महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१७४-
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
वसिष्ठजीके अद्भुत क्षमा-बलके आगे विश्वामित्रजीका पराभव
अर्जुन उवाच
किंनिमित्तमभूद् वैरं विश्वामित्रवसिष्ठयोः ।
वसतोराश्रमे दिव्ये शंस नः सर्वमेव तत् ॥ १ ॥
अर्जुनने पूछा—गन्धर्वराज! विश्वामित्र और वसिष्ठ मुनि तो अपने-अपने दिव्य आश्रममें निवास करते हैं, फिर उनमें वैर किस कारण हुआ? ये सब बातें मुझसे कहो ॥ १ ॥
गन्धर्व उवाच
इदं वासिष्ठमाख्यानं पुराणं परिचक्षते ।
पार्थ सर्वेषु लोकेषु यथावत् तन्निबोध मे ॥ २ ॥
गन्धर्वने कहा—पार्थ! वसिष्ठजीके इस उपाख्यानको सब लोकोंमें बहुत पुराना बतलाते हैं। उसे यथार्थरूपसे कहता हूँ, सुनिये ॥ २ ॥
कान्यकुब्जे महानासीत् पार्थिवो भरतर्षभ ।
गाधीति विश्रुतो लोके कुशिकस्यात्मसम्भवः ॥ ३ ॥
भरतवंशशिरोमणे! कान्यकुब्ज देशमें एक बहुत बड़े राजा थे, जो इस लोकमें गाधिके नामसे विख्यात थे। वे कुशिकके औरस पुत्र बताये जाते हैं ॥ ३ ॥
तस्य धर्मात्मनः पुत्रः समृद्धबलवाहनः ।
विश्वामित्र इति ख्यातो बभूव रिपुमर्दनः ॥ ४ ॥
उन्हीं धर्मात्मा नरेशके पुत्र विश्वामित्रके नामसे प्रसिद्ध हैं, जो सेना और वाहनोंसे सम्पन्न होकर शत्रुओंका मानमर्दन किया करते थे ॥ ४ ॥
स चचार सहामात्यो मृगयां गहने वने ।
मृगान् विध्यन् वराहांश्च रम्येषु मरुधन्वसु ॥ ५ ॥
व्यायामकर्शितः सोऽथ मृगलिप्सुः पिपासितः ।
आजगाम नरश्रेष्ठ वसिष्ठस्याश्रमं प्रति ॥ ६ ॥
तमागतमभिप्रेक्ष्य वसिष्ठः श्रेष्ठभागृषिः ।
विश्वामित्रं नरश्रेष्ठं प्रतिजग्राह पूजया ॥ ७ ॥
एक दिन वे अपने मन्त्रियोंके साथ गहन वनमें आखेटके लिये गये। मरुप्रदेशके सुरम्य वनोंमें उन्होंने वराहों और अन्य हिंसक पशुओंको मारते हुए एक हिंसक पशुको पकड़नेके
लिये उसका पीछा किया। अधिक परिश्रमके कारण उन्हें बड़ा कष्ट सहना पड़ा। नरश्रेष्ठ! वे प्याससे पीड़ित हो महर्षि वसिष्ठके आश्रममें आये। मनुष्योंमें श्रेष्ठ महाराज विश्वामित्रको आया देख पूजनीय पुरुषोंकी पूजा करनेवाले महर्षि वसिष्ठने उनका सत्कार करते हुए आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये आमन्त्रित किया।। ५—७।।
पाद्यार्घ्याचमनीयैस्तं स्वागतेन च भारत।
तथैव परिजग्राह वन्येन हविषा तदा।। ८।।
भारत! पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्वागत-भाषण तथा वन्य हविष्य आदिसे उन्होंने विश्वामित्रजीका सत्कार किया।। ८।।
तस्याथ कामधुग् धेनुर्वसिष्ठस्य महात्मनः।
उक्ता कामान् प्रयच्छेति सा कामान् दुह्यते सदा।। ९।।
महात्मा वसिष्ठजीके यहाँ एक कामधेनु थी, जो 'अमुक-अमुक मनोरथोंको पूर्ण करो' यह कहने-पर सदा उन-उन कामनाओंको पूर्ण कर दिया करती थी।। ९।।
ग्राम्यारण्यांश्चौषधींश्च दुदुहे पय एव च।
षड्रसं चामृतनिभं रसायनमनुत्तमम्।। १०।।
भोजनीयानि पेयानि भक्ष्याणि विविधानि च।
लेह्यान्यमृतकल्पानि चोष्याणि च तथार्जुन।। ११।।
रत्नानि च महार्हाणि वासांसि विविधानि च।
तैः कामैः सर्वसम्पूर्णैः पूजितश्च महीपतिः।। १२।।
ग्रामीण तथा जंगली अन्न, फल-मूल, दूध, षड्रस भोजन, अमृतके समान मधुर परम उत्तम रसायन, खाने, पीने और चबानेयोग्य भाँति-भाँतिके पदार्थ, अमृतके समान स्वादिष्ट चटनी आदि तथा चूसनेयोग्य ईख आदि वस्तुएँ तथा भाँति-भाँतिके बहुमूल्य रत्न एवं वस्त्र आदि सब सामग्रियोंको उस कामधेनुने प्रस्तुत कर दिया। सब प्रकारसे उन सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंके द्वारा हे अर्जुन! राजा विश्वामित्र भलीभाँति पूजित हुए।। १०—१२।।
सामात्यः सबलश्चैव तुतोष स भृशं तदा।
षडुन्नतां सुपाश्र्वोरुं पृथुपञ्चसमावृताम्।। १३।।
उस समय वे अपनी सेना और मन्त्रियोंके साथ बहुत संतुष्ट हुए। महर्षिकी धेनुका मस्तक, ग्रीवा, जाँघें, गलकम्बल, पूँछ और थन—ये छः अंग बड़े एवं विस्तृत थे।<sup>३.</sup> उसके पार्श्वभाग तथा ऊरु बड़े सुन्दर थे। वह पाँच पृथुल अंगोंसे सुशोभित थी<sup>३</sup>।। १३।।
मण्डूकनेत्रां स्वाकारां पीनोधसमनिन्दिताम्।
सुवालधिं शङ्कुकर्णां चारुशृङ्गां मनोरमाम्।। १४।।
उसकी आँखें मेढक-जैसी थीं। आकृति बड़ी सुन्दर थी। चारों थन मोटे और फैले हुए थे। वह सर्वथा प्रशंसाके योग्य थी। सुन्दर पूँछ, नुकीले कान और मनोहर सींगोंके कारण वह बड़ी मनोरम जान पड़ती थी ॥ १४ ॥
पुष्टायतशिरोग्रीवां विस्मितः सोऽभिवीक्ष्य ताम् ।
अभिनन्द्य स तां राजा नन्दिनीं गाधिनन्दनः ॥ १५ ॥
उसके सिर और गर्दन विस्तृत एवं पुष्ट थे। उसका नाम नन्दिनी था। उसे देखकर विस्मित हुए गाधिनन्दन विश्वामित्रने उसका अभिनन्दन किया ॥ १५ ॥
अब्रवीच्च भृशं तुष्टः स राजा तमृषिं तदा ।
अर्बुदेन गवां ब्रह्मन् मम राज्येन वा पुनः ॥ १६ ॥
नन्दिनीं सम्प्रयच्छस्व भुङ्क्ष्व राज्यं महामुने ।
और अत्यन्त संतुष्ट होकर राजा विश्वामित्रने उस समय उन महर्षिसे कहा—‘ब्रह्मन्! आप दस करोड़ गायें अथवा मेरा सारा राज्य लेकर इस नन्दिनी-को मुझे दे दें। महामुने! इसे देकर आप राज्य भोग करें’ ॥ १६ १/२ ॥
वसिष्ठ उवाच
देवतातिथिपित्रर्थं याज्यार्थं च पयस्विनी ॥ १७ ॥
अदेया नन्दिनीयं वै राज्येनापि तवानघ ।
वसिष्ठजीने कहा—अनघ! देवता, अतिथि और पितरोंकी पूजा एवं यज्ञके हविष्य आदिके लिये यह दुधारू गाय नन्दिनी अपने यहाँ रहती है, इसे तुम्हारा राज्य लेकर भी नहीं दिया जा सकता ॥ १७ १/२ ॥
विश्वामित्र उवाच
क्षत्रियोऽहं भवान् विप्रस्तपस्स्वाध्यायसाधनः ॥ १८ ॥
विश्वामित्रजी बोले—मैं क्षत्रिय राजा हूँ और आप तपस्या तथा स्वाध्यायका साधन करनेवाले ब्राह्मण हैं ॥ १८ ॥
ब्राह्मणेषु कुतो वीर्यं प्रशान्तेषु धृतात्मसु ।
अर्बुदेन गवां यस्त्वं न ददासि ममेप्सितम् ॥ १९ ॥
स्वधर्मं न प्रहास्यामि नेष्यामि च बलेन गाम् ।
(क्षत्रियोऽस्मि न विप्रोऽहं बाहुवीर्योऽस्मि धर्मतः ।
तस्माद् भुजबलेनेमां हरिष्यामीह पश्यतः ॥)
ब्राह्मण अत्यधिक शान्त और जितात्मा होते हैं। उनमें बल और पराक्रम कहाँसे आ सकता है; फिर क्या बात है जो आप मेरी अभीष्ट वस्तुको एक अर्बुद गाय लेकर भी नहीं दे रहे हैं। मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूँगा, इस गायको बलपूर्वक ले जाऊँगा। मैं क्षत्रिय हूँ, ब्राह्मण नहीं हूँ। मुझे धर्मतः अपना बाहुबल प्रकट करनेका अधिकार है; अतः बाहुबलसे ही आपके देखते-देखते इस गायको हर ले जाऊँगा ।। १९ १/२ ।।
वसिष्ठ उवाच
बलस्थश्चासि राजा च बाहुवीर्यश्च क्षत्रियः ॥ २० ॥
यथेच्छसि तथा क्षिप्रं कुरु मा त्वं विचारय ।
**वसिष्ठजीने कहा—**तुम सेनाके साथ हो, राजा हो और अपने बाहुबलका भरोसा रखनेवाले क्षत्रिय हो। जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा शीघ्र कर डालो, विचार न करो ।। २० १/२ ।।
गन्धर्व उवाच
एवमुक्तस्तथा पार्थ विश्वामित्रो बलादिव ॥ २१ ॥
हंसचन्द्रप्रतीकाशां नन्दिनीं तां जहार गाम् ।
कशादण्डप्रणुदितां काल्यमानामितस्ततः ॥ २२ ॥
**गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! वसिष्ठजीके यों कहनेपर विश्वामित्रने मानो बलपूर्वक ही हंस और चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाली उस नन्दिनी गायका अपहरण कर लिया। उसे कोड़ों और डंडोंसे मार-मारकर इधर-उधर हाँका जा रहा था ॥ २१-२२ ॥
हम्भायमाना कल्याणी वसिष्ठस्याथ नन्दिनी ।
आगम्याभिमुखी पार्थ तस्थौ भगवदुन्मुखी ॥ २३ ॥
भृशं च ताड्यमाना वै न जगामाश्रमात् ततः ।
अर्जुन! उस समय कल्याणमयी नन्दिनी डकराती हुई महर्षि वसिष्ठके सामने आकर खड़ी हो गयी और उन्हींकी ओर मुँह करके देखने लगी। उसके ऊपर जोर-जोरसे मार पड़ रही थी, तो भी वह आश्रमसे अन्यत्र नहीं गयी ॥ २३ ½ ॥
वसिष्ठ उवाच
शृणोमि ते रवं भद्रे विनदन्त्याः पुनः पुनः ॥ २४ ॥
ह्रियसे त्वं बलाद् भद्रे विश्वामित्रेण नन्दिनि ।
किं कर्तव्यं मया तत्र क्षमावान् ब्राह्मणो ह्यहम् ॥ २५ ॥
**वसिष्ठजी बोले—**भद्रे! तुम बार-बार क्रन्दन कर रही हो। मैं तुम्हारा आर्तनाद सुनता हूँ, परंतु क्या करूँ? कल्याणमयी नन्दिनि! विश्वामित्र तुम्हें बलपूर्वक हर ले जा रहे हैं। इसमें मैं क्या कर सकता हूँ। मैं एक क्षमाशील ब्राह्मण हूँ ॥ २४-२५ ॥
गन्धर्व उवाच
सा भयान्नन्दिनी तेषां बलानां भरतर्षभ ।
विश्वामित्रभयोद्विग्ना वसिष्ठं समुपागमत् ॥ २६ ॥
**गन्धर्व कहता है—**भरतवंशशिरोमणे! नन्दिनी विश्वामित्रके भयसे उद्विग्न हो उठी थी। वह उनके सैनिकोंके भयसे मुनिवर वसिष्ठकी शरणमें गयी ॥ २६ ॥
गौरुवाच
कशाग्रदण्डाभिहतां क्रोशन्तीं मामनाथवत् ।
विश्वामित्रबलैर्घोरैर्भगवन् किमुपेक्षसे ॥ २७ ॥
**गौने कहा—**भगवन्! विश्वामित्रके निर्दय सैनिक मुझे कोड़ों और डंडोंसे पीट रहे हैं। मैं अनाथकी भाँति क्रन्दन कर रही हूँ। आप क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं? ॥ २७ ॥
गन्धर्व उवाच
नन्दिन्यामेवं क्रन्दन्त्यां धर्षितायां महामुनिः ।
न चुक्षुभे तदा धैर्यान्न चचाल धृतव्रतः ॥ २८ ॥
**गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! नन्दिनी इस प्रकार अपमानित होकर करुण क्रन्दन कर रही थी, तो भी दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले महामुनि वसिष्ठ न तो क्षुब्ध हुए और न धैर्यसे ही विचलित हुए ॥ २८ ॥
वसिष्ठ उवाच
क्षत्रियाणां बलं तेजो ब्राह्मणानां क्षमा बलम् ।
क्षमा मां भजते यस्माद् गम्यतां यदि रोचते ॥ २९ ॥
**वसिष्ठजी बोले—**भद्रे! क्षत्रियोंका बल उनका तेज है और ब्राह्मणोंका बल उनकी क्षमा है। चूँकि मुझे क्षमा अपनाये हुए है, अतः तुम्हारी रुचि हो, तो जा सकती हो ॥ २९ ॥
नन्दिन्युवाच
किं नु त्यक्तास्मि भगवन् यदेवं त्वं प्रभाषसे ।
अत्यक्ताहं त्वया ब्रह्मन् नेतुं शक्या न वै बलात् ॥ ३० ॥
**नन्दिनीने कहा—**भगवन्! क्या आपने मुझे त्याग दिया, जो ऐसी बात कहते हैं? ब्रह्मन्! आपने त्याग न दिया हो, तो कोई मुझे बलपूर्वक नहीं ले जा सकता ॥ ३० ॥
वसिष्ठ उवाच
न त्वां त्यजामि कल्याणि स्थीयतां यदि शक्यते ।
दृढेन दाम्ना बद्ध्वैष वत्सस्ते ह्रियते बलात् ॥ ३१ ॥
**वसिष्ठजी बोले—**कल्याणि! मैं तुम्हारा त्याग नहीं करता। तुम यदि रह सको तो यहीं रहो। यह तुम्हारा बछड़ा मजबूत रस्सीसे बाँधकर बलपूर्वक ले जाया जा रहा है ॥ ३१ ॥
गन्धर्व उवाच
स्थीयतामिति तच्छ्रुत्वा वसिष्ठस्य पयस्विनी ।
ऊर्ध्वाञ्चितशिरोग्रीवा प्रबभौ रौद्रदर्शना ॥ ३२ ॥
**गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! 'यहीं रहो' वसिष्ठजीका यह वचन सुनकर नन्दिनीने अपने सिर और गर्दनको ऊपरकी ओर उठाया। उस समय वह देखनेमें बड़ी भयानक जान पड़ती थी ॥ ३२ ॥
क्रोधरक्तेक्षणा सा गौर्हम्भारवघनस्वना ।
विश्वामित्रस्य तत् सैन्यं व्यद्रावयत सर्वशः ॥ ३३ ॥
क्रोधसे उसकी आँखें लाल हो गयी थीं। उसके डकरानेकी आवाज जोर-जोरसे सुनायी देने लगी। उसने विश्वामित्रकी उस सेनाको चारों ओर खदेड़ना शुरू किया ॥ ३३ ॥
कशाग्रदण्डाभिहता काल्यमाना ततस्ततः ।
क्रोधरक्तेक्षणा क्रोधं भूय एव समाददे ॥ ३४ ॥
कोड़ोंके अग्रभाग और डंडोंसे मार-मारकर इधर-उधर हाँके जानेके कारण उसके नेत्र पहलेसे ही क्रोधके कारण रक्तवर्णके हो गये थे। फिर उसने और भी क्रोध धारण किया ।। ३४ ।।
आदित्य इव मध्याह्ने क्रोधदीप्तवपुर्बभौ ।
अङ्गारवर्षं मुञ्चन्ती मुहुर्वालधितो महत् ।। ३५ ।।
असृजत् पह्लवान् पुच्छात् प्रस्रवाद् द्रविडाञ्छकान् ।
योनिदेशाच्च यवनान् शकृतः शबरान् बहून् ।। ३६ ।।
क्रोधके कारण उसके शरीरसे अपूर्व दीप्ति प्रकट हो रही थी। वह दोपहरके सूर्यकी भाँति उद्भासित हो उठी। उसने अपनी पूँछसे बारंबार अंगारकी भारी वर्षा करते हुए पूँछसे स पह्लवोंकी सृष्टि की, थनोंसे द्रविड़ों और शकोंको उत्पन्न किया, योनिदेशसे यवनों और गोबरसे बहुतेरे शबरोंको जन्म दिया ।। ३५-३६ ।।
मूत्रतश्चासृजत् कांश्चिच्छबरांश्चैव पार्श्वतः ।
पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ।। ३७ ।।
कितने ही शबर उसके मूत्रसे प्रकट हुए। उसके पार्श्वभागसे पौण्ड्र, किरात, यवन, सिंहल, बर्बर और खसोंकी सृष्टि हुई ।। ३७ ।।
चिबुकांश्च पुलिन्दांश्च चीनान् हूणान् सकेरलान् ।
ससर्ज फेनतः सा गौर्म्लेच्छान् बहुविधानपि ॥ ३८ ॥
इसी प्रकार उस गौने फेनसे चिबुक, पुलिन्द, चीन, हूण, केरल आदि बहुत प्रकारके म्लेच्छोंकी सृष्टि की ॥ ३८ ॥