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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 682)

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त्रिनवतितमोऽध्यायः

राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना

वसुमानुवाच

पृच्छामि त्वां वसुमानौषदश्वि-
र्यद्यस्ति लोको दिवि मे नरेन्द्र ।
यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन्
क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ १ ॥

वसुमान्‌ने कहा— नरेन्द्र! मैं उषदश्वका पुत्र वसुमान् हूँ और आपसे पूछ रहा हूँ। यदि स्वर्ग या अन्तरिक्षमें मेरे लिये भी कोई विख्यात लोक हों तो बताइये। महात्मन्! मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ १ ॥

ययातिरुवाच

यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च
यत्तेजसा तपते भानुमांश्च ।
लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै
ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति ॥ २ ॥

ययातिने कहा— राजन्! पृथ्वी, आकाश और दिशाओंके जितने प्रदेशको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे तपाते और प्रकाशित करते हैं; उतने लोक तुम्हारे लिये स्वर्गमें स्थित हैं। वे अन्तवान् न होकर चिरस्थायी हैं और आपकी प्रतीक्षा करते हैं ॥ २ ॥

वसुमानुवाच

तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं
ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु ।
क्रीणीष्वैतांस्तृणकेनापि राजन्
प्रतिग्रहस्ते यदि धीमन् प्रदुष्टः ॥ ३ ॥

वसुमान् बोले— राजन्! वे सभी लोक मैं आपके लिये देता हूँ, आप नीचे न गिरें। मेरे लिये जितने पुण्यलोक हैं, वे सब आपके हो जायँ। धीमन्! यदि आपको प्रतिग्रह लेनेमें दोष दिखायी देता हो तो एक मुट्ठी तिनका मुझे मूल्यके रूपमें देकर मेरे इन सभी लोकोंको खरीद लें ॥ ३ ॥

ययातिरुवाच

न मिथ्याहं विक्रयं वै स्मरामि
वृथा गृहीतं शिशुकाच्छङ्कमानः ।
कुर्यां न चैवाकृतपूर्वमन्यै-
र्विधित्समानः किमु तत्र साधु ॥ ४ ॥

**ययातिने कहा—**मैंने इस प्रकार कभी झूठ-मूठकी खरीद-बिक्री की हो अथवा छलपूर्वक व्यर्थ कोई वस्तु ली हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। मैं कालचक्रसे शंकित रहता हूँ। जिसे पूर्ववर्ती अन्य महापुरुषोंने नहीं किया वह कार्य मैं भी नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि मैं सत्कर्म करना चाहता हूँ ॥ ४ ॥

वसुमानुवाच

तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्
मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते ।
अहं न तान् वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र
सर्वे लोकास्तव ते वै भवन्तु ॥ ५ ॥

**वसुमान् बोले—**राजन्! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वतः अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। नरेन्द्र! निश्चय जानिये, मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे सब आपके ही अधिकारमें रहें ॥ ५ ॥

शिबिरुवाच

पृच्छामि त्वां शिबिरौशीनरोऽहं
ममापि लोका यदि सन्तीह तात ।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः
क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ ६ ॥

**शिबिने कहा—**तात! मैं उशीनरका पुत्र शिबि आपसे पूछता हूँ। यदि अन्तरिक्ष या स्वर्गमें मेरे भी पुण्यलोक हों, तो बताइये; क्योंकि मैं आपको उक्त धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ ६ ॥

ययातिरुवाच

यत् त्वं वाचा हृदयेनापि साधून्
परीप्समानान् नावमंस्था नरेन्द्र ।
तेनानन्ता दिवि लोकाः श्रितास्ते
विद्युद्रूपाः स्वनवन्तो महान्तः ॥ ७ ॥

**ययाति बोले—**नरेन्द्र! जो-जो साधु पुरुष तुमसे कुछ माँगनेके लिये आये, उनका तुमने वाणीसे कौन कहे, मनसे भी अपमान नहीं किया। इस कारण स्वर्गमें तुम्हारे लिये अनन्त लोक विद्यमान हैं, जो विद्युत्के समान तेजोमय, भाँति-भाँतिके सुमधुर शब्दोंसे युक्त तथा महान् हैं ।। ७ ।।

शिबिरुवाच

तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्
मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते ।
न चाहं तान् प्रतिपत्स्ये ह दत्त्वा
यत्र गत्वा नानुशोचन्ति धीराः ॥ ८ ॥
**शिबिने कहा—**महाराज! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वयं अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। उन सबको देकर निश्चय ही मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे लोक ऐसे हैं, जहाँ जाकर धीर पुरुष कभी शोक नहीं करते ।। ८ ।।

ययातिरुवाच

यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभाव-
स्ते चाप्यनन्ता नरदेव लोकाः ।
तथाद्य लोके न रमेऽन्यदत्ते
तस्माच्छिबे नाभिनन्दामि देयम् ॥ ९ ॥
**ययाति बोले—**नरदेव शिबि! जिस प्रकार तुम इन्द्रके समान प्रभावशाली हो, उसी प्रकार तुम्हारे वे लोक भी अनन्त हैं; तथापि दूसरेके दिये हुए लोकमें मैं विहार नहीं कर सकता, इसीलिये तुम्हारे दिये हुएका अभिनन्दन नहीं करता ।। ९ ।।

अष्टक उवाच

न चेदेकैकशो राजँल्लोकान् नः प्रतिनन्दसि ।
सर्वे प्रदाय भवते गन्तारो नरकं वयम् ॥ १० ॥
**अष्टकने कहा—**राजन्! यदि आप हममेंसे एक-एकके दिये हुए लोकोंको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण नहीं करते तो हम सब लोग अपने पुण्यलोक आपकी सेवामें अर्पित करके नरक (भूलोक)-में जानेको तैयार हैं ।। १० ।।

ययातिरुवाच

यदर्होऽहं तद् यतध्वं सन्तः सत्याभिनन्दिनः ।
अहं तन्नाभिजानामि यत् कृतं न मया पुरा ॥ ११ ॥
**ययाति बोले—**मैं जिसके योग्य हूँ, उसीके लिये यत्न करो; क्योंकि साधु पुरुष सत्यका ही अभिनन्दन करते हैं। मैंने पूर्वकालमें जो कर्म नहीं किया, उसे अब भी

करनेयोग्य नहीं समझता ॥ ११ ॥

अष्टक उवाच

कस्यैते प्रतिदृश्यन्ते रथाः पञ्च हिरण्मयाः ।
यानारुह्य नरो लोकानभिवाञ्छति शाश्वतान् ॥ १२ ॥
**अष्टकने कहा—**आकाशमें ये किसके पाँच सुवर्णमय रथ दिखायी देते हैं, जिनपर आरूढ़ होकर मनुष्य सनातन लोकोंमें जानेकी इच्छा करता है ॥ १२ ॥

ययातिरुवाच

युष्मानेते वहिष्यन्ति रथाः पञ्च हिरण्मयाः ।
उच्चैः सन्तः प्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखा इव ॥ १३ ॥
**ययाति बोले—**ऊपर आकाशमें स्थित प्रज्वलित अग्निकी लपटोंके समान जो पाँच सुवर्णमय रथ प्रकाशित हो रहे हैं, ये आपलोगोंको ही स्वर्गमें ले जायँगे ॥ १३ ॥

(वैशम्पायन उवाच)

(एतस्मिन्नन्तरे चैव माधवी तु तपोधना ।
मृगचर्मपरीताङ्गी परिणामे मृगव्रतम् ॥
मृगैः सह चरन्ती सा मृगाहारविचेष्टिता ।
यज्ञवाटं मृगगणैः प्रविश्य भृशविस्मिता ॥
आघ्रायन्ती धूमगन्धं मृगैरैव चचार सा ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इसी समय तपस्विनी माधवी उधर आ निकली। उसने मृगचर्मसे अपने सब अंगोंको ढक रखा था। वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर वह मृगोंके साथ विचरती हुई मृगव्रतका पालन कर रही थी। उसकी भोजन-सामग्री और चेष्टा मृगोंके ही तुल्य थी। वह मृगोंके झुंडके साथ यज्ञमण्डपमें प्रवेश करके अत्यन्त विस्मित हुई और यज्ञीय धूमकी सुगन्ध लेती हुई मृगोंके साथ वहाँ विचरने लगी।

यज्ञवाटमटन्ती सा पुत्रांस्तानपराजितान् ॥
पश्यन्ती यज्ञमाहात्म्यं मुदं लेभे च माधवी ।
यज्ञशालामें घूम-घूमकर अपने अपराजित पुत्रोंको देखती और यज्ञकी महिमाका अनुभव करती हुई माधवी बहुत प्रसन्न हुई।

असंस्पृशन्तं वसुधां ययातिं नाहुषं तदा ॥
दिविष्ठं प्राप्तमाज्ञाय ववन्दे पितरं तदा ।
ततो वसुमनाः* पृच्छन् मातरं वै तपस्विनीम् ॥
उसने देखा, स्वर्गवासी नहुषनन्दन महाराज ययाति आये हैं, परंतु पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे हैं (आकाशमें ही स्थित हैं)। अपने पिताको पहचानकर माधवीने उन्हें प्रणाम किया।

तब वसुमनाने अपनी तपस्विनी मातासे प्रश्न करते हुए कहा।

वसुमना उवाच

भवत्या यत् कृतमिदं वन्दनं वरवर्णिनि ।
कोऽयं देवोऽथवा राजा यदि जानासि मे वद ॥
**वसुमना बोले—**माँ! तुम श्रेष्ठ वर्णकी देवी हो। तुमने इन महापुरुषको प्रणाम किया है। ये कौन हैं? कोई देवता हैं या राजा? यदि जानती हो तो मुझे बताओ।

माधव्युवाच

शृणुध्वं सहिताः पुत्रा नाहुषोऽयं पिता मम ।
ययातिर्मम पुत्राणां मातामह इति श्रुतः ॥
पूरुं मे भ्रातरं राज्ये समावेश्य दिवं गतः ।
केन वा कारणेनैव इह प्राप्तो महायशाः ॥
**माधवीने कहा—**पुत्रो! तुम सब लोग एक साथ सुन लो—'ये मेरे पिता नहुषनन्दन महाराज ययाति हैं। मेरे पुत्रोंके सुविख्यात मातामह (नाना) ये ही हैं। इन्होंने मेरे भाई पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोककी यात्रा की थी; परंतु न जाने किस कारणसे ये महायशस्वी महाराज पुनः यहाँ आये हैं'।

वैशम्पायन उवाच

तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा स्थानभ्रष्टेति चाब्रवीत् ।
सा पुत्रस्य वचः श्रुत्वा सम्भ्रमाविष्टचेतना ॥
माधवी पितरं प्राह दौहित्रपरिवारितम् ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! माताकी यह बात सुनकर वसुमनाने कहा—माँ! ये अपने स्थानसे भ्रष्ट हो गये हैं। पुत्रका यह वचन सुनकर माधवी भ्रान्तचित्त हो उठी और दौहित्रोंसे घिरे हुए अपने पितासे इस प्रकार बोली।

माधव्युवाच

तपसा निर्जिताँल्लोकान् प्रतिगृह्णीष्व मामकान् ।
पुत्राणामिव पौत्राणां धर्मादधिगतं धनम् ॥
स्वार्थमेव वदन्तीह ऋषयो वेदपारगाः ।
तस्माद् दानेन तपसा अस्माकं दिवमाव्रज ॥
**माधवीने कहा—**पिताजी! मैंने तपस्याद्वारा जिन लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है, उन्हें आप ग्रहण करें। पुत्रों और पौत्रोंकी भाँति पुत्री और दौहित्रोंका धर्माचरणसे प्राप्त किया हुआ धन भी अपने ही लिये है, यह वेदवेत्ता ऋषि कहते हैं; अतः आप हमलोगोंके दान एवं तपस्याजनित पुण्यसे स्वर्गलोकमें जाइये।

ययातिरुवाच

यदि धर्मफलं ह्येतच्छोभनं भविता तथा ।
दुहित्रा चैव दौहित्रैस्तारितोऽहं महात्मभिः ॥
**ययाति बोले—**यदि यह धर्मजनित फल है, तब तो इसका शुभ परिणाम अवश्यम्भावी है। आज मुझे मेरी पुत्री तथा महात्मा दौहित्रोंने तारा है।
तस्मात् पवित्रं दौहित्रमद्यप्रभृति पैतृके ।
भविष्यति न संदेहः पितॄणां प्रीतिवर्धनम् ॥
इसलिये आजसे पितृ-कर्म (श्राद्ध)-में दौहित्र परम पवित्र समझा जायगा। इसमें संशय नहीं कि वह पितरोंका हर्ष बढ़ानेवाला होगा।
त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः ।
त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ॥
भोक्तारः परिवेष्टारः श्रावितारः पवित्रकाः ।
श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र मानी जायँगी—दौहित्र, कुतप और तिल। साथ ही इसमें तीन गुण भी प्रशंसित होंगे—पवित्रता, अक्रोध और अत्वरा (उतावलेपनका अभाव)। तथा श्राद्धमें भोजन करनेवाले, परोसनेवाले और (वैदिक या पौराणिक मन्त्रोंका पाठ) सुनानेवाले—ये तीन प्रकारके मनुष्य भी पवित्र माने जायँगे।
दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभवति भास्करे ।
स कालः कुतपो नाम पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥
दिनके आठवें भागमें जब सूर्यका ताप घटने लगता है, उस समयका नाम कुतप है। उसमें पितरोंके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है।
तिलाः पिशाचाद् रक्षन्ति दर्भा रक्षन्ति राक्षसात् ।
रक्षन्ति श्रोत्रियाः पङ्क्तिं यतिभिर्भुक्तमक्षयम् ॥
तिल पिशाचोंसे श्राद्धकी रक्षा करते हैं, कुश राक्षसोंसे बचाते हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण पंक्तिकी रक्षा करते हैं और यदि यतिगण श्राद्धमें भोजन कर लें तो वह अक्षय हो जाता है।
लब्ध्वा पात्रं तु विद्वांसं श्रोत्रियं सुव्रतं शुचिम् ।
स कालः कालतो दत्तं नान्यथा काल इष्यते ॥
उत्तम व्रतका आचरण करनेवाला पवित्र श्रोत्रिय ब्राह्मण श्राद्धका उत्तम पात्र है। वह जब प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल समझना चाहिये। उसको दिया हुआ दान उत्तम कालका दान है। इसके सिवा और कोई उपयुक्त काल नहीं है।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ययातिस्तु पुनः प्रोवाच बुद्धिमान् ।
सर्वे ह्यवभृथस्नातास्त्वरध्वं कार्यगौरवात् ॥)

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! बुद्धिमान् ययाति उपर्युक्त बात कहकर पुनः अपने दौहित्रोंसे बोले—‘तुम सब लोग अवभृथस्नान कर चुके हो। अब महत्त्वपूर्ण कार्यकी सिद्धिके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ’।

अष्टक उवाच

आतिष्ठस्व रथान् राजन् विक्रमस्व विहायसम् ।
वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति ॥ १४ ॥
**अष्टक बोले—**राजन्! आप इन रथोंमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये। जब समय होगा, तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे ॥ १४ ॥

ययातिरुवाच

सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गजितो वयम् ।
एष नो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्मनः ॥ १५ ॥
**ययाति बोले—**हम सब लोगोंने साथ-साथ स्वर्गपर विजय पायी है, इसलिये इस समय सबको वहाँ चलना चाहिये। देवलोकका यह रजोहीन सात्त्विक मार्ग हमें स्पष्ट दिखायी दे रहा है ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तेऽधिरुह्य रथान् सर्वे प्रयाता नृपसत्तमाः ।
आक्रमन्तो दिवं भाभिर्धर्मेणावृत्य रोदसी ॥ १६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर वे सभी नृपश्रेष्ठ उन दिव्य रथोंपर आरूढ़ हो धर्मके बलसे स्वर्गमें पहुँचनेके लिये चल दिये। उस समय पृथ्वी और आकाशमें उनकी प्रभा व्याप्त हो रही थी ॥ १६ ॥
(अष्टकश्च शिबिश्चैव काशिराजः प्रतर्दनः ।
ऐक्ष्वाकवो वसुमनाश्चत्वारो भूमिपाश्च ह ॥
सर्वे ह्यवभृथस्नाताः स्वर्गताः साधवः सह ।)
अष्टक, शिबि, काशिराज प्रतर्दन तथा इक्ष्वाकुवंशी वसुमना—ये चारों साधु नरेश यज्ञान्त-स्नान करके एक साथ स्वर्गमें गये।

अष्टक उवाच

अहं मन्ये पूर्वमेकोऽस्मि गन्ता
 सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा ।
कस्मादेवं शिबिरौशीनरोऽय-
 मेकोऽत्यगात् सर्ववेगेन वाहान् ॥ १७ ॥

**अष्टक बोले—**राजन्! महात्मा इन्द्र मेरे बड़े मित्र हैं, अतः मैं तो समझता था कि अकेला मैं ही सबसे पहले उनके पास पहुँचूँगा। परंतु ये उशीनरपुत्र शिबि अकेले सम्पूर्ण वेगसे हम सबके वाहनोंको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं, ऐसा कैसे हुआ? ।। १७ ।।

ययातिरुवाच

अददद् देवयानाय यावद् वित्तमविन्दत ।
उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेष्ठो हि वः शिबिः ।। १८ ।।
**ययातिने कहा—**राजन्! उशीनरके पुत्र शिबिने ब्रह्मलोकके मार्गकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दान कर दिया था, इसीलिये ये तुम सब लोगोंमें श्रेष्ठ हैं ।। १८ ।।
दानं तपः सत्यमथापि धर्मो
ह्रीः श्रीः क्षमा सौम्यमथो विधित्सा ।
राज्ञन्नेतान्यप्रमेयाणि राज्ञः
शिबेः स्थितान्यप्रतिमस्य बुद्ध्या ।। १९ ।।
नरेश्वर! दान, तपस्या, सत्य, धर्म, ह्री, श्री, क्षमा, सौम्यभाव और व्रत-पालनकी अभिलाषा—राजा शिबिमें ये सभी गुण अनुपम हैं तथा बुद्धिमें भी उनकी समता करनेवाला कोई नहीं है ।। १९ ।।
एवंवृत्तो ह्रीनिषेवश्च यस्मात्
तस्माच्छिबिरत्यगाद् वै रथेन ।
राजा शिबि ऐसे सदाचारसम्पन्न और लज्जाशील हैं! (इनमें अभिमानकी मात्रा छू भी नहीं गयी है।) इसीलिये शिबि हम सबसे आगे बढ़ गये हैं।

वैशम्पायन उवाच

अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ-
न्मातामहं कौतुकेनेन्द्रकल्पम् ।। २० ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर अष्टकने कौतूहलवश इन्द्रके तुल्य अपने नाना राजा ययातिसे पुनः प्रश्न किया ।। २० ।।
पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं
कुतश्च कश्चासि सुतश्च कस्य ।
कृतं त्वया यद्धि न तस्य कर्ता
लोके त्वदन्यः क्षत्रियो ब्राह्मणो वा ।। २१ ।।
महाराज! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। आप उसे सच-सच बताइये। आप कहाँसे आये हैं, कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने जो कुछ किया है, उसे करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण इस संसारमें नहीं है ।। २१ ।।

ययातिरुवाच

ययातिरस्मि नहुषस्य पुत्रः
पूरोः पिता सार्वभौमस्त्विहासम् ।
गुह्यं चार्थं मामकेभ्यो ब्रवीमि
मातामहोऽहं भवतां प्रकाशम् ॥ २२ ॥
ययातिने कहा—मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता राजा ययाति हूँ। इस लोकमें मैं चक्रवर्ती नरेश था। आप सब लोग मेरे अपने हैं; अतः आपसे गुप्त बात भी खोलकर बतलाये देता हूँ। मैं आपलोगोंका नाना हूँ। (यद्यपि पहले भी यह बात बता चुका हूँ, तथापि पुनः स्पष्ट कर देता हूँ) ॥ २२ ॥

सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिगाय
प्रादामहं छादनं ब्राह्मणेभ्यः ।
मेध्यान्श्वानेकशतान् सुरूपां-
स्तदा देवाः पुण्यभाजो भवन्ति ॥ २३ ॥
मैंने इस सारी पृथिवीको जीत लिया था। मैं ब्राह्मणोंको अन्न-वस्त्र दिया करता था। मनुष्य जब एक सौ सुन्दर पवित्र अश्वोंका दान करते हैं, तब वे पुण्यात्मा देवता होते हैं ॥ २३ ॥

अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः
पूर्णांमिमामखिलां वाहनेन ।
गोभिः सुवर्णेन धनैश्च मुख्यै-
स्तदाददं गाः शतमर्बुदानि ॥ २४ ॥
मैंने तो सवारी, गौ, सुवर्ण तथा उत्तम धनसे परिपूर्ण यह सारी पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी एवं सौ अर्बुद (दस अरब) गौओंका दान भी किया था ॥ २४ ॥

सत्येन वै द्यौश्च वसुन्धरा च
तथैवाग्निर्ज्वलते मानुषेषु ।
न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं
सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति ॥ २५ ॥
सत्यसे ही पृथ्वी और आकाश टिके हुए हैं। इसी प्रकार सत्यसे ही मनुष्य-लोकमें अग्नि प्रज्वलित होती है। मैंने कभी व्यर्थ बात मुँहसे नहीं निकाली है; क्योंकि साधु पुरुष सदा सत्यका ही आदर करते हैं ॥ २५ ॥

यदष्टक प्रब्रवीमीह सत्यं
प्रतर्दनं चौषदशिवं तथैव ।
सर्वे च लोका मुनयश्च देवाः
सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम् ॥ २६ ॥

अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे और उषदश्वके पुत्र वसुमान्‌से भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ; वह सब सत्य ही है। मेरे मनका यह विश्वास है कि समस्त लोक, मुनि और देवता सत्यसे ही पूजनीय होते हैं ॥ २६ ॥
यो नः स्वर्गजितः सर्वान् यथा वृत्तं निवेदयेत् ।
अनसूयुर्द्विजाग्र्येभ्यः स लभेन्नः सलोकताम् ॥ २७ ॥
जो मनुष्य हृदयमें ईर्ष्या न रखकर स्वर्गपर अधिकार करनेवाले हम सब लोगोंके इस वृत्तान्तको यथार्थरूपसे श्रेष्ठ द्विजोंके सामने सुनायेगा, वह हमारे ही समान पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेगा ॥ २७ ॥

वैशम्पायन उवाच
एवं राजा स महात्मा ह्यतीव
स्वैर्दौहित्रैस्तारितोऽमित्रसाहः ।
त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा
स्वर्गं गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजा ययाति बड़े महात्मा थे। शत्रुओंके लिये अजेय और उनके कर्म अत्यन्त उदार थे। उनके दौहित्रोंने उनका उद्धार किया और वे अपने सत्कर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको व्याप्त करके पृथ्वी छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायातसमाप्तौ
त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥ ९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातसमाप्तिविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २० १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/३ श्लोक हैं)


* ये वसुमान् नामसे भी प्रसिद्ध थे।