृतराष्ट्रको चेतावनी और धृतराष्ट्रका अस्वीकार करना

वैशम्पायन उवाच

अथाब्रवीन्महाराज धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ।
पुत्रहार्दाद् धर्मयुक्ता गान्धारी शोककर्शिता ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय भावी अनिष्टकी आशंकासे धर्मपरायणा गान्धारी पुत्र-स्नेहवश शोकसे कातर हो उठी और राजा धृतराष्ट्रसे इस प्रकार बोली— ॥ १ ॥

जाते दुर्योधने क्षत्ता महामतिरभाषत ।
नीयतां परलोकाय साध्वयं कुलपांसनः ॥ २ ॥

‘आर्यपुत्र! दुर्योधनके जन्म लेनेपर परम बुद्धिमान् विदुरजीने कहा था—यह बालक अपने कुलका नाश करनेवाला होगा; अतः इसे त्याग देना चाहिये ॥ २ ॥

व्यनदज्जातमात्रो हि गोमायुरिव भारत ।
अन्तो नूनं कुलस्यास्य कुरवस्तन्निबोधत ॥ ३ ॥

‘भारत! इसने जन्म लेते ही गीदड़की भाँति ‘हुँआ-हुँआ’ का शब्द किया था; अतः यह अवश्य ही इस कुलका अन्त करनेवाला होगा। कौरवो! आपलोग भी इस बातको अच्छी तरह समझ लें ॥ ३ ॥

मा निमज्जीः स्वदोषेण महाप्सु त्वं हि भारत ।
मा बालानामशिष्टनामभिमंस्था मतिं प्रभो ॥ ४ ॥

‘भरतकुलतिलक! आप अपने ही दोषसे इस कुलको विपत्तिके महासागरमें न डुबाइये। प्रभो! इन उद्दण्ड बालकोंकी हाँ-में-हाँ न मिलाइये ॥ ४ ॥

मा कुलस्य क्षये घोरे कारणं त्वं भविष्यसि ।
बद्धं सेतुं को नु भिन्द्याद् धमेच्छान्तं च पावकम् ॥ ५ ॥
शमे स्थितान् को नु पार्थान् कोपयेद् भरतर्षभ ।
स्मरन्तं त्वामाजमीढ स्मारयिष्याम्यहं पुनः ॥ ६ ॥

‘इस कुलके भयंकर विनाशमें स्वयं ही कारण न बनिये। भरतश्रेष्ठ! बँधे हुए पुलको कौन तोड़ेगा? बुझी हुई वैरकी आगको फिर कौन भड़कायेगा? कुन्तीके शान्तिपरायण पुत्रोंको फिर कुपित करनेका साहस कौन करेगा? अजमीढकुलके रत्न! आप सब कुछ जानते और याद रखते हैं, तो भी मैं पुनः आपको स्मरण दिलाती रहूँगी ॥ ५-६ ॥

शास्त्रं न शास्ति दुर्बुद्धिं श्रेयसे चेतराय च ।
न वै वृद्धो बालमतिर्भवेद् राजन् कथंचन ॥ ७ ॥
‘राजन्! जिसकी बुद्धि खोटी है, उसे शास्त्र भी भला-बुरा कुछ नहीं सिखा सकता। मन्दबुद्धि बालक वृद्धों-जैसा विवेकशील किसी प्रकार नहीं हो सकता ॥ ७ ॥

त्वन्नेत्राः सन्तु ते पुत्रा मा त्वां दीर्णाः प्रहासिषुः ।
तस्मादयं मद्वचनात् त्यज्यतां कुलपांसनः ॥ ८ ॥
‘आपके पुत्र आपके ही नियन्त्रणमें रहें, ऐसी चेष्टा कीजिये। ऐसा न हो कि वे सभी मर्यादाका त्याग करके प्राणोंसे हाथ धो बैठें और आपको इस बुढ़ापेमें छोड़कर चल बसें। इसलिये आप मेरी बात मानकर इस कुलांगार दुर्योधनको त्याग दें ॥ ८ ॥