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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

२१४-

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चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

अर्जुनका पूर्वदिशाके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए मणिपुरमें जाकर चित्रांगदाका पाणिग्रहण करके उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न करना

वैशम्पायन उवाच

कथयित्वा च तत् सर्वं ब्राह्मणेभ्यः स भारत ।
प्रययौ हिमवत्पार्श्वं ततो वज्रधरात्मजः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! रातकी वह सारी घटना ब्राह्मणोंसे कहकर इन्द्रपुत्र अर्जुन हिमालयके पास चले गये ॥ १ ॥

अगस्त्यवटमासाद्य वसिष्ठस्य च पर्वतम् ।
भृगुतुङ्गे च कौन्तेयः कृतवाञ्छौचमात्मनः ॥ २ ॥
अगस्त्यवट, वसिष्ठपर्वत तथा भृगुतुंगपर जाकर उन्होंने शौच-स्नान आदि किये ॥ २ ॥

प्रददौ गोसहस्राणि सुबहूनि च भारत ।
निवेशांश्च द्विजातिभ्यः सोऽददत् कुरुसत्तमः ॥ ३ ॥
भारत! कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने उन तीर्थोंमें ब्राह्मणोंको कई हजार गौएँ दान कीं और द्विजातियोंके रहनेके लिये घर एवं आश्रम बनवा दिये ॥ ३ ॥

हिरण्यविन्दोस्तीर्थे च स्नात्वा पुरुषसत्तमः ।
दृष्टवान् पाण्डवश्रेष्ठः पुण्यान्यायतनानि च ॥ ४ ॥
हिरण्यबिंदुतीर्थमें स्नान करके पाण्डवश्रेष्ठ पुरुषोत्तम अर्जुनने अनेक पवित्र स्थानोंका दर्शन किया ॥ ४ ॥

अवतीर्य नरश्रेष्ठो ब्राह्मणैः सह भारत ।
प्राचीं दिशमभिप्रेप्सुर्जगाम भरतर्षभः ॥ ५ ॥
जनमेजय! तत्पश्चात् हिमालयसे नीचे उतरकर भरत-कुलभूषण नरश्रेष्ठ अर्जुन पूर्व दिशाकी ओर चल दिये ॥ ५ ॥

आनुपूर्व्येण तीर्थानि दृष्टवान् कुरुसत्तमः ।
नदीं चोत्पलिनीं रम्यामरण्यं नैमिषं प्रति ॥ ६ ॥
नन्दामपरनन्दां च कौशिकीं च यशस्विनीम् ।
महानदीं गयां चैव गङ्गामपि च भारत ॥ ७ ॥
भारत! फिर उस यात्रामें कुरुश्रेष्ठ धनंजयने क्रमशः अनेक तीर्थोंका तथा नैमिषारण्यतीर्थमें बहनेवाली रमणीय उत्पलिनी नदी, नन्दा, अपरनन्दा, यशस्विनी कौशिकी

(कोसी), महानदी, गयातीर्थ और गंगाजीका भी दर्शन किया ॥ ६-७ ॥
एवं तीर्थानि सर्वाणि पश्यमानस्तथाऽऽश्रमान् ।
आत्मनः पावनं कुर्वन् ब्राह्मणेभ्यो ददौ च गाः ॥ ८ ॥
इस प्रकार उन्होंने सब तीर्थों और आश्रमोंको देखते हुए स्नान आदिसे अपनेको पवित्र करके ब्राह्मणोंके लिये बहुत-सी गौएँ दान कीं ॥ ८ ॥
अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु यानि तीर्थानि कानिचित् ।
जगाम तानि सर्वाणि पुण्यान्यायतनानि च ॥ ९ ॥
तदनन्तर अंग, वंग और कलिंग देशोंमें जो कोई भी पवित्र तीर्थ और मन्दिर थे, उन सबमें वे गये ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा च विधिवत् तानि धनं चापि ददौ ततः ।
कलिङ्गराष्ट्रद्वारेषु ब्राह्मणाः पाण्डवानुगाः ।
अभ्यनुज्ञाय कौन्तेयमुपावर्तन्त भारत ॥ १० ॥
और उन तीर्थोंका दर्शन करके उन्होंने विधिपूर्वक वहाँ धन-दान किया। कलिंग राष्ट्रके द्वारपर पहुँचकर अर्जुनके साथ चलनेवाले ब्राह्मण उनकी अनुमति लेकर वहाँसे लौट गये ॥ १० ॥
स तु तैरभ्यनुज्ञातः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
सहायैरल्पकैः शूरः प्रययौ यत्र सागरः ॥ ११ ॥
परंतु कुन्तीपुत्र शूरवीर धनंजय उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा ले थोड़े-से सहायकोंके साथ उस स्थानकी ओर गये, जहाँ समुद्र लहराता था ॥ ११ ॥
स कलिङ्गानतिक्रम्य देशानायतनानि च ।
हर्म्याणि रमणीयानि प्रेक्षमाणो ययौ प्रभुः ॥ १२ ॥
कलिंग देशको लाँघकर शक्तिशाली अर्जुन अनेक देशों, मन्दिरों तथा रमणीय अट्टालिकाओंका दर्शन करते हुए आगे बढ़े ॥ १२ ॥
महेन्द्रपर्वतं दृष्ट्वा तापसैरुपशोभितम् ।
समुद्रतीरेण शनैर्मणिपूरं जगाम ह ॥ १३ ॥
इस प्रकार वे तपस्वी मुनियोंसे सुशोभित महेन्द्र पर्वतका दर्शन कर समुद्रके किनारे-किनारे यात्रा करते हुए धीरे-धीरे मणिपूर पहुँच गये ॥ १३ ॥
तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।
अभिगम्य महाबाहुरभ्यगच्छन्महीपतिम् ॥ १४ ॥
वहाँके सम्पूर्ण तीर्थों और पवित्र मन्दिरोंमें जानेके बाद महाबाहु अर्जुन मणिपूरनरेशके पास गये ॥ १४ ॥
मणिपूरेश्वरं राजन् धर्मज्ञं चित्रवाहनम् ।
तस्य चित्राङ्गदा नाम दुहिता चारुदर्शना ॥ १५ ॥

राजन्! मणिपूरके स्वामी धर्मज्ञ चित्रवाहन थे। उनके चित्रांगदा नामवाली एक परम सुन्दरी कन्या थी ॥ १५ ॥
तां ददर्श पुरे तस्मिन् विचरन्तीं यदृच्छया ।
दृष्ट्वा च तां वरारोहां चकमे चैत्रवाहनीम् ॥ १६ ॥
उस नगरमें विचरण करती हुई उस सुन्दर अंगोंवाली चित्रवाहनकुमारीको अकस्मात् देखकर अर्जुनके मनमें उसे प्राप्त करनेकी अभिलाषा हुई ॥ १६ ॥
अभिगम्य च राजानमवदत् स्वं प्रयोजनम् ।
देहि मे खल्विमां राजन् क्षत्रियाय महात्मने ॥ १७ ॥
अतः राजासे मिलकर उन्होंने अपना अभिप्राय इस प्रकार बताया—‘महाराज! मुझ महामनस्वी क्षत्रियको आप अपनी यह पुत्री प्रदान कर दीजिये’ ॥ १७ ॥

तच्छ्रुत्वा त्वब्रवीद् राजा कस्य पुत्रोऽसि नाम किम् ।
उवाच तं पाण्डवोऽहं कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ १८ ॥
यह सुनकर राजाने पूछा—‘आप किनके पुत्र हैं और आपका क्या नाम है?’ अर्जुनने उत्तर दिया, ‘मैं महाराज पाण्डु तथा कुन्तीदेवीका पुत्र हूँ। मुझे लोग धनंजय कहते हैं’ ॥ १८ ॥
तमुवाचाथ राजा स सान्त्वपूर्वमिदं वचः ।
राजा प्रभञ्जनो नाम कुलेऽस्मिन् सम्बभूव ह ॥ १९ ॥

तब राजाने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—'इस कुलमें पहले प्रभंजन नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं ॥ १९ ॥

अपुत्रः प्रसवेनार्थी तपस्तेपे स उत्तमम् ।
उग्रेण तपसा तेन देवदेवः पिनाकधृक् ॥ २० ॥
ईश्वरस्तोषितः पार्थ देवदेव उमापतिः ।
स तस्मै भगवान् प्रादादेकैकं प्रसवं कुले ॥ २१ ॥
'उनके कोई पुत्र नहीं था, अतः उन्होंने पुत्रकी इच्छासे उत्तम तपस्या प्रारम्भ की। पार्थ! उन्होंने उस उग्र तपस्यासे पिनाकधारी देवाधिदेव महेश्वरको संतुष्ट कर लिया। तब देवदेवेश्वर भगवान् उमापति उन्हें वरदान देते हुए बोले—'तुम्हारे कुलमें एक-एक संतान होती जायगी' ॥ २०-२१ ॥

एकैकः प्रसवस्तस्माद् भवत्यस्मिन् कुले सदा ।
तेषां कुमाराः सर्वेषां पूर्वेषां मम जज्ञिरे ॥ २२ ॥
एका च मम कन्येयं कुलस्योत्पादिनी भृशम् ।
पुत्रो ममायमिति मे भावना पुरुषर्षभ ॥ २३ ॥
'इस कारण हमारे इस कुलमें सदासे एक-एक संतान ही होती चली आ रही है। मेरे अन्य सभी पूर्वजोंके तो पुत्र होते आये हैं, परंतु मेरे यह एक कन्या ही हुई है। यही इस कुलकी परम्पराको चलानेवाली है। अतः भरतश्रेष्ठ! इसके प्रति मेरी यही भावना रहती है कि 'यह मेरा पुत्र है' ॥ २२-२३ ॥

पुत्रिका हेतुविधिना संज्ञिता भरतर्षभ ।
तस्मादेकः सुतो योऽस्यां जायते भारत त्वया ॥ २४ ॥
एतच्छुल्कं भवत्वस्याः कुलकृज्जायतामिह ।
एतेन समयेनेमां प्रतिगृह्णीष्व पाण्डव ॥ २५ ॥
'यद्यपि यह पुत्री है, तो भी हेतुविधिसे (अर्थात् इससे जो प्रथम पुत्र होगा, वह मेरा ही पुत्र माना जायगा, इस हेतुसे) मैंने इसे पुत्रकी संज्ञा दे रखी है। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा इसके गर्भसे जो एक पुत्र उत्पन्न हो, वह यहीं रहकर इस कुलपरम्पराका प्रवर्तक हो; इस कन्याके विवाहका यही शुल्क आपको देना होगा। पाण्डुनन्दन! इसी शर्तके अनुसार आप इसे ग्रहण करें' ॥ २४-२५ ॥

स तथेति प्रतिज्ञाय तां कन्यां प्रतिगृह्य च ।
उवास नगरे तस्मिंस्तिस्रः कुन्तीसुतः समाः ॥ २६ ॥
'तथास्तु' कहकर अर्जुनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और उस कन्याका पाणिग्रहण करके उन्होंने तीन वर्षोंतक उसके साथ उस नगरमें निवास किया ॥ २६ ॥

तस्यां सुते समुत्पन्ने परिष्वज्य वराङ्गनाम् ।
आमन्त्र्य नृपतिं तं तु जगाम परिवर्तितुम् ॥ २७ ॥

उसके गर्भसे पुत्र उत्पन्न हो जानेपर उस सुन्दरीको हृदयसे लगाकर अर्जुनने विदा ली तथा राजा चित्रवाहनसे पूछकर वे पुनः तीर्थोंमें भ्रमण करनेके लिये चल दिये ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि चित्राङ्गदासङ्गमे चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें चित्रांगदासमागमविषयक दो सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१४ ॥