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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

२२४-

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चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

अग्निदेवका अर्जुन और श्रीकृष्णको दिव्य धनुष, अक्षय तरकस, दिव्य रथ और चक्र आदि प्रदान करना तथा उन दोनोंकी सहायतासे खाण्डववनको जलाना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः स भगवान् धूमकेतुर्हुताशनः ।
चिन्तयामास वरुणं लोकपालं दिदृक्षया ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर धूमरूपी ध्वजासे सुशोभित होनेवाले भगवान् हुताशनने दर्शनकी इच्छासे लोकपाल वरुणका चिन्तन किया ॥ १ ॥

आदित्यमुदके देवं निवसन्तं जलेश्वरम् ।
स च तच्चिन्तितं ज्ञात्वा दर्शयामास पावकम् ॥ २ ॥
अदितिके पुत्र, जलके स्वामी और सदा जलमें ही निवास करनेवाले उन वरुणदेवने, अग्निदेवने मेरा चिन्तन किया है, यह जानकर तत्काल उन्हें दर्शन दिया ॥ २ ॥

तमब्रवीद् धूमकेतुः प्रतिगृह्य जलेश्वरम् ।
चतुर्थं लोकपालानां देवदेवं सनातनम् ॥ ३ ॥
चौथे लोकपाल सनातन देवदेव जलेश्वर वरुणका स्वागत-सत्कार करके धूमकेतु अग्निने उनसे कहा— ॥ ३ ॥

सोमेन राज्ञा यद् दत्तं धनुश्चैवेषुधी च ते ।
तत् प्रयच्छोभयं शीघ्रं रथं च कपिलक्षणम् ॥ ४ ॥
‘वरुणदेव! राजा सोमने आपको जो दिव्य धनुष और अक्षय तरकस दिये हैं, वे दोनों मुझे शीघ्र दीजिये। साथ ही कपियुक्त ध्वजासे सुशोभित रथ भी प्रदान कीजिये’ ॥ ४ ॥

कार्यं च सुमहत् पार्थो गाण्डीवेन करिष्यति ।
चक्रेण वासुदेवश्च तन्ममाद्य प्रदीयताम् ॥ ५ ॥
‘आज कुन्तीपुत्र अर्जुन गाण्डीव धनुषके द्वारा और भगवान् वासुदेव चक्रके द्वारा मेरा महान् कार्य सिद्ध करेंगे; अतः वह सब आज मुझे दे दीजिये’ ॥ ५ ॥

ददानीत्येव वरुणः पावकं प्रत्यभाषत ।
तदद्भुतं महावीरं यशःकीर्तिविवर्धनम् ॥ ६ ॥
सर्वशस्त्रैरनाधृष्यं सर्वशस्त्रप्रमाथि च ।
सर्वायुधमहामात्रं परसैन्यप्रधर्षणम् ॥ ७ ॥

एकं शतसहस्रेण सम्मितं राष्ट्रवर्धनम् ।
चित्रमुच्चावचैर्वर्णैः शोभितं श्लक्ष्णमव्रणम् ॥ ८ ॥
देवदानवगन्धर्वैः पूजितं शाश्वतीः समाः ।
प्रादाच्चैव धनूरत्नमक्षय्ये च महेषुधी ॥ ९ ॥
तब वरुणने अग्निदेवसे 'अभी देता हूँ' ऐसा कहकर वह धनुषोंमें रत्नके समान गाण्डीव तथा बाणोंसे भरे हुए दो अक्षय एवं बड़े तरकस भी दिये। वह धनुष अद्भुत था। उसमें बड़ी शक्ति थी और वह यश एवं कीर्तिको बढ़ानेवाला था। किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे वह टूट नहीं सकता था और दूसरे सब शस्त्रोंको नष्ट कर डालनेकी शक्ति उसमें मौजूद थी। उसका आकार सभी आयुधोंसे बढ़कर था। शत्रुओंकी सेनाको विदीर्ण करनेवाला वह एक ही धनुष दूसरे लाख धनुषोंके बराबर था। वह अपने धारण करनेवालेके राष्ट्रको बढ़ानेवाला एवं विचित्र था। अनेक प्रकारके रंगोंसे उसकी शोभा होती थी। वह चिकना और छिद्रसे रहित था। देवताओं, दानवों और गन्धर्वोंने अनन्त वर्षोंतक उसकी पूजा की थी ॥ ६—९ ॥

रथं च दिव्याश्वयुजं कपिप्रवरकेतनम् ।
उपेतं राजतैरश्वैर्गान्धर्वैर्हेममालिभिः ॥ १० ॥
इसके सिवा वरुणने दिव्य घोड़ोंसे जुता हुआ एक रथ भी प्रस्तुत किया, जिसकी ध्वजापर श्रेष्ठ कपि विराजमान था। उसमें जुते हुए अश्वोंका रंग चाँदीके समान सफेद था। वे सभी घोड़े गन्धर्वदेशमें उत्पन्न तथा सोनेकी मालाओंसे विभूषित थे ॥ १० ॥

पाण्डुराभ्रप्रतीकाशैर्मनोवायुसमैर्जवे ।
सर्वोपकरणैर्युक्तमजय्यं देवदानवैः ॥ ११ ॥
उनकी कान्ति सफेद बादलोंकी-सी जान पड़ती थी। वे वेगमें मन और वायुकी समानता करते थे। वह रथ सम्पूर्ण आवश्यक वस्तुओंसे युक्त तथा देवताओं और दानवोंके लिये भी अजेय था ॥ ११ ॥

भानुमन्तं महाघोषं सर्वरत्नमनोरमम् ।
ससर्ज यं सुतपसा भौमनो भुवनप्रभुः ॥ १२ ॥
प्रजापतिरनिर्देश्यं यस्य रूपं रवेरिव ।
यं स्म सोमः समारुह्य दानवानजयत् प्रभुः ॥ १३ ॥
उससे तेजोमयी किरणें छिटकती थीं। उसके चलनेपर सब ओर बड़े जोरकी आवाज गूँज उठती थी। वह रथ सब प्रकारके रत्नोंसे जटिल होनेके कारण बड़ा मनोरम जान पड़ता था। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी प्रजापति विश्वकर्माने बड़ी भारी तपस्याके द्वारा उस रथका निर्माण किया था। उस सूर्यके समान तेजस्वी रथका 'इदमित्थम्' रूपसे वर्णन नहीं हो सकता था। पूर्वकालमें शक्तिशाली सोम (चन्द्रमा)-ने उसी रथपर आरूढ़ हो दानवोंपर विजय पायी थी ॥ १२-१३ ॥

नवमेघप्रतीकाशं ज्वलन्तमिव च श्रिया ।
आश्रितौ तं रथश्रेष्ठं शक्रायुधसमावुभौ ॥ १४ ॥
वह रथ नूतन मेघके समान प्रतीत होता था और अपनी दिव्य शोभासे प्रज्वलित-सा हो रहा था। इन्द्र-धनुषके समान कान्तिवाले श्रीकृष्ण और अर्जुन उस श्रेष्ठ रथके समीप गये ॥ १४ ॥

तापनीया सुरुचिरा ध्वजयष्टिरनुत्तमा ।
तस्यां तु वानरो दिव्यः सिंहशार्दूलकेतनः ॥ १५ ॥
उस रथका ध्वजदण्ड बड़ा सुन्दर और सुवर्णमय था। उसके ऊपर सिंह और व्याघ्रके समान भयंकर आकृतिवाला दिव्य वानर बैठा था ॥ १५ ॥

दिधक्षन्निव तत्र स्म संस्थितो मूर्ध्न्यशोभत ।
ध्वजे भूतानि तत्रासन् विविधानि महान्ति च ॥ १६ ॥
नादेन रिपुसैन्यानां येषां संज्ञा प्रणश्यति ।
उस रथके शिखरपर बैठा हुआ वह वानर ऐसा जान पड़ता था, मानो शत्रुओंको भस्म कर डालना चाहता हो। उस ध्वजमें और भी नाना प्रकारके बड़े भयंकर प्राणी रहते थे, जिनकी आवाज सुनकर शत्रु-सैनिकोंके होश उड़ जाते थे ॥ १६ १/२ ॥

स तं नानापताकाभिः शोभितं रथसत्तमम् ॥ १७ ॥
प्रदक्षिणमुपावृत्य दैवतेभ्यः प्रणम्य च ।
संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रकः ॥ १८ ॥
आरुरोह तदा पार्थो विमानं सुकृती यथा ।
वह श्रेष्ठ रथ भाँति-भाँतिकी पताकाओंसे सुशोभित हो रहा था। अर्जुनने कमर कस ली, कवच और तलवार बाँध ली, दस्ताने पहन लिये तथा रथकी परिक्रमा और देवताओंको प्रणाम करके वे उसपर आरूढ़ हुए, ठीक वैसे ही, जैसे कोई पुण्यात्मा विमानपर बैठता है ॥ १७-१८ १/२ ॥

तच्च दिव्यं धनुः श्रेष्ठं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा ॥ १९ ॥
गाण्डीवमुपसंगृह्य बभूव मुदितोऽर्जुनः ।
हुताशनं पुरस्कृत्य ततस्तदपि वीर्यवान् ॥ २० ॥
जग्राह बलमास्थाय ज्यया च युयुजे धनुः ।
मौर्व्यां तु योज्यमानायां बलिना पाण्डवेन ह ॥ २१ ॥
येऽशृण्वन् कूजितं तत्र तेषां वै व्यथितं मनः ।

तदनन्तर, पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिसका निर्माण किया था, उस दिव्य एवं श्रेष्ठ गाण्डीव धनुषको हाथमें लेकर अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए। पराक्रमी धनंजयने अग्निदेवको सामने रखकर उस धनुषको हाथमें उठाया और बल लगाकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी। महाबली पाण्डुकुमारके उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाते समय जिन लोगोंने उसकी टंकार सुनी, उनका हृदय व्यथित हो उठा ॥ १९—२१ १/२ ॥
लब्ध्वा रथं धनुश्चैव तथाक्षय्ये महेषुधी ॥ २२ ॥
बभूव कल्पः कौन्तेयः प्रहृष्टः साह्यकर्मणि ।
वज्रनाभं ततश्चक्रं ददौ कृष्णाय पावकः ॥ २३ ॥
वह रथ, धनुष तथा अक्षय तरकस पाकर कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो अग्निकी सहायता करनेमें समर्थ हो गये। तदनन्तर पावकने भगवान् श्रीकृष्णको एक चक्र दिया, जिसका मध्यभाग वज्रके समान था ॥ २२-२३ ॥
आग्नेयमस्त्रं दयितं स च कल्योऽभवत् तदा ।
अब्रवीत् पावकश्चैवमेतेन मधुसूदन ॥ २४ ॥
अमानुषानपि रणे जेष्यसि त्वमसंशयम् ।
अनेन तु मनुष्याणां देवानार्माप चाहवे ॥ २५ ॥
रक्षःपिशाचदैत्यानां नागानां चाधिकस्तथा ।
भविष्यसि न संदेहः प्रवरोऽपि निबर्हणे ॥ २६ ॥
उस अग्निप्रदत्त प्रिय अस्त्र चक्रको पाकर भगवान् श्रीकृष्ण भी उस समय सहायताके लिये समर्थ हो गये। उनसे अग्निदेवने कहा—'मधुसूदन! इस चक्रके द्वारा आप युद्धमें अमानव प्राणियोंको भी जीत लेंगे, इसमें संशय नहीं है। इसके होनेसे आप युद्धमें मनुष्यों, देवताओं, राक्षसों, पिशाचों, दैत्यों और नागोंसे भी अधिक शक्तिशाली होंगे तथा इन सबका संहार करनेमें भी निःसंदेह सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होंगे ॥ २४—२६ ॥
क्षिप्तं क्षिप्तं रणे चैतत् त्वया माधव शत्रुपु ।
हत्वाप्रतिहतं संख्ये पाणिमेष्यति ते पुनः ॥ २७ ॥
'माधव! युद्धमें आप जब-जब इसे शत्रुओंपर चलायेंगे, तब-तब यह उन्हें मारकर और स्वयं किसी अस्त्रसे प्रतिहत न होकर पुनः आपके हाथमें आ जायगा' ॥ २७ ॥
वरुणश्च ददौ तस्मै गदामशनिनिःस्वनाम् ।
दैत्यान्तकरणीं घोरां नाम्ना कौमोदकीं प्रभुः ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् भगवान् वरुणने भी बिजलीके समान कड़कड़ाहट पैदा करनेवाली कौमोदकी नामक गदा भगवान्‌को भेंट की, जो दैत्योंका विनाश करनेवाली और भयंकर थी ॥ २८ ॥
ततः पावकमब्रूतां प्रहृष्टावर्जुनाच्युतौ ।
कृतास्त्रौ शस्त्रसम्पन्नौ रथिनौ ध्वजिनावपि ॥ २९ ॥

कल्यौ स्वो भगवन् योद्धुमपि सर्वैः सुरासुरैः ।
किं पुनर्वज्रिणैकेन पन्नगार्थे युयुत्सता ॥ ३० ॥
इसके बाद अस्त्रविद्याके ज्ञाता एवं शस्त्रसम्पन्न अर्जुन और श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर अग्निदेवसे कहा—‘भगवन्! अब हम दोनों रथ और ध्वजासे युक्त हो सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरोंसे भी युद्ध करनेमें समर्थ हो गये हैं; फिर तक्षक नागके लिये युद्धकी इच्छा रखनेवाले अकेले वज्रधारी इन्द्रसे युद्ध करना क्या बड़ी बात है?’ ॥ २९-३० ॥

अर्जुन उवाच

चक्रपाणिर्हृषीकेशो विचरन् युधि वीर्यवान् ।
चक्रेण भस्मसात् सर्वं विसृष्टेन तु वीर्यवान् ।
त्रिषु लोकेषु तन्नास्ति यन्न कुर्याज्जनार्दनः ॥ ३१ ॥
अर्जुन बोले—अग्निदेव! सबकी इन्द्रियोंके प्रेरक ये महापराक्रमी जनार्दन जब हाथमें चक्र लेकर युद्धमें विचरेंगे, उस समय त्रिलोकीमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे ये चक्रके प्रहारसे भस्म न कर सकें ॥ ३१ ॥

गाण्डीवं धनुरादाय तथाक्षय्ये महेषुधी ।
अहमप्युत्सहे लोकान् विजेतुं युधि पावक ॥ ३२ ॥
पावक! मैं भी यह गाण्डीव धनुष और ये दोनों बड़े-बड़े अक्षय तरकस लेकर सम्पूर्ण लोकोंको युद्धमें जीत लेनेका उत्साह रखता हूँ ॥ ३२ ॥

सर्वतः परिवार्यैवं दावमेतं महाप्रभो ।
कामं सम्प्रज्वलाद्यैव कल्यौ स्वः साह्यकर्मणि ॥ ३३ ॥
महाप्रभो! अब आप इस सम्पूर्ण वनको चारों ओरसे घेरकर आज ही इच्छानुसार जलाइये। हम आपकी सहायताके लिये तैयार हैं ॥ ३३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः स भगवान् दाशार्हेणार्जुनेन च ।
तैजसं रूपमास्थाय दावं दग्धुं प्रचक्रमे ॥ ३४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! श्रीकृष्ण और अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् अग्निने तेजोमय रूप धारण करके खाण्डववनको सब ओरसे जलाना आरम्भ कर दिया ॥ ३४ ॥

सर्वतः परिवार्याथ सप्तार्चिर्ज्वलनस्तथा ।
ददाह खाण्डवं दावं युगान्तमिव दर्शयन् ॥ ३५ ॥
सात ज्वालामयी जिह्वाओंवाले अग्निदेव खाण्डव-वनको सब ओरसे घेरकर महाप्रलयका-सा दृश्य उपस्थित करते हुए जलाने लगे ॥ ३५ ॥

प्रतिगृह्य समाविश्य तद् वनं भरतर्षभ ।

मेघस्तनितनिर्घोषः सर्वभूतान्यकम्पयत् ॥ ३६ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस वनको चारों ओरसे अपनी लपटोंमें लपेटकर और उसके भीतरी भागमें भी व्याप्त होकर अग्निदेव मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर घोष करते हुए समस्त प्राणियोंको कँपाने लगे ॥ ३६ ॥
दह्यतस्तस्य च बभौ रूपं दावस्य भारत ।
मेरोरिव नगेन्द्रस्य कीर्णस्यांशुमतोऽंशुभिः ॥ ३७ ॥
भारत! उस जलते हुए खाण्डववनका स्वरूप ऐसा जान पड़ता था, मानो सूर्यकी किरणोंसे व्याप्त पर्वतराज मेरुका सम्पूर्ण कलेवर उद्दीप्त हो उठा हो ॥ ३७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि गाण्डीवादिदाने
चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत खाण्डवदाहपर्वमें गाण्डीवादिदानविषयक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२४ ॥